सदन में ये सब कुछ तो फिर बचा क्या है

sadanहाल में बिहार विधान परिषद में लत्तम-जुत्तम की जो घटना हुई, उसकी मिसाल शायद ही देश के किसी सदन में देखने-सुनने को मिले. इस घटना में भाजपा के विधायक ने ही अपने ही दल के दूसरे विधायक के गिरेबां को पकड़ा और लात-घूसों की बौछार कर दी. इसकी जो वजह सामने आई है, वह अपने आप में इतनी शर्मनाक थी कि इस पर सदन का कोई भी सदस्य कुछ बोलने को तैयार नहीं था. दरअसल यह मामला विधान परिषद की महिला सदस्य को गलत तरीके से छूने का था. जिन विधान पार्षद ने महिला विधान पार्षद को कथित तौर पर गलत तरीके से छुआ था, वह लोजपा की सदस्य हैं-नूतन सिंह.

जबकि उनके साथ छेड़खानी करने वाले विधान पार्षद हैं लाल बाबू प्रसाद. नूतन सिंह के पति नीरज कुमार बबलू खुद भी भाजपा के विधायक हैं, पर वे विधान सभा के सदस्य हैं. नूतन ने गलत तरीके से छुए जाने की सूचना फोन कर अपने पति नीरज को दी. खबर मिलते ही वे विधान परिषद में आ धमके. गुस्से में तमतमाए नीरज ने आते ही लाल बाबू सिंह पर पहले गालियों की बौछार की, फिर कॉलर पकड़ा और उसके बात लात-घूसों की बौछार कर दी. हालांकि कथित रूप से गलत तरीके से छुए जाने की घटना की जानकारी नूतन और लालबाबू प्रसाद के अलावा किसी को नहीं है. पर नूतन का आरोप है कि लाल बाबू ने पहले भी उनके साथ ऐसी हरकत की थी.

बहरहाल नूतन सिंह के साथ छेड़खानी और उसके बाद उनकी लात-घूसों से हुई पिटाई के बाद का घटनाक्रम यह है कि सभापति ने लालू बाबू सिंह को एक दिन के लिए सदन से निलंबित कर दिया और भाजपा ने उन्हें पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निलंबित कर दिया. इन घटनाक्रमों के दौरान जो महत्वपूर्ण बात सामने आई, उसकी चर्चा इसलिए जरूरी है क्योंकि इस मामले में राजद ने सबसे ज्यादा मीडिया को निशाने पर लिया. राजद ने ट्विट कर कहा कि भाजपाई मानसिकता के पत्रकारों और मीडिया को भाजपा नेताओं की ऐसी ओछी हरकतें नहीं दिखती हैं. मीडिया इस घटना को दबाने में लगा रहा.

इतना ही नहीं लालू प्रसाद और तेजस्वी यादव ने भी ऐसे ही आरोप मीडिया पर लगाए. बात भी सही है कि मुख्यधारा के मीडिया ने इस मामले पर पहले तवज्जो नहीं दी. लेकिन शाम होते-होते राजद के कद्दावर नेताओं ने सोशल मीडिया पर भाजपा के खिलाफ अभियान छेड़ दिया. तेजस्वी यादव मीडिया की चुप्पी पर खासे उद्वेलित दिखे और उन्होंने ट्विट किया- क्या आज पत्रकारों की कलम की स्याही सूख गई है या पत्रकारिता की आत्मा ने मीडिया के शरीर को त्याग दिया है क्योंकि यह भाजपा के माननीय का मसला है.

उधर विरोधी दल के नेता सुशील मोदी व भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष नित्यानंद राय ने भी काफी देर तक इस मामले में चुप्पी साधे रखी. सोशल मीडिया पर मचे कोहराम के बाद यह खबर जब मुख्यधारा के मीडिया में आने लगी तो भाजपा के ऊपर भारी नैतिक दबाव बन गया. फिर दूसरे दिन भाजपा ने लालू बाबू के खिलाफ कार्रवाई करते हुए उन्हें निलंबित किया.

यहां ध्यान देने की बात है कि भाजपा के नेता ऐसे मामले में तब फंसे हैं, जब हाल में उत्तर प्रदेश चुनाव के दौरान खुद उसने एक महिला के साथ कथित बलात्कार के मुद्दे को चुनावी मुद्दा बनाया था. उस मामले में समाजवादी पार्टी के पूर्व विधायक और प्रत्याशी गायत्री प्रजापति पर बलात्कार का केस दर्ज था. इस मामले में अदालत ने उन्हें गिरफ्तार करने का आदेश दिया था.

लेकिन उन्हें यूपी पुलिस गिरफ्तार तब तक नहीं कर पाई थी, जब तक कि वहां भाजपा ने सत्ता नहीं संभाल ली. लेकिन भाजपा की जीत और सत्ता संभालने के बाद दो प्रमुख घटनाएं सामने आईं. इन में पहला मामला था दयाशंकर सिंह के निलंबन को रद्द करते हुए उन्हें पार्टी में शामिल करना और दूसरा बलात्कार के आरोपी गायत्री प्रजापति को गिरफ्तार कर लिया जाना.

यूपी भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष रहे दयाशंकर सिंह के बारे में यह याद दिलाना समीचीन होगा कि उन्होंने यूपी चुनाव से पहले बसपा प्रमुख मायावती के लिए ‘वेश्या’ जैसे शब्द का इस्तेमाल किया था. इसके बाद बसपा ने प्रदेश भर में कोहराम मचा दिया. तब मजबूर होकर पार्टी ने उन्हें छह साल के लिए निलंबित कर दिया था. लेकिन जैसे ही भाजपा सत्ता में आई उसके दूसरे ही दिन दयाशंकर सिंह का निलंबन खत्म करते हुए उन्हें पार्टी में वापस ले लिया गया. भाजपा के इस फैसले को मौकापरस्ती की पराकाष्ठा के रूप में देखा गया.

उस पर आरोप लगे कि चुनाव खत्म हो जाने के बाद दयाशंकर का निलंबन जनता के साथ धोखा है. यूपी में हुए इन दो घटनाक्रमों को बिहार में राष्ट्रीय जनता दल ने भाजपा द्वारा महिला सम्मान के मामले में सेलेक्टिव अप्रोच के रूप में देखा. और जैसे ही बिहार विधान परिषद में छेड़खानी की घटना सामने आयी तो वह पूरी तरह से हमलावर हो गया. एक तरफ जहां उसने भाजपा की खोखली नैतिकतावादी राजनीति को आड़े हाथों लिया तो दूसरी तरफ इस मामले में मीडिया की चुप्पी पर भी निशाना साधा.

हालांकि छेड़छाड़ के इस मामले में भाजपा के विधान पार्षद लाल बाबू प्रसाद ने कहा कि यह बात बिलकुल गलत है. महज इतनी प्रतिक्रिया कि उनके 35 वर्ष के अपने राजनीतिक जीवन में ऐसे आरोप कभी नहीं लगे. उनके लिए राजनीति हमेशा सेवा का काम रहा है. दूसरी तरफ प्रताड़ित महिला विधायक नूतन सिंह इस मामले के उजागर होने के बाद सार्वजनिक बयान से बचती रही हैं. हां इस मामले में उन्होंने विधान परिषद के सभापति को लिखित शिकायत जरूर दी है. उसके बाद इस मामले में सभापति ने कार्रवाई करते हुए विधान पार्षद लाल बाबू प्रसाद को एक दिन के लिए निलंबित कर दिया.

इस घटनाक्रम पर पक्ष-विपक्ष के आरोप-प्रत्यारोप अपनी जगह हैं. इस मामले में राजनीति भी अपनी जगह है, लेकिन एक बड़ा सवाल जनप्रतिनिधियों के आचरण को लेकर है जो आम जनता के मन-मस्तिष्क में बैठा है. कहने को तो विरले ही कोई राजनीतिक दल का नेता इन आरोपों में न घिरा हो पर ऐसी घटनाएं अगर सदन के अंदर प्रकाश में आएं, तो स्वाभाविक तौर पर जनता में, जनप्रतिनिधियों के प्रति गलत संदेश जाता है. वहीं दूसरी तरफ जब राजनीतिक दल ऐसे मामले में सेलेक्टिव अप्रोच अपनाएं, तो यह और भी चिंता की बात हो जाती है.

नूतन सिंह के साथ हुई घटना के बाद एक महत्वपूर्ण मामला यह देखा गया कि दूसरे दिन जब सदन की कार्रवाई शुरू हुई तो महिला सम्मान और अधिकार के लिए जो सबसे पहली आवाज उठी, वह खुद एक महिला सदस्य द्वारा उठाई गई. जद यू की विधान पार्षद रीना यादव ने सभापति के समक्ष यह मामला उठाया और इसके समर्थन में खुद राबड़ी देवी भी खड़ी हो गईं. इस मुद्दे को उठाये जाने के बाद सभापति ने आश्वासन दिया कि वह अपने कार्यकाल को किसी भी कीमत पर कलंकित नहीं होने देंगे. इसके बाद ही लाल बाबू प्रसाद को सदन से एक दिन के लिए निलंबित कर दिया गया.

उधर यह घटना ऐसे समय सामने आई, जब बिहार भाजपा अध्यक्ष के नेतृत्व में नयी कार्यसमिति के गठन का काम चल रहा है. लाल बाबू प्रसाद को प्रदेश उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, लेकिन जैसे ही यह मामला सामने आया, न सिर्फ उन्हें प्रदेश उपाध्यक्ष के पद पर चयन के फैसले को बदल दिया गया, बल्कि पार्टी से भी निलंबित कर दिया गया. लेकिन उत्तर प्रदेश में दयाशंकर सिंह के उदाहरण को देखते हुए एक प्रश्न तो जरूर उठ रहा है कि मामला शांत हो जाने के बाद कहीं उन्हें फिर से पार्टी में शामिल कर सम्मानजनक पद तो नहीं सौप दिया जाएगा.

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