साइबर अपराध : सुरक्षा में सेंध की नई चिंता

cyberबात चाहे एक पाकिस्तानी वीडियो क्लिप के जरिए मुजफ्फरनगर में दंगा कराने की हो, बांग्लादेशी हिंसा की तस्वीरों से असम को जलाने की, किसी और की बात को किसी और की बात बताकर फैलाने की या हैकिंग के जरिए भारतीय सुरक्षा व्यवस्था में सेंध लगाने की.

साइबर अपराध के बदलते तरीकों और बढ़ती घटनाओं ने अब एक ऐसी समस्या का रूप ले लिया है, जो सुरसा की भांति मुंह फैलाए खड़ी है और हमारी सरकार या सुरक्षा एजेंसियां चाह कर भी उनका समाधान नहीं कर पा रही हैं.

संचार के बेहतर माध्यमों के रूप में दिखने वाले व्हाट्‌‌‌सअप, फेसबुक, ट्‌‌‌वीटर और अन्य सोशल मीडिया कैसे हिंसा और उन्माद का साधन बन गए, पता ही नहीं चला. हालांकि पता तो अब भी नहीं चल रहा है कि कब, कौन, किस तरह से और किस पहचान से किसको साइबर अपराध का शिकार बना ले रहा है.

बिगाड़ रहा है सांप्रदायिक माहौल

3 सितंबर 2015 को आगरा के शमशाबाद इलाके में एक आपत्तिजनक फेसबुक पोस्ट को लेकर सांप्रदायिक माहौल इतना बिगड़ा कि इसने दो धर्मस्थलों में तोड़फोड़ और कई दुकानों में आगजनी का भयंकर रूप ले लिया. दंगे का रूप ले रही इस घटना पर पुलिस-प्रशासन काफी मशक्कत के बाद काबू पा सकी.

कुछ ऐसी ही घटना सामने आई बिहार के भोजपुर जिले के शाहपुर में, जहां 7 जुलाई 2016 को एक धर्म विशेष के खिलाफ फेसबुक पर की गई टिप्पणी ने सांप्रदायिक तनाव का रूप ले लिया. रानीसागर गांव में सड़क पर उतरे उपद्रवियों ने कई झोपड़ियों को आग के हवाले कर दिया.

इस घटना पर काबू पाने के लिए पुलिस को लाठीचार्ज भी करनी पड़ी थी. बीते साल बिहार में ही साइबर अपराध की एक ऐसी घटना सामने आई, जिसने कई जिलों को आग के हवाले कर दिया. 5 अगस्त 2016 को बिहार के छपरा के मकेर थाना क्षेत्र के दक्षिणी टोले में एक युवक ने आपत्तिजनक वीडियो फेसबुक पर पोस्ट कर दिया. वीडियो को सोशल मीडिया पर वायरल होते देर न लगी और इसने सांप्रदायिक दंगे का रूप ले लिया. प्रशासन ने एहतियातन पूरे जिले में निषेधाज्ञा लागू कर दी. इंटरनेट सेवा को बंद कर दिया गया.

तोड़फोड़ और हिंसा के आरोप में 25 लोगों को गिरफ्तार किया गया. लेकिन तब तक उस वीडियो ने पड़ोस के जिलों को भी अपने प्रभाव में ले लिया था. दंगे और आगजनी ने सिवान और गोपालगंज को भी अपना शिकार बना लिया. इन दोनों जिलों में भी इंटरनेट सेवा बंद करनी पड़ी. समाज में वैमनस्यता फैलाने वालों के लिए सोशल मीडिया और साइबर स्पेस एक नए औजार बनते जा रहे हैं.

ऐसी घटनाओं के भयंकर रूप लेने का एक सबसे बड़ा कारण ये है कि हमारे देश में पुलिस-प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों के पास साइबर अपराधों से निबटने के लिए न तो पर्याप्त संसाधन हैं और न ही जरूरी ट्रेनिंग. ऐसे मामलों में भी पुलिस अपराधियों को पकड़ने के लिए पारंपरिक तरीकोें का ही इस्तेमाल करती है.

यही कारण है कि अपराधियों और अपराध के कारणों तक पहुंचते-पहुंचते घटना विकराल रूप ले लेती है. सरकारें कहती तो हैं कि वे साइबर अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए वैज्ञानिक तरीकों के इस्तेमाल पर जोर दे रही हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही सच्चाई बयां करती है. हाल यह है कि देश के लगभग आधे राज्यों में ही साइबर पुलिस स्टेशन हैं. जो हैं उनमें भी प्रशिक्षण प्राप्त पुलिसकर्मियों का अभाव है.

महाराष्ट्र सरकार ने घोषणा की है कि स्वतंत्रता दिवस के दिन राज्य के सभी जिलों में एक-एक साइबर पुलिस स्टेशन की शुरुआत की जाएगी. इसके लिए आधारशिला भी रख दी गई है. लेकिन यह देखने वाली बात होगी कि ये कितने प्रभावी होते हैं, क्योंकि महाराष्ट्र उन अग्रणी राज्यों में है, जो साइबर अपराध से सबसे ज्यादा जूझ रहे हैं. कम चिंतनीय यह भी नहीं कि देश के एकमात्र साइबर ट्राइब्यूनल में जज ही नहीं हैं.

हैकिंग है सबसे बड़ी चिंता

चिंता की बात यह है कि केवल आम लोग ही इन साइबर अपराधियों का शिकार नहीं हो रहे हैं. बड़ी हस्तियों और शख्सियतों से लेकर सरकारी प्रतिष्ठान भी इसकी जद में आ रहे हैं. पिछले साल ही हमने देखा कि कैसे देश की बड़ी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस और देश के एक बड़े नेता राहुल गांधी का ट्‌‌‌वीटर एकाउंट हैक हो गया और उसपर कई आपत्तिजनक पोस्ट किए गए.

जब तक ट्‌‌‌वीटर एकाउंट को हैकर से आजाद कराया जाता, तब तक वह अपने मकसद में कामयाब हो चुका था. बीते कुछ वर्षों में प्रधानमंत्री कार्यालय और सीबीआई जैसे महत्वपूर्ण संस्थानों की वेबसाइट्‌‌‌स पर साइबर अटैक हो चुके हैं. 23 अगस्त 2016 को एक दैनिक समाचार पत्र को आरटीआई के जरिए मिली जानकारी के अनुसार बीते साढ़े चार साल में 979 सरकारी वेबसाइट्‌‌‌स हैक हुई हैं.

इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा दिए गए इन आंकड़ों के अनुसार 2012 में 371, 2013 में 189, 2014 में 155, 2015 में 164 और 2016 में जून महीने तक 100 सरकारी वेबसाइट्‌‌‌स हैक हुईं. आरटीआई से मिली इस जानकारी में यह भी बताया गया था कि भारत में बीते साढ़े चार सालों में सबसे ज्यादा साइबर हमले पाकिस्तान, बांग्लादेश और चीन से हुए हैं.

ऐसा भी नहीं है कि ये साइबर हमले हाल में ही देखने को मिल रहे हैं. 2011 में दिल्ली में हुए कॉनवेल्थ खेलों के दौरान ही महत्वपूर्ण भारतीय वेबसाइटों पर 8 हजार से ज्यादा बार साइबर हमले हुए थे. 2010 के बाद से साइबर हमले की घटनाओं में तेजी देखने को मिली है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े के मुताबिक 2010 में भारत में आईटी एक्ट के तहत 966 मामले दर्ज हुए थे, जो 2011 में बढ़कर 1781 हो गए. यानी एक साल में ही देश भर में साइबर हमलों में लगभग 85 फीसदी की बढ़ोतरी देखने को मिली.

कमज़ोर क़ानून भी है कारण

साल-दर-साल साइबर अपराध के बढ़ते आंकड़ों का एक कारण यह भी है कि देश में साइबर अपराधों को रोकने के लिए कठोर नियम व कानूनों का अभाव है. हाल के दिनों में ऐसी कई घटनाएं सामने आई हैं, जिनमें साइबर स्पेस का इस्तेमाल कर के बड़ी व विभत्स घटनाओं को अंजाम दिया गया है. लेकिन ऐसे अपराध करने वालों तक कानून की चाबुक पहुंचे, इसकी कोई मुकम्मल व्यवस्था ही भारत में नहीं है. किसी भी वेबसाइट पर अपलोड की गई आपत्तिजनक सामग्री को हटाने के लिए नियम यह है कि उस वेबसाइट को नोटिस दिए जाने के 36 घंटों के भीतर उसे उस सामग्री को हटाना होगा.

आज के दौर में जबकि कोई भी भ्रामक या उन्मादी सूचना चंद सेकंडों में देश भर में फैल जाती है, हम समझ सकते हैं कि यह समय अपराधियों के लिए कितना ज्यादा है. यह हास्यास्पद ही है कि भारत में साइबर अपराध गैर जमानती नहीं हैं. साथ ही इसके लिए अधिकतम सजा भी तीन साल ही है. सोचने वाली बात है कि इंटरनेट का इस्तेमाल कर के किसी भी बड़ी घटना को अंजाम देने वाला आदमी महज तीन साल की सजा पा कर आजाद हो सकता है. हालांकि यह भी तय नहीं है कि उसे सजा मिल ही जाय.

देश में साइबर थाने

आंध्रप्रदेश       2

अरुणाचल प्रदेश  1

बिहार   1

छतीसगढ़       1

केरल   1

राजस्थान       1

चंडीगढ़  1

ओड़िशा 1

मध्यप्रदेश      1

पंजाब   2

तमिलनाडु      7

कर्नाटक 7

झारखंड 7

पश्चिम बंगाल   5

उत्तराखंड       1

झारखंड 1

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