परद्रव्येषु आत्मवत्‌

Currency Exchangeबचपन में पढ़ाया जाता था परद्रव्येषु लोष्टवत. पर दारेषु मातृवत तो निरर्थक होता जा रहा है. मोदी जी के आने पर भारत को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के संकल्प से आशा बंधी थी कि पर द्रव्येषु लोष्टवत्‌ की प्रतिष्ठा बढ़ेगी. चोरी चकारी पर अंकुश लगेगा. लोग पैर फैलाकर निश्चिन्तता से सोएंगे.

मुरादाबाद की रैली में मोदी जी ने कहा, मैं तो फकीर हूं, झोला उठाऊंगा चलता बनूंगा. इस वाक्य को मेरे एक मित्र ने बहुत गंभीरता से लिया, उन्होंने फेसबुक पर लिखा कि मोदी जी तो जाने की बात करने लगे. मैंने उन्हें लिखा कि अमित शाह से पूछ लीजिए कहीं यह जुमला न हो. वैसे इसे सहानुभूति के खाते में डाल दो. लेकिन एक बात जो मार्के की कही उससे मन सिमट सिमट गया. दरअसल परद्रव्येषु लोष्टवत्‌ भी दारेषु के रास्ते चल पड़ा.

दारा के तो हाथ पैर भी होते हैं वह तो भिड़ भी सकती है. द्रव्येषु बह जाएगा, कौन रोकेगा. जबकि देश के प्रधान मंत्री का समर्थन मिल गया हो. उन्होंने बहुत गंभीरता से दो तीन बातें कहीं. इंदिरा गांधी की तरह वे क्या, बाद के कई पीएम गरीब की रट लगाते रहे हैं.

गरीब का नाम लेकर वे चुनाव की सुरसरि में गोता लगाते और गरीब नाम कुछ ऐसा करामाती है कि सही सलामत निकल आते हैं. मोदी जी ने एक ही संदर्भ में गरीब का नाम दस बारह बार लिया और उन सबसे कहा, गरीब जनधन के खाते से रुपए न निकालें. एक क्षण को चौंका, कहीं वे नोटबंदी की तरह प्रबंध न आयद कर रहे हों.

लेकिन वे गरीब को उद्बोधन दे रहे थे कि खाते से पैसा न उठाना. दरअसल सुनने में आया था कि कालाधन संग्रहकर्ताओं ने गरीबों के जनधन खातों में सरकार समर्थित ढाई-ढाई लाख रुपया डलवा दिया था. जब गरीबों के खाते में पड़ा रहेगा तो स़फेद हो जाएगा. तब वे बाज़ार में चालू भाव के हिसाब से कमीशन छोड़ कर, दूसरी कोख में पलने वाले बच्चे की तरह, स़फेद रुपया वापिस ले लेंगे.

किसी शहर में बताया जाता है, भाव बीस प्रतिशत था किसी में तीस प्रतिशत था. गरीब खुश था. उनका मतलब उसी रुपये से था जो कमीशन में उसके पास रहने वाला था. उन्होंने यह भी कहा कि कोई दादागिरी करे तो कह देना मोदी को चिट्ठी लिख रहा हूं. मैं संभाल लूंगा. मेरा दिमाग लगातार इसी बारे में सोच रहा है कि क्या रास्ता निकाला जाए. यानी उनकी इस बात से लगा कि स्वयं उनको उस धन पर कब्ज़ा करना वैध नहीं लग रहा था.

उन्होंने यह भी आश्वासन दिया कि मैं इसी काम में लगा हूं. यह धन तुम्हारा बना रहे और भ्रष्टाचारी पकड़ में आ जाएं. ठीक है ना. वहां सब मोदी जी की तरह गरीब थे, सबने बहुत ज़ोर से ताली बजाई, हाथ हिलाए. मोदी जी का प्रस्ताव जन सभा में अनुमोदित हो गया.

पूरे देश में लगभग 80 प्रतिशत गरीब हैं. उनमें से आधे लोगों ने भी ढाई लाख प्रति व्यक्ति जमा किया, यानी लगभग 33.7 करोड़ लोगों के खाते में लगभग 77 करोड़ रुपए जमा किए गए. लगभग 77 करोड़ रुपया की मिलकियत वे गरीबों को दे रहे हैं. यह न्यूतम आकलन है.

अब सवाल है, यह रुपया किसका है? क्या मोदी जी का है? अगर नहीं तो उनको यह अधिकार किसने दिया, संसद ने दिया? किसी ने नहीं दिया. जब उन्होंने विदेश से आने वाले काले धन में से 15, 16 लाख देश के प्रत्येक व्यक्ति के खातों में जमा करने की बात कही थी तब भी आश्वासन देने का अधिकार उनके पास नहीं था.

वह काला धन आता तो कोई भी प्रधानमंत्री 125 करोड़ लोगों को इतनी बड़ी राशि नहीं दे सकता था. यह वाक़ई लुभावना मुहवरा था बिहार का चुनाव जीतने का, उसी ने उन गरीबों को जनधन खाते खोलने के लिए प्रेरित किया.

नोट बंदी के दौरान ग़रीबों के खाते में भ्रष्टाचारियों ने उन्हीं को लालच देकर ढाई-ढाई लाख जमा कराए. वह रुपया किसका है? क्या उनका है जिन्होंने जमा करने के लिए दिया था? वे क्या इस बात को स्वीकार करेंगे? दूसरी बात क्या वह रुपया खाताधारक का है? उसका तो बिल्कुल नहीं.

अगर उसका होता तो पीएम उठाने के लिए मना न करते. कानूनन ज़मीन में दबी संपत्ति या अनायास पड़ी पाई हुई मिली संपत्ति, सरकार की ही होती है. वह उसकी नहीं जिसको मिलती है. कहीं यह भी चुनावी वादा तो नहीं. जिस व्यक्ति का अधिकार नहीं वह कैसे रख लेगा.

इसके दो परिणाम स्पष्ट हैं कि वे लोग जो आज तक ईमानदारी का जीवन व्यतीत कर रहे थे अब उनके मुंह ख़ून लग जाएगा. जैसे कॉर्पोरेट के मुंह को बैंको से लिया कर्ज़ न वापिस करने का लगा है. दूसरी बात सेठजी ने अपने मातहतों पर विश्वास करके ही रुपया खाते में डलवाया था.

हो सकता है कुछ लोग सेठ की बात न मानें. उस हालत में उन्हें नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा. वे उस रकम के लिए नौकरी का ख़तरा शायद ही लें. दूसरे एक जगह का काला धन दूसरी जगह भी काला ही रहेगा. गरीबी की रगड़ से वह स़फेद नहीं हो पाएगा. दूसरी बात, कोई भी व्यक्ति क़ानूनी जाल में नहीं फंसना चाहेगा.

मोदी जी का यह वाक्य कि पहले लोग मनी मनी चिल्लाते थे, अब मोदी मोदी चिल्लाते हैं, भ्रामक अधिक है. इस देश की ख़ूबी है लोग संयम रखना जानते हैं. नोटबंदी के सबसे कठिन समय में भी आदमी मनी-मनी नहीं चिल्लाया. वह चुप रहा या फिर पिटा.

विदेशी परंपरा है, हिटलर जब मंच पर जाता था, तो फ्युरर-फ़्युरर चिल्लाते थे. फ़्यूरर माने मालिक. विदेशों में उन्होंने अपने लिए प्रवासी भारतीयों के मुंह से मोदी मोदी सुना है, हो सकता है वही उन्होंने यहां रोपित कर दिया हो. आरएसएस ब्रिगेड ने चुनावों में हर हर मोदी चलाया था, कुछ दिन चला फिर ठंडा पड़ गया.

हो सकता है वे मालिक-मालिक सुनना चाहते हों. फ़्यूरर न तो कोई समझेगा और न कहेगा. नोटबंदी के बाद लोग पैसे-पैसे को मोहताज हैंै, आत्महत्याएं कर रहे हैं, लाइन में लगे-लगे मर रहे हैं.

जनतंत्र में इस तरह की भक्ति का कोई अर्थ नहीं. ख़ासतौर से आक्रमक भक्ति का. ऐसी भक्ति तनाशाही की ओर ले जाती है. जब सरकार का हर व्यक्ति यह समझाने का प्रयत्न कर रहा है कि मोदी जी जो करते हैं सही करते हैं.

उनसे असहमत होना राष्ट्रद्रोह है. वे गरीब के साथ हैं, जबकि कहा जाता है कि वे कॉर्पोरेट के समर्थक हैं. उनके हितों पर ही मोदी जी की नज़र है. चीन भी जनवाद से कॉर्पोरेट की तऱफ चला गया है. पूरा देश आज चीन के पेटीएम के साथ है. जिसकी आमदनी का 40 प्रतिशत चीन को जाता है.

स्टेट बैंक पेटीएम की तरह है, वह निःशुल्क है. पीएम बीएनएसएल के मुक़ाबले जीयो के प्रचार का हिस्सा बने. प्रचार प्रसार मंत्री की हिम्मत नहीं प़डी कि उनसे निवेदन करें कि आपके जीयो के साथ जाने से बीएसएनएल पर असर पड़ेगा. शायद इसलिए कि उनका हर काम राष्ट्र से जुड़ा है.

जैसे आपातकाल में इन्दिरा इंडिया हो गई थी वैसे ही. भले ही वैसी तुक न हो, पर प्रकान्तर से मोदी इज़ इंडिया प्रमाणित किया जा रहा है. मोदी इज़ मनी तो उन्होंने स्वयं ही बता दिया. मैंने लगभग सभी प्रधानमंत्रियों को देखा है, कोई प्रधानमंत्री संसद भवन में जुलूस की तरह नहीं चलता था.

कार से उतर कर सीधा अपने चैंबर में जाता था. मोदी कल्ट को जैसे बढ़ावा दिया जा रहा है, नोटबंदी के संदर्भ में ख़ासतौर से, वह इंदिरा गांधी के आपातकाल के ज़माने से भी सिजल है. एक वरिष्ठ मंत्री ने तो मोदी जी को मसीहा बताया था. एक मुख्यमंत्री ने तो यहां तक कह दिया था कि जो आलोचना करते हैं वे देशद्रोही हैं, जबकि आलोचना जनतंत्र की शक्ति है.

इस मुख्यमंत्री ने अपने प्रदेश के एक आयोजन में पोस्टर में नए आए प्रधानमंत्री का और नेताओं के साथ चित्र भी नहीं छपवाया था. डॉ. अंबेडकर ने संभवतः संसद में जान स्टुअर्ट मिल को उद्धृत करते हुए कहा था, अपनी स्वतंत्रता किसी एक महान व्यक्ति के चरणों पर न रख दो, न उसे इतनी ताक़त दे दो कि वह इतना ताक़तवर हो जाए कि तमाम संस्थाओं को नष्ट कर दे. …राजनीति में भक्ति या व्यक्ति पूजा निश्चित रूप में अवमूल्यन का रास्ता है और यह रास्ता अंततः तानाशाही की ओर ले जाता है. (रामचंद्र गुहा के लेख से)

यह समय सावधानी का है. या तो जनतंत्र की परिभाषा, भक्तों के हिसाब से बदलनी पड़ेगी, ‘प्रतिबंधित जनतंत्र’ या इसे हर हालत में मुक्त जनतंत्र रखना होगा जिसका सपना गांधी, तिलक, लाजपतराय, सुभाष, आज़ाद, भगत सिंह, बिस्मिल आदि ने देखा था.