उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव : मायावती, अखिलेश, प्रियंका और मोदी का अखाड़ा

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का बयान सामने आया है, जिसमें उन्होंने कहा है कि ये उत्तर प्रदेश का चुनाव नहीं, देश का चुनाव है. इसका सीधा अर्थ है कि जो उत्तर प्रदेश में जीतेगा, वो 2019 में केंद्र में सरकार बनाने में सफल होगा. अखिलेश यादव के इस बयान से उनके समर्थक सौ प्रतिशत सहमत होंगे और उसके आगे वे ये भी कहेंगे कि अब अखिलेश यादव नाम का एक नया चेहरा दिल्ली की गद्दी के लिए देश की राजनीति में सामने आ गया है. अखिलेश यादव से उलट उत्तर प्रदेश की भूतपूर्व मुख्यमंत्री और वंचितों की नेता मायावती इससे सिर्फ आंशिक रूप से सहमत होंगी.

उनके समर्थक ये अवश्य कहना चाहेंगे कि उत्तर प्रदेश में उनकी सरकार बनेगी और वे ही 2017 से 2019 के केंद्र बिंदु में रहेंगी. कांग्रेस हिचकोले खाती हुई समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में आई, लेकिन वे यह नहीं कह सकते कि उत्तर प्रदेश के चुनाव में उसकी कितनी बड़ी जीत होगी और वो दिल्ली की गद्दी के लिए कितनी दावेदार होगी. भारतीय जनता पार्टी इन सारे अनुमानों से परे जाकर अपने पूरे संसाधनों और संपूर्ण राजनीतिक क्षमता के साथ उत्तर प्रदेश के चुनाव को जीतना चाहेगी और जीतने के बाद वह 2019 में फिर से दिल्ली की गद्दी पर अपने संभावित कब्जे की घोषणा कर देगी.

इन चार पक्षों के अलावा अभी कोई पक्ष उत्तर प्रदेश में दिखाई नहीं देता है, न किसी दल के रूप में और न ही किसी गठबंधन के रूप में. चौथा गठबंधन अजीत सिंह, नीतीश कुमार, डॉ. अयूब और आर के चौधरी जैसों को बनाना था, लेकिन इसकी भ्रूण हत्या बहुत पहले हो गई और उसके ज़िम्मेदार इन चारों में से अधिकांश लोग हैं.

समाजवादी पार्टी का अंतर्विरोध

उत्तर प्रदेश के मुख्यतया तीन और थोड़े और विस्तार से देखें तो चार पक्ष हैं, जिनके अपने-अपने सकारात्मक पहलू भी हैं और अपने-अपने अंतर्विरोध भी हैं. सबसे पहले अखिलेश यादव की बात करते हैं. पिछले तीन महीने अखिलेश यादव और उनके पिता मुलायम सिंह यादव के बीच का तनाव पूरे उत्तर प्रदेश ही नहीं सारे देश को अपने में बांधे रहा.

तीन महीने चला ये घटनाक्रम किसी भी टेलीविजन सीरियल से कम रोचक नहीं था. इसमें षड्‌यंत्र थे, सौतेली माताएं थीं, सास-बहुएं थीं, चाचाओं के अपने-अपने दांव थे. कुल मिलाकर राजमहल के भीतर चलने वाले षड्‌यंत्र का आधुनिक स्वरूप नमक, मिर्च, घात-प्रतिघात के रूप में हमारे सामने था और सारे देश ने इसमें भरपूर रूचि दिखाई. सबसे आखिरी के घटनाक्रम में अखिलेश यादव ने अपने पिता को अपनी चतुराई और अपने बुद्धिबल से समाजवादी पार्टी की गद्दी से उतार दिया. लेकिन कभी ये नहीं कहा कि वे उन्हें उतारना चाहते हैं.

अखिलेश ने उन्हें मार्गदर्शक के रूप में सामने रखते हुए उनके सारे अधिकार छीन लिए. इस क्रम में अखिलेश के चाचा प्रोफेसर रामगोपाल यादव मुख्य रणनीतिकार के रूप में उभरे. रामगोपाल यादव ने पिछले 15-20 सालों में अपने बड़े भाई मुलायम सिंह यादव के रणनीतिकार की सकुशल भूमिका निभाई थी. दिल्ली सहित पूरे देश में यह माना जाता था कि मुलायम सिंह वही फैसला लेंगे जो  प्रोफेसर रामगोपाल कहेंगे, क्योंकि मुलायम सिंह ने स्थितियों का विश्लेषण करने और लोगों से बातचीत करने की पूरी ज़िम्मेदारी प्रोफेसर रामगोपाल को सौंप रखी थी.

इसकी पराकाष्ठा दो साल पहले सप्रमाण देखने को मिली, जब देवेगौड़ा, नीतीश कुमार, लालू यादव, शरद यादव, अभय चौटाला और कमल मोरारका ने एक पार्टी बनाने की कोशिश की. सबने मिलकर मुलायम सिंह यादव को नई पार्टी का अध्यक्ष, पार्लियामेन्ट्री बोर्ड का अध्यक्ष मान लिया और उनके चुनाव चिन्ह और उनकी पार्टी के नाम पर सहमती जता दी. प्रेस के सामने उन्हें मालाएं पहना दी गईं और मुलायम सिंह ने उसे स्वीकार भी कर लिया. लेकिन इसके ठीक डेढ़ महीने के भीतर बिहार चुनाव में इस फैसले की धज्जियां उड़ गईं.

प्रोफेसर रामगोपाल ने ये घोषणा की कि वह बिहार में अलग चुनाव लड़ेंगे. दरअसल, जब मुलायम सिंह यादव को एक पार्टी का नेता मानने की बात हुई और जब लालू यादव और नीतीश कुमार ने कहा कि अब मुलायम सिंह को आगे बढ़ना चाहिए, तो उनकी तरफ से कहा गया कि एक पार्टी बनाने की प्रक्रिया बिहार चुनाव के बाद शुरू करेंगे. इस वाकये ने लालू यादव और नीतीश कुमार को ये संदेश भेजा कि बिहार चुनाव के जो परिणाम आएंगे, उसके बाद हम सब नई पार्टी की घोषणा करेंगे.

इसलिए उन्होंने अपने प्रत्याशियों की घोषणा कर दी, जिसे प्रोफेसर रामगोपाल यादव ने अपने लिए हानिकारक माना और ये समझा कि शायद नई पार्टी में राजनीतिक फैसले लेने का अधिकार बहुत से दूसरे लोगों के पास जा सकता है और अचानक इस पार्टी को सुशुप्तावस्था में रखने की योजना बनी. हालांकि कहा ये गया कि भारतीय जनता पार्टी के इशारे पर प्रोफेसर रामगोपाल यादव ने एक पार्टी बनाने की योजना को सिरे नहीं चढ़ने दिया, क्योंकि अगर एक पार्टी बन जाती तो भारतीय जनता पार्टी का मानना था कि बिहार में हर हालत में वो पार्टी जीतती. इस चर्चा की वास्तविकता का कोई प्रमाण किसी के पास नहीं है.

लेकिन सारे संबंधित पक्षों और राजनीतिक जानकारों के बीच ये चर्चा इतनी मज़बूती से उभरी कि प्रोफेसर रामगोपाल यादव नई पार्टी बनाने के रास्तेे के प्रमुख खलनायक बन गए. इसके पक्ष में सिर्फ एक ही बात कही जा सकती है कि जब मुख्यमंत्री के परिवार का झगड़ा और आगे बढ़ा, तो पहले शिवपाल सिंह यादव ने सार्वजनिक रूप से और फिर स्वयं मुलायम सिंह यादव ने सार्वजनिक रूप से कहा कि प्रोफेसर रामगोपाल यादव ने सीबीआई से बचने के लिए और भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में रणनीति बनाने के लिए सारी समस्याएं पैदा की और उन्होंने ही परिवार में विभाजन करा दिया. सिर्फ यही दो बयान उस चर्चा के प्रमाण में हमारे सामने हैं.

हो सकता है, ये सही न हो लेकिन अखिलेश यादव द्वारा मुलायम सिंह यादव को बिल्कुल किनारे कर देना, हाशिये पर डाल देना उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत स्वीकारा नहीं गया और न पसन्द किया गया. 50 साल से ऊपर के लोग इस फैसले के खिला़फ दिखाई दे रहे हैं. लेकिन 50 प्रतिशत वो हैं जिन्हें हम नौजवान कह सकते हैं, जो इस मानसिकता के हैं कि अखिलेश के पिता ने उनके लिए कुछ नहीं किया, वे अच्छा कर सकते थे. ऐसी समझ वाले युवा इस फैसले के पक्ष में हैं.

अखिलेश यादव के चुनाव कैंपेन में पहला रोड़ा यही सवाल बनने वाला है कि उन्होंने अपने 5 साल के मुख्यमंत्रित्व काल के बाद ही कैसे अपने पिता को अपमानित कर एक किनारे धकेल दिया और किस तरह से उनकी उस सारी मेहनत को मटियामेट कर दिया, जो उन्होंने पिछले 40 साल में समाजवादी पार्टी को इस ऊंचाई पर पहुंचाने के लिए की थी.

अखिलेश यादव के लिए दूसरी चुनौती मुलायम सिंह यादव का आखिरी बयान बन रहा है, जिसमें उन्होंने कहा है कि अखिलेश यादव मुस्लिम विरोधी हैं. उन्होंने पांच साल अखिलेश यादव को बहुत सारी सलाहें दीं, जो उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों से संबंधित थीं, जिन्हें मुलायम सिंह यादव अपना मुख्य वोट मानते हैं. दूसरी तरह की सलाहें मुसलमानों को लेकर थीं, उनके उत्थान को लेकर थीं.

लेकिन अखिलेश यादव ने दोनों के ऊपर ध्यान नहीं दिया. मुलायम सिंह यादव के इस चेतावनी भरे मार्मिक वक्तव्य कि अखिलेश मुसलमान विरोधी हैं, का इस्तेमाल मायावती और भाजपा भी करेगी. इन दो अड़चनों के अलावा अखिलेश यादव के सामने उत्तर प्रदेश में कोई अड़चन नहीं है. अगर कोई अड़चन है तो उनके द्वारा किए गए काम हैं, जिनके बारे में ये चुनाव फैसला करेगा कि वो काम शहरों में रहने वाले लोगों के लिए किए गए या गांवों में रहने वाले लोगों के लिए किए गए.

यह चुनाव ये भी फैसला करेगा कि गांवों में किए गए कामों को उत्तर प्रदेश का ग्रामीण क्षेत्र कितना अपना मानता है या स्वभाविक रूप से किए गए विकास को एक विलक्षण विकास मानता है. जब अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने, तो देश में एक आशा बंधी थी कि एक नौजवान मुख्यमंत्री जिस तरह से काम करेगा उसी प्रकार की छवि देश में नौजवानों की बनेगी. दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी के पास न नौजवान मुख्यमंत्री है, न नौजवान पार्टी अध्यक्ष है न किसी प्रदेश में कोई नौजवन मुख्यमंत्री का चेहरा है, दूसरी तरफ अखिलेश यादव का नौजवान चेहरा है.

अगर अखिलेश यादव इस चुनाव में सरकार नहीं बना पाते हैं, तो ये सिर्फ अखिलेश यादव के लिए ही घातक नहीं होगा, देश के नौजवानों को सर्वोच्च पद देने के सिद्धांत पर भी सवालिया निशान खड़ा हो जाएगा, क्योंकि प्रदेश, प्रदेश की समस्याएं, प्रदेश का विकास दूसरे शब्दों में देश की समस्याएं, देश का विकास क्या नौजवान को सौंपा जा सकता है या नहीं सौंपा जा सकता है, इस सिद्धांत के ऊपर नई बहसें शुरू हो जाएंगी.

बसपा के सकारात्मक पहलू

मायावती की बात करें, तो सबसे पहले संभावित उम्मीदवारों को टिकट देने के अलावा उनकी पार्टी में विद्रोह न होना भी उनके पक्ष में जाता है. उनकी पार्टी से दो ब़डे नेता निकले, स्वामी प्रसाद मौर्य और आर के चौधरी. स्वामी प्रसाद मौर्य को भारतीय जनता पार्टी ने 30 टिकटों का आश्वासन दिया था, लेकिन उन्हें 3 पर समेट दिया.

दूसरी तरफ आरके चौधरी को टिकट दी गई, लेकिन इससे मायावती के समर्थकों में कोई विद्रोह हुआ हो, कोई चर्चा हुई हो, कोई गुस्सा हुआ हो, ऐसा नहीं दिखाई नहीं दिया. इतना ही नहीं, मायावती ने जिन्हें टिकट दी, उनके प्रतिद्वंदी भी उनके खिलाफ कोई माहौल नहीं बना पाए. मायावती का दूसरा व्यक्तित्व का एक पहलू है कि पिछले पूरे पांच साल उन्होंने लखनऊ और दिल्ली में रहकर ख़ामोशी से गुज़ार दिए.

उन्होंने अखिलेश यादव की सरकार के खिलाफ न ज्यादा वक्तव्य दिया, न कोई आन्दोलन किया, न उनकी कमियों को उजागर किया. यदा-कदा वह कभी बोल देती थीं, पर वो कैंपेन की शक्ल में नहीं होता था. अब जब चुनाव नज़दीक आए हैं, तो मायावती ने अपने सधे हुए अंदाज़ में न केवल मुस्लिम समाज को ज्यादा सीटें दीं, बल्कि उन्होंने मुस्लिम समाज को एड़ेस करना भी शुरू किया और कहा कि अगर मुसलमान बसपा का समर्थन करते हैं, तो निश्चित रूप से भारतीय जनता पार्टी को उत्तर प्रदेश में हराया जा सकता है. उनके कैंपेन की ये लाइनें मुसलमानों को उनकी तरफ खींच रही हैं.

मुस्लिम समाज आख़िर में किसे वोट देगा, कहा नहीं जा सकता, क्योंकि सपा और कांग्रेस का या अखिलेश और प्रियंका गांधी का गठबंधन मुसलमानों को एकतरफा फैसला लेने में शायद थोड़ी परेशानी पैदा करेगा. लेकिन उत्तर प्रदेश चुनावों में जाने-अनजाने मुस्लिम समाज बहुत बड़ा फैक्टर बन गया है, इसलिए अगर मुस्लिम समाज बीएसपी के साथ जाता है, जिसे साथ आने का खुला आमंत्रण मायावती ने दिया है, तो उत्तर प्रदेश चुनाव का फैसला अखिलेश और भारतीय जनता पार्टी की इच्छाओं के विपरीत भी हो सकता है.

कांग्रेस की उम्मीद प्रियंका गांधी

कांग्रेस उत्तर प्रदेश में सबसे ख़राब हालत में है. कांग्रेस की पूरी रणनीति राहुल गांधी के दिशा-निर्देश में चली और पिछले पूरे पांच साल कांग्रेस ने अखिलेश यादव की सरकार का विरोध किया. राहुल गांधी की उत्तर प्रदेश में जितनी यात्राएं हुईं, उनमें अखिलेश विरोध प्रमुख था और उनकी खाट यात्राओं में भी अखिलेश यादव का विरोध था.

हालांकि एक जगह उन्होंने अखिलेश यादव की तारी़फ भी की, शायद उस समय उन्हें लगा होगा कि मैं सार्वजनिक रूप से तारीफ कर अखिलेश के साथ गठबंधन कर सकता हूं. राहुल गांधी को ये समझाया गया कि अगर वो अखिलेश यादव के साथ गठबंधन करते हैं, तो मुसलमान मायावती के साथ नहीं जाएगा. फिर अखिलेश यादव और कांग्रेस मिलकर उत्तर प्रदेश की 300 सीटों पर क़ब्ज़ा कर लेंगे.

जिसकी कई बार घोषणा स्वयं अखिलेश यादव ने की. कांग्रेस का नुक़सान ये हुआ कि पांच साल तक वह जिस रणनीति पर चल रही थी, उसके अनुसार कांग्रेस के 400 उम्मीदवार विधानसभा के लिए खड़े होते और पार्टी का जनाधार बढ़ाते. शुरू में कांग्रेस के रणनीतिक सलाहकार प्रशांत किशोर ने भी यही लाइन ली थी और उन्होंने राहुल गांधी की रैली भी यही कहकर करवाई थी कि जो उम्मीदवार जितने ज्यादा लोगों को राहुल गांधी की रैली में लाएंगे, वो उनका आंकलन करवाएंगे, उनके समर्थकों की संख्या गिनवाएंगे और उसके हिसाब से टिकट का फैसला करेंगे. पहली बार राहुल गांधी की बड़ी रैली लखनऊ में हुई, जिसमें टिकट के

दावेदार 400 चुनाव क्षेत्रों से बसें भर-भर लोगों को ले लाए. लेकिन जैसे ही ये घोषणा हुई कि अब अखिलेश यादव के साथ कांग्रेस का गठबंधन होगा, कांग्रेस के वे कार्यकर्ता निराश हो गए और घर पर बैठ गए, जो चुनाव लड़ने के लिए अपना जी-जान लगा रहे थे, अपना पैसा लगा रहे थे. अब देखना ये है कि जो 105 सीटें कांग्रेस को मिली हैं, उनमें से कांग्रेस कितनी सीटें जीतती है.

दिल्ली की भूतपूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का आंकलन है कि कांग्रेस को 70 सीटें जीतनी चाहिए. जबकि निस्पक्ष विवेचकों का मानना है कि कांग्रेस अगर 45 और 50 सीटें जीत जाए तो उसके खाते में बहुत होगा. लेकिन एक तीसरा पक्ष भी है, जो ये मानता है कि कांग्रेस और अखिलेश यादव के गठबंधन से कांग्रेस को ज्यादा फायदा होगा, अखिलेश यादव की सीटें घटेंगी.

इसका अभी कोई तर्क नहीं है, लेकिन तर्क ये है कि गांवों में जो अतंर्विरोध हैं और जो भावना अखिलेश यादव के हाल के क्रियाकलापों के ऊपर लोगों में बनी है, अगर वो अगले 15 दिनों में समाप्त नहीं हुई, तो लोगों का ये सोचना सही साबित हो जाएगा कि कांग्रेस तो इस गठबंधन से फायदा उठा जाएगी, लेकिन अखिलेश को इससे नुक़सान होगा. इस तरह का एक उदाहरण पश्चिम बंगाल के रूप में हमारे सामने है, जहां कांग्रेस के सीटों की संख्या बढ़ गई और उनके सहयोगी वामपंथियों के सीटों की संख्या कम हो गई, जबकि कांग्रेस का कोई जनाधार पश्चिम बंगाल में नहीं था.

कांग्रेस ने एक बड़ा काम प्रियंका गांधी को चुनाव मैदान में उतारकर किया है. उनके कैंपेन की योजना डिंपल यादव के साथ बन रही है और उत्तर प्रदेश में कम से कम 6 या 8 सभाएं दोनों मिलकर करेंगी. प्रियंका गांधी का अपना अंदाज़ है और वो लोगों के साथ अपने को कनेक्ट कर लेती हैं. लोग भी उनकी सभाओं में अपनी उपस्थिति दर्ज कराएंगे. प्रियंका गांधी के चुनाव प्रचार में उतरने के बाद जो नौजवान कांग्रेस के साथ खड़े होंगे, वे अखिलेश के समर्थक नौजवानों के साथ मिलकर वोटों के ऊपर खासा असर डालेंगे.

कांग्रेस के भीतर उत्तर प्रदेश के चुनावों में दिल्ली की गद्दी का भी एक अंडर करेंट दिखाई देगा कि उत्तर प्रदेश के चुनावों के बाद राहुल गांधी कांग्रेस का चेहरा बनेंगे या प्रियंका गांधी. मेरा मानना है कि अगर शीला दीक्षित का आंकलन सही होता है, तो प्रियंका गांधी दिल्ली का चेहरा बनेंगी और अगर स्वतंत्र समीक्षकों का अंदाजा सही साबित होता है कि कांग्रेस 45-50 सीटों पर रह जाएगी, तो राहुल गांधी ही दिल्ली के लिए कांग्रेस का चेहरा बनेंगे. कांग्रेस ने प्रियंका गांधी को यूपी के चुनावों में उतारकर एक बड़ा जुआ खेला है. कांग्रेस के लोग विश्वास कर रहे हैं कि वो इस बाज़ी को ज़रूर जीतेंगे.

भाजपा के पास संसाधन है, चेहरा नहीं

भारतीय जनता पार्टी के पास धन है, संगठन है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे समझदार और ख़तरनाक लोगों का समूह है, जो हर पोलिंग बूथ पर ख़डे हो सकते हैं, शहरों और गांवों में हवा बना सकते है. लेकिन भारतीय जनता पार्टी के पास मुख्यमंत्री पद का कोई चेहरा नहीं है.

भारतीय जनता पार्टी के भीतर एक ब़डी चर्चा है कि रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में भाजपा को फायदा पहुंचा सकते हैं. दूसरा नाम केंद्रीय पर्यटन मंत्री महेश शर्मा का है. मुख्यमंत्री पद की दौ़ड में तीसरा नाम राजनाथ सिंह का है, जो स्वयं मुख्यमंत्री नहीं बनना चाहते. लेकिन सांसद योगी आदित्यनाथ, जो मुख्यमंत्री बनना चाहते है, उन्हें भाजपा मुख्यमंत्री उम्मीदवार के रूप में पेश नहीं करना चाहती.

अगर भाजपा आदित्यनाथ को चुनाव के कैंपेन से दूर रखती है, या उनसे कहती है कि वे बाद में मुख्यमंत्री बन सकते हैं, तो योगी आदित्यनाथ की हिंदु रक्षा वाहिनी, जो पूर्वांचल के 20-22 जिलों में सबसे सशक्त संगठन है, वह भाजपा का उस तरह से साथ नहीं देगा, जिस तरह से 2014 के लोक सभा चुनाव में दिया था. अगर यह संगठन भारतीय जनता पार्टी का समर्थन नहीं करता है, तब चुनाव को लेकर भाजपा की संभावनाएं थो़डी सी कमजोर हो जाती है. भारतीय जनता पार्टी ने हर चुनाव क्षेत्र के लिए 6 मोटरसाइकिल, 12 पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं के हिसाब से दिए हैं, ताकि गांव-गांव पहुंच कर भाजपा का प्रचार किया जाए.

कुल मिलाकर ये 2400 के करीब मोटरसाइकिलें होती हैं और अगर वेतन समेत उनके कार्यकर्ताओं का खर्च जो़ड लिया जाए, तो यह एक बहुत ब़डा खर्च हो जाता है. इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी अकेली ऐसी पार्टी है, जिसने हर चुनाव क्षेत्र में 6 मोटरसाइकिलें और लगभग 800 छोटे रथ प्रचार के लिए भेजे हुए है. भारतीय जनता पार्टी ने एक बार फिर राम मंदिर बनाने की बात का प्रचार करने के लिए टोलियों का गठन किया है. भाजपा बिल्कुल इस दुविधा में नहीं है कि उसे मुसलमानों का वोट मिलेगा या नहीं मिलेगा.

उसका मानना है कि उसे मुसलमानों का वोट नहीं मिलेगा. इसलिए वह अब इस चुनाव को मंदिर बनाम मस्जिद में बदलना चाहती है. इसमें संघ उसका साथ देगा. लेकिन जिस तरह से भाजपा ने विधान सभा चुनाव में हर उस व्यक्ति को टिकट दिया है, जो दूसरी पार्टी छो़ड के आया है, चाहे वो समाजवादी पार्टी हो, बसपा हो या फिर कांग्रेस हो, उससे लगता है कि संघ की पक़ड अब भारतीय जनता पार्टी के ऊपर नहीं रही और भाजपा विशुद्ध रूप से कांग्रेस की रणनीति के ऊपर चुनाव ल़डना और जीतना चाहती है.

भारतीय जनता पार्टी की कमजोरी के कई उदाहरण सामने आए हैं. पहला उदाहरण आर के चौधरी का है, जो बसपा से निकले, भारतीय जनता पार्टी में शामिल भी नहीं हुए, एनडीए का सदस्य भी नहीं बने, लेकिन उन्हें भाजपा ने टिकट दे दिया. उन्हें इसलिए टिकट दिया गया क्योंकि भाजपा को लगा कि सांसद कौशल किशोर पासियों के नेता हैं, उनका मुकाबला करने के लिए या उनसे बचे हुए पासियों को अपनी तरफ लाने के लिए आर के चौधरी की जरूरत है.

हालांकि, आर के चौधरी और कौशल किशोर की आपस में नहीं बनती है, लेकिन जहां एक तरफ कौशल किशोर की पत्नी को विधानसभा चुनाव का टिकट दिया गया, वहीं आर के चौधरी को बिना पार्टी में शामिल किए विधानसभा का टिकट दे दिया गया. ये बताता है कि भारतीय जनता पार्टी चुनाव क्षेत्र में अपने को कहीं कमजोर पा रही है. नारायण दत्त तिवारी का समर्थन भारतीय जनता पार्टी ने पहा़ड के ब्राह्मणों का समर्थन अपनी तरफ करने के लिए लिया. नारायण दत्त तिवारी भी अपने पुत्र के लिए अमित शाह के घर पहुंच गए.

उन्होंने यह बता भी दिया कि अब सिद्धांत की राजनीति नहीं, सत्ता की राजनीति ही चलने वाली है. शायद इसीलिए, जितनी पार्टियां उत्तर प्रदेश में चुनाव ल़ड रही हैं, वो एक ही सिद्धांत को मुख्य मान रही हैं और वो है सत्ता, किसी भी तरह सत्ता हासिल करना. जब किसी भी तरह सत्ता की बात आ जाय, फिर वो गरीबों के लिए नहीं होती है, वो ठेकेदारों के लिए होती है, पार्टी के लोगों के लिए होती है, ब्यूरोक्रेट्‌स के लिए होती है और अपने रिश्तेदारों के लिए होती है.

मुसलमान क्या करेंगे

अखिलेश यादव और कांग्रेस के बीच गठबंधन पर 15-20 दिनों तक चली बहस ने मुश्किलें ख़डी कर दी है और मुश्किल पश्चिमी उत्तर प्रदेश की है. यहां पर मुसलमानों ने बैठक कर के यह तय किया था, यद्यपि जाटों ने मुजफ़्फरनगर में उनके समाज के साथ अन्याय किया है, लेकिन वे जाटों के इस अन्याय को भूल कर, भारतीय जनता पार्टी के ब़डे खतरे को देखते हुए इस गठबंधन के पक्ष में वोट करेंगे. यानी जाट और मुसलमान एक साथ मिल कर अखिलेश यादव और प्रियंका गांधी के लिए वोट करते.

लेकिन, अखिलेश यादव ने राष्ट्रीय लोकदल यानी अजित सिंह के साथ जिस तरीके से गठबंधन न होने देने की रणनीति बनाई वो जाटों को अपमानित कर गई. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पहले समाजवादी पार्टी के साथ राष्ट्रीय लोक दल के गठबंधन की बातचीत चली. बाद में समाजवादी पार्टी ने कहा कि अगर गठबंधन करना है, तो कांग्रेस अपनी सीटों में से राष्ट्रीय लोक दल को सीटें दे.

यह कहने के साथ ही सपा ने उन प्रमुख सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दिए, जहां से अजित सिंह के अपने लोग ख़डे होते और जो अजित सिंह का घर था, जैसे छपरौली, बागपत. इसने अजित सिंह को ही नहीं बल्कि जाट बिरादरी को भी अपमानित किया. अखिलेश यादव के लिए अजित सिंह का साथ न होना, इस चुनाव में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बहुत परेशानी पैदा कर सकता है. अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मायावती और मुस्लिम गठबंधन, भारतीय जनता पार्टी के गठबंधन के सामने सीना तान कर खडा है.

नीतीश कुमार ने उत्तर प्रदेश में 8 सफल सभाएं की और उत्तर प्रदेश के उन लोगों को, जो भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस या कहीं पर मायावती और समाजवादी पार्टी से भी अलग थे, उन्हें एक आशा की किरण दी कि नीतीश कुमार के बहाने उन्हें चुनाव में कोई रोल प्ले करने का मौका मिल जाएगा. उत्तर प्रदेश में कुर्मी समाज है, जो आज तक कभी सत्ता में नहीं रहा, उसने नीतीश कुमार के साथ मजबूती से ख़डे हो कर यह बता दिया कि अगर नीतीश कुमार अपने उम्मीदवार ख़डे करते हैं, या वे किसी गठबंधन में जाते हैं, तो यह समाज नीतीश कुमार के साथ उस गठबंधन को जिताने में बहुत सहायक साबित होगा.

लेकिन, नीतीश कुमार को न मायावती ने पूछा, न अखिलेश यादव ने. नीतीश कुमार तक, उनके दिल्ली के मित्रों के जरिए ये खबर पहुंचाई गई, कि अगर वे दो सीटों पर चुनाव ल़डना चाहते हैं, तो समाजवादी पार्टी उन्हें गठबंधन में लेने को तैयार है. यह प्रोफेसर रामगोपाल यादव का मास्टर स्ट्रोक था कि जब इन्होंने बिहार में हमें पांच सीटें प्रस्तावित की थी, तो हम इन्हें दो सीट अपनी तरफ से प्रस्तावित करें. नीतीश कुमार 20 से 25 सीटों पर काफी असरकारी साबित हो सकते थे, लेकिन अंत में उन्होंने फैसला किया कि वे उत्तर प्रदेश में चुनाव नहीं ल़डेंगे, क्योंकि इससे सेकुलर वोटों का बंटवारा हो सकता है. नीतीश कुमार के चुनाव न ल़डने से भारतीय जनता पार्टी मजबूत हुई है.

कुर्मी समाज शुरू से भारतीय जनता पार्टी के साथ रहा है. अब, अगर नीतीश कुमार चुनाव नहीं ल़डेंगे, तो पूरा का पूरा कुर्मी समाज भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में जाएगा और वो अखिलेश यादव और मायावती के लिए नुक़सानदेह साबित हो सकता है. कुल मिला कर उत्तर प्रदेश के चुनाव में नीतीश कुमार का और लालू यादव का कोई रोल नहीं है. लालू यादव पहले ही चुनाव न ल़डने की घोषणा कर चुके हैं और अब नीतीश कुमार ने लालू यादव के उस वक्तव्य का सहारा ले कर कहा है कि हम लालू यादव की सलाह पर सेकुलर वोटों को न बंटने देने के लिए चुनाव नहीं ल़डेंगे.

मोटे तौर पर हम कह सकते है कि उत्तर प्रदेश चुनाव में ये किसी के भी पक्ष में जाने वाले अंतर्विरोध हैं. लेकिन, अगर हम इन्हें ध्यान से देखें, तो ये अंतर्विरोध सबसे ज्यादा भारतीय जनता पार्टी को नुक़सान पहुंचाएंगे, फिर अखिलेश यादव को नुक़सान पहुंचाएंगे और फिर मायावती को नुक़सान पहुंचाएंगे. लेकिन इनका सबसे ज्यादा फायदा मिलेगा कांग्रेस को. अब, इस स्थिति में किसके पक्ष में उत्तर प्रदेश की बाजी आती है, वो फैसला आने के बाद ही तय होगा. लेकिन, लगता ये है कि जिन दो पक्षों के बीच में मुख्य ल़डाई होगी, उनमें एक पक्ष मायावती जी का है. दूसरे पक्ष में भारतीय जनता पार्टी आती है या अखिलेश यादव आते हैं, ये चुनाव का आखिरी सप्ताह बताएगा.

सबसे आखिर में, उत्तर प्रदेश का मुस्लिम समाज

पशोपेश में है. मुस्लिम समाज के लिए भारतीय जनता पार्टी ने कोई वादा नहीं किया है. मुस्लिम समाज के लिए पिछले 5 साल में उत्तर प्रदेश की सरकार ने भी कोई बहुत ज्यादा काम नहीं किया है. अभी का चुनावी घोषणा पत्र भी उत्तर प्रदेश के मुसलमानों के पक्ष में कोई ठोस बात नहीं कर रहा. 90 प्रतिशत वही वादे दुहराए गए हैं, जो 2012 के चुनाव में किए गए थे. दो नए वादे किए गए हैं, एक तो बनारस में हज हाउस बनाने की बात समाजवादी पार्टी के घोषणा पत्र में है.

लेकिन, मुसलमानों के लिए मायावती ने भी कोई खास घोषणा नहीं की है. मायावती ने बस एक काम किया है कि उन्होंने मुसलमानों को सबसे ज्यादा टिकटें दी हैं और उनसे ये अपील की है कि अगर वो बसपा का साथ देंगे, तब भारतीय जनता पार्टी को रोका जा सकता है. मायावती, मुसलमानों के इस कमजोर नस को जानती हैं कि उन्हें जो भी उम्मीदवार भारतीय जनता पार्टी को हराता हुआ दिखाई देगा, मुसलमान उसी उम्मीदवार के पक्ष में वोट डालेंगे. इसी भावना को अपने पक्ष में मो़डने का काम मायावती कर रही हैं.

त्रिशंकु विधानसभा बनी तो क्या होगा

क्या होगा, अगर उत्तर प्रदेश में हंग असेंबली (त्रिशंकु विधान सभा) की स्थिति बनती हैै. इस स्थिति में एक तरफ भारतीय जनता पार्टी अखिलेश यादव के साथ मिल कर सरकार बना सकती है और दूसरी तरफ वो मायावती के साथ मिल कर भी सरकार बना सकती है. उस समय भारतीय जनता पार्टी देखेगी कि दोनों में से कौन उसके पक्ष में शर्तें मानने के मूड में है. अभी तक उत्तर प्रदेश के किसी राजनीतिक दल का कोई वैचारिक संघर्ष नहीं दिखाई दे रहा है.

अगर कहीं दिखाई दे रहा है, तो कुछ भारतीय जनता पार्टी का दिखाई दे रहा है, क्योंकि भारतीय जनता पार्टी से जु़डे राष्ट्रीय स्वयं सेवक के मनमोहन वैद्य ने बहुत सोच समझ कर बयान दिया है कि आरक्षण भेद-भाव को ब़ढाता है और वो आरक्षण नहीं चाहते हैं. यह बयान बेख्याली में दिया हुआ नहीं है.

यह बयान राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी की उस सोच को बताता है, जिसमें कॉमन सिविल कोड है, आर्टिकल 370 की समाप्ति है और मुसलमानों को अपीज (तुष्ट) न किया जाए यह भी शामिल है. उन्हें लगता है कि उत्तर प्रदेश में वे हर हालत में चुनाव जीत सकते हैं, क्योंकि यहां हिंदूओं की संख्या ज्यादा है. अगर वे चुनाव जीतते हैं, तो बचे हुए दो साल में वे अपने विचार के अनुसार सारे देश में अपने फैसलों को लागू कर सकते हैं. शायद, इसीलिए अखिलेश यादव ने कहा कि उत्तर प्रदेश का चुनाव दरअसल 2019 का दिल्ली का चुनाव है.

उनके इस वाक्य का विरोध न मायावती जी ने किया है, न कांग्रेस ने किया है और न भारतीय जनता पार्टी ने किया है. देखते हैं, ये चुनाव किनके चेहरे पर मुखौटे लगाता है, किनके चेहरे के मुखौटे उतारता है. ये जनता का भी इम्तिहान है कि वो किनके तर्कों से प्रभावित होती है, किनके तर्कों से प्रभावित नहीं होती है. लेकिन, हम अखिलेश यादव की इस बात से पूरी तरह से सहमत हैं कि उत्तर प्रदेश का चुनाव 2019 के लिए दिल्ली के रास्ते की दिशा और शर्तें तय करेगा.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.
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संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.