बेटे के लिए नेताजी ने त्याग दी सारी प्राथमिकताएं, खुल रहा नियोजित-नौटंकी का भेद : मेलो नहीं येलो-ड्रामा

akhilesh yadavसमाजवादी पार्टी के झंडाबरदार परिवार में चला मुगलकालीन सत्ताकांक्षी विद्रोह सियासतदानों की नजर में भले ही ‘मेलो-ड्रामा’ साबित हुआ हो, लेकिन प्रदेश के आम लोग इसे ‘येलो-ड्रामा’ मानते हैं.

इस पीत-नाट्य का पटाक्षेप अखिलेश के पक्ष में करा कर मुलायम सिंह यादव खुद को बड़े व्यूह रचनाकार, बड़े दांवबाज या बड़े बिसातबाज मान रहे होंगे, लेकिन जमीनी असलियत यही है कि पुत्रमोह में एक कद्दावर राजनीतिज्ञ ने जन-पक्षीय राजनीति की पूरी दुनिया के सामने भद्द करा दी.

अखिलेश यादव के पक्ष में दिया गया चुनाव आयोग का 42 पेजी फैसला सूक्ष्मता से पढ़ लें, तो आपको मुलायम के पीत-नाट्य की असलियत का पता चल जाएगा. इस ‘येलो ड्रामा’ के नेपथ्य में पिता-पुत्र दोनों एक नजर आएंगे और भाई शिवपाल यादव अलग-थलग.

जिस तरह पूरी पार्टी ने अखिलेश के प्रति समर्थन जताया और समर्थन के दस्तावेज चुनाव आयोग तक पहुंचे, उसे देख कर ही चुनाव आयोग में कार्यरत कुछ अधिकारियों ने कह दिया था कि यह मुलायम की अंदरूनी सहमति के बगैर हो ही नहीं सकता.

मुलायम के प्रति प्रतिबद्ध नेताओं की पूरी जमात ने अखिलेश के समर्थन में बाकायदा हस्ताक्षर किए, इनमें कई ऐसे नाम हैं जिनका मुलायम से लगाव केवल सत्ता-लोभ के कारण नहीं, बल्कि पारिवारिक और सैद्धांतिक भी रहा है. इस प्रकरण में केवल शिवपाल के समर्थक अलग-थलग पड़े. उनकी बाकायदा शिनाख्त हुई और उससे अखिलेश यादव आगाह हुए.

चुनाव आयोग का आधिकारिक दस्तावेज देखें तो उसमें आपको समाजवादी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के 46 सदस्यों में से 31 सदस्यों, 229 विधायकों में से 205 विधायकों, 68 विधान परिषद सदस्यों (एमएलसी) में से 56 एमएलसी, लोकसभा के पांच सदस्यों में से चार सदस्यों, राज्यसभा के 19 सदस्यों में 11 सदस्यों और पार्टी के कुल 5731 डेलीगेट्स में 5242 डेलीगेट्स के अखिलेश यादव के समर्थन में किए गए हस्ताक्षर मिलेंगे. सपा के एक नेता ने यह सवाल रखा कि क्या ये हस्ताक्षर मुलायम की सहमति के बगैर हो गए? अखिलेश की पत्नी डिम्पल और रामगोपाल के बेटे अक्षय को छोड़ कर अन्य दो सांसद धर्मेंद्र व तेज प्रताप क्या मुलायम की ‘आज्ञा’ के बगैर इधर-उधर कर सकते थे?

उक्त सपा नेता बड़ी तल्खी से कहते हैं, नेताजी को अखिलेश को उभार कर उत्तराधिकार ही सौंपना था और शिवपाल खेमे को धराशाई ही करना था तो इतनी नौटंकी करने की क्या जरूरत थी? इसके और भी राजनीतिक तरीके हो सकते थे. इसके लिए जनता के मनोविज्ञान से खेलने की क्या जरूरत थी’? आप स्थितियों को भी देखें तो इस कथन में कितना दम है, पता चल जाता है.

चुनाव आयोग के समक्ष मुलायम एक बार भी यह मानने को तैयार नहीं हुए कि पार्टी में कोई ‘स्प्लिट’ (विभाजन) है. जबकि चुनाव आयोग ने समाजवादी पार्टी में स्पष्ट विभाजन (स्प्लिट) मानते हुए ही इस मामले पर सुनवाई की और अपना फैसला सुनाया. साफ है कि मुलायम यह जानते थे कि पार्टी में कोई ‘स्प्लिट’ नहीं है, वे पार्टी से केवल अखिलेश के भविष्य की आशंकित अड़चनों को ‘स्प्लिट’ करना चाहते थे, जिसमें वे कामयाब हुए.

यही वजह है कि पार्टी में चर्चा इस बात की नहीं है कि अखिलेश के समर्थन में कितने लोगों ने हस्ताक्षर किए, बल्कि शिनाख्त उन लोगों की हो रही है जिन लोगों ने अखिलेश के समर्थन में हस्ताक्षर नहीं किए. जिस तरह मुलायम शुरू से ही कहते रहे कि अखिलेश से कोई विवाद नहीं, उसी तरह अखिलेश भी लगातार यह कहते रहे हैं कि उनका पिता मुलायम सिंह से कोई विवाद नहीं है.

बहरहाल, अब लोगों के सामने यह साफ हो चुका है कि अखिलेश का विवाद किससे था और मुलायम किस तरह शिवपाल के कंधे पर हाथ रख कर विवाद को निपटाने में लगे थे. अनुशासनहीनता के आरोप में निवर्तमान प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल यादव ने जिन लोगों को पार्टी से निकाला था, उन सब को नए राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के आदेश पर पार्टी में वापस ले लिया गया है.

इनमें पवन पांडेय, सुनील यादव साजन, अरविंद यादव, उदयवीर सिंह, आनंद भदौरिया, संजय लाठर, गौरव दुबे, मोहम्मद एबाद, बृजेश यादव, दिग्विजय सिंह देव जैसे तमाम अखिलेश समर्थकों के नाम शामिल हैं. इनकी वापसी के बारे में कहा गया कि अनुशासनहीनता करने वाले उक्त सभी नेताओं ने मुलायम सिंह से माफी मांग ली तो उनकी पार्टी में वापसी हो गई और उनके सांगठनिक पद भी बहाल कर दिए गए.

लेकिन जिन लोगों ने पार्टी दफ्तर पर हमला बोल कर तोड़फोड़ की और शिवपाल यादव की नेमप्लेट उखाड़ कर जूतों से रौंदा था, उन लोगों की उस सार्वजनिक अनुशासनहीनता पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई, या शिवपाल जैसे वरिष्ठ नेता से माफी मंगवा कर उन्हें पार्टी में वापस लेने का निर्णय क्यों नहीं हुआ? लेकिन नैतिकता से जुड़ा यह सवाल मौजूदा दौर में कहां उठता है!

पिता मुलायम के आदेश और दिशा-निर्देशन में अखिलेश अब चुनाव में उतरने को तैयार हैं. अब वे खुद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, लिहाजा, टिकट पर आखिरी निर्णय भी अखिलेश का ही होगा. मुलायम ने अखिलेश को 38 लोगों की सूची सौंप कर उन पर विचार करने का अखिलेश से आग्रह करने का फिर एक प्रहसन खेला. सब जानते हैं कि 38 लोगों की इस सूची में शिवपाल समर्थक नेताओं के नाम हैं, जिन्हें टिकट मिल भी जाए फिर भी अब तो वे ‘दागी’ ही हैं.

अखिलेश ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहते जिससे भविष्य में सत्ता-निर्माण में कोई अवरोध खड़ा होने की संभावना हो. लिहाजा, कई मंत्रियों और विधायकों का टिकट कट सकता है, चेहरे बदल सकते हैं, या चुनाव में उनकी पराजय का चक्रव्यूह रचा जा सकता है. आपराधिक छवि के लोगों में से जिनके चेहरे अखिलेश को पसंद नहीं हैं, उन्हें चुनाव लड़ने का मौका नहीं मिलेगा, अन्य को मिल रहा है. कांग्रेस से संभावित गठबंधन के बहाने भी अखिलेश कई सपाइयों को निपटाने की तैयारी में हैं.

चुनाव आयोग से फैसला आने के पहले ही अखिलेश ने अपनी ‘कोर’ टीम गठित कर ली थी, जो चुनाव प्रबंधन देखेगी. गोया उन्हें पहले से पता था कि क्या होने वाला है. इस कोर-टीम में विधान परिषद के 25 सदस्यों को चुना गया है. अखिलेश की यह स्पेशल टीम चुनाव के काम में समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं की मदद भी करेगी और उन पर निगरानी भी रखेगी.

सपाई ‘येलो-ड्रामा’ का ही पीत पक्ष है जसवंत नगर सीट से चुनाव लड़ने के लिए शिवपाल के बेटे आदित्य यादव का पहले नाम उछाला जाना. लेकिन शिवपाल ने पुत्र-मोह में फंसने का विचार छोड़ जसवंत नगर सीट से चुनाव लड़ने का निर्णय ले लिया. आदित्य का नाम सामने आने के बाद चर्चा यह निकली कि शिवपाल ही पुत्र मोह में अपनी सीट आदित्य के लिए छोड़ना चाहते हैं. ऐसा होने से शिवपाल भी पुत्र-मोही मुलायम के समानान्तर जा खड़े होते.

यह बात तो जगजाहिर थी ही कि अखिलेश अपने चाचा शिवपाल को टिकट नहीं देना चाहते हैं. शिवपाल जसवंत नगर सीट से चुनाव लड़ना चाहते थे और सपा से टिकट नहीं मिलने की स्थिति में उनके राष्ट्रीय लोक दल के सिम्बल से चुनाव लड़ने की बात चल रही थी. यह बात चर्चा तक सीमित नहीं थी, क्योंकि शिवपाल और उनके समर्थकों के राष्ट्रीय लोकदल के चुनाव निशान (सिम्बल) पर चुनाव लड़ने की द्विपक्षीय वार्ता चल रही थी.

चुनाव आयोग का फैसला आने के बाद शिवपाल आगे के कदम के लिए कानूनी सलाह भी ले रहे हैं. राष्ट्रीय लोक दल ने आधिकारिक तौर पर कहा भी कि शिवपाल यादव से जुड़े सपा विधायक या नेता, जिन्हें सपा से टिकट नहीं मिलेगा, वे लोक दल के टिकट पर चुनाव लड़ सकते हैं. राष्ट्रीय लोक दल ने शिवपाल के समक्ष यह प्रस्ताव रखा था कि टिकट से वंचित सपाई रालोद के टिकट से चुनाव लड़ सकते हैं.

यही वजह है कि महागठबंधन के लिए चल रही कोशिशों में अखिलेश ने रालोद को दूर कर दिया. इस चर्चा के बाद शायद अखिलेश खेमे का लगा कि शिवपाल का रालोद के साथ जाना नुकसानदेह हो सकता है, तो फौरन शिवपाल को जसवंत नगर सीट से सपा का आधिकारिक प्रत्याशी घोषित कर दिया गया.

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने 20 जनवरी को जिन 36 ज़िलों के लिए 191 उम्मीदवारों की घोषणा की, उसमें शिवपाल यादव का नाम तो है, पर शिवपाल समर्थकों का नाम चुन-चुन कर काटा गया है. माफिया सरगना अतीक अहमद का नाम कटा, लेकिन अखिलेश समर्थक कई अपराधी छवि के लोगों को टिकट मिला. शिवपाल समर्थक कई साफ छवि के लोगों का नाम काटने का कोई तर्क नहीं है. पहली ही लिस्ट आगे की प्राथमिकताओं का दर्शन करा रही है.

मुलायम की छत्रछाया में रहने वाले किरणमय नंदा अब अखिलेश के साथ हैं. महागठबंधन के प्रयासों में नंदा भी काफी सक्रिय रहे. रालोद से गठबंधन को लेकर हुई बातचीत के बारे में पूछने पर नंदा कहते हैं कि सपा रालोद से कोई बात ही नहीं कर रही है. वे कहते हैं कि रालोद महागठबंधन में शामिल होगा कि नहीं, यह कांग्रेस तय करेगी.

उधर, कांग्रेस ने भी रालोद को ‘लिफ्ट’ नहीं दिया. चौधरी अजित सिंह के पुत्र व रालोद के महासचिव जयंत चौधरी की इस सिलसिले में पिछले दिनों प्रियंका गांधी से हुई मुलाकात भी बेनतीजा ही रही. कांग्रेस पार्टी को सपा को भी कोई अधिक तरजीह नहीं दे रही है. कांग्रेस जिन सीटों पर अपना अधिकार जता रही है, उन सीटों पर सपा का पहले से कब्जा है. खास तौर पर अमेठी और रायबरेली की सीटें कांग्रेस अपने हाथ में रखना चाहती है.

सपा के राष्ट्रीय महासचिव किरणमय नंदा कहते हैं कि सपा कांग्रेस को अधिकतम 85 सीटें दे सकती है. लेकिन (खबर लिखे जाने तक) कांग्रेस इसके लिए राजी नहीं थी. नंदा यह भी कहते हैं कि पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस जिन सीटों पर पहले या दूसरे नम्बर पर रही थी और जिन पर सपा तीसरे, चौथे या पांचवें नम्बर पर रही थी, वे कांग्रेस को दी जा सकती हैं. इस हिसाब से कांग्रेस को 54 सीटें ही मिलनी चाहिए.

भगोड़ों के भरोसे जंग जीतना चाहती है भाजपा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते रहें कि पार्टी में परिवारवाद का बढ़ना खतरनाक है, लेकिन टिकट बंटवारे में परिवारवाद और जातिवाद भीषण हावी है. अब तो भाजपा में बाहरीवाद का भी प्रकोप बढ़ता जा रहा है. इन वजहों से भारतीय जनता पार्टी झगड़े, कलह और बगावत से भरती जा रही है.

पार्टी के दिल्ली, देहरादून और लखनऊ दफ्तरों पर जबरदस्त विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. यहां तक कि लखनऊ में आत्मदाह तक की कोशिशें दर्ज हो गईं. उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में जगह-जगह पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं और भाजपा नेतृत्व को चुनाव में औकात दिखा देने की चुनौतियां मिल रही हैं.

बाहरी दलों से आए नेता अपनी भारी लिस्ट पर अड़े हैं और खुलेआम दूसरी पार्टी का दर देखने की धमकियां दे रहे हैं. जो नेता ऐन लोकसभा चुनाव में भाजपा में शरीक हुए और मोदी लहर में जीत कर सांसद बन गए, वैसे नेता भी अपने-अपने रिश्तेदारों को टिकट दिलाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाए हैं. भाजपा कार्यकर्ताओं का कहना है कि पार्टी से जुड़े मूल कार्यकर्ताओं को टिकट का अवसर नहीं दिया गया तो यह पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित होगा.

बसपा से भाजपा में आए स्वामी प्रसाद मौर्य की अपनी शर्तें हैं तो बृजेश पाठक की अपनी. अब तो नारायण दत्त तिवारी की शर्तें भी भाजपा को पूरी करनी हैं. राजनीतिक समीक्षक मानते हैं कि अपने मूल काडर की उपेक्षा और बाहरी लोगों को टपकाने का आकर्षण भाजपा को ले डूबेगा.

उत्तराखंड भाजपा में लगी कांग्रेसियों की लगी लंबी कतार भी भाजपा को मुश्किलों में ही डालने वाली है. पहाड़ में यह चर्चा भी आम है कि भाजपा में व्यक्तित्वों का इतना टोटा पड़ गया है कि अमित शाह नारायण दत्त तिवारी जैसे चुके हुए नेताओं को पार्टी में जुटा रहे हैं. यूपी भाजपा के एक नेता बोले, ‘जो पार्टी अपने लिए मुख्यमंत्री का चेहरा तक तय नहीं कर पा रही, वह भगोड़े चेहरों के भरोसे जंग जीतना चाहती है.

प्रभात रंजन दीन

प्रभात रंजन दीन शोध,समीक्षा और शब्द रचनाधर्मिता के ध्यानी-पत्रकार...