कालिदाससंस्थानम्‌ – संस्कृत को भारत की राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया जाना चाहिए : जोशी

sanskritकालिदाससंस्थान्‌म वाराणसी के अध्यक्ष प्रो. रेवा प्रसाद द्विवेदी तथा प्रो. सदाशिव कुमार द्विवेदी द्वारा सम्पादित ‘अलंकारशास्त्रागम्‌’ नामक महत्वपूर्ण ग्रन्थ का लोकार्पण पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री पद्मविभूषण प्रो. मुरली मनोहर जोशी द्वारा किया गया. कार्यक्रम की अध्यक्षता काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. गिरीश चन्द्र त्रिपाठी ने की तथा इसमें प्रसिद्ध उद्योगपति पूर्व सांसद श्री कमल मोरारका तथा सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. यदुनाथ प्रसाद दुबे उपस्थित रहे.

प्रो. जोशी ने कहा कि संस्कृत भाषा हमारे देश की सर्वोत्तम सम्पत्ति है. देश के प्रत्येक नागरिक को इसे अवश्य ही पढ़ना चाहिए. संस्कृत में जीवन के नियामक सफल उपदेश ही नहीं हैं, अपितु इसमें सम्पूर्ण विश्व का ज्ञान-विज्ञान भी सन्नहित है. काशी हिन्दू विश्वविद्यालय संस्कृत के अध्ययन-अध्यापन का अभूतपूर्व केन्द्र है. इसमें अध्यापनरत प्रध्यापकों की जिम्मेदारी बनती है कि वे संस्कृत के वर्तमान पाठ्‌यक्रम को और अधिक व्यावहारिक बनाएं, जिससे कि इसमें निहित ज्ञानराशि का जन-जन तक प्रसार हो सके. संस्कृत को भारत की राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया जाना चाहिए तथा इसका अध्ययन-अध्यापन प्रत्येक भारतवासी के लिए अनिवार्य किया जाना चाहिए.

श्री कमल मोरारका ने संस्कृत के समुन्नयन के लिए हर संभव सहायता प्रदान करने के अपने संकल्प को उजागर किया. श्री एमआर मोरारका फाउण्डेशन मुम्बई द्वारा प्रदत्त आर्थिक अनुदान से साहित्यशास्त्रसमुच्चय ग्रन्थमाला के अन्तर्गत कालिदास संस्थान द्वारा इस ग्रन्थमाला के सात भागों को प्रकाशित किया जा चुका है, जिनमें 22 से भी अधिक साहित्यशास्त्र के आचार्यों के ग्रन्थ सम्पादित हैं. सातवां भाग है ‘अलंकारशास्त्रागम’. अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. गिरीश चन्द्र त्रिपाठी ने कहा कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में संस्कृत के समुन्नयन की अभूतपूर्व संभावना है. इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए विश्वविद्यालय के शताब्दी वर्ष में संस्कृत पर आधारित अन्तर्वेषयिक शोध हेतु भारत अध्ययन केन्द्र की स्थापना की गई है.

आचार्य रेवा प्रसाद द्विवेदी ने ग्रन्थ के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि अज्ञातनामा काव्यप्रभा टीका के साथ इस ग्रन्थ के प्रकाशन से सम्पूर्ण साहित्यशास्त्र की दिशा बदल गई है. अब तक साहित्यशास्त्र में ध्वनिवाद को सर्वोपरि माना जाता रहा, परन्तु अलंकारशास्त्रागम के प्रकाशन से यह तथ्य आधारहीन सिद्ध हो जाता है. अलंकारशास्त्रागम में साहित्यशास्त्र विषयक अनेक अभिनव सिद्धान्त उपस्थित हैं. जिन्हें प्रत्येक अध्येता को पढ़ना चाहिए. यह ग्रन्थ साहित्यशास्त्र के क्षेत्र में अभिनव क्रान्ति का प्रवर्तक है. समारोह में 100 से अधिक विभिन्न शास्त्रों के मूर्धन्य संस्कृत विद्वानों का श्री कमल मोरारका द्वारा सम्मान किया गया. कालिदास संस्थान ने साहित्यशास्त्रागम के सातों ग्रन्थ सभी विशिष्ट अतिथियों को प्रदानकर उन्हें सम्मानित किया.

समारोह में कृतज्ञता ज्ञापन संस्कृतविद्या धर्म विज्ञान संकाय के प्रमुख प्रो. चन्द्रमा पाण्डेय ने किया तथा संचालन कालिदास संस्थान के मानद सचिव प्रो. सदाशिव कुमार द्विवेदी ने किया. समारोह में चौथी दुनिया के प्रधान संपादक श्री संतोष भारतीय, आचार्य वशिष्ठ त्रिपाठी, प्रो. वागी शास्त्री, प्रो. कमलेश दत्त त्रिपाठी, प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय, प्रो. प्रद्योत कुमार मुखोपाध्याय इत्यादि काशी के मूर्धन्य विद्वान्‌ तथा गणमान्य नागरिक, छात्र एवं छात्राएं उपस्थित थे. समारोह का आयोजन संस्कृत विद्या धर्मविज्ञान संकाय के मुख्य सभागार में हुआ.

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