जेलों में मुसलमानों व दलितों की संख्या ज्यादा क्यों

jailदस साल पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश में मुसलमानों की स्थिति को जानने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस राजेंद्र सच्चर की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति गठित की थी. इस कमिटी की ड्राफ्ट रिपोर्ट में इस बात का जिक्र था कि जेलों में बंद मुसलमानों की संख्या उनकी आबादी के अनुपात से बहुत ज्यादा है, वहीं कई सरकारी विभागों में उनकी हिस्सेदारी उनकी आबादी से कम है.

सच्चर कमिटी की रिपोर्ट इतनी तल्ख थी कि खुद कमिटी ने उस रिपोर्ट को अंतिम रूप देते वक्त उसे अलग कर दिया था. यह सच्चाई तब लोगों के सामने आई, जब एक अंग्रेजी अखबार ने इस हिस्से को प्रकाशित कर दिया.

बहरहाल, सच्चर कमेटी की रिपोर्ट पेश होने के दस साल बाद धर्म की बुनियाद पर जेलों में बंद कैदियों से संबंधित नेशनल क्राइम ब्यूरो 2015 की रिपोर्ट में सच्चर कमिटी की रिपोर्ट से अलग किए गए हिस्से की पुष्टि होती है. 29 अक्टूबर 2016 को एक राष्ट्रीय अखबार में छपी रिपोर्ट में इस बात का जिक्र था कि सच्चर कमिटी से अलग किए हिस्से के संदर्भ में जेल में मुसलमानों की संख्या को ज्यादा बताया गया था और अब एनसीआरबी रिपोर्ट में मुस्लिम कैदियों को 20.9 और सजायाफ्ता कैदियों को 15.8 फीसदी बताया गया है.

सच्चर कमिटी को आठ राज्यों ने जेलों के आंकड़े भेजे थे, जिसके मुताबिक 10.6 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले महाराष्ट्र में यह अनुपात 32.4 था, जबकि 9.06 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले गुजरात में जेलों में एक चौथाई मुस्लिम कैदी थे.

वहीं, 12.33 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले कर्नाटक में मुस्लिम कैदियों की संख्या 17.5 फीसदी थी. दिलचस्प बात यह है कि 30 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले असम के जेलों में मुस्लिम कैदियों की संख्या 28.1 फीसदी थी. इन आंकड़ों से यह बात तय है कि देश में मुसलमानों की गिरफ्‌तारी में तेजी आई है. हालांकि यह रुझान अभी शुरू नहीं हुआ है, बल्कि कई दशक पहले से जारी है.

वैसे सच्चर कमिटी की रिपोर्ट से अलग किए गए हिस्से में मुसलमानों की गिरफ्तारी के बढ़ते रुझान का कारण नहीं बताया गया है और न ही एनसीआरबी की रिपोर्ट में इसका जिक्र है. दरअसल देश में विचाराधीन मुस्लिम कैदियों की संख्या 20.9 फीसदी है, जबकि सजायाफ्ता मुस्लिम कैदियों की संख्या 15.8 फीसदी है. 2011 की जनगणना के मुताबिक, देश में कुल मुस्लिम आबादी 14.2 फीसदी है.

गौरतलब है कि यह रुझान सिर्फ मुसलमानों में ही नहीं दिख रहा है, बल्कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों में भी ये रुझान पाया जाता है. एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक, अनुसूचित जाति की आबादी 16.6 फीसदी है और जेलों में बंद अनुसूचित विचाराधीन कैदियों की संख्या 21.6 फीसदी है और सजायाफ्ता कैदियों की संख्या 20.9 है.

उसी तरह अनुसूचित जनजातियों में विचाराधीन कैदियों की संख्या 12.4 फीसदी है और सजायाफ्ता कैदियों की संख्या 13.7 फीसदी है, जबकि उनकी आबादी केवल 8.6 फीसदी है. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और मुसलमानों की कुल जनसंख्या को देखा जाए तो ये 29.4 फीसदी होगी और विचाराधीन कैदियों में इनकी भागीदारी 54.9 फीसदी और सजायाफ्ता कैदियों में इनकी भागीदारी 50.4 फीसदी हो जाएगी.

मुसलमानों के संबंध में वर्ष 2014 की एनसीआरबी की जो रिपोर्ट आई थी, उसमें भी बताया गया था कि विचाराधीन कैदियों में उनका हिस्सा 21.05 फीसदी और सजायाफ्ता कैदियों में 16.38 फीसदी है. इससे जाहिर है कि 2014 के मुकाबले 2015 में मुसलमानों में जेल जाने की स्थिति लगभग एक जैसी रही.

दिलचस्प बात यह है कि एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक महाराष्ट्र, तमिलनाडु, गुजरात, पश्चिम बंगाल, मध्यप्रदेश, दिल्ली राजस्थान, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों में मुस्लिम कैदियों की संख्या, उनकी आबादी के अनुपात से बहुत ज्यादा है.

जेल में बंद कैदियों की संख्या पर नजर डालें तो, इन राज्यों में किसी जेल में बंद हर दूसरा, तीसरा कैदी मुसलमान ही नजर आता है. 2014 की तरह 2015 में भी सबसे खराब रिपोर्ट महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, गुजरात, मध्यप्रदेश, दिल्ली और राजस्थान की रही. इन राज्यों में मुस्लिम आबादी क्रमशः 12, 27, 10.6, 3.7 और 9 फीसदी है, जबकि वहां के जेलों में विचाराधीन कैदियों का अनुपात क्रमशः 30, 16.47,13.32, 22 और 16 फीसदी है.

इसके अलावा जब हम विचाराधीन और सजायाफ्ता मुस्लिम कैदियों के आंकड़ों की तुलना करते हैं, तो दोनों के बीच बहुत बड़ा अंतर नजर आता है. महाराष्ट्र में यह फर्क 10 फीसदी का है जिससे पता चलता है कि फर्जी आरोपों के तहत मुसलमानों को गिरफ्तार किया जाता है और बाद में जब मुकदमा चलाया जाता है तो वे बेकसूर साबित होते हैं और बाइज्जत बरी हो जाते हैं.

लेकिन गिरफ्तारी और बाइज्जत बरी होने के दौरान कुछ वर्षों से लेकर कई वर्षों तक का फासला हो जाता है. इस दौरान आमतौर पर किसी बेगुनाह का करियर तबाह हो जाता है और वो समाज में इज्जत के साथ जिंदगी गुजारने के योग्य नहीं रह जाता. ऐसे कई लोग हैं, जिन्हें फर्जी आरोपों के तहत गिरफ्तार किया गया और उनको अपनी बेगुनाही साबित करने में दस या बीस साल या उससे भी ज्यादा वक्त लग गए.

इस दौरान उनका परिवार भी आर्थिक रूप से तबाह हो गया और पाई-पाई का मोहताज हो गया. अफसोस की बात तो ये है कि उनकी बदहाली और तबाही की जिम्मेदारी कोई नहीं लेता है और न ही उनको कोई मुआवजा दिया जाता है. हमारे देश की कानून-व्यवस्था ऐसी है कि जो गिरफ्तार हो, उसे दोषी मान लिया जाता है और अगर आरोपी पर कोई दोष साबित न हो तब भी गिरफ्तार करने वाले की कोई गलती नहीं होती है.

अजीब बात तो यह है कि ऐसी गिरफ्तारी पर तो उसे ईनाम और तरक्की तक दे दी जाती है, लेकिन अदालत द्वारा बरी हो जाने के बाद भी उसे कोई सजा नहीं मिलतीहै. यही वजह है कि पिछड़े और दबे-कुचले वर्गों, जिनमें मुसलमान व अनुसूचित जाति और जनजाति शामिल हैं, की फर्जी मामले में गिरफ्तारी का रुझान बढ़ जाता है.

बहरहाल, पिछड़े वर्गों, जिनमें मुसलमान व अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति शामिल हैं, की कुल आबादी 29.4 फीसदी के मुकाबले में इन वर्गों से संबंध रखने वाले विचाराधीन कैदियों का अनुपात 51 फीसदी है. यानी कुल गिरफ्तार किए गए कैदियों में से आधे से अधिक का संबंध इन वर्गोर्ं से है.

पिछले दो वर्षों में एनसीआरबी की रिपोर्ट के आंकड़े यह बता रहे हैं, लेकिन सरकार मौन साधे है. सवाल यह है कि क्या सरकार की यह चुप्पी कभी टूटेगी और कमजोर और पिछड़े वर्गों की तरफ ध्यान देगी?