नोटबंदी से कल्याणपुर सीमेंट फैक्ट्री पर ग्रहण

cimentबिहार में पिछले ढाई दशक में नए कल-कारखाने तो नहीं लगे लेकिन जो पुराने कारखाने थे, उनमें भी किन्हीं कारणों से ताले लगते गए. कल-कारखानों के बंद होने का प्रमुख कारण सरकार की उपेक्षा नीति या फिर मजदूरों की यूनियनबाजी रही. कभी बिहार के सबसे ब़डे उद्योग समूह में शुमार डालमियानगर का रोहतास इंडस्ट्रीज यूनियनबाजी और प्रबंधन की आपसी खींचतान में बंद हो गया.

जिसका खामियाजा वर्षों से कार्यरत हजारों कर्मचारियों को भुगतना पड़ा. इसी प्रकार बिहार के कई सरकारी और निजी क्षेत्र के उद्योग धीरे-धीरे बंद होते चले गए. बिहार के रोहतास जिला स्थित 80 साल पुराने कल्याणपुर सीमेंट फैक्ट्री को भी कहीं बंद करने की साजिश तो नहीं हो रही है. कल्याणपुर सीमेंट फैक्ट्री का बिहार ही नहीं बल्कि देश के प्रमुख सीमेंट फैक्ट्रियों में महत्वपूर्ण स्थान है.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 8 नवम्बर 2016 की मध्यरात्री से 1000 और 500 के पुराने नोटों का चलन बंद किए जाने और राशि निकासी के नियमों में बदलाव किए जाने के कारण कल्याणपुर सीमेंट फैक्ट्री पर भी विपरीत प्रभाव पड़ा है. इस फैक्ट्री में कार्यरत मजदूरों को समय से वेतन नहीं मिल पा रहा है.

प्रबंधन ने पूर्व में मजदूरों को आश्वासन दिया था कि नवम्बर-दिसम्बर में मजदूरों के बकाया राशि का भुगतान कर दिया जाएगा. लेकिन नोटबंदी के बाद प्रबंधन ने अपने को लाचार बताते हुए कहा कि नोटबंदी से मजदूरों का वेतन भुगतान भी प्रभावित हुआ है. जल्द ही मजदूरों का सभी बकाया भुगतान कर दिया जाएगा. इस सीमेंट फैक्ट्री के मजदूरों का वेतन पिछले 8 माह से बकाया है.

मजदूरों का आरोप है कि प्रबंधन नोटबंदी का बहाना बनाकर वेतन भुगतान नहीं कर रहा है. मजदूरों ने कहा है कि हमारे पास 1000-500 के जो पुराने नोट थे, उन्हें भी बैंक में जमा करा दिया गया है. अब ऐसे नियम बना दिए गए हैं कि बैंकों में जमा राशि निकल नहीं पा रही है. इधर प्रबंधन भी नोटबंदी का ही रोना रो रहा हैं और इसी के कारण भुगतान में असमर्थता का राग अलाप रहा है.

फैक्ट्री के मजदूर पिछले कुछ दिनों से अपने बकाया वेतन भुगतान के लिए कारखाने के गेट पर धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं. लेकिन उनकी समस्याएं सुनने वाला कोई नहीं है. केसिएल प्रबंधन की ओर से मजदूरों को कोई ठोस आश्वासन भी नहीं दिया जा रहा है. जिसके कारण मजदूरों को, उनकी कमाई डूबने का भय सताने लगा है. हालांकि प्रबंधन की ओर से ऐसे संकेत मिले हैं कि दिसंबर के अंत तक मजदूरों का वेतन भुगतान कर दिया जाएगा.

कर्मचारी यूनियन के नेता बिपिन पासवान ने बताया कि इस कारखाने में काम कर रहे मजदूरों के घरों में राशन के लाले पड़े हुए हैं. लेकिन कंपनी के अधिकारी कान में तेल डालकर सो गए हैं. मजदूर नेता नारायण राम व बबन सिंह का आरोप है कि पिछले 8 माह से केसिएल के मजदूरों का वेतन भुगतान नहीं किया गया है. नोटबंदी के बाद जो थोड़े-बहुत पैसे बचाकर रखे थे, उन्हें भी बैंकों में जमा कर दिए जाने से समस्या और गंभीर हो गई है.

इस कारखाने की स्थिति तब और गंभीर हो गई, जब पैकिंग सेक्शन के मजदूरों ने 8 दिसम्बर 2016 को काम करने से इंकार कर दिया. तब प्रबंधन ने मजदूरों की समस्या सुनने के बजाय सुरक्षाबलों के द्वारा उन्हें फैक्ट्री से बाहर निकलवा दिया.

प्रबंधन के इस रवैये से मजदूरों का आक्रोश और बढ़ गया और सभी मजदूर कारखाने के गेट पर धरना देकर बैठ गए. मामला गंभीर होता देख प्रबंधन ने मजदूरों से सुलह का भी प्रयास भी किया. लेकिन आक्रोशित मजदूर कंपनी के अधिकारियों का पुतला दहन कर विरोध जताने लगे.

केसिएल के मैनेजर सीवी कुमार और एचआर मैनेजर अर्जुन सिंह का कहना है कि यूनियन के कुछ नेता मजदूरों की आ़ड में कंपनी की साख खराब कर रहे हैं. प्रबंधन के लोगों ने यह भी बताया कि बिहार के अन्य बंद पड़े कारखानों की तरह इस कारखाने को भी बंद कराने की साजिश रची जा रही है.

यूनियनबाजी कर के फैक्ट्री पर ताला लगाने का प्रयास किया जा रहा है. प्रबंधन ने कहा है कि मजदूरों को ऐसे नेताओं से सचेत रहना चाहिए. ऐसे लोग अपने हित के लिए मजदूरों का इस्तेमाल कर रहे हैं. हालांकि ऐसे नेताओं के मंसूबे कभी पूरे नहीं होंगे.

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