यह सरकार नीतिगत अभाव से जूझ रही है

kamal sirआइए इस बार पेश हुए आम बजट पर एक नज़र डालते हैं. देश में एक अजीब घटनाक्रम चल रहा है. आम तौर पर सरकार या प्रधानमंत्री के पास अपनी नीतियों की स्पष्ट समझ और दृष्टिकोण होती है. अगर कभी सरकार में अस्थिरता होती भी है, तो गठबंधन के सहयोगियों के अलग व्यवहार के कारण.

अभी जो अजीब बात है, वो यह कि संख्या के लिहाज़ से यह सरकार पूरी तरह से स्थिर है, क्योंकि सत्ताधारी दल के 282 सांसद हैं और उनके अलावा उनके सहयोगी भी हैं, लेकिन फिर भी प्रधानमंत्री और उनके नज़दीकी राज़दारों के दिमाग में पूर्ण अस्थिरता है.

प्रधानमंत्री मेक इन इंडिया की नीति के तहत दूसरे देशों से निवेश आकर्षित करना चाहते हैं. वे औद्योगिकरण और रोजगार को बढ़ावा देना चाहते हैं. वे चाहते हैं कि कर व्यवस्था को सरल बनाया जाय. वे कई अन्य चीजों के अलावा यह भी चाहते हैं कि लोग आधुनिक बने और जितना संभव हो सके पारदर्शी अर्थव्यवस्था अपनाएं. लेकिन इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए इनकम टैक्स एक्ट में बड़े पैमाने पर संशोधन की आवश्यकता है.

मौजूदा सरकार के द्वारा चार बजट पेश किए जा चुके हैं, लेकिन इस सिलसिले में कुछ नहीं किया गया है. आयकर प्रणाली वैसी ही है, जैसी यूपीए के शासनकाल में थी. आयकर विभाग जैसे पहले था (अच्छा, बुरा या भ्रष्ट) अब भी वैसा ही है. केवल मेक इन इंडिया का जाप कर के आप बदलाव कैसे ला सकते हैं? कंपनियों को लाने के लिए आपको चीजें आसान करनी होंगी.

दरअसल, चिदम्बरम, मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी या राहुल गांधी को गाली दे कर भारत को महान बनाने की राजनीतिक चाह पूरी नहीं की जा सकती. इससे आगे बढ़ने की राजनीतिक इच्छा और कमजोर होती है. जब देश के संचालन की बात होती है, तो ये सारी चीज़ें बेमानी हो जाती हैं. देश के मतदाताओं ने देश के संचालन का अधिकार आपको दिया है.

आपके पांच साल के कार्यकाल में से तीन साल निकल गए हैं. आप यूपीए के 10 साल की पुनरावृति नहीं कर सकते. अगर ऐसा करेंगे तो उसे यह ज़ाहिर होगा कि नया करने के लिए आपके पास कुछ नहीं है. मतदाताओं को यह संदेश जाएगा कि अगली बार फिर से उन्हें (यूपीए को) ही सत्ता में ले आइए, क्योंकि वे देश के लिए कुछ कर रहे थे.

अब विजय माल्या का मामला ही देख लीजिए. विजय माल्या पर बात करने से पहले मैं यह सा़फ करता चलूं कि उनसे मेरा कोई लेना देना नहीं है. सामाजिक तौर पर मैं उनको बहुत अधिक नहीं जानता. लेकिन यह मेरी समझ से परे है कि आप एक व्यक्ति को इतना कैसे डरा सकते हैं कि वो अपना लोन वापस न करने की स्थिति में देश छो़ड कर भाग जाए.

उसके बाद अब इस मसले को सुलझाने के बजाय वित्त मंत्री अपने बजट भाषण में कहते हैं कि हम कानून को इतना सख्त बनाएंगे कि कोई अगर कर्ज लेने के बाद देश छो़ड कर भागे, तो उसकी संपत्ति जब्त कर ली जाएगी. अपने लोगों के साथ आपका ये बर्ताब है! ऐसा व्यक्ति जो संसद का सदस्य है, उसने देश की सबसे बेहतरीन एयरलाइंस संचालित की, उसके खिलाफ इस तरह की कार्रवाई कर के विदेशी निवेशकों को आप क्या सन्देश देना चाहते हैं?

जब आपके देश के प्रमुख लोग सुरक्षित नहीं हैं, तो एक विदेशी निवेशक यहां आ कर कैसे सुरक्षित महसूस करेगा. जाहिर है कि आप उसे गिरफ्तार नहीं करेंगे, क्योंकि उसका दूतावास इसमें हस्तक्षेप करेगा. टीवी पर ये प्रचारित किया जा रहा है कि विजय माल्या और ललित मोदी को निशाना बनाया जाएगा. ये बहुत छोटी सोच है. सरकार बड़ी-बड़ी बातें करती है, लेकिन काम बहुत छोटे (तुच्छ) करती है.

पूरा बजट बदले की भावना से भरा हुआ है. हालांकि बजट में अच्छी चीजें भी हैं. जैसे, कम आमदनी वालों को टैक्स में छूट दी गई है और करों में कटौती कर के छोटे कॉरपोरेट्स को भी फायदा पहुंचाने की कोशिश की गई है. ग्रामीण क्षेत्र के लिए बजट आवंटन की राशि में थोड़ा इजाफा किया गया है. जैसे, मनरेगा की राशि ब़ढाई गई है, लेकिन फिर भी यह पर्याप्त नहीं है. ऐसा इसलिए हो सकता है कि वित्त मंत्री वित्तीय घाटे को 3.2 फीसदी तक सीमित रखना चाहते हों. हालांकि इसमें तर्क नहीं है.

भूतपूर्व वित्त मंत्री चिदंबरम ने भी वित्तीय घाटे को 3 फीसदी तक सीमित रखने की बात कही थी. लेकिन ये ऐसा साल है, जिसमें वित्तीय घाटे को 4 फीसदी तक रखना चाहिए था. इससे बड़े पैमाने पर निवेश की प्रक्रिया शुरू होती. बहरहाल, यह एक ऐसा मामला है, जिस पर हम उनकी आलोचना कर सकते हैं. वित्तीय घाटा एक अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रतिमान है, जिसपर हर व्यक्तइपना अलग नजरिया रख सकता है.

मेरे हिसाब से एक विकासशील देश सिर्फ वित्तीय घाटे के बारे में हमेशा नहीं सोच सकता है. मुद्रीकृत घाटा और महंगाई दर मायने रखते हैं. यदि उच्च वित्तीय घाटा बर्दाश्त किया जा सकता है, तो उसमें कोई बुराई नहीं है. आप इंफ्रास्ट्रक्चर और नई परियोजनाओं आदि पर भारी निवेश सीमित संसाधनों से नहीं कर सकते, आपको अपने संसाधन के आधार को विस्तार देना होगा.

कहने का मतलब ये है कि इस बजट के विस्तृत मूल्यांकन की आवश्यकता नहीं है. ये अच्छा बजट है. जहां तक अरुण जेटली का सवाल है, उन्होंने एक अच्छा बजट पेश किया है. उन्होंने गरीबों को राहत देने की कोशिश की है. लेकिन एक बार फिर अखबार ये संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि ये प्रो-पुअर (गरीब के हित में) और एंटी-रिच (अमीर विरोधी) बजट है.

अगर ये अमीर विरोधी बजट होता तो फिर शेयर मार्केट को नीचे की तरफ जाना चाहिए था. शेयर मार्केट में उछाल क्यों आया? मैं इस तर्क को नहीं समझ पा रहा हूं कि अचानक शेयर मार्केट गरीबों का कैसे हो गया. हमें ये समझना होगा कि इस सरकार में पॉलिसी डेफिसिट (नीतिगत कमजोरी) है.

अब राजनीतिक दलों के चंदे को ही देख लीजिए. ये किस तरह का संशोधन है कि 20 हजार की बजाय एक आदमी केवल 2 हजार रुपये ही नगद में चन्दा दे सकता है. क्या इस देश में लोगों की कमी है? अब एक नकली रसीद की जगह राजनीतिक दलों को दस नकली रसीद काटने पड़ेंगे.

हम क्या कर रहे हैं? यह एक विचारविहीन फैसला है. प्रधानमंत्री सुबह 5 बजे कुछ सोचते हैं और दोपहर में लोगों से उसे लागू करने के लिए कहते है, फिर हर व्यक्ति उस काम में लग जाता है. कोई उनसे तर्क-वितर्क नहीं करता, क्योंकि वे ऐसा पसंद नहीं करते हैं.

ये तो बजट हुआ. अब दूसरे मुद्दे की तरफ आते हैं, जो सुप्रीम कोर्ट से जुड़ा है. सुप्रीम कोर्ट भी कोई गौरवपूर्ण काम नहीं कर रहा है. पहले तो उन्होंने सुब्रत रॉय को बिना किसी आरोप के, बिना एफआईआर के, बिना ट्रायल के जेल में रखा. ये सर्वोच्च अदालत द्वारा स्थापित अच्छा उदाहरण नहीं है. अब, बीसीसीआई की बात करते हैं. यहां मुख्य शिकायत ये है कि कुछ लोग हमेशा पॉवर में रहते हैं. जैसे, अरुण जेटली, शरद पवार, एन श्रीनिवासन, राजीव शुक्ला आदि.

तो क्या अदालत इन्हें हटाएगी और क्रिकेट के संचालन के लिए उन्हें बहाल करेगी, जो क्रिकेट के बारे में कुछ नहीं जानते? क्रिकेट ही एक ऐसा खेल है, जिसमें भारत दुनिया में बेहतर प्रदर्शन कर रहा है. आप इसे नष्ट कर देना चाहते हैं. बेशक, आप इसे नष्ट नहीं कर पाएंगे, क्योंकि खिलाड़ी अच्छे हैं, वे अच्छा खेलेंगे ही.

लेकिन, अदालत कर क्या रही है? अदालत बीसीसीआई से कह रही है कि जो राज्य लोढा कमेटी के समर्थन में वोट नहीं कर रहे हैं, उन्हें पैसा नहीं दो. कल को अदालत अटॉर्नी जनरल से कह सकती है कि जो राज्य नरेन्द्र मोदी को सहयोग नहीं कर रहे हैं, उनका पैसा बन्द कर दिया जाना चाहिए.

क्या हम लोकतंत्र में रह रहे हैं? क्या यह धनतंत्र है? क्या हम किसी हास्यासपद तंत्र में रह रहे हैं? सुप्रीम कोर्ट को इन सवालों का जवाब जरूर देना चाहिए. अब जस्टिस ठाकुर जा चुके है. जस्टिस खेहर ने उनकी जगह ले ली है, जो अपनी ईमानदारी और गंभीरता के लिए जाने जाते हैं. उन्हें इन दोनों मामलों (सुब्रत रॉय और बीसीसीआई) की फिर से समीक्षा करनी चाहिए.

इसमें कोई हानि नहीं है यदि सुप्रीम कोर्ट इन मामलों को रद्द कर सामान्य स्थिति कायम कर देता है. ऐसा करने में सुप्रीम कोर्ट की गरिमा पर चोट नहीं पहुंचेगी. जैसे बीसीसीआई चल रहा था वैसे चलने दें. अगर वहां कोई गलत काम हो रहा है, तो देश का कानून वहां पर लागू होगा.

अगर कोई गलत तरीके से चुन कर आता है, तो देश का कानून इस पर लागू होगा. अगर कोई सही तरीके से चुन कर आता है, तो उसे आने दीजिए. आप उसे क्यों रोक रहे है? कांग्रेस ने कई सालों तक देश पर शासन किया, कोई अदालत उसे रोकने नहीं आई. लोगों ने सरकार बदली. मुझे दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि सुप्रीम कोर्ट कोई अच्छा उदाहरण नहीं पेश कर रहा है. अमेरिका में राष्ट्रपति सुप्रीम कोर्ट के जज की नियुक्ति करते हैं.

इंग्लैंड में भी यही सिस्टम है. वहां जज, जज की नियुक्ति नहीं करते हैं. भारत ही एक ऐसा देश है, जहां सुप्रीम कोर्ट इतना सुप्रीम (बड़ा) हो गया है कि वे अपने लोगों की नियुक्ति खुद ही करते हैं और हर बात पर टिप्पणी करते हैं. मुझे अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि एक समय ऐसा आएगा, जब लोग सुप्रीम कोर्ट में अपना विश्वास खोने लगेंगे. ये देश के लिए बहुत ही खतरनाक बात होगी. सुप्रीम कोर्ट इस बात को जितनी जल्दी समझ लेगा, उतना ही बेहतर होगा.

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