हमें हमारा कश्मीर वापस लौटा दें

Pro Kashmir resolution Studदरअसल, हमें शिकवा है दोस्तों से और दुश्मनों से भी. हमें अपनों ने भी लूटा और ग़ैरों ने भी लूटा. कश्मीर के लोग बेचारे इनोसेंट पीपल हैं. इनको अभी आप कहेंगे कि कल आप हड़ताल छोड़ दो, हम ये करेंगे आपकी आज़ादी के लिए, तो ये पांव छुएंगे आपके. उन दिनों नेहरू जी डल झील की सैर कर रहे थे.

लोगों ने उनका विरोध किया. एक ने अपना कपड़ा उठा कर पेट दिखाया, कहा हमें आपका चावल नहीं, आजादी चाहिए. शे़ख अब्दुल्ला ने मिसगाइड किया नेहरू जी को. शे़ख अब्दुल्ला ने कहा कि ये कह रहे हैं कि हमें चावल चाहिए, भूखे पेट हैं, तभी पेट दिखा रहे हैं.

असल में बुनियादी तौर पर कश्मीर के प्रॉब्लम क्रिएटर मिस्टर अब्दुल्ला ही हैं. 1989 से हमने कितनी मौतें देखी. कितनों की इज्ज़त लूटीं. कश्मीर का समाधान यह है कि टेबल पर आना चाहिए, बातचीत के लिए. कश्मीर के दो-तीन स्टेक होल्डर्स है, पाकिस्तान के भी और इंडिया के भी. ये सब एक टेबल पर आएं. बैठे, बातचीत करें.

गरीबी हमारी पहली समस्या है
हम तो कहते हैं कि इंडिया भी आए यहां पर, हमें अपनाए और पाकिस्तान भी अपनाए. कश्मीर को संवारे सजाए. हम अ़फगानिस्तान के लोग नहीं हैं, चेचेन्या वाले नहीं हैं, ये कश्मीर है, ये जन्नत है. इस जन्नत को आग लगा दी गई. कोई बच्ची अंधी हो गई.

किसी ने बाप खोया, किसी ने बेटा. बेटे की अर्थी बाप को ही उठानी पड़ती है. 10 लाख आर्मी यहां पर बैठी हुई है. जैसे कोई वर्ल्ड वार चल रहा हो. अगर, 10 लाख आर्मी के बदले एक लाख आर्मी रखते तो नौ लाख आर्मी पर जितना खर्च आता है, वो यहां के यूथ पर खर्च होता.

इससे बेरोजगारी खत्म होती. हमारे फारूक़ अब्दुल्ला साहब हैं, इन्होंने कश्मीर को क्या दिया है. उनको क्या है? दुख-दर्द तो हम लोगों को है. शाम के वक्त अंधेरा उनके घर में नहीं होता, कश्मीरियों के घर में अंधेरा होता है. बिजली फीस तो गरीबों को देना पड़ता है, ़फारूक़ अब्दुल्ला को नहीं. यहां की पहली क्राइसिस गरीबी है.

साढ़े तीन लाख ग्रेजुएट युवा यहां पर बेक़ार बैठे हुए हैं. यहां पर 75 हज़ार पोस्टग्रेजुएट हैं, जो बेक़ार बैठे हुए हैं. ये प्रोफेशनल डिग्री वाले हैं. हम इंडिया की बात नहीं, कश्मीर की बात कर रहे हैं. अगर यहां पर तीन हज़ार करोड़ का बजट आता है, तो कोई पूछने वाला नहीं है.

कोई क्यों नहीं पूछता है? अगर मैं फारूक़ अब्दुल्ला का क्लास लूं, तो कल को वे कहेंगे कि हम पाकिस्तान के साथ जाने वाले लोग हैं. यही हमारी दुखती रग है. मुफ्ती से सवाल करेंगे तो हमें कहेंगे कि हमें आज़ादी चाहिए. कल तक महबूबा मुफ्ती कह रहीं थी कि ये हमारे बच्चे हैं. जब गोली चली तो उसने भाषा बदल ली.

हमारे साथ ज्यादती होती है
यहां पर बहुत सारे स्टेक होल्डर्स हैं. यहां पर रॉ भी स्टेक होल्डर है, अपनी मर्ज़ी से किसी को कुर्सी पर बिठाते हैं. कहने का मतलब कि जो उनकी गुलामी करे. यहां की गवर्नेंस देखिए. क्या ये डेमोक्रेसी है? एक बूढ़ा आदमी है, बीमार है, पेसमेकर लगा हुआ है, गिलानी साहब से इंडियन गवर्नमेंट क्यों इतना डरती है?

वो कौन सा रिवॉल्यूशन ले आएंगे. अरे, भाई छोड़ दो उनको, नमाज़ पढ़ने दो. एक बंदे को आज़ादी नहीं दे सकते, तो हज़ार बंदों को कहां से आज़ादी देंगे? आज उनको दस वर्ष हो गए घर में नज़रबंद हुए और आज उनकी मकान को ही छावनी बना दिया गया है. आसिया अंद्रावी, उसका बेटा हॉस्पिटल में है.

खुद कोर्ट ने कहा कि उसको छोड़ दो. अभी वो जेल से बाहर ही था कि फिर से उसको अरेस्ट कर लिया गया. यहां ये हालात हैं. ये एक दर्द नहीं है यहां पर, दर्द का अंबार है. आप सिटी में देखते हैं, आप गांव में जाइए, देखिए, कई ऐसे लोग है, जिनके बेटों को आज से बीस साल पहले ग़ायब कर दिया गया. 10 साल की बच्चियों का रेप हुआ.

दिल जीतने के लिए क्या करना पड़ता है? पहले अपनाना पड़ता है. ग़ुलामी और आज़ादी को छोड़ दीजिए, पहले मानवता की बात कीजिए. बाद में देखेंगे की ग़ुलाम कौन है, आज़ाद कौन है. यहां का सीएम भी आज़ाद नहीं है, वो भी ग़ुलाम है. उसको डिक्टेशन लेनी पड़ती है पहले. सौ बार फोन उठाना पड़ता है.

यहां जो स्टेटस दिया गया था, उसको खत्म कैसे किया गया? इंसान को लगता है कि हमारे साथ ज्यादती तो पहले से ही करते आए हैं. किसी की भी सरकार हो, सबका द़खल रहता है. ज्यादा से ज्यादा द़खल इंटेलिजेंस की रहती है. किसको क्या करना है, किससे क्या कराना है, सब में द़खल होता है.

आर्मी वाला मुझे बोलेगा कि यहां वोट डालने जाओगे, किसको डालोगे, फलाने को डालना. एक इंसान को कैसा फील होगा तब? अगर हमारे साथ सेना वाले कोई ज्यादती करते हैं और अगर हम एफआईआर दर्ज कराने जाए तो वह भी नहीं दर्ज किया जाता. छोटे-छोटे बच्चों को भी ज़लील किया जाता है.

यदि मैं छोटे बच्चे के साथ बाज़ार निकलता हूं, तो मिलिट्री वाला गंदी-गंदी बातें बोलता है. ऐसे में, अगर मुझे मौक़ा मिले, तो मैं भी मिलीटेंट बनूंगा. गन उठाऊंगा, मारूंगा या मरूंगा, खत्म कहानी. यासिर क़ादरी जैसे यहां पर कितने लोग होंगे. सोफिया, निलोफर, आसिया का गैंग रेप केस का इंटरनेशनलाइज़ेशन हो गया.

लेकिन कुछ नहीं हुआ. आर्मी वाला आएगा, आपको दो-तीन थप्पड़ मारेगा, डंडा मारेगा और चला जाएगा. कश्मीर को विक्टिमाइज किया जाता है, बर्बरिज्म चल रहा है. यदि पुलिस स्टेशन वाला किसी को ऐसे उठा कर लाया तो वो चार हज़ार, पांच हज़ार, दस हज़ार, तीस हज़ार की बोली लगा कर उनको छोड़ते हैं.

क्या इस पर इंडियन प्राइम मिनिस्टर कोई स्ट्रिक्टनेस दिखा सकते हैं? यहां पर जो पुलिस है, वो यहां क्रिमिनल एक्टिविटी में शामिल है. पुलिस ल़डकों को उठा कर लाती है, पीटती है, दो-तीन बाद फिर 10-20-30 हजार दो तो छोड़ देती है. अब जिस बंदे को तीस हज़ार के लिए विक्टिमाइज किया गया, उसी का नाम बुरहान था.

यहां बहुत दिग्गज लोग हैं, जिन्होंने क़लम से जंग लड़ी, जिन्होंने आइडियोलॉजी से ल़डाई लड़ी, ख्यालात से लड़ाई लड़ी, किसी ने हथियार से भी लड़ाई लड़ी. लेकिन जो लड़के हथियार उठाते हैं, क्यों उठाते हैं? क्योंकि, वो मजबूरी में ऐसा करते है.

हालात से मजबूर हो कर फिर इस बात पर डट जाते हैं कि अब तो मर के जाना है या मार कर जाना है. कुछ लोगों ने कहा कि गिलानी साहब के घर गये, उन्होंने दरवाज़ा नहीं खोला. एक ऐसी स्थिति बन जाती है कि एक लीडर दरवाज़ा खोले तो उसको भी खतरा है. गिलानी साहब ने हड़ताल के समय एक स्टेटमेंट दिया था कि एंबुलेंस पर पत्थर मत फेंको, लड़के उनके घर चले गए.

उन्होंने सारे न्यूज़ चैनलों को वापस फोन करके बोला कि ये वाली लाइन हटा दो. क्योंकि उनकी भी जान खतरे में पड़ गयी. लडकों ने बोला कि हम मरते हैं और आप बोलते हैं कि मत मारो. ये पुलिस वालों ने एंबुलेंस के साथ क्या किया. किसी के खिला़फ कोई एक्शन नहीं. कोई सस्पेंड नहीं हुआ आज तक. कोई टर्मिनेट नहीं हुआ आज तक.

पुलिस यहां पर लोगों को विक्टमाइज करती है, लोगों से पैसा लेते हैं, टॉर्चर करते हैं. यही सब बातें लोगों को एक्स्ट्रीमिज्म की ओर ले जाता है. यहां पर सबसे ज्यादा मिलिट्री जोन है, गवर्नेंस यहां पर तो बिल्कुल ज़ीरो है. दो दिन से हमारे घर में बिजली नहीं है. वैसे गवर्नेंस चलाएं भी क्या? महबूबा जी भी क्या बोलेंगी? उनके पास अथॉरिटी ही क्या है?

एक बुरहान के मरने से 1000 बुरहान पैदा हो गए
मस्जिद में नमाज़ होती है. नमाज़ पढ़ के लोग निकलते हैं. 50-60 हज़ार लोग होते हैं, उनमें से दस हज़ार लोग बोल देते है कि हमें चाहिए आज़ादी, कोई कहता है कि पाकिस्तान ज़िंदाबाद. यहां पर जब शे़ख अब्दुल्ला एलेक्शन लड़ते थे, तो उनके हाथ में पाकिस्तान का नमकीन होता था. वो लोगों को दिखाते थे.

लोग उनको वोट डालते थे. जब कोई मिलिटेंट मरता था, तो महबूबा मुफ्ती उसकी मां को आंख के आंसू पोंछती थीं. यहां पर लोग लीडर बनते हैं, स़िर्फ पाकिस्तान के नाम पर और आज़ादी के नाम पर. जब वो गद्दी पर बैठते हैं, तब फिर राजनाथ सिंह को गले लगाते हैं. हमारी कमज़ोरी यही आज़ादी है.

शे़ख अब्दुल्ला ने राज किया, फिर फारूक़ अब्दुल्ला ने राज किया, उमर अब्दुल्ला ने राज किया, स़िर्फ इसी चीज़ पर. वाजपेयी जी ही एक लीडर हैं जिन्होंने कश्मीर का दर्द समझा. कुछ हद तक समझा कि कश्मीरियों की बीमारी क्या है? ये कोई छोटी बीमारी नहीं है. 1931 से ही ये बीमारी है. 1931 में इंडिया भी आज़ाद नहीं था, वो भी ग़ुलाम था. लेकिन, हम आज़ाद लोग थे.

मरना तो यहां पर हर किसी को है. यहां पर कोई जवान नहीं बचेगा. मैं देखता हूं कि जो हमारे यूथ हैं, वे कमप्रोमाइज नहीं करेंगे, जब तक कि कोई स्टेबल ़फैसला न हो. एक बुरहान के मरने से 1000 बुरहान पैदा हो गए यहां पर.

आपने देखा कि एक बुरहान के पीछे तीन लाख का जुलूस जनाज़ा पढ़ने के लिए निकला. अब कम्पिटिशन इसी फील्ड में है. अब सब गिलानी बनना चाहते हैं यहां. एक इंसान की चाहत क्या होती है? जब मरो तो लोग अच्छा बोले.

यहां के पत्रकारों से पूछिए कि वो बेचारा लिख नहीं सकता है, उसका क़लम बेक़ार पड़ा है. उसको पता है कि अगर मेरे क़लम ने कुछ ज़हर उगला तो सज़ा-ए-मौत होगी. किसी के क़लम में इतनी ताक़त नहीं है कि वो सच लिखे. इनको पहले पूछना पड़ता है कि क्या मुझे इजाज़त है?

आपको जितने भी कश्मीरी मिलेंगे, वो यही कहेंगे कि हमें न हिंदुस्तान चाहिए, न पाकिस्तान चाहिए, हमें हमारा कश्मीर वापस लौटा दें. ये ज़ख्मी कश्मीर हमें वापस दे दो. हमारे साथ हमदर्दी करो. हमारे बच्चे बंद हैं, हमारे बच्चों को गोलियां लगी हैं, हम और कुछ नहीं मांगते हैं.