बाहुबली और भारतीय दर्शक

bahubaliमुंबई, (लेखराज) : बाहुबली दक्षिण भारत से डब होकर आने वाली फिल्मों के क्रम में एक और फिल्म थी | फिल्म की रिलीज़ के समय हिंदी फिल्मों के दर्शक वर्ग ने बाहुबली को इसी रूप में लिया, लेकिन देखते ही देखते यह फिल्म भारतीय दर्शकों पर जादू-सा कर गयी और अंत में बाहुबली भारतीय सिनेमा इतिहास की सबसे बड़ी सफल फिल्म साबित हुई | सुनने में आ रहा है कि बाहुबली का दूसरा और अंतिम भाग अपनी रिलीज़ से पहले ही सैटेलाईट राइट्स और फिल्म डिस्ट्रीब्यूशन के माध्यम से 500 करोड़ का व्यवसाय कर चुका है, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है |

विचार करने वाली बात यह है कि बाहुबली में ऐसा क्या था कि दर्शक एक काल्पनिक पौराणिक कथा को देखकर मंत्रमुग्ध हो गए ? ऐसा तो नहीं है कि इससे पहले पौराणिक कहानियों पर फिल्म ही न बनी हो | बल्कि देखा जाए तो भारतीय फिल्म निर्माण की शुरुआत में सबसे अधिक फ़िल्में पौराणिक विषयों पर ही आधारित थीं | जैसी कि कहावत है कि इतिहास स्वयं को दुहराता है….तो क्या बाहुबली ने उसी इतिहास को दुहराया है | नहीं, बात सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है | एक और चौंकाने वाली बात यह है कि अब सिनेमा यथार्थपरक कहानियों के प्रस्तुतीकरण की तरफ बढ़ रहा है | ऐसे में अगर कोई काल्पनिक आख्यान पर आधारित फिल्म दर्शकों का न सिर्फ मन मोह ले बल्कि उसके दूसरे भाग के लिए पूरे देश में तीव्र प्रतीक्षा की जा रही हो, तो प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है कि आख़िर इस फिल्म में ऐसा क्या जादू था ?

पहली सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आदमी के मन की प्यास अनंत है | मनुष्य का मनोविज्ञान कुछ इस तरह का है, और जैसा कि फ्राइड ने कहा है कि आदमी सदा अतृप्त रहने वाला प्राणी है, कि वो और और आगे, और और गहरे, और और ऊँचे की तलाश में सदैव भटकता रहता है | नए का भरपूर उपभोग करता है, पर जल्दी ही उससे ऊबकर फिर किसी और नए की खोज में चल पड़ता है | हमने मूक फ़िल्में बनायीं, हमने बोलती फ़िल्में बनायीं, हमने रंगीन फ़िल्में बनायीं, प्यार की फ़िल्में, हिंसा की फ़िल्में, संतों की फ़िल्में, भूतों की फ़िल्में बनायीं…हमने हर तरह की फ़िल्में बनायीं लेकिन हमारी प्यास नहीं बुझी | फिर हमने बाहुबली बनायी, तो दर्शक उसे देखकर दंग रह गए | जो सदियों से मनुष्य के मन में अपने से कुछ बड़ा larger than life की ख्वाहिश पनप रही थी, बाहुबली में उन्हें वही मिला |

अत्याधुनिक तकनीक के साथ बाहुबली में जो भव्यता और विशालता थी, वो दर्शकों के अवचेतन मन में हज़ारों सालों से बन रही तस्वीर से मेल खा गयी | बाहुबली के पात्रों में जनता ने अपने पौराणिक पात्र जीवंत होते देखे, प्रेम, बलिदान, महत्वाकांक्षा, प्रतिशोध और राजनीति का बवंडर देखा | अद्भुत युद्ध-दृश्य देखे | सत्य-असत्य, अच्छे-बुरे के बीच के आँखें चौंधियाने वाला संघर्ष देखा | माँ का आर्तनाद और बेटे की हुंकार देखी | जो रक्त की धार सिनेमा के परदे पर बाहुबली की शिराओं में बह रही थी, वही दौड़ दर्शकों ने अपनी नशों में महसूस की… और इस तरह दर्शक बारम्बार इस प्यास का आनंद लेने के लिए सिनेमा घरों की तरफ दौड़ पड़े | अब दर्शकों को बड़ी बेसब्री से बाहुबली दूसरे और अंतिम भाग का इंतज़ार है |

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