इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत के नारे खोखले हैं

kamal morarkaहम बेरहम शिकंजे में कसे जा चुके हैं. सिविल सोसाइटी को इन चीज़ों की जानकारी होनी चाहिए, लेकिन नहीं है. जम्मू और कश्मीर में जो घटनाएं घट रही हैं, उसकी सही रिपोर्टिंग नहीं हो रही है. यह बहुत बड़ी त्रासदी है. हमने हड़ताल में पांच दिन की छूट का ऐलान किया, लोगों ने उसमें साथ दिया. इसके पीछे यही मंशा थी कि हड़ताल शुरू हुए अब छह महीने होने वाले हैं, अब लोगों को राहत मिल जानी चाहिए.

जहां तक हमारे बुनियादी मसले के संबंध हैं, भारत के फौजी शिकंजे से आज़ादी हासिल करने का, वो जारी रहेगा. उसकी सूरतें और शक्लें बदलती रहेंगी. हमारी क़ौम ने जो महान क़ुर्बानियां दी हैं, उन्हें भुलाया नहीं जा सकता है. चाहे भारत यहां कितना भी सरमाया खर्च करे, ताक़त खर्च करे, लेकिन हम अपने स्टैंड पर डटे रहेंगे. हम अपने क़ौम से कहते हैं कि हमें ईमानदार बनना चाहिए, हमें इंसान का दोस्त बनना चाहिए.

इसलिए आप देख रहे हैं यहां जम्मू कश्मीर में किसी हिन्दू भाई को कोई नुक़सान नहीं पहुंच रहा है. हम खुदा परस्त हैं इसलिए हमें उम्मीद है कि अल्लाह ताला ज़रूर हमारी मदद करेगा.

भारत बहुत बड़ा मुल्क है उसके पास पैसा है, बड़ी फ़ौज है और यहां कई ऐसे लोग हैं जो उसके जबरी क़ब्ज़े का समर्थन भी करते हैं. उनके दिलों में भी कोई कसक नहीं है जो इंसान का दुख देख कर उसमें कोई तब्दीली आ जाए. इसके बावजूद ऐसा होता है. ये चीज़ें होती रहती हैं, हमें इससे परेशान होने की ज़रूरत नहीं है.

कश्मीर एक विवादास्पद टेरीटरी है
हम 47 से लेकर मुसलसल देखते आए हैं. उससे पहले भी हम सौ साल तक डोगरा शाही के शिकंजे में रहे हैं. उस दौर में भी हमने मज़ारें देखी हैं, सख्तियां देखी हैं. हिन्दुस्तान जो जम्हूरियत के दावे कर रहा है, वो खोखली है. उन्होंने हमारे साथ जो वादे किए थे, उससे बिल्कुल मुकर गए. हमारा जो बुनियादी और पैदाइशी हक़ है, राइट टू सेल्फ-डिटरमिनेशन, उसका उन्होंने वादा किया है. 18 क़रारदादों को पास किए हैं.

उन पर दस्त़खत किए हैं. उनको तसलीम किया है, पाकिस्तान ने भी और आलमी बिरादरी इसकी गवाह है, लेकिन उस पर वो अमल करने के लिए तैयार नहीं हैं. सिर्फ ताकत का नशा है. मसले को आसान करने का यही रास्ता है कि हिन्दुस्तान रियलिटी को समझे. वह समझे कि जम्मू और कश्मीर एक विवादित क्षेत्र है.

जम्मू और कश्मीर के लोगों को ये हक़ मिलना चाहिए कि वे अपने भविष्य का फैसला कर सकें कि वे भारत के साथ रहना चाहते हैं या पाकिस्तान के साथ या कोई और ऑप्शन चुनते हैं. भारत यहां नरमी का रवैया अख्तियार करे. यहां की वास्तविक मांग को स्वीकार करे.

सब कुछ हिन्दुस्तान के हाथ में है, हमारे हाथ में कुछ नहीं है. हमने बार-बार कहा है कि जम्मू-कश्मीर के जो बाशिंदे हैं, मुसलमान हैं, चाहे हिन्दू हैं, चाहे सिख हैं, चाहे बौद्ध हैं, चाहे ईसाई हैं, उनको हक़ दिया जाए कि वे अपने भाग्य का फैसला करें. अगर मेजॉरिटी का फैसला यही हो कि हम हिन्दुस्तान के साथ रहेंगे, तो हम तसलीम करेंगे. हम लोगों का फैसला तसलीम करेंगे. यही हल है और कोई हल नहीं है.

इन्हें कुर्सी से मतलब है, कश्मीर से नहीं
जो ये हिंदनवाज़ पार्टियां हैं, इनके रंग और इनके बयानात बदलते रहते हैं. इनका असल मक़सद कुर्सी है. ़फारूक़ अब्दुल्ला ने जो कुछ कहा है, उसमें भी यही मक़सद है कि हमें किसी न किसी तरह कुर्सी मिल जाए. अगर वो सिंसियर हैं, तो उनको चुनाव में कभी हिस्सा नहीं लेना चाहिए. वो कहते हैं कि हम हुर्रियत के साथ हैं. हुर्रियत आगे बढ़े, हम उनके पीछे-पीछे चलेंगे. अगर वो इसमें सिंसियर हैं, तो उन्हें किसी भी चुनाव में हिस्सा नहीं लेना चाहिए.

लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ. 1996 में जब यहां मुकम्मल बायकॉट था, तो इसी शख्स ने कहा कि अगर सिर्फ दो फीसद वोट पड़ेंगे, हम चुनाव में हिस्सा लेंगे. इलेक्शन में हिस्सा लिया और फिर वज़ीर-ए-आला बने. इनको स़िर्फ इक्तेदार के साथ दिलचस्पी है. अवाम के साथ कोई इनकी हमदर्दी नहीं है. क़ुर्बानी देने के लिए तैयार नहीं हैं. इस बार सौ जवान शहीद किए गए.

मैं अक्सर जवानों की बात करता हूं. ऐसे दर्दनाक वाक़यात जो हैं, वो तारी़ख का हिस्सा बन चुके हैं. अब इन पार्टियों को मौक़ा देने का सवाल नहीं पैदा होता है. अगर हमारे कॉज़ के लिए उनके मन में सिंसियरिटी है तो वे आगे आ कर किसी भी चुनाव में हिस्सा न लें. ये सारा सूरतेहाल जो है, वो ऐसे ही लोगों की लाई हुई है. 1947 में जम्मू में मुसलमानों की मेजॉरिटी थी. 81 ़फीसदी. ऐलान किया गया कि सारे जम्मू शहर में जमा हो जाओ.

पाकिस्तान बना है, हम तुमको गाड़ियों में भरकर पाकिस्तान भेज देंगे. उनके साथ फरेब किया गया और जब जम्मू आ गए तो वहां उनका कत्लेआम किया गया. शे़ख अब्दुल्ला अपनी आंखों से पांच लाख मुसलमानों का खून बहते देखते रहे. इस्ती़फा नहीं दिया. एक आंसू भी नहीं बहाया. उसी अब्दुल्ला की ये तारी़फ कर रहे हैं. आगामी चुनाव के बायकॉट का हमने फैसला किया है. अभी जो हमारा इंजीनियर शहीद हुआ, उसके जनाज़े में मैंने तक़रीर की फोन पर.

मैंने एलान किया कि आने वाले इलेक्शन, चाहे पंचायत का हो या श्रीनगर का हो या अनंतनाग का हो, उसका बायकॉट किया जाए. कुछ लोगों का कहना है कि हम इलेक्शन में हिस्सा लें. मैं 15 साल तक इलेक्शन में रहा. असेंबली में रहा 15 साल. तीन बार मुझे सोपोर कॉन्स्टीट्‌यूएंसी से वोट मिला. मैंने असेंबली में काम किया. हमने इसका भी तज़ुर्बा किया है. मैंने तो अल्लाह ताला के फज़ल से अपने 15 साल असेंबली में काम किया.

8 जुलाई के बाद तो लोग ही आए न सड़कों पर. वो कोई जंग नहीं थी. किसी के हाथ में डंडा नहीं था, किसी के हाथ में कोई पैलेट गन नहीं था. किसी के हाथ में कोई ग्रेनेड नहीं था. उनका कत्ल किया गया. उन पर गोलियां चलाई गईं. उन पर पैलेट गन चलाए गए. देखना तो यही है कि भाई ऐसा क्यों हुआ? अगर पहले से ही बुरहान की शहादत पर वहां दो लाख लोग जमा हो चुके थे.

40 बार उसकी नमाज़े जनाज़ा पढ़ी गई और फिर यहां से और लाखों की तादाद में वहां पहुंचते तो क्या फर्क़ पड़ता. लेकिन लोगों को नहीं आने देते हैं सड़कों पर. जहां तक जलसे, जुलूस व विरोध प्रदर्शन का सवाल है वो तो दूर की बात है. यहां तो मज़हबी कार्यक्रम करने की भी इजाज़त नहीं है.

12 दिसम्बर को ईद मिलादुन-नबी थी. हमने अपने यहां कार्यक्रम आयोजित किया, जिसमें यासीन मालिक, मीरवाइज़ और दूसरे बोलने वालों के साथ तक़रीबन 200 लोग शामिल होने वाले थे, लेकिन उस कार्यक्रम को करने की इजाज़त नहीं दी गई.

यानी एक बंद कमरे में एक धार्मिक कार्यक्रम करने पर बताया गया कि कानून व्यवस्था की समस्या पैदा हो जाएगी. दरअसल, यह लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि भारत की फ़ौज, यहां की पुलिस और भारत की सरकार कितना ज़ुल्म कर रही है. यहां भारत का लोकतंत्र कहां है?

क़सूर उनका है जो खामोश रहते हैं
वाजपेयी साहब का नाम अक्सर लिया जाता है कि कश्मीर पर उन्होंने बड़ा एहसान किया. क्या किया उन्होंने? कुछ भी नहीं किया. उन्होंने अपनी एक तक़रीर में कहा था कश्मीरियत और इंसानियत वगैरह. लेकिन क्या उन्होंने इंसानियत का एहतराम किया? हम भी तो इंसान हैं और फिर मुसलमान हैं. हमें मुसलमान होने पर फख्र है. वाजपेयी जी ने अगर कहा कि हम इंसानियत के दायरे में कश्मीर का फैसला करेंगे, तो हम भी इंसान हैं न.

तो वाजपेयी के दौर में हमें हमारा हक़ मिलना चाहिए था. दरअसल ये कहने की बातें हैं इस पर अमल नहीं हो रहा है. पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्ऱफ उसी दौर में कश्मीर मसले को सुलझाने के लिए भारत आये थे, चार सूत्री फॉर्मूला लेकर. मैंने उस फॉर्मूले का विरोध किया था. यहां हमारे कुछ नेताओं ने उसका समर्थन किया था. दरअसल वो फॉर्मूला हमारे बुनियादी स्टैंड से बिल्कुल अलग था, जिसमें हम आत्मनिर्णय (सेल्फ डिटरमिनेशन) की मांग कर रहे हैं.

भारत को इस मसले को हल करने के साथ कोई दिलचस्पी नहीं है. भारत के प्रधानमंत्री ने, यहां क़त्ल हुए लोगों या पेलेट गनों से ज़ख्मी लोगों के बारे में एक लफ्ज़ भी नहीं कहा है. कोई अफ़सोस नहीं जताया. एक विचारक था. उसे पूछा गया कि समाज में जो फसादात हो रहे हैं, इसकी क्या वजह है. उसका जवाब था कि ये जो फसाद करने वाले हैं, उनका क़सूर नहीं है.

ये उन लोगों का कसूर है जो खामोश रहते हैं. भारत में ऐसे करोड़ों लोग होंगे जो मानवता प्रेमी हैं, लेकिन सामने नहीं आते. जब तक आप लोगों को रोकेंगे नहीं, उनपर डंडे नहीं बरसाएंगे, उनपर गोलियां नहीं चलाएंगे तब तक वे पत्थर नहीं फेंकेंगे. अब पत्थर फेंकने वालों को ही मुजरिम बनाया जा रहा है. उन्हें ही जेलों में भेजा जा रहा है.

जो क़ातिल हैं, जिन्होंने पेलेट गन से हमारे लोगों की आंखें ख़राब कीं, उनको कोई कुछ नहीं कहता. ज़ख्मियों को कोई नहीं पूछता. इससे बढ़ कर और ज़ुल्म क्या हो सकता है. अब यह सवाल है कि हम भारत के खिला़फ, जिस तरह गांधी जी ने सिविल नाफ़रमानी को हथियार बनाया था, क्या हम वैसा कर सकते हैं.

इसका जवाब है कि अगर अंग्रेज़ हाकिम होते तो हम ये कर सकते थे, लेकिन यह भारत का राज है, जहां चारदीवारी से बाहर जाने की इजाज़त नहीं है, सड़कों पर निकलने की इजाज़त कहां से मिलेगी?

सिविल सोसाइटी हमारी बात हिन्दुस्तान के लोगों तक पहुंचाए
कश्मीर में पिछले पांच महीने से विरोध प्रदर्शन चल रहा था. ये सवाल किया जाता है कि पांच महीने के पहले के जो हालात थे, क्या वहां तक वापस जाया जा सकता है? मेरा मानना है कि हालात तो वैसे ही हैं. पहले भी लोगों को गिरफ्तार किया जाता था. अभी भी कहीं धरना देते हैं तो वहां पुलिस आती है, फ़ौज आती है, लाठी चार्ज किया जाता है, सड़कों पर बैठने नहीं दिया जाता है. सूरते हाल ज्यों की त्यों है.

अगर सिविल सोसाइटी कुछ कर सकती है तो उन्हें चाहिए कि वो पहले हिंदुस्तान के लोगों में जागरूकता पैदा करे कि कश्मीर में ज़ुल्म हो रहा है. इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत के जो नारे दे रहा है, ये खोखले नारे हैं. ज़मीनी सतह पर ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा है. सिविल सोसाइटी हम पर एहसान करे कि वे भारत में जागरूकता पैदा करे. लोगों को बताए कि भारत ने हमसे एक वादा किया था.

कश्मीर के लोग उस वादे को पूरा करने की मांग कर रहे हैं. पी चिदम्बरम ने 2010 में यह माना कि कश्मीर प्रॉब्लम इज अ ब्रोकन प्रॉमिसेज़. यानी हमने कश्मीर के लोगों के साथ जो वादे किये थे, हमने तोड़ दिए. ये बातें अगर हिंदुस्तान के लोगों तक पहुंचाई जाएं, सिविल सोसाइटी के ज़रिए तो उनका हमारे ऊपर बहुत बड़ा एहसान होगा. बुरहान के बड़े भाई का क़त्ल हुआ था.

अब पुलिस ने यह मान लिया है कि वह कोई मिलिटेंट नहीं था या हिज़बुल मुजाहिदीन का कोई कमांडर नहीं था. उन्होंने आदेश दिया कि इसका हर्जाना दिया जाना चाहिए. जम्मू में इस आदेश के खिला़फ प्रदर्शन हुआ. हिंदुस्तान में ऐसे लोग भी हैं. उन लोगों तक, जिनके सीनों में दिल है, उन तक अगर हिंदुस्तान की सिविल सोसाइटी पहुंचने की कोशिश करे, तो धीरे धीरे हिंदुस्तान के लोगों में ये नरमी आ जाएगी और वे हक़ीक़त को समझने का मौक़ा पाएंगे.

हमारी तंज़ीम का संविधान तय करेगा विरासत
अक्सर लोग हमसे पूछते हैं कि आपकी विरासत कौन संभालेगा. इस सिलसिले में मैं ये कहूंगा कि हमारी तंज़ीम का एक संविधान बना हुआ है. संविधान के मुताबिक़ कोई उसका मेम्बर बनता है और काम करता है तो वह किसी भी पद पर जा सकता है. मेरे दो बेटे हैं. उनमें से कोई भी हमारी पार्टी का मेम्बर नहीं बना है. इसलिए इसका कोई अंदेशा नहीं रखना चाहिए कि वे ही मेरी विरासत संभालेंगे.

अगर वे मेम्बर बन जाते हैं और उनमें सलाहियत है और सारे मेम्बर्स चाहेंगे तो उनको अपना नेता चुन सकते हैं, अपने वोट के जरिए. लेकिन, सबसे पहली ज़रूरत यह है कि वे तहरीक के मेम्बर बनें. नसीम तो सरकारी नौकरी में हैं. वे मेम्बर नहीं बन सकते. लेकिन, नईम बन सकते हैं. यदि वे पार्टी के संविधान की शर्तों को पूरा करते हुए मेम्बर बनते हैं तो ठीक है.

मेरे दोनों बेटे मेरी दो आंखों की तरह हैं. एक का मिजाज़ नर्म है और एक का गर्म है. एक का मानना है कि हमारी तहरीक में सब्र किया जाए लेकिन दूसरे का कहना है कि हमें अपने स्टैंड पर क़ायम रहना चाहिए. -लेखक हुर्रियत कांफ्रेंस (जी) के चेयरमैन हैं.

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