राज कुमार हिरानी और भारतीय सिनेमा

raj kumar hirani, indian cinema, munnabhai, three idiotsमुंबई, (लेखराज) : सोदेश्य सिनेमा की जब बात की जाती है, तो आज के सिनेमा में एक वीरानी-सी वीरानी नज़र आती है | भारतीय सिनेमा का वह दौर बहुत पीछे छूट गया, जब फ़िल्में साहित्य की तरह समाज का मार्ग प्रशस्त करती थीं | हालाँकि सिनेमा साहित्य की जगह तो नहीं ले सकता क्योंकि दोनों ही अपने आप में  भिन्न विधाएँ हैं और दूसरी बात जहाँ साहित्य का एक अपेक्षाकृत प्रबुद्ध पाठकवर्ग होता है, वहीँ सिनेमा की निर्भरता पूरी तरह आम जनता की अभिरुचियों पर है | यह भी एक स्वीकार करने योग्य बात है कि जब भी किसी साहित्यिक कृति पर सिनेमा का निर्माण हुआ है, उसने प्रबुद्ध वर्ग को अपने दर्शकवर्ग में शामिल किया है और आम जनता की अभिरुचियों को परिष्कृत करने का प्रयास किया है | लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसा बहुत ही कम हुआ है |

आज के दौर के सोदेश्य सिने निर्देशकों और निर्माताओं पर नज़र डालें, तो एक नाम सबसे ऊपर उभरकर आता है…और वह नाम है- राज कुमार हिरानी, जिन्हें प्यार से सिनेमा वाले राजू हिरानी बुलाते हैं | राजू हिरानी ने भारतीय सिनेमा में जो सबसे बड़ा योगदान दिया है, वह यह है कि उन्होंने उस खाई को पाटने की कोशिश की है, जो आम दर्शकों को प्रबुद्ध दर्शकों से अलग करती है | उनकी फिल्मों में एक ऐसा इन्द्रधनुष बनता है, जिसका सौंदर्य समाज के हर वर्ग का मन मोह लेता है | मुन्नाभाई एम बी बी एस से उन्होंने सिनेमा के न केवल बने बनाए खांचे को तोड़ा, बल्कि फिल्मों से दूर जाते दर्शकों को वापस लाने के साथ ही नया दर्शक वर्ग भी खड़ा किया, जिससे फिल्म इंडस्ट्री में एक नयी रौशनी आई |

मुन्नाभाई एम बी बी एस और लगे रहो मुन्नाभाई में जहाँ उन्होंने आत्मीयता और अहिंसा के माध्यम से लोगों की सो गयी संवेदना को जगाया, वहीँ थ्री इडियट में उन्होंने विद्यार्थियों को उनके माँ बाप द्वारा थोपी गयी अपेक्षाओं के भार से मुक्ति दिलाई और पी के में उन्होंने दो क़दम आगे जाकर आदमियत को धर्म की थोथी मान्यताओं से मुक्त करने का प्रयास किया | आज के भारतीय सिनेमा में राज कुमार हिरानी एक कभी न बुझने वाली मशाल के वाहक हैं |

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