बदलता दिख रहा है भारतीय खेलों का भविष्य : धंधा नहीं चलेगा

Sports authority of indiaभारतीय खेल संघों का गंदा खेल किसी से छुपा नहीं है. देश में जो संस्था भारतीय खेलों को बुलंदियों पर पंहुचाने का जिम्मा लेती हैं, वही इस खेल के साथ गद्दारी करने से भी नहीं चूकतीं. भारतीय ओलम्पिक संघ इसका जीता जागता उदाहरण है. ओलम्पिक जैसी प्रतियोगिता में भारतीय खिलाड़ियों के प्रदर्शन के बारे में अक्सर सवाल उठाये जाते हैं लेकिन देश में चलाने वाली खेल संस्थाएं इससे पल्ला झाड़ती हैं.

सुविधाओं के अभाव में खिलाड़ी अपनी प्रतिभा के साथ न्याय नहीं कर पाते. पिछले काफी समय से भारतीय ओलम्पिक संघ को लेकर कई बार उठा-पटक हो चुकी है. इस बार नया मामला यह है कि भारतीय ओलम्पिक संघ ने कलमाड़ी और अभय चौटाला जैसे दागियों को फिर से अपने परिवार में शामिल करने का फैसला किया. इन दोनों के आने के बाद भारतीय खेल जगत में हड़कम्प मच गया. स्पष्ट है कि दोनों की वापसी भारतीय खेल को फिर से गर्त में ढकेलने का काम करेगी.

इसे ध्यान में रखकर खेल मंत्रालय हरकत में आया और आनन फानन में इंडियन ओलम्पिक एसोसिएशन को निलम्बित कर दिया. हालांकि कलमाड़ी ने अभी अध्यक्ष पद लेने से किनारा करने की बात कही है, जबकि अभय चौटाला अभी इसपर कुछ बोलने से बच रहे हैं. दरअसल देश को चलाने वाली खेल संस्था खेल माफियाओं के चंगुल में है. खेल संस्थाओं पर राजनीति भी उतनी ही हावी है. देश में खेलों को बढ़ावा देने वाली हर खेल संस्था में नेताओं, कारोबारियों व नौकरशाओं का रोल अहम रहता है.

भारतीय खेल इनके चंगुल से आजाद नहीं हो पा रहा है. इसी कारण से भारतीय खेल विश्व खेल पटल पर असरदार प्रदर्शन करने में भी सक्षम नहीं हो पा रहा है. नेताओं, कारोबारियों और नौकरशाओं ने खेल के माध्यम से अपनी जेबों में अपार धन भरा लेकिन खिलाड़ियों को कुछ नहीं दिया. खिलाड़ी मैदान में पसीना बहाता है लेकिन खेल संघ उसकी प्रतिभा चमकाने के लिए कुछ नहीं करते. सुरेश कलमाड़ी और अभय चौटाला दो ऐसे नाम हैं जो भारतीय खेलों को दीमक की तरह चाट गए.

दोनों महानुभावों ने भारतीय खेलों की साख का सत्यानाश कर दिया. सुरेश कलमाड़ी ने साल 1996 से लेकर 2011 तक भारतीय ओलम्पिक संघ की कमान अपने हाथ में रखी. इन्हीं सालों में भारतीय खेलों में भ्रष्टाचार चरम पर रहा. कलमाड़ी ने साल 2010 में कॉमनवेल्थ खेल का दिल्ली में आयोजन कराया लेकिन इस दौरान जमकर भ्रष्टाचार हुआ.

कलमाड़ी को कुर्सी ही नहीं गंवानी पड़ी बल्कि जेल भी जाना पड़ा. घोटाले के आरोपों के तहत कलमाड़ी को 10 महीने जेल में बिताना पड़ा. इसके बाद अभय चौटाला ने भारतीय ओलम्पिक संघ की कमान संभाली. चौटाला ने दिसम्बर 2012 में इस पद को सम्भाला था लेकिन उनके ऊपर भी तमाम आरोप लगे. चौटाला इस पद पर फरवरी 2014 तक काबिज रहे. दिल्ली से लेकर राज्यों तक खेल संस्थाओं का हाल यही है. प्रत्येक खेल में खिलाड़ियों का कम

नेताओं और नौकरशाहों का बोलबाला है.  फेडरेशन से खिलाड़ियों को कुछ भी मदद नहीं मिलती है. खेल संघों से जुड़े नेता अपनी जेब में माल जमा करने में लगे रहते हैं, जबकि भारतीय खिलाड़ियों की सफलता में फेडरेशन का हाथ न के बराबर होता है. पीवी सिंधु ने पदक जीता तो इसमें गोपीचंद का बहुत बड़ा योगदान था. दीपा जैसी प्रतिभावान जिम्नास्टिक खिलाड़ी को फेडरेशन से कोई मदद नहीं मिली. फेडरेशन केवल नेताओं की गोद में बैठने वाली संस्था बनकर रह गया है. भारत के खेल संघों पर काबिज लोगों ने खूब घोटाले किए. कलमाड़ी और चौटाला जैसे महानुभावों की कमी थोड़े ही है.

भारतीय खेलों में राजनीतिक दखलअंदाजी इतनी है कि विदेशों में होने वाले खेलों या हाल ही में हुए रियो ओलम्पिक को लें तो खिलाड़ियों से अधिक खेल संघ के पदाधिकारी और उनके लग्गू-भग्गू विदेश जाने की होड़ में लगे रहते हैं. इससे भारतीय खेल का भारी नुकसान हो रहा है. रियो ओलम्पिक में भारतीय खेल अधिकारियों की मौज-मस्ती का भेद भी खुला जब 42 किलोमीटर की मैराथन दौड़ में भाग ले रही ओपी जैशा बेहोश पड़ी रही और उनका हाल पूछने के लिए देश का कोई प्रतिनिधि अधिकारी वहां मौजूद नहीं था. इस पर सरकार ने कोई कार्रवाई भी नहीं की.

सवाल है कि आखिर कब तक भारतीय खेल इन खेल माफियों के बीच फंसा रहेगा, कब तक मेडल के लाले पड़े रहेंगे, कब तक भारतीय खेल संघ ठोस योजना बनाने में फेल साबित होता रहेगा, कब तक खिलाड़ी सुविधाओं से वंचित होते रहेंगे और नेता नौकरशाह उनके नाम पर धन हड़पते रहेंगे? फिलहाल तो सरकार के पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं है.

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