आलू के औषधीय गुण, जो आपको दिलाये रोगों से निजाद

potato plant

परिचय

मूलतः दक्षिण अमेरिका के शीतोष्ण भागों में प्राप्त होता है. स्पेन, पुर्तगाल तथा यूरोप में 16वीं सदी में तथा भारत में 17वीं सदी में तथा अन्य देशों में 19वीं सदी में आलू का प्रवेश पुर्तगालियों तथा अंग्रेजों द्वारा हुआ. समस्त भारत में विशेषतः उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, मेघालय, बिहार, जम्मू-कश्मीर, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र व गुजरात में इसकी खेती की जाती है.

औषधीय प्रयोग मात्रा एवं विधि

मुख रोग :

  • मुखपाक- आलू के भूने हुए कंद का सेवन करने से मुखपाक में लाभ होता है.

वक्ष रोग :

  • 2-5 मिली आलू पत्ते के रस में मधु तथा सेंधा नमक मिलाकर सेवन करने से गले की जलन आदि का शमन होता है.
  • खांसी- 2-5 मिली आलू पत्ते के रस का सेवन करने से पुरानी खांसी में लाभ होता है.

वृक्कवस्ति रोग :

  • मूत्राल्पता- आलू को भूनकर खाने से मूत्राल्पता में लाभ होता है.

त्वचा रोग :

  • दग्ध- आलू को पीसकर जले हुए स्थान पर लेप करने से व्रण तथा शोथ में लाभ होता है.
  • कच्चे आलू को काटकर दाद तथा खाज वाले स्थानों पर मलने से लाभ होता है.
  • कच्चे आलू को पीसकर चेहरे पर लगाने से चेहरे की कान्ति बढ़ती है तथा झाईयां दूर हो जाती हैं.

सर्वशरीर रोग :

  • दौर्बल्य- आलू को भूनकर हलवा बनाकर सेवन करने से यह पौष्टिक तथा बलदायक होता है.
  • आलू को भूनकर अदरख तथा पुदीना डालकर यूष बनाकर पीने से क्षुधा की वृद्धि होती है तथा शारीरिक दौर्बल्य का शमन होता है.

प्रयोज्यांग : कंद तथा पत्र.

मात्रा : चिकित्सक के परामर्शानुसार.

विषाक्तता : हरे आलू के फल तथा हरे छिलके वाले कंद में कभी-कभी विषाक्त प्रभाव भी देखने को मिले हैं, अतः उनका आभ्यन्तर प्रयोग सावधानी से करना चाहिए.

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