असली देशद्रोही को पहचानना सीखिए

santosh-bhartiyaमुझे किसी ने दो दिन पहले एक कहानी सुनाई. कहानी पुरानी है. एक राजा था. एक दिन उसके यहां दो दर्जी आए. उन्होंने कहा कि हम स्वर्ग से धागा लाकर पोशाक बनाते हैं, जिसे देवता पहनते हैं.

राजा ने कहा, एक पोशाक मेरे लिए भी बनाओ, मुंहमांगा इनाम मिलेगा. दर्जी ने कहा, ठीक है. मुझे 50 दिन का समय दीजिए, लेकिन उस पोशाक की खास बात ये है कि वो मूर्खों को नहीं दिखेगी.

राजा और भी खुश हुआ कि इस तरह तो हम अपने राज्य के मूर्खों को भी पहचान लेंगे. दोनों ने एक बंद कमरे में पोशाक बनानी शुरू कर दी. दोनों दर्जी देर रात तक खटर-पटर करते रहते थे. एक दिन राजा ने अपने मंत्री से कहा, वहां जाकर देखो कि कैसी पोशाक बन रही है? मंत्री कमरे के अंदर गया. जाते ही उनमें से एक ने कहा, देखो मंत्री, कितना सुंदर रेशा है! पर मंत्री को कुछ दिखाई नहीं दिया.

उसे अचानक वो बात याद आ गई कि मूर्खों को ये पोशाक नहीं दिखाई देगी. मंत्री ने भी कहा, हां, बहुत सुंदर है. उसने आकर राजा को बताया, बहुत सुंदर बन रही है आपकी पोशाक. राजा बहुत खुश हुआ. एक दिन राजा भी देखने गया. उसे भी कुछ दिखाई नहीं दिया, पर वह चुप रहा. उसने मन में सोचा कि लगता है, मंत्री मुझसे ज्यादा बुद्धिमान है, तभी पोशाक उसे दिखाई दी थी.

मैं मूर्ख हूं, यह सोच राजा पशोपेश में पड़ गया, पर चुप रहा कि कहीं वो मूर्ख ना साबित हो जाए. पोशाक बनकर तैयार हो गई. दोनों दर्जियों ने कहा कि कल हम जनता के सामने ये पोशाक पहनाएंगे, फिर राजा की सवारी निकलेगी. दूसरे दिन राजा को पोशाक पहनाई गई, जो किसी को दिख नहीं रही थी, लेकिन बोला कोई नहीं, क्योंकि उन्हें डर था कि लोग उन्हें मूर्ख कहेंगे. राजा नंग-धड़ंग होकर बड़ी शान के साथ निकल रहा था.

अब ये कहानी आज बिल्कुल फिट दिख रही है. नोटबंदी से सब परेशान हैं, लेकिन कह दें, तो लोग कहेंगे कि तुम्हारे अंदर देशभक्ति नहीं है, देश के लिए कोई भाव नहीं है. सीमा पर सिपाही खड़ा हो सकता है, तुम लाइन में नहीं खड़े हो सकते. डरा दिया गया है देश के नाम पर. सभी तारीफों में लगे हैं, जैसे पोशाक की तारीफ कर रहे थे.

50 दिन ज्यादा नहीं, देखना देश कितना बदलता है. महंगाई कितनी कम हो जाएगी, भ्रष्टाचार कितना कम हो जाएगा, कालाधन समाप्त हो जाएगा और अगर देश ये सब नहीं कर पाया, तो कैशलेस तो हो ही जाएगा.

हमारे प्रधानमंत्री जी सोशल मीडिया की बहुत तारीफ करते हैं. उन्होंने सेना के जवानों से भी कहा कि सोशल मीडिया में आपकी बहुत तारीफ हो रही है. वो देश के लोगों से भी कहते हैं कि डिजिटल हो जाओ. हमारे वित्तमंत्री कहते हैं कि देश के 50 प्रतिशत लोग यानी सवा सौ करोड़ के आधे लोग इंटरनेट पर हैं. अब वो कैसे कहते हैं, ये वही जानें. लेकिन हमें जहां तक अनुमान है, 6 करोड़ के आसपास लोग सोशल मीडिया से जुड़े हैं.

इसमें 60 लाख लोग प्रधानमंत्री जी के स्ट्रॉन्ग सपोर्टर हैं, उनका एक ग्रुप है. ढाई हजार लोग देश में प्रधानमंत्री जी के विचारों वाली पार्टी के पे-रोल पर दिन-रात बैठकर सोशल मीडिया में तोपें चला रहे हैं, गोले दाग रहे हैं. अब उस सोशल मीडिया पर अगर हमारी सरकार फैसले ले, प्रधानमंत्री जी फैसले लें, अच्छी बात है, लेकिन इस फैसले लेने में एक बड़ा खतरा है.

आप भी उसी भ्रमजाल, झूठ के चक्रव्यूह में फंस जाते हैं, जिसमें फंसकर 6 करोड़ लोग एक अलग तरह की हवा बना रहे हैं. ऐसे लोगों को देश के किसानों की मजबूरी नहीं दिखाई देती, ऐसे लोगों को नौकरी से निकाले जाने वाले मजदूरों का दर्द समझ में नहीं आता है.

ऐसे लोगों को सब्जी, खोमचे, रिक्शे वाले, छोटे दुकानदार, गांवों में फैली हुई पूरी सप्लाई चेन, जो लोगों के पास छोटी-छोटी चीजें तत्परता से पहुंचाती है, उसमें लगे हुए लोगों का दर्द नजर नहीं आता. यह दर्द सोशल मीडिया के झांसे वाले चक्रव्यूह में फंस गया है.

इसका उदाहरण देखना हो, तो आप एक लाइन प्रधानमंत्री की नीतियों के खिलाफ लिखकर देख लीजिए. तब हमें पता चलेगा कि हम लोकतांत्रिक देश में हैं या मूर्खों के तानाशाही वाले देश में हैं. आपके बोलने और सत्य उजागर करने की आजादी के ऊपर जो हमला होगा, वह आपको सन्न कर देगा. मां, बहन, बेटियों की बेलगाम गालियां वे लोग देते हैं, जो पिछले दो ढाई साल से किसी एक चीज पर स्थिर नहीं हैं.

अब उन्हें सिर्फ और सिर्फ कैशलेस सोसाइटी दिखाई दे रही है. अब उन्हें कालाधन नहीं दिखाई दे रहा. अब उन्हें गरीबों, किसानों का दर्द नहीं दिखाई दे रहा है. अब उन्हें वो सारे वादे नहीं दिखाई दे रहे हैं, जिन्हें पूरा करने का सपना हमें सरकार ने दिखाया था.

ये बातें मैं इसलिए कह रहा हूं कि देश की सत्यता और वास्तविकता एक तरफ है और सोशल मीडिया की दुनिया में चीत्कार-चिंघाड़ और विद्रूप उपहास एक तरफ है. मैं उन सारे लोगों से निवेदन करना चाहता हूं कि आप सोशल मीडिया पर जितना झूठ फैलाना चाहें, फैलाइए. जितनी गाली देना चाहें, दीजिए. आप जितना लोगों को भ्रमित करना चाहें, कीजिए, पर देश में कई तरह की काठ की हांडियां चढ़ रही हैं.

कहावत है कि काठ की हांडी दोबारा इस्तेमाल नहीं होती, आग पर नहीं चढ़ाई जाती, लेकिन जिनके पास कई काठ की हांडियां हों, उनका क्या करेंगे आप? इसलिए अब इस देश में हर चीज का रिश्ता देशभक्ति से जुड़ गया है और इन दिनों तो देशभक्तों की एक नई पौध सामने आ गई है.

आप अगर पाकिस्तान को गाली नहीं देते, तो आप देशभक्त नहीं हैं. अगर आप नोटबंदी का समर्थन नहीं करते, तो आप देशभक्त नहीं हैं, लेकिन अगर आप गरीबों की तकलीफ, उनकी नौकरियां जाने, लोगों के रोजगार समाप्त होने की बात करते हैं, तो आप देशद्रोही हैं. एक नई बहस, देशभक्त कौन है और देशद्रोही कौन है, ये चल पड़ी है. जिस परंपरागत परिभाषा को हम जानते हैं कि देशभक्ति क्या है और देशद्रोह क्या है, उसे इस सोशल मीडिया ने भुला दिया है.

अब मैं सिर्फ इतना कह सकता हूं कि हमारा देश डिजिटल नहीं हो पाया है, ये बहुत अच्छी बात है, क्योंकि जिस देश में सरकार एक मोबाइल फोन की सर्विस ठीक नहीं कर सकती, वो कैशलेस इकोनॉमी की बात कर रही है.

जो नोटों को सही ढंग से छापकर लोगों तक पहुंचा नहीं पा रही है, वो डिजिटल बैंकिंग की बात कर रही है. सपना अच्छा है, लेकिन इसमें कहीं ऐसा न हो कि बैंकों व मध्यम वर्ग के खातों से करोड़ों रुपए हैक कर निकाल लिए जाएं.

अगर आपका पैसा निकल जाता है, तो बैंक आपकी सुनवाई नहीं करता. दूसरी तरफ बैंक उनकी सुनवाई कर रहा है, जो लोग इस देश से लाखों करोड़ लेकर फरार हो गए हैं. उनका मूलधन और ब्याज माफ करने में बैंक एक-दूसरे से होड़ कर रहे हैं.

क्या बैंकों के चेयरमैन या वित्त मंत्रालय के अधिकारियों की संपत्ति की जांच नहीं होनी चाहिए? जब हम ब्लैक मनी की बात करते हैं, तो उनका पैसा क्यों माफ कर देते हैं, जो विल्फुल डिफॉल्टर हैं.

ये सारे सवाल दिमाग में आते हैं, लेकिन ये सवाल उनके लिए बेमतलब हैं, जो सोशल मीडिया पर देशभक्ति का गाना गा रहे हैं. दरअसल ये सबसे बड़े देशद्रोही हैं, जो देश की सरकार को भी मुगालते में डाल रहे हैं और नई-नई अफवाहें फैला रहे हैं.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.