विरासत को लेकर साहित्यिक संघर्ष

इस वक्त हिंदी में एक ऐसी पीढ़ी सक्रिय है जो अपनी पहचान के संकट को लेकर बहुत चिंतित रहती है. यह चिंता उनके लेखन से ज्यादा कृत्यों में या फिर सार्वजनिक आचार-व्यवहार में दिखाई देता है. इस पीढ़ी का सबसे बड़ा दर्द यह है कि उसको उल्लेखनीय नहीं माना जा रहा है. हिंदी साहित्य में आमतौर पर यह माना जाता है कि दस साल में लेखकों की एक नई पीढ़ी सामने आ जाती है. लेखकों की जो नई पीढ़ी सामने आती है वो अपने से पुरानी पीढ़ी के लेखन का अपनी रचनात्मकता से विस्तार करती है. नई और पुरानी पीढ़ी का द्वंद्व भी हर दौर में देखने को मिलता रहा है. नई पीढ़ी खुद को परंपरा या विरासत के डंडे से हांके जाने को लेकर विरोध भी प्रकट करती रही है, कभी उग्र होकर तो कभी शांति से विरोध करके तो कभी अपनी रचनाओं से पुरानी पीढ़ी से लंबी लकीर खींचकर.

इस परिपाटी का निर्वाह कमोबेश हर युग में हुआ है, लेकिन समकालीन साहित्यिक परिदृश्य में एक अलग ही किस्म की रस्साकशी देखने को मिल रही है. युवावस्था की दहलीज को पार कर चुकी पीढ़ी खुद को परंपरा और विरासत के नाम पर हांके जाने के खिलाफ तो नजर आती है लेकिन उसको अपने से पुरानी पीढ़ी को रचनात्मकता के नाम पर नकारने की बेचैनी नहीं दिखाई देती है. जबकि अबतक तो यही होता आया है कि अपेक्षाकृत नई पीढ़ी अपने से पहले वाली पीढ़ी को रचनात्मक स्तर पर चुनौती देती रही है, चाहे वो नई कहानी का दौर रहा हो या फिर बीटनिक पीढ़ी का, किसी भी अन्य पीढ़ी को देखें तो यह साफ तौर पर नजर आती है.

अगर हम भारतेन्दु युग से लेकर अबतक के परिदृश्य पर नजर डालें तो लगभग इसी तरह की प्रवृत्ति को रेखांकित किया जा सकता है. तो अब ऐसा क्यों हो रहा है कि रचनात्मक स्तर पर अपेक्षित यह पीढ़ियों का संघर्ष एक अलग ही रूप लेता जा रहा है. रचनाओं के माध्यम से होनेवाले संघर्ष की बजाय यह व्यक्तिगत संघर्ष में तब्दील हो गया है, जो साहित्यिक माहौल में एक अलग ही किस्म की कटुता के वातावरण का निर्माण कर रहा है, जो चिंता का विषय है. रचनात्मक स्तर पर चुनौती देना बेहतर तरीका होता है.

साहित्य की इस प्रवृत्ति पर विचार करने की आवश्यकता है. दस साल में अगर पीढ़ियों के बदल जाने या नई पीढ़ी के साहित्यिक परिदृश्य पर आगमन के सिद्धांत को मानें तो इस वक्त हिंदी साहित्य में करीब आठ पीढ़ियां सक्रिय हैं. नामवर सिंह और रामदरश मिश्र जैसे नब्बे पार लेखकों से लेकर सुजाता और श्रद्धा थवाइत तक. इसको हम हिंदी की रचनात्मकता की ताकत मान सकते हैं. तो फिर इसकी क्या वजह है कि बीच की एक पीढ़ी अपनी मौजूदगी को लेकर या साहित्यक परिदृश्य में अपनी उपस्थिति को लेकर इतनी संवेदनशील हो रही है.

उसको अपने से वरिष्ठ पीढ़ी से अपने लेखन की वैधता पर मोहर क्यों चाहिए? उसके अंदर इतनी बेचैनी क्यों है? क्यों नहीं उस पीढ़ी के लेखकों/ लेखिकाओं को अपने लेखन पर भरोसा है. अगर हम संजीदगी से इसपर विचार करते हैं तो यह लगता है कि यह मामला इतना सरल नहीं है और इसको इस तरह से देखने पर यह समस्या के विश्लेषण का सरलीकरण हो सकता है.

बीच की पीढ़ी के लेखकों के बीच अपनी रचनाओं की मान्यता को लेकर जो बेचैनी दिखाई देती है दरअसल वो इस वजह से है कि उस पीढ़ी के पास अपना कोई आलोचक नहीं है. आज के दौर के ज्यादातर लेखक आलोचकों को नकारने में लगे रहते हैं. बहुधा मुक्तिबोध की पंक्ति तोड़ने ही होंगे सारे गढ़ और मठ को नारे की तरह इस्तेमाल करते हुए. आलोचकों को नकारने की यह प्रवृति इन दिनों ज्यादा बढ़ गई है. अब तो हालात ये हो गया है कि छुटभैये लेखक भी आलोचना पर सवाल खड़े करने लगे हैं. पौने उपन्यास लिखकर ख्याति प्राप्त करनेवाले लेखक भी आलोचना पर फब्ती कसते हैं. सवाल उठाना गलत नहीं है, उठने ही चाहिए, लेकिन मर्यादा का दायरा जब पार होता है तो कुंठा सामने आ जाती है.

आलोचना की अपनी दिक्कतें हैं, वो सतही हो गई हैं, उसमें पूर्वग्रह ज्यादा दिखाई देता है आदि-आदि. इसके बावजूद साहित्य में इस विधा की अपनी एक अहमियत है, जिसको नकारने की ना तो आवश्यकता है और ना ही गढ़ और मठ तोड़ने की नारेबाजी की.

आलोचना की गलत प्रवृत्तियों पर रचनात्मक तरीके से बात होनी चाहिए. वैसे भी हिंदी आलोचना के इतने बुरे दिन नहीं आए हैं कि उसको रचनाकारों से किसी भी तरह के प्रमाण-पत्र की आवश्यकता हो. बावजूद इसके आलोचना के खिलाफ जिस तरह का माहौल बनाया जा रहा है वह साहित्य की हर विधा के लिए नुकसानदेह हो सकती है. जो पीढ़ी इन दिनों अपने से पुरानी पीढ़ी से विरासत और वसीयत की मांग कर रही है, अगर उस पीढ़ी के लेखकों की रचनाओं पर गंभीरता से विचार होता तो यह दिक्कत नहीं आती. सालों से लिख रहे लेखकों/लेखिकाओं के रचनाकर्म पर गंभीरता से विचार करनेवाला कोई आलोचक सामने नहीं आ रहा है. जो खुद के आलोचक होने का दावा करते हैं वो उतनी तैयारी के साथ इस कर्म में नहीं उतरते हैं.

आलोचना के लिए जिस अध्ययन की आवश्यकता होती है या फिर जिस तरह से वैश्विक प्रवृत्तियों के बरक्श देसी रचनाओं को रखकर तुलनात्मक विश्लेषण की आवश्यकता होती है उसका सर्वथा अभाव दिखता है. जिन लोगों के सर पर युवा आलोचक की कलगी लगाई जा रही है उनके लेखन को देखकर भी निराशा होती है. या तो वो मार्क्सवाद के भोथरे औजारों से आलोचना करने में लगे हैं या फिर अलग-अलग लेखकों से समीक्षानुमा टिप्पणी लिखवाकर किताब का संपादन कर आलोचक बने बैठे हैं. मामला यहीं तक नहीं रुकता है. कई बार आलोचनात्मक लेखों को पढ़ने के बाद मन में यह सवाल उठता है कि आलोचक की राय क्या है?

होता यह है कि वो लिखना शुरू करते ही उद्धरण देना शुरू कर देते हैं. नेम ड्रॉपिंग कर-कर के अपने लेख को वजनदार बनाने के चक्कर में उनका खुद का कोई मत सामने आ नहीं पाता है. इसका सबसे ज्यादा नुकसान उस लेखक का होता है, जिसकी रचनाओं पर उस लेख में विचार किया जाता है. ना तो रचना पर बात हो पाती है, ना ही रचना के क्राफ्ट आदि पर.

अगर कोई आलोचक सामने आकर उक्त पीढ़ी की लेखिकाओं/लेखकों पर गंभीरता से विचार करेगा तो पीढ़ीगत संघर्ष दिखाई नहीं देगी. इसके अलावा उस पीढ़ी को यह भी करना होगा कि वो अपनी भी  पीढ़ी के साथी लेखकों की रचनाओं पर लिखना शुरू करे. इसका एक फायदा यह होगा कि उनकी रचनाओं पर बात शुरू हो जाएगी. राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर और मोहन राकेश की त्रयी ने भी ये किया था, जिसका उनके लेखन को कितना फायदा हुआ, ये तो इतिहास में दर्ज है. अपने साथी लेखकों की रचनाओं को खारिज करने की बजाए वो उसपर विमर्श की शुरुआत करें, कटुता भी घटेगी और स्वीकार्यता भी बढ़ेगी. कटुता हमेशा रचनात्मकता को कुंद करती है.

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