कभी न ख़त्म होने वाली प्रक्रिया

indo-pakउ़फा (रूस) में जब भारत एवं पाकिस्तान के निर्वाचित राष्ट्राध्यक्षों की बातचीत चल रही थी, तो उसी समय यह तय हो गया था कि नियंत्रण रेखा पर तनाव बढ़ जाएगा और आतंकवादी गतिविधियों में भी तेज़ी आ जाएगी. दोनों देशों के बीच विवाद के लंबे इतिहास में जब भी शांति बहाली संभव लगने लगती है, तो ऐसी शक्तियां आड़े आ जाती हैं, जिनकी वजह से शांति प्रक्रिया रुक जाती है.

दोनों देशों के बीच राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) स्तर की प्रस्तावित बैठक (जिसे बाद में रद्द कर दिया गया) एक उच्चस्तरीय बैठक थी. पिछले कई वर्षों से इस तरह की वार्ताएं होती रही हैं. ऐसी वार्ताओं में पाकिस्तान कश्मीर को अपना मुख्य मुद्दा मानता है, जो ़िफलहाल भारत के लिए मुद्दा नहीं है. भारत चाहता है कि पाकिस्तान आतंकवाद का मसला सुलझाए. भारत का कोई भी प्रधानमंत्री कश्मीर मसले पर भारत के हितों से समझौता नहीं कर सकता. उसी तरह किसी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को इतना अधिकार नहीं है कि वह वांछित आतंकवादियों को भारत के हवाले कर दे.

परवेज़ मुशर्रफ ऐसे में एक अपवाद थे, क्योंकि वह एक सैन्य तानाशाह थे. अपनी किताब-दी पाकिस्तान पैराडॉक्स: इंस्टेबिलिटी एंड रिजिलीएंस में क्रिस्टोफे जे़फरलो ने यह दिखाया है कि कैसे सेना वहां के शासक वर्ग के साथ मिलकर देश चलाती है. दोनों वर्गों की संस्कृति साझी है, दोनों के बीच रिश्तेदारियां हैं और दोनों के सोचने का तरीका एक है.

वर्ष 1971 के बाद लोकतंत्र की तीसरी वापसी पर इसे मज़बूती मिली है. इमरान खान के प्रदर्शन सेना को उकसाने के लिए किए जा रहे थे, ताकि वह सत्ता पर क़ब्ज़ा कर ले, लेकिन इसमें उन्हें नाकामी हाथ लगी. नवाज़ शरीफ को नेशनल असेंबली का पूरा समर्थन हासिल है, लेकिन इसके बावजूद देश में सत्ता के दो केंद्र बने हुए हैं. अ़फग़ानिस्तान, परमाणु हथियार और कश्मीर से जुड़े मामले सेना के हाथ में हैं, बाक़ी मामले नवाज़ शरीफ देखते हैं.

सेना देश में आतंकवाद के मसले से परेशान है. अभी हाल में आतंकवादियों ने पंजाब के गृह मंत्री की हत्या कर दी थी. लेकिन, यदि आतंकवादी सीमा पार करके भारत जाते हैं, तो इसमें उसे कोई आपत्ति नहीं है. इन सबके बावजूद पाकिस्तान की सिविल सोसायटी बदल रही है. वर्ष 1998 के पाकिस्तान दौरे के दौरान मैं जिस घर में गया, मुझसे यही कहा गया कि आप लोग कश्मीर छोड़ क्यों नहीं देते?

अभी हाल में जब कश्मीर पर लिखी अपनी किताब पर व्याख्यान देने के लिए मैंने 10 दिन लाहौर और इस्लामाबाद में गुज़ारे थे, तो वहां लोगों में नरेंद्र मोदी के बारे में जानने की जिज्ञासा थी. उन्होंने भारत के सेक्युलर मीडिया को पढ़ रखा था, जिससे उन्हें लग रहा था कि नरेंद्र मोदी एक आग उगलने और युद्धोत्तेजक बातें करने वाले व्यक्ति होंगे. वे अभी तक यह नहीं समझ पाए हैं कि नरेंद्र मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में नवाज़ शरीफ को बुलाकर दोस्ती का हाथ क्यों बढ़ाया और शांति के दूसरे प्रस्तावों का क्या अर्थ है?

जहां तक मैं समझाता हूं कि उन्हें लेकर संघ के कुछ उजड्ड तत्व भी हैरान हैं. यहां तक कि कांग्रेस ने भी आक्रामक रुख अख्तियार कर रखा है कि सीमा पर होने वाले उल्लंघन को भारत कैसे बर्दाश्त कर सकता है. बेशक, कांग्रेस यह भूल गई होगी कि मनमोहन सिंह ने शांति की नीति अपनाने के लिए कितनी कोशिश की और उनकी पार्टी ने उनका कैसे साथ दिया. शर्म अल-शेख याद कीजिए. उस समय अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे.

भारत-पाकिस्तान दोस्ती के लिए सभी भारतीय नेताओं में सबसे अधिक प्रयास उन्होंने ही किए थे. वह नरेंद्र मोदी के हीरो हैं. राजनीति विरोधाभासों से पूर्ण है. अक्सर देखा गया है कि चरमपंथी (हार्ड लाइनर) समझे जाने वाले नेताओं ने स्थायी शांति स्थापित की है. वे यह परवाह नहीं करते कि उनके नर्म रुख पर उनकी आलोचना हो सकती है. अमेरिकी राष्ट्रपतियों रिचर्ड निक्सन एवं रोनाल्ड रीगन ने क्रमश: चीन और गोर्वाचोव के साथ ऐसा ही किया था. अगले हफ्ते न सही, अगले साल न सही, लेकिन ऐसा संभव है कि नरेंद्र मोदी पाकिस्तान के साथ स्थायी शांति बनाने में कामयाब हो जाएं. वह अपने संकल्पों में अटल हैं.

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