फाइनल में बेल्जियम को हरा कर भारत बना सिरमौर

World Cupबेहद शानदार खेल के लिए राष्ट्रीय खेल हॉकी एक बार फिर सुर्खियों में है. भारत की जूनियर टीम ने विश्व कप में गजब की हॉकी का प्रदर्शन करते हुए खिताब अपने नाम कर लिया है. देश में एक बार फिर हॉकी का परचम बुलंद हो रहा है.

लगातार नाकामी और विवाद की भेंट चढ़ने वाली भारतीय हॉकी एक बार फिर विश्व खेल पटल पर छा गई है. सीनियर भले ही अभी जीतने के लिए संघर्ष कर रहे हों, लेकिन जूनियरों की तूती बोल रही है. मैदान पर एक बार फिर भारतीय हॉकी की हनक स्थापित हो रही है. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनउ में हॉकी का जुनून चरम पर था.

भारतीय टीम ने जूनियर विश्व कप में यूरोप की सबसे ताकतवर टीम माने जाने वाली बेल्जियम को 2-1 से पराजित कर 15 साल बाद इस खिताब को अपने नाम किया है.

इतिहास के पन्नों के सहारे भारतीय हॉकी अपनी सुनहरी यादों के बल जी रही थी, लेकिन 18 दिसम्बर 2016 को लखनऊ के मेजर ध्यानचंद हॉकी स्टेडियम में हुई जीत ने एक बार फिर भारतीय हॉकी में नई जान फुंक दी है. यह जीत भारतीय हॉकी की तस्वीर बदल सकती है.

टीम के कई युवा खिलाड़ियों ने अपने जोरदार प्रदर्शन की बदौलत सीनियर टीम में अपना मजबूत दावा ठोक दिया है. उनमें हरमनप्रीत, मनदीप, अरमान जैसे प्रतिभावान खिलाड़ियों के नाम प्रमुख हैं, जो आने वाले दिनों में भारतीय हॉकी को नई पहचान दिला सकते हैं. पूरे विश्व कप जूनियर हॉकी टूर्नामेंट में भारतीय टीम ने गजब की हॉकी का प्रदर्शन किया.

आलम तो यह रहा कि विदेशी टीमें भारत के कहर से बचने की फिराक में दिखीं. भारतीय खिलाड़ियों ने मैदान पर अपनी बेहतरीन हॉकी की बदौलत हर जंग को बेहद आसान फतह में बदल दिया. टूर्नामेंट के दौरान भारतीय खिलाड़ियों की फिटनेस का भी कोई जवाब नहीं था. दूसरी ओर मैदान पर खिलाड़ियों का आपसी तालमेल भी गजब का देखा गया. बेल्जियम जैसी मजबूत टीम को आसानी से काबू करना भी एक बड़ी बात है.

भारतीय खिलाड़ियों का विरोधी टीमों पर शुरुआती समय में ही धावा बोल देना, इससे पहले कभी देखने को नहीं मिला. 70 और 80 के दशक की बात कुछ और थी, लेकिन मौजूदा समय में ऐसा बहुत कम देखा गया, जब भारतीय खिलाड़ी लगातार मैदान पर फुर्तीले और पासिंग के मामले में अव्वल दिखते रहे. हरमनप्रीत जैसे खिलाड़ी इसका सटीक उदाहरण हैं. यह जीत इसलिए भी अहम है, क्योंकि भारत ने इससे पूर्व साल 2001 में होबार्ट में विश्व कप जीता था.

टूर्नामेंट के फाइनल मुकाबले में भारत और बेल्जियम दोनों ही टीमों को मजबूत दावेदार माना जा रहा था, लेकिन भारत ने अपने पराक्रमी खेल की बदौलत बेल्जियम के सपनों पर ग्रहण लगा दिया. लखनऊ का मेजर ध्यानचंद हॉकी स्टेडियम मैच शुरू होने से पहले ही खचाखच भर गया था. पूरा स्टेडियम भारतीय तिरंगे से लहरा रहा था. हर खेल प्रेमी की जुबान पर भारत माता की जय का नारा गूंज रहा था.

मैच के पहले हाफ में ही टीम इंडिया ने बेल्जियम पर हमला करना शुरू कर दिया. मैदान पर तेजी से भारतीय खिलाड़ी बेल्जियम को खुली चुनौती देते दिखे. शुरुआती पांच मिनट के खेल में ही यह दिखने लगा कि भारत इस मुकाबले को एकतरफा करने की फिराक में है.

भारतीय खिलाड़ियों ने शुरुआती मिनटों में दो शानदार अटैक किए लेकिन गोल करने में कामयाबी नहीं मिली. मैच के आठवें मिनट में मिडफील्ड की बदौलत संता सिंह ने स्कूब के सहारे गेंद को आगे बढ़ाया जिसे गुरजंत सिंह ने अपनी शानदार रिवर्स हिट के सहारे गोल में बदलने में कामयाबी पाई. इस तरह से भारत ने पहला गोल दागकर बेल्जियम का मनोबल हिला दिया.

पहले ही हाफ के 22वें मिनट में भारतीय टीम के नीलकांता सिंह ने बेहद चतुराई से गेंद सिमरजीत सिंह की तरफ बढ़ाई और इसके बाद सिमरजीत सिंह ने रिवर्स हिट से गोल दागकर भारतीय टीम को 2-0 की अहम बढ़त दिला दी.

इस गोल के बाद तो पूरे स्टेडियम में भारतीय प्रशंसक खुशी से झूम उठे. इसके बाद बेल्जियम की टीम ने भारत पर दबाव बनाने का अथक प्रयास किया, लेकिन भारतीय टीम ने अपनी बेहतरीन रक्षात्मक रणनीति का भी परिचय दिया.

आखिरी वक्त पर जब मैच समाप्त होने में महज कुछ पल शेष रह गए थे, तभी बेल्जियम को एक पेनाल्टी कार्नर मिला, लेकिन उसे वे चूक गए. तभी उन्हें दूसरा पेनाल्टी कॉर्नर भी मिल गया.

समय के मुताबिक मैच तब तक खत्म हो चुका था, लेकिन पेनाल्टी कॉर्नर का फरमान रेफरी जारी कर चुके थे. वही फरमान बेल्जियम टीम की इज्जत बचा गया. पेनाल्टी कॉर्नर से बेल्जियम एक गोल करने में कामयाब रहा. बेल्जियम के फेब्रिस वान बोकरिज ने पेनाल्टी कॉर्नर का गोल किया. इस तरह भारत 2-0 के बजाय 2-1 से विजयी घोषित हुआ.

भारतीय टीम ने क्वार्टरफाइनल में स्पेन जैसी टीम को भी इसी तरह चित किया था. सेमीफाइनल में भारतीय टीम ने ऑस्ट्रेलियाई कंगारुओं को बेहाल करते हुए पेनाल्टी शूट आउट में 4-2 के अंतर से पटका. इतना ही नहीं लीग मैचों में भी टीम इंडिया का प्रदर्शन तारीफ के काबिल रहा.

लीग मैचों में भारत ने कनाडा को 4-0 से हराया. इसके बाद उसने इंग्लैंड को 5-3 और दक्षिण अफ्रीक को 2-1 से हराकर अपनी दावेदारी मजबूत की. भारतीय टीम ने सेमीफाइनल में ऑस्ट्रेलिया जैसी मजबूत टीम की चुनौती को भी आसानी से निपटा दिया.

जबकि सेमीफाइनल का मुकाबला आसान नहीं था. दोनों टीमों के खेल में एक बात सामान्य तौर पर दिख रही थी, वह थी जीत की भूख. निर्धारित समय तक स्कोर 2-2 के बराबर रहा लेकिन पेनाल्टी शूट आउट में भारत ने कंगारुओं को 4-2 से पछाड़ते हुए फाइनल का टिकट हासिल कर लिया. पेनाल्टीशूट आउट में गोलची दहिया का खास योगदान रहा.

दहिया ने ऑस्ट्रेलिया के मैथ्यू बर्ड और शार्प लैचलान के गोल के प्रयासों को नाकाम कर दिया. फिर तो फाइनल की राह आसान हो गई. भारतीय टीम ने ऑस्ट्रेलिया से अपना पुराना हिसाब चुकता कर लिया. दरअसल 1997 में विश्व कप खिताबी जंग में भारत को कंगारुओं से ही हार मिली थी.

भारतीय जूनियर हॉकी टीम को विश्व विजेता बनाने में कोच हरेंद्र सिंह का खास योगदान रहा. यह भी एक संयोग ही है कि साल 2005 में स्पेन से हार कर चौथे नंबर पर रहने वाली भारतीय टीम के कोच हरेंद्र सिंह ही थे, लेकिन इस बार उन्होंने चक दे इंडिया के शाहरुख की तरह टीम को नई पहचान दिला दी. कुल मिलाकर देखा जाए तो भारतीय हॉकी के लिए यह जीत बेहद खास है, क्योंकि यह जीत हॉकी के शानदार भविष्य के प्रति उम्मीदें दिखा रही है.

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