उत्तराखंड में गंगा के निकट खनन और स्टोन-क्रशिंग पर पूरी तरह रोक – आखिर काम आया संतों का बलिदान

Nigamanandaपर्यावरण की बर्बादी के खिलाफ साधु-संतों और उत्तराखंड की जनता का आक्रोश देखते हुए केंद्रीय पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने गंगा में खनन पर पूरी तरह रोक लगा दी है. गंगा के पांच किलोमीटर के दायरे में स्टोन-क्रशिंग पर भी पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया है.

हरिद्वार के जिलाधिकारी, एसएसपी और उत्तराखंड सरकार को आदेश का पालन कराने का निर्देश देते हुए बोर्ड ने स्पष्ट किया है कि निर्देश के उल्लंघन पर पांच साल की सख्त सजा और एक लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान कड़ाई से लागू किया जाए. आदेश की कॉपी मिलने के बाद ही स्वामी शिवानंद ने अपना अनशन समाप्त किया.

प्रशासनिक बेशर्मी का हाल यह है कि हरिद्वार के जिलाधिकारी ने फिलहाल ऐसा कोई आदेश मिलने से ही इन्कार कर दिया है. जबकि आदेश की कॉपी सार्वजनिक तौर पर दृष्टिगोचर हो रही है. सोलह साल के अंतराल में बारी-बारी से भाजपा और कांग्रेस की सरकारें बनती रहीं, लेकिन दोनों दलों के नेताओं ने गंगा-यमुना और हिमालय के साथ लगातार छल किया.

गंगा-यमुना और हिमालय को अपनी आय का साधन बनाया और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया. राज्य में शीघ्र ही विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. भाजपा ने हरीश सरकार को खनन माफिआओं और दागियों की सरकार घोषित करने के लिए राज्य में परिवर्तन यात्रा निकाल रखी है.

खनन पर प्रतिबंध और तटीय इलाकों में चल रहे स्टोन क्रशरों पर कार्रवाई की मांग को लेकर मातृसदन लंबे समय से अनशन कर रहा था. इसके विरोध में मातृसदन ने सात नवंबर को केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्रालय को भी पत्र भेजा था. इसका संज्ञान लेते हुए मंत्रालय के अधीन नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा के महानिदेशक यूपी सिंह ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को कार्रवाई करने के लिए पत्र भेजा.

इसके जवाब में सूबे के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने केंद्र की मोदी सरकार और भाजपा पर ही पलटवार करते हुए कहा कि भाजपा नेता खुद ही खनन के गोरखधंधे में लिप्त हैं. गंगा में खनन को लेकर सरकार पर उठ रहे सवालों पर मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा कि केंद्र अगर चाहे तो खनन का नियंत्रण अपने पास रख ले.

रावत ने पूछा कि भाजपा नेता यह बताएं कि प्रदेश में स्टोन क्रशर और खनन के पट्टे जारी करने की अनुमति किसने दी थी? उत्तराखंड की जनता के समक्ष भाजपा को यह स्पष्ट करना ही होगा कि तत्कालीन मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने इस तरह की सिफारिशें क्यों नहीं मानी थीं? हरीश रावत ने कहा कि उनके समय में एक भी खनन पट्टे को अनुमति नहीं दी गई.

भाजपा नेता खुद खनन में लिप्त हैं और उल्टे उन्हें बदनाम करने का षडयंत्र कर रहे हैं. मातृसदन के परमाध्यक्ष स्वामी शिवानंद द्वारा मुख्यमंत्री सहित कई अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराए जाने की बात पर हरीश रावत ने कहा कि मातृसदन अगर मुकदमा दर्ज कराता है, तो वह इसे भी संतों का आशीर्वाद ही समझेंगे.

देवभूमि उत्तराखंड के प्रवेश द्वार हरिद्वार से ही गंगा को प्रदूषित करने एवं मां गंगा की छाती को अवैध खनन से छलनी करने का काम खनन माफिया राज्य के गठन के बाद से ही करते आ रहे हैं. राज्य में जल, जंगल एवं जमीन की प्राकृतिक अस्मिता बहाल रखने के सवाल पर तभी से साधु-संत गोलबंद होने लगे थे और गंगा को बचाने के लिए धर्मनगरी हरिद्वार के संतों की आवाजें उठने लगी थीं.

इसमें मातृ-सदन के संतों की अग्रणी भूमिका रही. राज्य गठन के बाद राजनेताओं और खनन माफिआओं का गठजोड़ इस कदर मजबूत हुआ कि भाजपा के राज में संत निगमानन्द सहित तीन संत इस नापाक गठबंधन की बलि चढ़ गए. देवभूमि की जनता यह भूली नहीं है कि निशंक के राज में गंगा को बचाने के लिए आमरण अनशन करते हुए मातृसदन के युवा संत निगमानन्द ने किस तरह अपनी शहादत दी थी.

जिस समय निगमानन्द ने अन्तिम सांस ली थी, उस समय भाजपा के वरिष्ठ नेता नितिन गडकरी जी सपरिवार बद्रीनाथ में थे और मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक उनकी आवाभगत में व्यस्त थे. उत्तराखंड सरकार ने युवा संत को बचाने का प्रयास नहीं किया. संत की शहादत पर केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी भी हरिद्वार पहुंची थीं और कहा था कि युवा संत का बलिदान निरर्थक नहीं जाएगा.