गिरती दर्शक संख्या और सिनेमा का भविष्य

future of cinema, low count of audienceभारत में सिनेमा के निर्माण के समय से ही भारतीय अवाम मनोरंजन की इस विधा की मुरीद हो गयी थी | भारतीय दर्शक चलती फिरती तश्वीरों के माध्यम से कहानी का प्रस्तुतीकरण देखकर अचंभित रह गए और देखते ही देखते सिनेमा भारतीय क्षितिज पर छा गया | लगातार बढ़ती दर्शक संख्या को देखते हुए सिनेमा हॉल के संख्या भी बढ़ने लगी | भारतीय सिनेमा के सौ से ज़्यादा सालों के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि दर्शकों की संख्या तुलनात्मक रूप से घटी है | ये एक चौकाने वाली और साथ ही सावधान कर देने वाली घटना है |

2010 में जहाँ सिनेमा दर्शकों की संख्या क़रीब 82 मिलियन थी, वहीं 2016 तक यह कम होते होते 77. 63 मिलियन रह गयी | हालाँकि इस गिरावट की बहुत बड़ी वजह संचार तथा तकनीकी में हुई क्रान्ति है | आज इतने चैनल हैं कि आदमी के पास विकल्पों का समंदर उपलब्ध हो गया है | साथ ही इन्टरनेट तथा youtube की उपलब्धता ने मनोरंजन का अनंत संसार खोल दिया है | दर्शक इन उपलब्ध विकल्पों की वजह से सिनेमा से मुँह मोड़ने लगे हैं | इसके अलावा पायरेसी फिल्म व्यवसाय के लिए ख़तरनाक दुश्मन की तरह आ खड़ी हुई है | इसकी वजह से दर्शक फिल्म को सिनेमा हॉल में देखने के बजाय घर पर ही देख लेते हैं | कई बार फिल्म निर्माताओं की तरफ से इसके ख़िलाफ़ सरकार से कार्रवाई करने की माँग की गयी है, पर अब तक कोई सार्थक क़दम नहीं उठाया गया है |

अगर हम सिनेमा हॉल्स की संख्या की तरफ नज़र डालें, तो हम पाते हैं कि 2011 में चाइना में जहाँ 9000 स्क्रीन थे, 2014 तक उनकी संख्या 24000 हो गयी, वहीं भारत में अब तक सिर्फ 10167 स्क्रीन्स हैं, जिनमें से सिंगल स्क्रीन की संख्या बड़ी तेज़ी से कम हो रही है | हालाँकि मल्टीप्लेक्सेज की संख्या बढ़ रही है, पर इसकी रफ़्तार बहुत ही धीमी है |

आज दर्शकों का फिल्मों से जुड़ाव लगातार कम होता जा रहा है | मनोरंजन के विकल्पों की उपलब्धता के अलावा इसका एक बड़ा कारण यह है कि आज की फिल्मों की कहानी से आम आदमी की भावनाएँ ग़ायब होती जा रही हैं, सिनेमा का लगातार पश्चिमीकरण हो रहा है | प्रयोगशीलता के नाम पर शुष्क कहानियाँ प्रस्तुत की जा रही हैं | अगर यही हाल रहा, तो वो दिन दूर नहीं जब सिनेमा हॉल खाली पड़े होंगे और फिल्म व्यवसाय ध्वस्त हो जाएगा | वक़्त रहते इस सच्चाई को समझ लेने की आवश्यकता है |

 

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