कश्मीर कश्मीरियों को सौंपना चाहिए

kshmirमैं 17 दिसंबर से 20 दिसंबर के बीच श्रीनगर के दौरे पर था. इस दौरे के पीछे विचार ये था कि खुद वहां जाकर अपनी आंखों से देखा जाए कि हालात क्या हैं. वहां हो क्या रहा है. किन लोगों ने कश्मीर की जनता को इतना अधिक क्रोधित कर दिया है? मैं वहां के अलगाववादी नेताओं से मिलने में अधिक इच्छुक था.

मैं मिला भी. लेकिन, इस मौ़के का फायदा मैंने वहां के समाज के विभिन्न हिस्से के लोगों से मिलने के लिए भी उठाया. मैं संक्षेप में याद कर के आपको ये बताता हूं कि मैंने वहां क्या देखा, क्या बातें की और वहां क्या-क्या घटनाएं घटी हैं.

हुर्रियत नेताओं से मेरी मुलाक़ात

मैं अलगाववादी माने जाने वाले नेताओं में सबसे वरिष्ठ नेता सैयद अली शाह गिलानी से मिला. गिलानी एक अनुभवी नेता हैं. वह काफी मृदुभाषी आदमी हैं और वह अपने घर तक ही सीमित हैं, क्योंकि पुलिस उन्हें बाहर निकलने नहीं देती है. यहां तक कि उन्हें नमाज़ के लिए मस्जिद जाने की भी अनुमति नहीं है. लेकिन वह का़फी दृढ़संकल्पित हैं. वे इस बात को ले कर का़फी स्पष्ट हैं कि जब तक भारत और पाकिस्तान बैठ कर बातचीत नहीं करते हैं, तब तक कोई भी नतीजा नहीं निकलेगा.

उनके समूह की मांग निश्चित रूप से जनमत संग्रह है, जो कश्मीर का एक लंबे समय से लंबित मुद्दा है. लेकिन उनके व्यवहार में ऐसा कुछ भी नहीं है, जो दिखाता हो कि वह कश्मीर में आम लोगों के लिए व्यवधान या समस्या चाहते हैं. तथ्य यह है कि कुछ दिन पहले उन्होंने पर्यटकों से आह्वान किया है कि पर्यटक बड़ी संख्या में कश्मीर आएं. इस बात के भी सबूत हैं कि कोई भी पर्यटकों को हानि नहीं पहुंचाता है.

हिंसक कार्रवाई नाराज़ युवाओं और अर्धसैनिक बलों के बीच ही होती है.इसके बाद, मैंने मीरवाइज़ मौलवी उमर फारूक़, जो हुर्रियत के एक और वरिष्ठ नेता हैं, से मुलाक़ात की. इस मुलाक़ात का परिणाम भी कमोबेश वैसा ही रहा, लेकिन वह बातचीत शुरू किए जाने को लेकर अधिक उत्सुक नज़र आए.

वह इस बात से भी का़फी खुश नज़र आए कि कम से कम सिविल सोसाइटी कश्मीर में रुचि ले रही है. उन्होंने इस बात का उल्लेख भी किया कि हमें अपनी तरफ से भारत सरकार को यह बताने का प्रयास करना चाहिए कि कुछ कदम उठाए जाने की ज़रूरत है. मैंने मुस्लिम कांफ्रेंस के प्रोफेसर अब्दुल ग़नी बट से भी मुलाक़ात की.

वे एक बहुत ही सम्मानित व्यक्ति हैं. हालांकि, उनकी पार्टी चुनावी तौर पर एक प्रमुख पार्टी नहीं है, लेकिन ईमानदारी और मूल्यों को ले कर उनकी प्रतिष्ठा बरक़रार है. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि हिंसा कहीं नहीं ले जाती है. उनका मानना है कि दिल्ली को चाहिए कि वो श्रीनगर के संपर्क में रहे, बातचीत करे. प्रोफेसर बट हमारे जैसे सिविल सोसाइटी समूह के प्रयासों का भी स्वागत करते हैं.

फिर, हमने नईम खान, जो हुर्रियत के वरिष्ठ सदस्य हैं और जो लंबे समय से भूमिगत हैं, से मुलाक़ात की. उन्होंने भी यही माना कि तब तक कुछ भी नतीजा नहीं आएगा, जब तक दोनों पक्ष बैठ कर बातचीत नहीं करते हैं. अच्छी बात ये है कि इन सभी लोगों में एक सकारात्मक नोट था. कोई भी वास्तव में नकारात्मक नहीं था और गुत्थी को उलझाए रखना नहीं चाहता.

छात्रों, वकीलों और व्यापारियों की सोच अलग है
फिर हम हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के सदस्यों से मिले, जो वास्तव में कोई आवाज नहीं हैं, क्योंकि खुद न्यायपालिका वहां अपने आदेश को कार्यान्वित करवा पाने में सक्षम नहीं है.

इन सदस्यों ने एक उदाहरण के जरिए मुझे बताया कि उच्च न्यायालय ने एक आदेश दिया है कि श्री गिलानी कहीं भी जाने के लिए स्वतंत्र हैं. 2009 में फैसला सुनाया गया था और अभी तक पुलिस ने इस पर कार्रवाई नहीं की है. ज़ाहिर है, यह अदालत की अवमानना का एक स्पष्ट उदाहरण है. लेकिन यही वहां की न्यायपालिका की स्थिति है.

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पूरे भारत के या कहें कि दुनिया भर के वकील पढ़े-लिखे होते हैं, अच्छी तरह से तथ्यों से वाक़ि़फ होते हैं और उनकी बात भी का़फी तर्कसंगत होती है. कश्मीर के किसी भी हिस्से से वे संबंधित हो सकते हैं, कुछ नेशनल कांफ्रेंस, कुछ पीडीपी के हो सकते हैं, कुछ कांग्रेस के हो
सकते हैं, लेकिन जहां तक बातचीत का सवाल है, वो पूरी तरह से अराजनैतिक था.

कुछ छात्र मुझसे मिलने आए. जैसा कि हर जगह होता है, यहां भी छात्रों के एक अलग विचार हैं. कुछ छात्रों ने कहा कि उन्हें नहीं मालूम कि क्यों हर कोई ये सोचता है कि हम पाकिस्तान या स्वतंत्रता चाहते हैं. हम चाहते हैं कि भारत सरकार हमारे साथ उचित तरीक़े से व्यवहार करे.

क्यों आप समस्या को और अधिक खराब कर रहे हैं? बुरहान वानी के मामले में हर कोई इस बात से सहमत हैं कि यह एक सहज घटना थी. निश्चित रूप से हुर्रियत या किसी अन्य के द्वारा शुरू नहीं किया गया था. यह ऐसा उत्प्रेरक बन गया था, जिसने पहले से ही जमा ग़ुस्से को और भड़का दिया और उस युवक की हत्या ने हालात को नियंत्रण से बाहर कर दिया.

हां, यह सही है कि उसके बाद हुर्रियत ने कैलेंडर जारी किया, ताकि हड़ताल में अनुशासन लाया जा सके. एक ऐसी हड़ताल जहां छह महीने सभी दुकानें बंद हो जाती हैं, लोग अपनी आजीविका खो रहे हैं, स्कूलों-कॉलेजों को बंद कर दिया जाता है और यह सब बिना किसी भय के स्वेच्छा से होता है. यह एक बड़ा संकेत है, जो बताता है कि हवा किस दिशा में बह रही है.

मैं नहीं जानता कि वो कौन हैं, जो कश्मीर की ज़मीनी हक़ीक़त के बारे में दिल्ली में सरकार को सूचित करते हैं. लेकिन निश्चित रूप से दिल्ली की सरकार को बेहतर तरी़के से सूचित किये जाने की ज़रूरत है. बेशक, सर्दी के मौसम ने इस गुस्से को थोड़ा कम कर दिया है और बताया है कि आप सालों तक इस तरह का एक आंदोलन नहीं कर सकते.

छह महीने तक वहां राहत है, लेकिन यह मानना है कि शांति वापस आ गई है, झूठी बात होगी. सन्नाटा, शांति नहीं है. सर्दियों के समाप्त होने के बाद, जब सरकार फिर से श्रीनगर आ जाती है, गतिविधि फिर से शुरू होती है, मैं नहीं जानता कि क्या होगा.

मैंने व्यापारियों के एक समूह से भी मुलाक़ात की. वे फिर से अपने व्यापार को शुरू करने में अत्यधिक रुचि ले रहे थे. मुख्य बात यह है कि इनमें से किसी ने भी हुर्रियत नेताओं के खिला़फ कुछ भी नहीं बोला. न ही उन्होंने नेशनल कांफ्रेंस, पीडीपी के खिला़फ बोला.

वे ऐसे चिंतित नागरिक हैं जो सामान्य जीवन चाहते हैं. सामान्य जीवन की वापसी चाहते हैं. असल में मैंने ही उनसे आग्रह किया था कि वे एक लाइन लें, लेकिन सिवाय ये कहने के कि भारत सरकार को पाकिस्तान के साथ, कश्मीर के साथ चर्चा करनी चाहिए, यह एक त्रिपक्षीय चर्चा हो सकती है, वे कोई लाइन नहीं ले सके. वे चाहते हैं कि कोई ऐसा फॉर्मूला निकले जिससे श्रीनगर और कश्मीर के अन्य भागों में सामान्य शांतिपूर्ण जीवन की वापसी हो सके.

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