नोटबंदी के बाद बेनामी सम्पत्तियों के खिला़फ कार्रवाई : अब शत्रु सम्पत्ति पर नज़र

governmentपांच सौ और हजार के नोटों पर ग्रहण लगाने के बाद अब केंद्र सरकार ने अवैध सम्पत्तियों के अधिग्रहण की तैयारियां शुरू कर दी हैं. इसकी पहली खेप में वे सम्पत्तियां जब्त या नीलाम की जाएंगी जो देश विभाजन के समय पाकिस्तान चले गए लोगों की हैं. ऐसी सम्पत्तियों में अधिकांश पर माफिया तत्वों या संदिग्ध गतिविधियों में लगे लोगों का कब्जा पाया गया है.

नोटबंदी का आदेश जारी होने के महीने भर बाद ही खुफिया एजेंसियों को देशभर में मौजूद ऐसी सम्पत्तियों, जिन्हें सरकारी शब्दावली में मशत्रु सम्पत्तिफ कहा जाता है, की ताजा स्थिति के बारे में छानबीन कर रिपोर्ट पेश करने को कहा गया था.

अधिकांश रिपोर्टें केंद्र सरकार के पास आ गई हैं. अब उन सम्पत्तियों पर काबिज लोगों से कब्जे का कानूनी आधार मांगा गया है. केंद्रीय खुफिया एजेंसी का मानना है कि कई ऐसी सम्पत्तियां हैं, जिन पर पाकिस्तान भाग गए माफिया सरगना दाऊद इब्राहीम के गुर्गों, सम्बन्धियों या दाऊद से जुड़े लोगों का कब्जा पाया गया है.

इसी तरह शत्रु सम्पत्ति के नाम पर ऐसी भी तमाम सम्पत्तियां मिली हैं, जिन पर दशकों से संदेहास्पद लोगों का कब्जा है, जिन्हें अब सरकार अपने कब्जे में लेकर या तो नीलाम करेगी, या सरकारी इस्तेमाल में लाएगी.

केंद्र सरकार ने दिसम्बर (2016) में ही शत्रु सम्पत्ति (संशोधन और वैधीकरण) अध्यादेश लाकर अपना कानूनी पक्ष मजबूत कर लिया था. शत्रु सम्पत्तियों पर सरकार के अधिग्रहण या उसकी नीलामी की प्रक्रिया में निचली अदालतें हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं. शत्रु सम्पत्ति का पता लगाने का काम पहले से चल रहा था. ताजा पड़ताल के बाद पाया गया कि शत्रु सम्पत्ति जितनी अब तक बताई जा रही थी, उससे कहीं अधिक है.

अभी इसकी संख्या बढ़ ही रही है. केंद्रीय एजेंसी के एक अधिकारी ने कहा कि सरकारों ने शत्रु सम्पत्ति का पता लगाने में रुचि नहीं ली. अभी भी कई राज्य सरकारें इसकी छानबीन में सहयोग नहीं कर रही हैं. अधिकारी कहते हैं कि केंद्र की यह कार्रवाई अवैध और बेनामी सम्पत्तियों पर कार्रवाई का पहला कदम है.

सभी सम्बद्ध राज्यों के जिलाधिकारियों को गृह मंत्रालय की ओर से निर्देश भेजा गया था कि वे अपने-अपने जिले की शत्रु सम्पत्तियों पर काबिज लोगों से कब्जे का कानूनी आधार हासिल करें. जो कब्जे कानून सम्मत पाए जाएंगे उनका किराया बाजार दर और निर्धारित सरकारी शर्तों पर लागू किया जाएगा और जिन कब्जों का कोई कानूनी आधार नहीं होगा, उन्हें जब्त कर लिया जाएगा.

उत्तर प्रदेश में एक हजार 468 शत्रु सम्पत्तियों पर जो लोग काबिज हैं, उन्हें सरकारी नोटिस दी जा चुकी है. इनमें लखनऊ के हजरतगंज जैसे बेशकीमती इलाके में स्थित लारी बिल्डिंग, महमूदाबाद मेंशन, मौलवीगंज स्थित लाल कोठी, चारबाग गंगा प्रसाद रोड स्थित सिद्दीकी बिल्डिंग, गोलागंज इमामबाड़ा स्थित मलका जमानिया जैसी कुछ प्रमुख सम्पत्तियां भी शामिल हैं, जिस पर लोग दशकों से काबिज हैं. अधिकांश लोग किराया भी नहीं देते, जो देते हैं वे भी कभी कभार वाले ही हैं.

बेशकीमती इलाकों में स्थित इन सम्पत्तियों पर काबिज लोगों को कौड़ियों का किराया जमा करने में भी तकलीफ होती है. इनमें हजरतगंज के मशहूर कपूर होटल, प्रमुख व्यवसायिक प्रतिष्ठान हलवासिया गु्रप, घनश्याम ऑप्टिकल्स, शर्मा एसोसिएट्स, मेसर्स ओरिएंट मोटरकार, कोहली ब्रदर्स जैसे प्रतिष्ठानों के धनपति मालिकों के नाम शामिल हैं.

इनमें से कई लोगों ने तो कभी किराया दिया ही नहीं. अब इन्हें बकाये का किराया भी जमा करना होगा और सरकार को यह भी बताना होगा कि शत्रु सम्पत्ति पर उनके कब्जे का कानूनी आधार क्या है. इस तरह की नोटिसें प्रदेशभर में गई हैं. शत्रु सम्पत्ति के दायरे में रिहाईशी इमारतें, व्यवसायिक इमारतें, कृषि भूमि वगैरह आते हैं. लखनऊ जिला प्रशासन का कहना है कि राजधानी स्थित शत्रु सम्पत्तियों पर काबिज 35 प्रमुख डिफॉल्टर्स के खिलाफ पहली खेप की नोटिस जारी की गई है.

इनके कब्जे के कानूनी आधार की पड़ताल की जा रही है. पुख्ता कानूनी आधार पाए जाने पर उनका सारा लंबित किराया वसूल किया जाएगा अन्यथा सम्पत्ति जब्त करने की कार्रवाई की जाएगी. जिन कब्जों का कोई कानूनी आधार नहीं पाया गया उन्हें जब्त कर लिया जाएगा. लखनऊ जिला प्रशासन ने कहा कि लखनऊ की सदर तहसील की करीब डेढ़ सौ से भी अधिक शत्रु सम्पत्तियों का भौतिक निरीक्षण कराया गया है और उन पर काबिज लोगों के खिलाफ भी नोटिस जारी की गई है.

अध्यादेश लागू होने के बाद न केवल सिविल प्रशासन बल्कि सेना ने भी शत्रु सम्पत्ति का ब्यौरा लेना शुरू किया है. मध्य कमान मुख्यालय खास तौर पर इस मामले में सक्रिय है, क्योंकि मध्य कमान के दायरे में आने वाले सात राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड और ओड़ीशा में से यूपी, एमपी और उत्तराखंड में सबसे अधिक शत्रु सम्पत्तियां हैं. सेना के मध्य कमान का मुख्यालय लखनऊ में है.

यूपी में लखनऊ, फैजाबाद, बरेली, सीतापुर, कानपुर, फतेहगढ़, रामपुर, कासगंज, मुरादाबाद, मेरठ, झांसी जैसे इलाकों, उत्तराखंड में देहरादून, नैनीताल, हल्द्वानी, मसूरी और मध्य प्रदेश में भोपाल, महू, जबलपुर, इंदौर जैसे इलाकों में शत्रु सम्पत्तियों का ब्यौरा इकट्ठा करने में सेना खास तौर पर जुटी है. भोपाल के नवाब की सम्पत्ति भी शत्रु सम्पत्ति के रूप में घोषित है, लिहाजा वहां भी सेना ने जिला प्रशासन से सम्पत्ति का विस्तृत ब्यौरा देने को कहा है.

गृह मंत्रालय ने सीआरपीएफ को इन सम्पत्तियों पर कब्जे का निर्देश भी जारी कर दिया था, लेकिन विस्तृत जांच बढ़ने पर फिलहाल इस कार्रवाई को रोक दिया गया है. भोपाल में ऐसी करीब डेढ़ सौ शत्रु सम्पत्तियों पर कार्रवाई लंबित पड़ी हुई है.

गृह मंत्रालय के दस्तावेज बताते हैं कि देश में एक लाख करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की अचल शत्रु सम्पत्ति है. करीब तीन हजार  करोड़ रुपये की चल सम्पत्ति के होने का अब तक प्रमाण मिला है. इसकी पड़ताल और आकलन का काम चल रहा है और आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है. शुरुआत में 2186 शत्रु सम्पत्ति का ही पता लगा था, जो अब 16 हजार का आंकड़ा पार कर रहा है.

शत्रु सम्पत्ति का पता लगाने में कई राज्यों ने केंद्र का सहयोग नहीं किया. इनमें पश्चिम बंगाल अव्वल है. उसके बाद बिहार का नम्बर आता है. शत्रु सम्पत्ति के पांच हजार से अधिक मामले पश्चिम बंगाल सरकार की फाइल में बंद पड़े हुए हैं. शत्रु सम्पत्ति के पहले वाले आंकड़े यानि, कुल 2186 शत्रु सम्पत्तियों में से 1468 सम्पत्तियां अकेले उत्तर प्रदेश में थीं, जिसकी संख्या बढ़ रही है.

अन्य राज्यों में मसलन, पश्चिम बंगाल में 351, दिल्ली में 66, गुजरात में 63, बिहार में 40, गोवा में 35, महाराष्ट्र में 25, केरल में 24 व शेष शत्रु सम्पत्तियां कुछ अन्य राज्यों में थीं, लेकिन बाद में गहनता से कराई गई छानबीन में शत्रु सम्पत्तियों की संख्या 16 हजार के पार चली गई. गृह मंत्रालय के दस्तावेजों के मुताबिक देश की 31 शत्रु सम्पत्तियों का इस्तेमाल केंद्रीय सुरक्षा बल कर रहे हैं.

इनमें से 12 का इस्तेमाल केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ), सात का इस्तेमाल नेशनल सिक्युरिटी गार्ड (एनएसजी), छह का इस्तेमाल केंद्रीय रिजर्व पुलिस फोर्स (सीआरपीएफ), चार का इस्तेमाल सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) और दो शत्रु सम्पत्तियों का इस्तेमाल नेशनल डिजास्टर रेस्पॉन्स फोर्स (एनडीआरएफ) कर रहा है. उल्लेखनीय है कि नवम्बर महीने में नोटबंदी लागू किए जाने के बाद 23 दिसम्बर 2016 की देर रात से शत्रु संपत्ति (संशोधन और वैधीकरण) अध्यादेश लागू किया गया. 22 दिसम्बर 2016 को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अध्यादेश पर हस्ताक्षर किए.

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 21 दिसम्बर 2016 को अध्यादेश जारी करने की मंजूरी दी थी. उसके बाद उसे राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा गया था. यह अध्यादेश पांचवीं बार लाया गया. संसद से पारित होने के बाद यह विधेयक बन जाएगा. नोटबंदी के बाद लागू होने वाले इस अध्यादेश को मंजूर नहीं करने की राष्ट्रपति से अपील भी की गई थी, लेकिन राष्ट्रपति ने उन अपीलों पर ध्यान नहीं दिया.

जहां तक माफिया और आतंकी सरगना दाऊद इब्राहिम की भारत में अवैध सम्पत्ति का मसला है, इसे भी शत्रु सम्पत्ति के दायरे में रखा जा रहा है. भारत में रियल इस्टेट के धंधे में कई प्रमुख और मशहूर कंपनियों में दाऊद का पैसा लगा हुआ है. केंद्रीय खुफिया एजेंसी और प्रवर्तन निदेशालय ने दाऊद इब्राहिम की ऐसी नौ विशाल सम्पत्ति का पता लगाया था जिसे बेचने का कुचक्र चल रहा था.

हालांकि दाऊद ने केंद्र के सतर्क होने के पहले अपनी कई सम्पत्तियां बेच भी डालीं. ये सम्पत्तियां मुम्बई, पुणे, मैसूर, मसूरी, लखनऊ, दिल्ली और कोलकाता शहर में हैं. उत्तराखंड के मसूरी में होटल, लखनऊ में होटल और रियल इस्टेट के साथ-साथ कई फार्म हाउस और रिज़ॉर्ट्स में भी दाऊद का धन लगा है, जिसे बाहर से सफेदपोश चला रहे हैं. वर्ष 2015 के दिसम्बर महीने में ही सरकार ने मुम्बई के नागपाड़ा में दाऊद के एक होटल मदिल्ली जायकाफ को जब्त कर उसे नीलाम कर दिया था.

दिल्ली के सदर बाजार स्थित बेलीराम मार्केट की लगभग 200 दुकानों को लेकर भी शत्रु सम्पत्ति का विवाद चल रहा है. दिल्ली के बल्लीमारान स्थित मुस्लिम मुसाफिरखाना भी लंबे अर्से तक शत्रु सम्पत्ति विवाद में फंसा रहा था. शत्रु सम्पत्ति (संशोधन और वैधीकरण) अध्यादेश के तहत भोपाल में पूर्व नवाब की अरबों रुपये की सम्पत्ति भी शत्रु सम्पत्ति में शुमार है. भोपाल नवाब परिवार की सम्पत्ति भोपाल और उसके आसपास के तीन विधानसभा क्षेत्रों में फैली है. भोपाल शहर के कई मोहल्ले नवाब की सम्पत्ति पर ही बसे हुए हैं.

सम्पत्तियां अकूत, पर राजस्व शून्य

उत्तर प्रदेश के मराजाफ महमूदाबाद उर्फ़ आमीर मोहम्मद ख़ान की लखनऊ समेत उत्तरप्रदेश के कुछ अन्य जिलों और उत्तराखंड राज्य में स्थित अकूत सम्पत्ति शत्रु सम्पत्ति के रूप में घोषित है. शत्रु सम्पत्ति (संशोधन और वैधीकरण) अध्यादेश के तहत शत्रु सम्पत्तियों का मालिकाना हक केंद्र सरकार को तो मिल गया है, लेकिन अधिकांश सम्पत्ति अवैध कब्जे में है और उससे सरकारी राजस्व कुछ भी प्राप्त नहीं हो रहा है.

यही हाल प्रदेश की अन्य सभी शत्रु सम्पत्तियों का भी है, जहां लोग कब्जा जमाए बैठे हैं और सरकारी राजस्व को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं. राजा महमूदाबाद (लखनऊ के नज़दीक सीतापुर जिले की तहसील का नाम है मुरादाबाद) की ऐसी सम्पत्तियों की कुल संख्या 936 है.

यह सम्पत्ति लखनऊ, सीतापुर और नैनीताल में है, जो अब शत्रु सम्पत्ति के दायरे में है. लखनऊ में राजा महमूदाबाद की सम्पत्तियों में मशहूर बटलर पैलेस, महमूदाबाद हाउस और हज़रतगंज की आलीशान दुकानें और होटल्स हैं. सीतापुर के जिलाधिकारी, एसएसपी और सीएमओ के आवास भी राजा महमूदाबाद की सम्पत्तियों का ही हिस्सा हैं.

राजा मोहम्मद आमिर अहमद खान (तत्कालीन राजा महमूदाबाद) के भारत-पाकिस्तान दोनों ही देशों में अच्छे राजनीतिक संपर्क थे. उनका दोनों ही देशों में आना-जाना लगा रहता था. भारत विभाजन के बाद से वे ईराक में रह रहे थे. 1957 में उन्होंने भारतीय नागरिकता छोड़कर पाकिस्तानी नागरिकता ले ली. भारत ने देश छोड़कर पाकिस्तान जा बसे लोगों की सम्पत्तियां मभारत के रक्षा नियम (डिफेंस ऑफ इंडिया रूल्स) 1962फ के तहत अपने संरक्षण में ले लीं.

भारत सरकार ने यह कार्रवाई 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद की, जबकि पाकिस्तान यह काम पहले ही कर चुका था. 1973 में राजा महमूदाबाद की लंदन में मौत हो गई. उनके बेटे मोहम्मद आमिर मोहम्मद खान ने पिता की सम्पत्ति पर उत्तराधिकार का दावा पेश किया.

लखनऊ सिविल कोर्ट ने उन्हें सम्पत्ति का वारिस माना, लेकिन उन्हें कुछ हासिल नहीं हुआ. 2001 में मुम्बई हाईकोर्ट ने भी महमूदाबाद के पक्ष में फैसला दिया. सरकार ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की. सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर महमूदाबाद वारिस को सम्पत्ति का अधिकार मिल गया. 2010 में कांग्रेस सरकार शत्रु सम्पत्ति अधिनियम में संशोधन का अध्यादेश लाई और सभी सम्पत्तियों को फिर से कब्जे में ले लिया.

गृह मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा कि भारत से पलायन कर पाकिस्तान चले गए लोगों की छोड़ी गई अधिकांश सम्पत्तियों पर भू माफियाओं और संदेहास्पद तत्वों का कब्जा है. कई स्थानों पर भू माफियाओं द्वारा शत्रु सम्पत्तियां बेची जा रही हैं. लखनऊ समेत फैजाबाद, कासगंज, बरेली, रामपुर जैसे कई जिलों में ऐसे मामले सामने आए हैं.

राजनीतिक छत्र-छाया वाले माफियाओं के खिलाफ प्रशासन कुछ नहीं कर पा रहा. शत्रु सम्पत्ति पर काबिज लोग सरकारी राजस्व के भी शत्रु बन गए हैं और सरकारी कर जमा नहीं कर रहे हैं. प्रदेश के राजस्व विभाग के अधिकारी ने कासगंज जिले का हवाला देते हुए बताया कि जिले में 152 शत्रु सम्पत्तियां चिन्हित की गई थीं, इन पर करोड़ों का राजस्व बकाया है. इन शत्रु सम्पत्तियों पर अवैध कब्जा है.

कासगंज तहसील के किनावा में एक, वाहिदपुर माफी में एक, ढोलना में तीन, खेड़िया में छह, रहमतपुर माफी में छह, विरहरा में एक, तालिकपुर सराय में 10, नरायनी में सात, मुबारिकपुर में चार, भिटौना में 19 और टंडोली माफी में 50 शत्रु सम्पत्तियां शिनाख्त की गईं, लेकिन इनमें से अधिकांश सम्पत्तियां अनाप-शनाप लोगों को बेच डाली गईं.

खरीद-बिक्री भी अवैध तरीके से हुई, जिसका कोई राजस्व रिकार्ड नहीं है. अब सरकार के सामने उन सम्पत्तियों के मालिकाना हक की पहचान करने की भारी समस्या है. ऐसा ही हाल नैनीताल स्थित महमूदाबाद की सम्पत्ति का भी हुआ. नैनीताल स्थित मेट्रोपोल होटल भी शत्रु सम्पत्ति घोषित है, लेकिन अरबों की इस सम्पत्ति पर हुए कब्जे के खिलाफ नैनीताल जिला प्रशासन ने कुछ नहीं किया. मल्लीताल कोतवाली में एक प्राथमिकी दर्ज कर जिला प्रशासन मस्त हो गया. मेट्रोपोल होटल अपने जमाने में नैनीताल का सबसे बड़ा होटल हुआ करता था.

41 कमरों के इस होटल का निर्माण एक अंग्रेज मिस्टर रेंडल ने किया था. बाद में यह राजा महमूदाबाद की सम्पत्ति हो गई. इस पर अनेक लोगों का कब्जा रहा. 1995 तक यह होटल के रूप में चलता रहा, फिर 2010 में अदालत के आदेश पर जिला प्रशासन ने बतौर कस्टोडियन इसे कब्जे में ले लिया. जिला प्रशासन ने इस पर कब्जा तो जमा लिया, लेकिन इसकी देखरेख में कोई दिलचस्पी नहीं ली. भूमाफियाओं ने होटल में आग लगवा दी, जिसमें बॉयलर रूम, बैडमिंटन कोर्ट और 14 कमरों वाला हिस्सा खाक हो गया.

सम्पत्ति पर कब्जे के इरादे से ही यह आग लगवाई गई थी. इसमें जिला प्रशासन की संदेहास्पद भूमिका से भी इन्कार नहीं किया जा सकता. शत्रु सम्पत्ति का कानूनी संरक्षक जिला प्रशासन ही होता है लेकिन सम्पत्तियों के नाम जोड़ने-घटाने का भी खेल प्रशासन ही करता रहता है. सामर्थ्यवान लोग शत्रु सम्पत्ति की लिस्ट से अपनी सम्पत्ति हटवाने में कामयाब हो जाते हैं. ऐसे भी कई उदाहरण सामने आ रहे हैं.

बेनामी सम्पत्तियों पर गिरेगी गाज, पहले से था अंदेशा

नोटबंदी के बाद अगला नम्बर बेनामी और अवैध सम्पत्तियों का आने वाला है, इसका पहले से अंदेशा भी था और बाद में इसका औपचारिक तौर पर ऐलान भी हुआ. बेनामी सम्पत्तियों पर केंद्र सरकार की निगाह 2015 से ही थी. सरकार ने 13 मई 2015 को लोकसभा में बेनामी ट्रांजेक्शन एक्ट पेश किया था.

01 नवम्बर 2016 से देश में बेनामी सम्पत्ति निषेध कानून लागू हो गया था. इस कानून के जरिए चल-अचल सम्पत्ति से सम्बन्धित सभी खरीद-फरोख्त आधार कार्ड और पैन कार्ड से जोड़ दिए जाएंगे. साथ ही जमीन की खरीद-फरोख्त करने वालों को इसका विस्तृत ब्यौरा आयकर विभाग को देना होगा.

इस कानून में संशोधन के जरिए बेनामी ट्रांजेक्शन की परिभाषा बदलने, बेनामी ट्रांजेक्शन करने वाले लोगों पर अपीलीय ट्रिब्यूनल और सम्बद्ध संस्था की तरफ से जुर्माना लगाए जाने का प्रस्ताव शामिल किया गया है. इस कानून के मुताबिक बेनामी सम्पत्ति वह है जिसे किसी दूसरे के नाम पर लिया जाए और उसकी कीमत का भुगतान कोई और करे.

अब उन सारी सम्पत्तियों को बेनामी माना जाएगा जो किसी फर्जी नाम से खरीदी गई हो और जिसके असली मालिक का पता न चले. इसके अलावा दूसरे नामों से बैंक खातों में किए जाने वाले फिक्स्ड डिपॉजिट्‌स भी काले धन के दायरे में आएंगे.

केंद्र सरकार को ऐसी सारी सम्पत्तियां जब्त कर लेने का अधिकार है. इसके अलावा बेनामी सम्पत्ति के तहत ट्रांजेक्शन करने वाले लोगों पर सख्त कानूनी कार्रवाई की जा सकेगी. दोषी पाए गए व्यक्ति पर भारी जुर्माना और सात साल तक की कैद हो सकती है.

बेनामी सम्पत्ति के खिलाफ कार्रवाई में आयकर विभाग ने 3,185 करोड़ रुपये की अघोषित आय का पता लगाया है. इसके अलावा 428 करोड़ रुपये की नकदी और गहने जब्त किए हैं. बेनामी सम्पत्तियों को लेकर आयकर विभाग की ओर से तीन हजार से ज्यादा नोटिसें जारी की गई हैं.

ब्रिटेन के बैंक में फंसे हैं करोड़ों रुपये

शत्रु सम्पत्ति विवाद में प्रमुख रूप से महमूदाबाद रियासत, भोपाल नवाब, मुम्बई में मोहम्मद अली जिन्ना का घर और लंदन के एक बैंक में जमा हैदराबाद फंड का मसला शुमार है. ब्रिटेन के रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैंड (जो पहले नेशनल वेन्समिंस्टर बैंक के नाम से जाना जाता था) में तीन सौ करोड़ रुपये से अधिक की रकम 1948 से ही जमा है. इस पर पाकिस्तान भी दावा करता रहा है, लेकिन ब्रिटेन की अदालत ने पाकिस्तानी दावे को अनुचित करार दिया है. हैदराबाद के विलय के समय तत्कालीन निजाम के वित्त मंत्री ने ब्रिटेन के नेशनल वेस्टमिंस्टर बैंक में 1,007,940 पौंड और 9 शिलिंग पाकिस्तानी उच्चायुक्त हबीब इब्राहिम रहमतउल्लाह के खाते में जमा करवा दिए थे.

इसकी सूचना मिलते ही निजाम ने बैंक को वह रकम वापस उनके खाते में ट्रांसफर करने का संदेश भेजा, लेकिन बैंक ने मना कर दिया. निजाम ने अदालत की शरण ली तो पाकिस्तान ने भी दावा ठोक दिया. मामला इंग्लैंड के न्यायालय के ट्रिब्यूनल में चला गया. भारत भी दावेदार था. अदालती कार्रवाई के कारण खाता फ्रीज कर दिया गया था. भारत का कहना है कि हैदराबाद फंड हैदराबाद की जनता का पैसा है और रियासत का भारत में विलय हो जाने के बाद पूरी रकम भारत को मिलनी चाहिए.

2008 में भारत सरकार ने फंड के बंटवारे पर सहमति कायम करने का प्रस्ताव दिया, लेकिन पाकिस्तान ने इन्कार कर दिया और 2013 में गुपचुप तरीके से फिर कानूनी पहल शुरू कर दी. लेकिन तब तक पाकिस्तान को हैदराबाद फंड की सुरक्षा के अधिकार से वंचित किया जा चुका था. पाकिस्तान सरकार अपने यहां सारी शत्रु सम्पत्तियां जब्त कर चुकी है, जबकि भारत में शत्रु सम्पत्तियों के मसले में भी सियासत ही होती रही है.

लखनऊ में पहली खेप में जिनके खिला़फ नोटिस जारी हुई

  1. संदीप कोहली, कोहली ब्रदर्स लारी बिल्डिंग, हजरतगंज, लखनऊ
  2. विक्रम कपूर, कपूर होटल – लारी बिल्डिंग, हजरतगंज, लखनऊ
  3. जेके बहल, ओरिएंट मोटरकार – लारी बिल्डिंग, हजरतगंज, लखनऊ
  4. नरेश गुरनानी, घनश्याम ऑप्टिकल्स – लारी बिल्डिंग, हजरतगंज, लखनऊ
  5. सावित्री देवी महमूदाबाद मेंशन, हजरतगंज, लखनऊ
  6. गिरजा शंकर हलवासिया – महमूदाबाद मेंशन, हजरतगंज, लखनऊ
  7. आरआर शर्मा, शर्मा एंड एसोसिएट्स – महमूदाबाद मेंशन, हजरतगंज, लखनऊ
  8. गौहर अली पुत्र अरशद अली – लाल कोठी, मौलवीगंज, लखनऊ
  9. केडब्लू चंद्रा पुत्र अब्दुल वाहिद सिद्दीकी – लाल कोठी, मौलवीगंज, लखनऊ
  10. अजीज अहमद पुत्र मतलूब आलम – लाल कोठी, मौलवीगंज, लखनऊ
  11. हाजी इस्माइल पुत्र हाजी सिकंदर बख्श – सिद्दीकी बिल्डिंग, गंगा प्रसाद रोड, अस्तबल, चारबाग, लखनऊ
  12. जफरुल इस्लाम पुत्र जैनुब आयदीद – सिद्दीकी बिल्डिंग, गंगा प्रसाद रोड, अस्तबल, चारबाग, लखनऊ
  13. मूसा पुत्र दुलारे – सिद्दीकी बिल्डिंग, गंगा प्रसाद रोड, अस्तबल, चारबाग, लखनऊ
  14. जब्बार हुसैन पुत्र मुर्तजा हुसैन – सिद्दीकी बिल्डिंग, गंगा प्रसाद रोड, अस्तबल, चारबाग, लखनऊ
  15. अतीक अहमद पुत्र लईक अहमद – सिद्दीकी बिल्डिंग, गंगा प्रसाद रोड, अस्तबल, चारबाग, लखनऊ
  16. ताहिर हुसैन पुत्र अफसर हुसैन – सिद्दीकी बिल्डिंग, गंगा प्रसाद रोड, अस्तबल, चारबाग, लखनऊ
  17. अनीस बानो पत्नी जब्बार हुसैन – सिद्दीकी बिल्डिंग, गंगा प्रसाद रोड, अस्तबल, चारबाग, लखनऊ
  18. शरफ जहां पत्नी राशिद अली – सिद्दीकी बिल्डिंग, गंगा प्रसाद रोड, अस्तबल, चारबाग, लखनऊ
  19. मोहम्मद मूसा पुत्र अफसर हुसैन – सिद्दीकी बिल्डिंग, गंगा प्रसाद रोड, अस्तबल, चारबाग, लखनऊ
  20. बदरुल हसन पुत्र मेहदी हसन – सिद्दीकी बिल्डिंग, गंगा प्रसाद रोड, अस्तबल, चारबाग, लखनऊ
  21. मोहम्मद खलील पुत्र मो. हाबी – सिद्दीकी बिल्डिंग, गंगा प्रसाद रोड, अस्तबल, चारबाग, लखनऊ
  22. मौलाना साजिद – मलका जमानिया, इमामबाड़ा, गोलागंज, लखनऊ
  23. शाकिर हुसैन पुत्र जाकिर हुसैन – मलका जमानिया, इमामबाड़ा, गोलागंज, लखनऊ
  24. राम जानकी पुत्र महावीर – मलका जमानिया, इमामबाड़ा, गोलागंज, लखनऊ
  25. आनंद अग्रवाल पुत्र रामदास – मलका जमानिया, इमामबाड़ा, गोलागंज, लखनऊ
  26. हरीराम – मलका जमानिया, इमामबाड़ा, गोलागंज, लखनऊ
  27. अब्दुल हई पुत्र मुन्ने – मलका जमानिया, इमामबाड़ा, गोलागंज, लखनऊ
  28. रयाज हैदर पुत्र मुखालिस हुसैन – मलका जमानिया, इमामबाड़ा, गोलागंज, लखनऊ
  29. मिर्जा वसी हसन पुत्र मिर्जा आगा हसन – मलका जमानिया, इमामबाड़ा, गोलागंज, लखनऊ
  30. गुलाम मुहम्मद पुत्र मुहम्मद हुसैन – मलका जमानिया, इमामबाड़ा, गोलागंज, लखनऊ
  31. नसीर उर्फ मुन्ने पुत्र छुट्‌टन – मलका जमानिया, इमामबाड़ा, गोलागंज, लखनऊ
  32. मोहम्मद मजीद – मलका जमानिया, इमामबाड़ा, गोलागंज, लखनऊ
  33. शकीरा बेगम पत्नी गुलाम रसूल – मलका जमानिया, इमामबाड़ा, गोलागंज, लखनऊ
  34. मोहम्मद हलीम पुत्र अब्दुल शकूर – मलका जमानिया, इमामबाड़ा, गोलागंज, लखनऊ
  35. इरफान अप्पू पुत्र कल्लू टेनी – मलका जमानिया, इमामबाड़ा, गोलागंज, लखनऊ

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