करो़डों खर्च पर हाथ नहीं लग रही मछली

सीताम़ढी जिले में तकरीबन ढाई दशक पूर्व मत्स्य पालन को ब़ढावा देने के लिए प्रजनन सह वितरण केंद्र की स्थापना करायी गयी थी. सीताम़ढी-शिवहर एनएच-104 के राघोपुर बखरी गांव में मुख्य पथ से करीब एक किलोमीटर पूरब दिशा में स्थापित उक्त केंद्र को जिले के मत्स्य पालकों के लिए बेहतर भविष्य के रूप में देखा जा रहा था. लेकिन सरकार की अनदेखी के कारण वर्तमान में यह मत्स्य पालन केंद्र अपने हाल पर आंसू बहा रहा है.

इसका परिसर अब स्थानीय दबंगों के अतिक्रमण का शिकार हो रहा है. परिसर में चारो तरफ पुआल बिखरा पड़ा है. 16 अक्टूबर 1986 को बिहार सरकार के तत्कालीन मत्स्य सह पशुपालन मंत्री मदन प्रसाद सिंह ने खाद्य दिवस के अवसर पर इस केंद्र का उद्घाटन किया था. करीब 52 एक़ड जमीन पर स्थापित इस मत्स्य पालन केंद्र को विश्व बैंक के तत्कालीन अभियंता एससी खोभारी चाईना ने डिजाइन किया था.

1980 में चीन से प्रशिक्षण प्राप्त कर के आये अभियंता नंद किशोर सिंह का इस केंद्र के विकास में महत्वपूर्ण योगदान था. इसके प्रत्येक तालाब की खुदाई करीब डे़ढ एकड जमीन में करायी गयी थी, जिनमें तकरीबन एक दर्जन तालाब मत्स्य प्रजनक थे. गौरतलब है कि संपूर्ण भारत में इस प्रकार के दो ही केंद्र थे, एक राजधानी पटना में और दूसरा सीताम़ढी के राघोपुर बखरी में. पटना वाले को बंद कर वहां एम्स की स्थापना करा दी गयी. वहीं राघोपुर बखरी का केंद्र तकरीबन तीन साल पहले तक साल में चार माह मत्स्य बीज प्रजजन का कार्य करता रहा है.

केंद्र परिसर में जल की समस्या से निजात के लिए 20 एचपी का दो समरसबिल पंप भी लगाया गया था. 40 केबी का एक जेनेरेटर एवं 80 हजार गैलन क्षमता वाली एक पानी की टंकी भी उपलब्ध करायी गयी थी. इसके साथ ही तीन हैचिंग व दो ग्रिडिंग पुल का भी निर्माण कराया गया था. तब केंद्र को चलाने के लिए एक प्रभारी मो. अख्तर जमाल के अलावा 3 चौकीदारों की नियुक्ति भी हुई थी.

केंद्र के लिए हैचरी प्रबंधक के अलावा 4 मत्स्य तकनीशियन और 6 मछुआरों का पद भी सृजित किया गया था. केंद्र के तत्कालीन प्रभारी मो. जमाल ने इस बारे में बताया कि सबसे पहले 1986 में उ़डीसा के बासकेट हैचरी से केंद्र का श्रीगणेश किया गया था, जो कि 1989 तक कार्य करता रहा. 1990 में चाईनीज सर्कुलर हैचरी के कार्यरत होने के बाद लाखों की लागत से निर्मित बासकेट हैचरी का प्रयोगशाला बेकार होकर रह गया.

प्रयोगशाला का पाईपलाईन व भवन जर्जर होने लगा. भवन के खिडकियां-दरवाजे स़ड गए. इस मत्स्य पालन केंद्र में पंजाब, कश्मीर, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश एवं पश्चिम बंगाल के अलावा देश के अन्य प्रांतों से भी फिशरी कॉलेजों के छात्र आकर मत्स्य प्रजनन पर प्रयोग करते थे. लेकिन यहां पर छात्रों के ठहरने की समुचित व्यवस्था नहीं होने के कारण महज चंद दिनों बाद ही उनके वापस जाने की मजबूरी बनी रही.

वर्तमान में जिले का विभागीय आंक़डा बताता है कि सीताम़ढी जिले के मत्स्य पालकों को प्रशिक्षण के लिए अन्य स्थानों पर भेजने में लाखों खर्च किया जा रहा है. वित्तीय वर्ष 2014-15 में मत्स्य पालकों के प्रशिक्षण की योजना से संबंधित प्रतिवेदन में बताया गया है कि राज्य से बाहर 90 प्रशिक्षण के लिए 9 लाख रुपये खर्च का लक्ष्य निर्धारित किया गया था. जिसके आलोक में कुल 60 प्रशिक्षण पर 5 लाख 37 हजार रुपये खर्च किये गये हैं. जबकि 270 जिला स्तरीय प्रशिक्षण के लिए निर्धारित 4 लाख 72 हजार में से 264 प्रशिक्षण पर तकरीबन पौने 4 लाख रुपये खर्च किये जा चुके है.

एक ओर जहां इतनी बडी संंस्था मृतप्राय बनी है, वही दूसरी ओर जिले के अलग-अलग प्रखंडों में हेचरी की स्थापना के लिए केंद्र व राज्य सरकार व्यापक स्तर पर अनुदान दे रही है. सीताम़ढी जिले में ही तकरीबन डे़ढ दर्जन हैचरी हैं. राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के अंतर्गत कृषि रोड मैप के तहत 281 करो़ड रुपये प्रस्तावित हैं. इस राशि से बत्तख सह मछली, बागवानी सह मछली एवं गाय सह मछली पालन की भी व्यवस्था करायी जानी थी.

इसके अलावा फिशरी कॉलेजों के छात्रों की सुविधा के लिए एक छात्रावास निर्माण की भी योजना थी. जिन उद्देश्यों के लिए यह राशि प्रस्तावित थी, उन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति के लिए स्थापित एक केंद्र आज जर्जर हाल में है. अगर यह प्रस्तावित राशि राघोपुर बखरी मत्स्य पालन केंद्र को उपलब्ध करा दी गयी होती, तो बहुत हद तक इसका विकास हो गया होता.

साथ ही सूबे के मत्स्य पालकों को आंध्रप्रदेश समेत अन्य स्थानों पर प्रशिक्षण के लिए जाने की समस्या से निजात भी मिलता और प्रशिक्षण मद में खर्च की जाने वाली सरकारी राशि भी बच जाती. तकरीबन तीन साल पूर्व तक इस मत्स्य पालन केंद्र में मई से अगस्त माह के बीच बीज प्रजनन कार्य के साथ उत्पादित बीज को 5 सौ रुपये प्रति लाख की दर से वितरित किया जाता रहा है. जिससे प्रतिवर्ष तकरीबन ढाई से तीन लाख रुपये तक की आमदनी होती थी.

हाल ही में केंद्र सरकार ने मत्स्य पालकों के लिए नीली क्रांति योजना को स्वीकृति प्रदान की है. इस योजना के तहत केंद्र सरकार से 50 प्रतिशत अनुदान मिलेगा. राज्य सरकार के द्वारा भी 20 प्रतिशत अतिरिक्त टॉप अप अनुदान का प्रस्ताव है.

इस योजना में नये तालाबों के निर्माण, आर्द्रभूमि के विकास, अंगुलिकाओं के संचयन, केज में मछली पालन, हैचरी निर्माण व फिश शेड मील की स्थापना को भी शामिल किया गया है. वहीं राज्य सरकार द्वारा अनुसूचित जाति / जनजाति के मत्स्य पालकों को मछली के विपणन हेतू प्रोत्साहित करने के लिए विशेष घटक योजना के अन्तर्गत 90 प्रतिशत सब्सीडी के रूप में अनुदान पर मोपेड सह आइस बॉक्स, थ्री व्हीलर व फोर व्हीलर वाहन उपलब्ध कराने वाली है.

सरकारी तालाब के जीर्णोद्यार व चौकीदार शेड निर्माण पर भी 50 प्रतिशत अनुदान दिया जाने वाला है. जिला मत्स्य पदाधिकारी मनोरंजन कुमार ने बताया है कि राघोपुर बखरी के बंद प़डे मत्स्य प्रजनन व बीज वितरण केंद्र का 5 करो़ड की लागत से जीर्णोद्यार कराया जायेगा. केंद्र के 35 एक़ड जमीन में मॉडल ब्रूड बैंक बनाया जायेगा.

जिसमें सूबे में विलुप्त हो रही कवई, देशी मांगूर, सिंघी, गैंचा, बाश व टेंगरा के बीज का उत्पादन होगा. बताया गया है कि परियोजना मंजूरी के लिए फाइल नेशनल फिशरीज डेवलपमेंट बोर्ड हैदराबाद के पास मंजूरी के लिए भेजी गयी है. इसमें 90 प्रतिशत लागत राशि एनएफडीबी और शेष 10 प्रतिशत बिहार सरकार की होगी. अब देखना यह है कि इस फाईल का गंतव्य जमीनी हकीकत से जुड़ता है यह पहले की तरह यह फाइल भी धूल फांकती रह जाती है.