तीनों पक्षों के बीच बातचीत ज़रूरी

दिल्ली में सरकार के रवैये में कोई बदलाव नहीं है. सरकार कश्मीर की समस्या को केवल लॉ एंड ऑर्डर की समस्या मानती है. सिन्हा साहब (यशवंत सिन्हा) जैसे लोग यहां आते हैं, बातचीत करते हैं और बयान देकर चले जाते हैं. इससे कुछ नहीं होने वाला है. इनकी बात भी समझने वाला कोई नहीं है.

इंटरलोक्यूटर्स (वार्ताकारों जैसे राधा कुमार, एमएम अंसारी और स्वर्गीय दिलीप पडगांवकर) के साथ भी यही हुआ. उन्हें बड़ा अपमानित किया गया, जबकि उन्होंंने बड़ी मेहनत करके रिपोर्ट तैयार की. यह वक्त गुज़ारने वाली बात है. दरअसल यह हम लोगों को थकाना चाहते हैं और कुछ नहीं करना चाहते हैं.

यह धारणा कि सिविल सोसाइटी की बात भी कोई समझने और सुनने वाला नहीं है, बड़ा खराब संदेश देता है. भारत के बाक़ी लोग कितना समझते हैं कि कश्मीर की समस्या क्यों है. अगर समझते भी हैं तो आप (संतोष भारतीय जी) की वजह से. आपकी तरह और भी पत्रकार हैं, जिन्होंने कॉलम लिखे.

इससे और भी लोग समस्या को समझ जाएंगे. मेरा मानना है कि जनता को भी समस्या को गंभीरता से समझना चाहिए. सरकार को बात को इस प्रकार लेना चाहिए कि हमने कुछ वादे किये हैं, जिन्हें निभाना है.

नई मुसीबत आई है, वह यह है कि भारत की कुछ महत्वपूर्ण नियुक्तियों में कश्मीर को सामने रखकर निर्णय किया जा रहा है. नए आर्मी ची़फ जो आए हैं वह कश्मीर के एक्सपर्ट कहलाते हैं. इसी प्रकार इंटेलीजेंस ची़फ हैं और नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर हैं.

ये भी कश्मीर एक्सपर्ट के तौर पर ही मशहूर हैं. नेवी ची़फ भी कश्मीर एक्सपर्ट कहलाते हैं. कश्मीर के सिलसिले में मिलिट्री माइंड सेट बनाया है और इसे स़िर्फ उनकी नज़र से देखा जाता है. आज ही मैं एक अ़खबार में एक रिपोर्ट पढ़ रहा था कि एक बाप अपने बेटे को अब रेडीक्लाइज होने से नहीं रोकता है.

स्थिति इतनी ़खराब हो गई है कि जो लोग कल तक अपने बच्चों को पढ़ाई में ध्यान लगाये रखने के लिए हिदायतें दिया करते थे, आज वे भी उन्हें नहीं रोकते हैं और कहते हैं कि जाओ, जहां जाना चाहते हो, जाओ. जबकि उन्हें मालूम है कि वे अपने बच्चों को खो देंगे.

यह कैसा समय आ गया है कि एक बाप अपनी बेटी को कहता है कि जाओ बेटा, अब हम तुम्हें नहीं रोकेंगे और न ही तुम पर किसी तरह की बंदिशें लगाएंगे. ठीक है हमारा बच्चा मारा जायेगा, हमारा नुक़सान होगा और हमारी दुकान भी प्रभावित होगी, शायद बंद भी हो जाए. लेकिन जब यह स्थिति जहन में आ जाती है, तो यह ठीक नहीं है क्योंकि फिर तो खुदानाख्वास्ता खून-़खराबा ही होगा.

यह समस्या 1947 से ही चली आ रही है और अब तक ज्यों की त्यों है. आज तक कितनी हिंसाएं हुईं, कितने लोग मारे गए, कितने बच्चे अनाथ हुए, कितनी बहनों ने अपने भाई खोए, कितनी माओं ने अपने लाल खोए, कितनी महिलाएं बेवा हुईं, ये सब हमने अपनी आंखों से देखा. 1947 में शांति के साथ रहे.

फिर 1953 से 1964 या 1965 तक भी हम शांति के साथ जिए. फिर हमने थोड़े से आर्म्स (हथियार) उठा लिए. इसके बाद हम फिर शांतिप्रिय होने की ओर आए और शांति को तलाश करने लगे. 1990, 1991 और 1992 में आप जैसे कुछ दोस्त आ गए.

उन्होंने हमसे कहा कि हम सिविल सोसाइटी की ओर से कुछ करना चाहते हैं, आप लोग हथियार छोड़ दीजिए. हमने यासीन मलिक से कहा कि लेट पीस बी गिवन ए चांस (अमन को एक अवसर दीजिए). उन्होंने हथियार डाल दिए.

ये तमाम चीजें रिकॉर्ड में हैं, लेकिन इतना कुछ घटित होकर भी समस्या का कोई हल नहीं निकलता है और समस्या किसी अंजाम तक नहीं पहुंचती है. अगर वह इस भ्रम में हैं कि कश्मीरियों को क्रश करने से यह समस्या हल हो जाएगी तो मैं कहना चाहता हूं कि यह बहुत बड़ी ग़लतफहमी है.

आज से लगभग 900 वर्ष पूर्व (12वीं सदी में) पंडित कल्हण ने अपनी ऐतिहासिक किताब राजतरंगिनी (बादशाहों की नदी) में लिखा था कि कश्मीरियों को जीत सकते हो तो प्यार और मोहब्बत से जीतो. लिहाज़ा अगर इस समस्या को हम अंजाम तक नहीं पहुंचाते हैं, तो बहुत ज्यादा मुश्किल होगी और इसका अंजाम बहुत ही ख़तरनाक होगा.

दूसरी चीज़ जो मैं अ़खबारों में देखता हूं कि हो गया जी हो गया, मसला हल हो गया और अब तो वहां बाज़ार भी खुल रहे हैं. मान लीजिए कि हुर्रियत की ओर से दो दिन या पांच दिन कश्मीर बंद नहीं हुआ, तो इसपर तो इंडियन सिविल सोसाइटी की ओर सकारात्मक प्रतिक्रिया होनी चाहिए.

लेकिन इसे तो आप हमारे ही खिलाफ इस्तेमाल करते हैं कि अब सब ठीक है. होना तो यह चाहिए कि चार क़दम आप चलें, तो दो क़दम या एक क़दम हम चलें, लेकिन हम यह नहीं देख रहे हैं. सिन्हा साहब या सिविल सोसाइटी के दल के आने से महज़ यह होता है कि आए, बैठे, बात की और चले गए.

यह हक़ीक़त है कि शेख़ अब्दुल्ला चुने गए जनप्रतिनिधि नहीं थे. आप कहते हैं कि हुर्रियत चुनी हुई जनप्रतिनिधि नहीं है. इस पर सवाल यह है कि फिर शेख़ अब्दुल्ला कहां से चुने हुए जनप्रतिनिधि हो गए?

उन्होंने किसी चुनाव में भी हिस्सा नहीं लिया. फिर जब विधायिका बनी, जिसने अक्सेशन (विलय) को रेटीफाई किया तो आपने शेख़ अब्दुल्ला को जेल में बिठा दिया. खुलासा यह है कि यहां यही राजनीति चली आ रही है.

कश्मीर में सबसे ख़ास बात यह है कि 8 नवंबर को नोटबंदी की घोषणा के बाद यहां बैंकों में कोई भी लाइन नहीं लगी. बैंक के अन्दर जाकर लोग लेन-देन करते रहे. यहां कोई टेरर मनी नहीं है, कोई ब्लैक मनी नहीं है. जबकि कश्मीरियों को बदनाम करने के लिए निरर्थक बातें की जाती हैं.

अगर किसी के दिमाग में यह है कि यह सब कुछ (आन्दोलन) ख़त्म हो जाएगा तो यह ख्याल सही नहीं है. चलना तो है ही और मंज़िल तक तो पहुंचना ही है. जब तक हम मंज़िल तक पहुंच न जाएं, चलते जाएंगे.

जहां तक यह सवाल है कि क्या जनमत संग्रह इच्छानुसार या आवश्यकतानुसार है, तो मेरा ख्याल है कि जनमत संग्रह ज़रूरी चीज़ है? एक चीज़ जो साबित की जाती है, वह दूसरी चीज़ों को ़खारिज करके की जाती है. अतीत में कई प्रयास किए गए.

शिमला समझौता हुआ, नेहरू-बोगरा एग्रीमेंट हुआ, ताशकंद पैक्ट हुआ, फिर आपके और हमारे (कश्मीरियों) बीच इस मसले पर बात हुई. 1975 में भी एग्रीमेंट हुआ लेकिन मसला हल नहीं हुआ.

राजीव-़फारूक़ एकॉर्ड हुआ, फिर भी मसला हल नहीं हुआ. हमें इन तमाम अनुभवों से एक सीख लेनी चाहिए और वह यह कि जब तक इस मसले पर तीनों पक्ष एक साथ बैठकर बात नहीं करेंगे, मसले का हल नहीं होगा. अगर आप कहें कि चलिए देखते हैं, यानि कुछ ले-देकर कुछ कर लें तो हम लोग (कश्मीरी जनता) इस की अनुमति नहीं देंगे.

अब रही जनमत संग्रह की बात, तो आप कहते हैं कि जम्मू के लोग तो इसे नहीं चाहते, वह भारत के साथ हैं. आप कहते हैं कि 90 प्रतिशत हिन्दू भाई नहीं चाहते, तो यह उनका हक़ है. आप कहते हैं कि लेह (लद्दाख) में बुद्धिस्ट हैं, जबकि वहां उनकी आबादी केवल एक लाख 65 हज़ार है.

सबसे अच्छा हल यह है कि आप बैठें, हम बैठें टेबल पर, उनको भी बुलाएं और देखें कि हल क्या निकलता है? संयुक्त राष्ट्र के समझौते के अनुसार जनमत संग्रह को देखना चाहिए.

यह एप्रोच सही नहीं है कि जम्मू नहीं चाहता, लेह नहीं चाहता, शिया नहीं चाहता या फलां नहीं चाहता. संयुक्त राष्ट्र में जो पेटीशन भारत की ओर से है, उसमें यही कहा गया है कि हम जनमत संग्रह करवाएंगे.

loading...