श्रद्धांजलि : ओम पुरी के निधन से पूरा बॉलीवुड सदमे में

ompuriजब ओमपुरी और नंदिता पुरी  के रिश्तों में आई थी दरार

ओम पुरी की पत्नी नंदिता पुरी पत्रकार और स्तंभकार हैं. उन्होंने ओमपुरी पर एक किताब लिखी है, अनलाइकली हीरो : द स्टोरी ऑफ ओमपुरी. किताब में ओमपुरी और नंदिता पुरी के प्रेम संबंधों का जिक्र है, जो बहुत ही व्यक्तिगत है.

इस किताब को लेकर ओमपुरी ने अपनी नाराज़गी जाहिर की थी. उन्होंने कहा था कि उनकी पत्नी ने इस किताब की प्रसिद्धि के लिए इसके अंदर कुछ ऐसे वाकयों का जिक्र किया, जिनसे उन्हें काफी झटका लगा. उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था.

बायोग्राफी को लेकर इन्हीं विवादों के बाद, दोनों के संबंधों में कड़वाहट आ गई. ओमपुरी पर घरेलू हिंसा के आरोप भी लगे. नंदिता पुरी से शादी के पहले ओमपुरी की शादी सीमा कपूर से हुई थी, जो अभिनेता अन्नू कपूर की बहन हैं.

देश के बेहतरीन अभिनेताओं में शुमार ओम पुरी का 6 जनवरी को निधन हो गया. वह 66 वर्ष के थे. मुंबई के वर्सोवा स्थित आवास पर शुक्रवार सुबह उन्हें दिल का दौरा पड़ा था. उनकी मौत की खबर सुन कर पूरा बॉलीवुड और उनके प्रशंसक सदमे में हैं.

बॉलीवुड के साथ-साथ उन्होंने हॉलीवुड में भी अपनी अदाकारी का लोहा मनवाया था. 18 अक्टूबर 1950 को अंबाला के एक पंजाबी परिवार में जन्में ओम पुरी ने फिल्म एंड टेलिविजन इंस्टिट्यूट पुणे से पढ़ाई की थी. मराठी फिल्म घासीराम कोतवाल (1976) से उन्होंने अपना करियर शुरू किया था.

1980 में आई आक्रोश ओमपुरी की पहली हिट फिल्म थी. इस फिल्म ने उन्हेें रातों रात स्टार बना दिया और वह अपने शानदार अभिनय के लिए बॉलीवुड में जाने जाने लगे. फिल्म आक्रोश के लिए उन्हें फिल्म फेयर के बेस्ट सपोर्टिंग अभिनेता के अवॉर्ड से भी नवाजा गया.

1993 में ओम पुरी ने नंदिता पुरी के साथ शादी की थी. लेकिन 2013 में उनका तलाक हो गया था. ईशान नाम का उनका एक बेटा भी है. फिल्म अर्धसत्य के लिए ओम पुरी को नेशनल अवॉर्ड मिला था. फिल्म में उनका किरदार सामाजिक और राजनैतिक बुराइयों का विरोध करता है. इसके अलावा फिल्म आरोहण के लिए भी ओम पुरी को नेशनल अवॉर्ड मिल चुका है.

एक समय था जब ओम पुरी वड़ा पाव खाकर गुजारा करते थे

ओम पुरी को भले ही आज लोग एक सफल कलाकार के रूप में देखते हों लेकिन उन्होंने यह मुकाम कैसे हासिल किया, इसकी भी बड़ी दिलचस्प कहानी है. एक इंटरव्यू में उन्होंने अपनी जिंदगी के संघर्षों के बारे में पूरी दुनिया को बताया था.

विविध भारती  पर उजाले उनकी यादों के  कार्यक्रम मेें यूनुस ़खान ने उनसे विशेष बातचीत की थी, तब पता चला कि ओम पुरी ने अपनी जिंदगी में कितने संघर्षों का सामना किया है.

ओम पुरी ने बताया था, ‘मेरा जन्म भले ही अंबाला में हुआ था, लेकिन मेरी शिक्षा मामा के घर पटियाला में हुई. मैं बहुत छोटा था, तभी से मामा के पास पला और बड़ा हुआ. मेरी शिक्षा हिंदी और पंजाबी में हुई. मैं पढ़ाई में हमेशा अव्वल आता और क्लास का मॉनिटर भी बना रहा. 11 वीं कक्षा में आते-आते नाटकों में काम करने का शौक हो गया था.

पटियाला से मैं दिल्ली चला आया और नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) में एडमिशन ले लिया. लेकिन फीस भरने के पैसे नहीं थे. दिल्ली में रहने की समस्या आई तो मैं पंजाब हाऊस पहुंचा, इस उम्मीद से कि कहीं रहने का ठिकाना मिल जाएगा. लेकिन वहां पर एक बंगाली आदमी ने कहा कि तुम्हारा दिल्ली में रहने का इंतजाम नहीं हो सकता.

मैं बहुत मायूस होकर वापस आ रहा था, तभी उन्होंने आवाज दी. मैं लौटा, उन्होंने कहा कि मैं दो कमरे के मकान में अकेला रहता हूं, लिहाजा तुम मेरे साथ कुछ दिनों तक रह सकते हो. संयोग था कि उनका घर एनएसडी के पास ही था.

तब एनएसडी में मेरे साथ नसीरुद्दीन शाह भी पढ़ते थे. उनसे मेरी गहरी दोस्ती हो गई. मैं बहुत मध्यमवर्गीय परिवार से था और मेरे पास फीस भरने के भी पैसे नहीं थे. मैंने एनएसडी वालों से कह दिया कि मैंने पंजाब सरकार से स्कॉलरशिप के लिए आवेदन दिया है, वहां से पैसे आते ही मैं फीस भर दूंगा. 3600 रुपए की स्कॉलशिप आई और इस तरह मेरी फीस जमा हुई.

एनएसडी में हम स्टेज शो करते थे, जिसे काफी पसंद किया जाता था. एनएसडी से निकलने के बाद मैंने सोचा, क्या किया जाए? कुछ दोस्तों ने पुणे के फिल्म इंस्टिट्यूट में दाखिला लेने की सलाह दी. पुणे के फिल्म इंस्टिट्यूट में इंटरव्यू के लिए मेरे पास एक अच्छी सी शर्ट तक नहीं थी.

तब मुझे नसीरुद्दीन शाह ने एक चेक वाली शर्ट गिफ्ट की और मैं पुणे पहुंच गया. वहां मेरा दाखिला भी हो गया. बाद में नसीर भी पुणे आ गए. उस वक्त सुरेश ओबेराय, राकेश बेदी, नसीरुद्दीन शाह आदि मेरे क्लासमेट थे.

इंटरव्यू में ओम पुरी ने आगे बताया कि ‘मुझे पुणे में भी खाने की दिक्कत होती थी, क्योंकि मेरे पास पैसे तो होते नहीं थे. उस समय मेरे पास रेजगारी होती थी और मैं वड़ा पाव खाकर और चाय पीकर दिन गुजारता रहा. नसीर मुझसे पहले मुंबई पहुंच गए थे और 1976 में मैंने मुंबई का रुख किया.

जब मैंने मुंबई में अपना कदम रखा था, तब चिकने चेहरे वाले कलाकार ही फिल्मी दुनिया में छाए हुए थे. एक स्टेज शो के दौरान मुझे गोविंद निलहानी ने देखा था और उन्होंने मुझे और नसीर को एक डॉक्यूमेंट्री कम एड फिल्म में मौका दिया.

नसीरुद्दीन शाह और मैं मजदूर बने थे, बदले में हमें 600 रुपए का मेहनताना मिला. जिस दिन पैसे मिले, मैंने और नसीर ने जिंदगी में पहली बार एक एयरकंडीशंड होटल में जाकर अच्छा खाना खाया, वरना हम दोनों एक सरदार जी के ढाबे पर ही सस्ता खाना खाया करते थे.

जब मेरी फिल्म अर्धसत्य ने रुपहले परदे पर धूम मचाई, तब बॉलीवुड ने जाना कि मैं भी कलाकार हूं. जहां तक मेरी संवाद अदायगी की बात है, तो यह कला मुझे एनएसडी में सिखाई गई थी.

तब मुझे लगता था कि हमें तो एक्टिंग करना है फिर संवाद अदायगी की क्लास क्यों, लेकिन अब लगता है कि इसका फायदा हमें आगे चलकर मिला. मैं खुशनसीब हूं कि मुझे हमेशा अच्छे लोगों का साथ मिला और मैं जिंदगी में आगे बढ़ता चला गया.’

कैसा रहा फिल्मी सफर?

साधारण चेहरे के बावजूद ओम पुरी अपनी खास एक्टिंग, आवाज़ और डायलॉग डिलिवरी के लिए जाने जाते हैं. 1980 में आई भावनी भवई, आक्रोश, 1981 में सद्गति, 1982 में अर्धसत्य और डिस्को डांसर, 1986 में आई मिर्च मसाला और 1992 की धारावी से ओम पुरी को शोहरत मिली.

सनी देओल के साथ घायल में पुलिस इंस्पेक्टर और 1996 में गुलजार की माचिस में उन्होंने सिख आतंकवादी का किरदार निभाया. माचिस में बोला गया उनका डायलॉग आधों को 47 ने लील लिया और आधों को 84 ने काफी मशहूर हुआ था. इसके अलावा उनकी प्रमुख फिल्में हैं- आक्रोश, गांधी, विजेता, जाने भी दो यारो, आरोहण, सत्याग्रह, मिर्च मसाला, नासूर, आघात,  नरसिम्हा, चाची 420, आस्था, गुप्त, प्यार तो होना ही था, विनाशक, चाइना गेट, कुंवारा, हेरी फेरी, दुल्हन हम ले जाएंगे, घात, फर्ज, गदर-एक प्रेम कथा, मक़बूल, चुप चुपके, सिंग इज किंग, मुखबीर, लंदन ड्रीम, दबंग, अग्निपथ (2012), ओह माई गॉड, मालामाल वीकली, डर्टी पॉलिटिक्स, बजरंगी भाईजान, मिस तनकपुर हाजिर हो, हो गया दिमाग़ का दही, मिर्जिया, गांधीगिरी आदि.

ओम पुरी कई अवार्ड से नवाजे गए

वर्ष 1980 में फिल्म आक्रोश में शानदार अभिनय के लिए ओम पुरी को फिल्म फेयर के बेस्ट सह अभिनेता के अवॉर्ड से नवाजा गया.

1982 में फिल्म आरोहण के लिए उन्हें नेशनल अवॉर्ड मिल चुका है. इसके अगले ही साल 1983 में ओम पुरी को फिल्म अर्धसत्य के लिए भी नेशनल अवॉर्ड मिला.

इसके अलावा उन्हें फिल्म घायल (1990), माचिस (1996), गुप्त (1997), प्यार तो होना ही था (1998) के लिए फिल्म फेयर के बेस्ट अभिनेता के लिए नमांकित गया था.

पीएम मोदी ने ओम पुरी के निधन पर जताया शोक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शोक जताते हुए ट्विटर पर एक पोस्ट साझा किया.

पीएम मोदी ने लिखा, ओम पुरी की निधन की खबर सुनकर काफी दुख हुआ. ओम पुरी को हमेशा ही उनके बॉलीवुड के लंबे सफर और थियेटर के लिए याद किया जाएगा.

ओम पुरी के निधन पर बॉलीवुड हस्तियों ने क्या कहा

बॉलीवुड के इस मशहूर अभिनेता के आकस्मिक निधन से बॉलीवुड सदमे में है. करन जौहर ,अनुपम खेर और कई बॉलीवुड सेलेब्रिटियों ने उनकी मौत पर शोक जताया है.

अभिनेता अनुपम खेर ने ट्विटर पर लिखा, मैं ओमपुरी को पिछले 43 साल से जानता था. यकीन नहीं हो रहा है कि वो अब हमारे बीच इस दुनिया में नहीं है. उनकी अचानक हुई मौत से गहरा धक्का लगा है.

महेश भट्ट लिखते हैं, अलविदा ओम! आज तुम्हारे साथ मेरी जिंदगी का भी एक हिस्सा चला गया. मैं उन लम्हों को कैसे भूल सकता हूं, जब हमने फिल्म और जिंदगी की बातें करते हुए कितने रातें बिताई.

अभिनेता बोमन ईरानी लिखते हैं, हमने आज बेहतरीन प्रतिभा, बेहतरीन शख्सियत, बेहतरीन आवाज को खो दिया है.

मधुर भंडारकर ने कहा, यकीन नहीं हो रहा है कि ऐसा हुआ है. उन्होंने इंटरनेशनल लेवल पर अपने अभिनय का कमाल दिखाया है. मुझे ये खबर सुनकर बहुत दुख हुआ है.

एक अच्छे अभिनेता, एक सच्चे इंसान का जाना…

एक ऐसा अभिनेता, जिसने रील लाइफ में समाज की बुराईयों और कटु सच्चाईयों को जिया, जिसने रियल लाइफ में भी समाज की विषमताओं, कटुताओं पर जम कर बोला, उसे कोई टीवी चैनल या सोशल मीडिया पर मौजूद उपद्रवी तत्व देशभक्ति का पाठ पढ़ाए, तो मान लेना चाहिए कि अर्धसत्य, सत्य पर भारी प़ड रहा है. शायद, ओमपुरी को भी इस बात का एहसास हुआ होगा, जब पाक कलाकारों को देश से भगाने के मुद्दे पर उनके एक बयान की वजह से मीडिया ने उन्हें आ़डे हाथों लिया. उन्हें भला-बुरा कहा गया. लेकिन, ओमपुरी की समझदारी और समाज के प्रति उनकी संवेदना उतनी ही बेहतरीन है, जितना उनका अभिनय.

1980 में आई फिल्म आक्रोश में एक पीड़ित आदिवासी की भूमिका हो या अर्धसत्य का एक युवा इंस्पेक्टर, हर किरदार को उन्होंने निभाया ही नहीं, बल्कि पर्दे पर जिया भी. आक्रोश के लिए तो उन्हें सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेता का फिल्म फेयर पुरस्कार भी दिया गया. 1982 में आई फिल्म आरोहण के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से उन्हें सम्मानित किया गया.

इसके बाद सन 1984 में आई फिल्म अर्धसत्य के लिए एक बार फिर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया. ओमपुरी का जाना, सिर्फ एक अभिनेता का जाना भर नहीं है. उनका जाना, अभिनय के एक स्कूल का बंद होने जैसा है. ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें. चौथी दुनिया परिवार की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि.