बासी वादों का बेनूर जश्न

benoorकांग्रेस ने ‘3 साल 30 तिकड़म’  नाम से एक वीडियो जारी कर सरकार पर तमाम मोर्चों पर नाकाम होने का आरोप लगाया है. ऐसे में सरकार के दावों की पड़ताल जरूरी है. इस रिपोर्ट कार्ड में जहां ऊर्जा और सड़क परिवहन मंत्रालयों की स्थिति कुछ बेहतर दिखती है, तो वहीं शिक्षा, स्वास्थ्य व रेल जैसे मंत्रालय रेंगते नजर आते हैं.
 
कब तक छंटेगा गांवों का अंधेरा 
मोदी सरकार ने आजादी के 70 साल बाद भी बिजली से महरूम रहे 18,452 गांवों को 2018 तक रौशन करने का वादा किया था. इससे पूर्व बिजली से वंचित इन गांवों को दिसंबर 2017 तक रौशन करने की योजना थी. अगर जमीनी स्तर पर देखें तो अक्टूबर 2016 तक 7500 गांवों तक रौशनी नहीं पहुंची थी, जबकि 6300 गांवों में बिजली के खंभे व तार लगाने के काम शुरू हो गए थे. ऐसे में यह उम्मीद करना बेमानी होगा कि एक साल में इन गांवों तक बिजली पहुंच जाएगी. ऊर्जा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि 60 प्रतिशत काम पूरा होने में ही करीब डेढ़ साल लग जाएंगे.
दिसंबर 2017 तक तो यह काम पूरा होना असंभव है. झारखंड, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, ओडीशा जैसे कई राज्य अपने गांवों को रौशन करने में विशेष रुचि नहीं दिखा रहे हैं. हालांकि ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल दावा कर रहे हैं कि 750 दिनों में बाकी बचे गांवों तक भी बिजली पहुंचा दी जाएगी. सरकारी वेबसाइट पर भी यह दावा किया जा रहा है कि देश के 99.3 प्रतिशत गांवों तक बिजली पहुंचा दी गई है. गोयल का यह भी कहना है कि बिजली किल्लत की जगह भारत अब बिजली आधिक्य वाला देश बन गया है. सरकारी दावे चाहे जो हों, लेकिन गांवों में बिजली पहुंचे और लोगों को समुचित बिजली की सप्लाई हो, इसमें अभी वर्षों लगेंगे.
हालांकि मोदी सरकार के 3 साल पूरे होने पर एक राहत भरी खबर आई है. भारत बिजली सुविधा के मामले में 2014 में विश्व बैंक की रैंकिंग में 99वें स्थान पर था, जो अब 2017 में 26वें स्थान पर आ गया है. गत दो साल में मौजूदा पारंपरिक बिजली क्षमता में 20 फीसदी वृद्धि हुई है और सौर बिजली क्षमता में 15 प्रतिशत वृद्धि हुई है.
सौर ऊर्जा में लक्ष्य से पीछे 
यूपीए सरकार ने 2020 तक देश की सौर ऊर्जा क्षमता 20 हजार मेगावाट करने का लक्ष्य तय किया था. मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही इसे एक लाख मेगावाट कर दिया. इसका मतलब यह है कि 100 गीगावाट के अपने लक्ष्य को पाने के लिए भारत को अगले सात साल तक हर साल 14 हजार मेगावाट सौर बिजली का उत्पादन करना होगा.
जबकि पिछले 5 साल में भारत ने स्थापित सौर ऊर्जा में सिर्फ 2000 मेगावाट का ही इजाफा किया है. सवाल यह है कि सरकार एक तरफ सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है, वहीं इस पर दी जा रही 30 प्रतिशत सब्सिडी को कम कर 15 प्रतिशत कर दिया गया है. इतना ही नहीं, जहां सरकार पहले सोलर ऊर्जा उत्पादकों को 8 से 9 रुपए प्रति वाट का रेट देती थी, जो अब गिरकर 3.50 या 4 रुपए तक रह गया है. सरकार के इस कदम से वैकल्पिक उर्जा के उपयोग को लेकर आम लोगों में निराशा है.
लक्ष्य से कोसों दूर है सड़क निर्माण
 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मई, 2014 को सत्ता संभालने के दौरान सड़क एवं परिवहन क्षेत्र में बड़ी चुनौतियां थीं. सरकार ने सड़क निर्माण में तेजी लाने के लिए 2016-2017 में 22 किलोमीटर प्रतिदिन राजमार्गों का निर्माण किया, जबकि लक्ष्य 30 किलोमीटर प्रतिदिन था. 2015-16 में यह 16 किलोमीटर प्रतिदिन था. वहीं यूपीए सरकार के दौरान 2014-15 में यह 12 किलोमीटर प्रतिदिन था. आंकड़ों से स्पष्ट है कि 2016-17 के दौरान राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण में कुछ तेजी आई, लेकिन सरकार सड़क निर्माण में अब भी अपने लक्ष्य से काफी पीछे है. इस साल प्रतिदिन 41 किमी रोड बनाने का लक्ष्य रखा गया है.
सड़क व परिवहन मंत्री नीतीन गडकरी ने खुद स्वीकार किया है कि 16,271 किलोमीटर नेशनल हाईवे के ठेके दिए गए थे, जिनमें से 2016-17 में 8321 किलोमीटर का निर्माण किया गया. वे मानते हैं कि काम में अभी और तेजी लाने की जरूरत है. वहीं प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत 47,350 किमी सड़कों का निर्माण हुआ, जबकि यूपीए सरकार के दौरान 2013-14 में यह मात्र 25,316 किमी था. भारत में लगभग 47 लाख किमी लंबी सड़कों का जाल है. इनमें राष्ट्रीय राजमार्ग की लंबाई लगभग 58 हजार किलोमीटर है.
2017-18 के दौरान सरकार सड़क परिवहन और राष्ट्रीय राजमार्ग पर 64,900 करोड़ रुपए खर्च करेगी. यह 2016-17 से 24 प्रतिशत अधिक है. इसमें से 10,723 करोड़ रुपए रख-रखाव और मरम्मत पर खर्च होंगे, जबकि 54,177 करोड़ रुपए नए राजमार्गों और पुलों के निर्माण पर खर्च होंगे. इस प्रकार नरेंद्र मोदी सरकार नए राजमार्गों के निर्माण कार्यों पर मरम्मत से अधिक खर्च कर रही है.
रोड सेफ्टी पर लचर रवैया
सड़क हादसों में देश में हर साल डेढ़ लाख लोगों की जान चली जाती है. इनमें आधे से ज़्यादा 35 साल के नीचे के हैं. 2005 से 2015 के बीच सड़क हादसों में 14 प्रतिशत की वृद्धि हुई. वहीं इनमें होने वाली मौतों में 54 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो गई, जबकि 2022 तक सड़क हादसों में होने वाली मौतों को आधा करने का लक्ष्य है. सरकार के तमाम प्रयासों के बाद भी सड़क हादसों में निरंतर वृद्धि हुई है. गौरतलब है कि सड़क दुर्घटनाओं से हर साल करीब 55 हजार करोड़ से 60 हजार करोड़ रुपए का नुकसान होता है, जो जीडीपी का तीन प्रतिशत है. जनवरी 2016 में सरकार ने हादसे रोकने के लिए सड़क सुधार पर 11 हजार करोड़ खर्च करने का ऐलान किया. सवा सात सौ से ज्यादा ऐसी जगहों की पहचान की गई, जहां ज्यादा हादसे होते हैं. अगले 5 साल में ऐसे सड़कों व चौराहों को दुरुस्त किया
जाना है.
2014 में दिल्ली में जाम की समस्या से निपटने के लिए नई रिंग रोड बनाने की बात की गई थी. गडकरी ने केंद्रीय रोड रिसर्च इंस्टीट्यूट से जाम से निपटने के लिए विकल्प तैयार करने को कहा था. इसके बावजूद रिंग रोड निर्माण का काम अधर में है और रोड सेफ्‌टी व जाम को लेकर हालात जस के तस हैं.
जन औषधि केंद्र : लक्ष्य था तीन हज़ार, खुले एक हज़ार 
सस्ते दर पर बेहतर क्वालिटी की दवा उपलब्ध कराने के लिए यूपीए सरकार ने 2008 में जन औषधि केंद्र खोले जाने की योजना बनाई थी. इसके बाद मोदी सरकार ने 2017 तक 3000 जन औषधि केंद्र खोले जाने पर जोर दिया. लेकिन   फिलहाल 1000 जन औषधि केंद्र ही खुल सके हैं, जो सरकार के लक्ष्य से काफी कम हैं. सरकार ने अब रेलवे स्टेशनों पर 1000 जन औषधि केंद्र खोलने की घोषणा की है. रेलवे स्टेशनों पर जन औषधि केंद्र खुलने से इस योजना का प्रचार तो होगा, लेकिन अब भी दवा के लिए लोग बाजार या अस्पताल के आस-पास के मेडिकल स्टोर पर ही निर्भर हैं. ऐसे में रेलवे स्टेशनों पर इन केंद्रों के खुलने का फायदा कम, नुकसान ही ज्यादा नजर आता है. पहले भी बिक्री के अभाव में या दवा उपलब्ध नहीं रहने पर कई जन औषधि केंद्रों पर ताला लटक चुका है.
कैसे होगी 5 लाख डॉक्टर्स की कमी पूरी 
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के मानकों के अनुसार भारत में पांच लाख डॉक्टर्स की कमी है. डब्ल्यूएचओ के अनुसार भारत में 1700 लोगों पर एक डॉक्टर है, जबकि एक हजार लोगों पर एक डॉक्टर होने चाहिए. वहीं सरकार ने दिसंबर 2015 को बताया कि देश में प्रत्येक 1,681 मरीज पर एक डॉक्टर की उपलब्धता है. एक विशेषज्ञ का कहना है कि अगर पांच साल की अवधि तक हर साल सौ मेडिकल कॉलेज खुलेंगे, तभी 2029 तक देश में पर्याप्त डॉक्टर उपलब्ध हो सकते हैं.
ग्रामीण इलाकों में स्थित प्राइमरी हेल्थ सेंटर (पीएचसी) व कम्युनिटी हेल्थ सेंटर (सीएचसी) भी डॉक्टर और नर्सों की कमी से जूझ रहे हैं. भारत को पीएचसी में कम से कम 70 हजार एमबीबीएस डॉक्टर्स की जरूरत है. सरकार ने विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी को देखते हुए डॉक्टर्स की रिटायरमेंट उम्र बढ़ाकर 65 साल कर दी है. इसके अलावा शैक्षणिक सत्र 2017-18 के लिए मेडिकल स्नातकोत्तर में कुल 4,193 सीटों की बढ़ोतरी भी कर दी गई है. लेकिन जहां कई मेडिकल कॉलेज खोलने की जरूरत है, वहां कुछ मेडिकल सीटें बढ़ाकर या रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाकर इस समस्या से निपटना मुश्किल है. गौरतलब है कि 30 जून, 2015 तक देश में 9,59,198 डॉक्टर पंजीकृत थे.
एम्स खुलें, तब तो हो इलाज 
प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना (पीएमएसएसवाई) के पहले चरण में 6 एम्स खोले जाने थे. फिलहाल जोधपुर, रायपुर और भोपाल एम्स में यह विभाग शुरू नहीं हो सके हैं, जबकि पटना, भुवनेश्वर और ऋृषिकेश में यह विभाग आंशिक रूप से शुरू हो चुके हैं. स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्‌डा ने कहा कि मंजूर हुए छह एम्स के निर्माण में देरी की वजह परियोजनाओं से संबंधित आधारभूत मसले हैं. इसके बाद सरकार ने दूसरे चरण में भी दस एम्स खोलने की घोषणा की है. इसके अलावा सरकार ने 2016 में दिल्ली एम्स की क्षमता दोगुनी करने की बात की थी, लेकिन यहां लोगों की भीड़ को देखकर अनुमान लगाया जा सकता है कि हालात में कितना सुधार हुआ है. इसके अलावा 2016 में देशभर में 20 कैंसर इंस्टीट्यूट खोले जाने की घोषणा की गई थी, जिसपर अभी तक काम शुरू नहीं हो सका है. यह हाल तब है, जब पांच लाख लोग हर साल कैंसर से मरते हैं.
कालाजार पर क़ाबू पाने का लक्ष्य अधूरा 
देश से कालाजार की जानलेवा बीमारी के उन्मूलन का लक्ष्य पूरा होने की संभावना एक बार फिर कमजोर होती जा रही है. मई 2016 तक इसके 2943 मामले सामने आ चुके हैं. स्वास्थ्य मंत्री दावा कर चुके हैं कि 2017 तक इसे समाप्त  कर लिया जाएगा. हालांकि स्वास्थ्य विशेषज्ञ मौजूदा स्थिति को देखते हुए 2017 तक इस पर काबू पाने को मुश्किल बता रहे हैं.
इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन (आईडीएफ) के हवाले से नड्‌डा ने बताया कि 20 से 70 वर्ष के आयु वर्ग में 2014 में डायबिटीज के 6.68 करोड़ और 2015 में 6.91 करोड़ मरीज थे. 1980 से 2014 के दौरान भारत में डायबिटीज पीड़ित महिलाओं की संख्या में 80 फीसद की बढ़ोतरी हुई है.
दोगुनी हुई आईआईटी की फीस  मानव संसाधन मंत्रालय ने 2016 में आईआईटी की सालाना फीस 90 हजार से बढ़कर दो लाख कर दी. अब मानव संसाधन विकास मंत्रालय आईआईटी छात्रों को ब्याज मुक्त ऋण प्रदान करने के लिए एक योजना लेकर आया है, ताकि छात्रों को फीस का भुगतान करने में मदद मिल सके.
2017 में प्रकाश जावड़ेकर ने घोषणा की है कि आईआईटी में लड़कियों की भागीदारी 8 से बढ़ाकर 20 फीसदी की जाएगी. अभी हाल ये है कि विभिन्न आईआईटी में दाखिले के लिए होने वाली संयुक्त प्रवेश परीक्षा (जेईई) में 4,500 लड़कियां पास करती हैं, वहीं उनमें से केवल 800 ही विभिन्न पाठ्यक्रमों में दाखिला ले पाती हैं. इसके अलावा सरकार ने स्वीकार किया कि कॉलेज से उत्तीर्ण होने के बाद मात्र 40 प्रतिशत इंजीनियरिंग स्नातकों को ही रोजगार मिल पाता है. मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने  कहा कि सरकार ने अगले पांच वर्ष में कम से कम 60 प्रतिशत इंजीनियरिंग छात्रों को रोजगार योग्य बनाने का लक्ष्य बनाया है.
डेढ़ दर्जन विश्वविद्यालयों में वीसी नहीं  
जब स्मृति ईरानी मंत्री बनी थीं, तो कोई डेढ़ दर्जन विश्वविद्यालयों में वीसी के पद खाली पड़े थे, जिनमें में ज्यादातर अब भी खाली ही हैं. ईरानी के पदभार संभालने के एक साल बाद भी मंत्रालय कई उच्च पदों पर नियुक्तियां नहीं कर पाई है. मिसाल के तौर पर Aएआईसीटीई, एनसीईआरटी और सीबीएसई के चेयरमैन के पद खाली हैं. इन पदों पर नियुक्ति कब होगी, किसी को
पता नहीं.
आईआईटी में 40 फीसदी कम फैकल्टी 
प्रकाश जावड़ेकर ने हाल में बताया कि आईआईटी और केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 40 फीसदी कम फैकल्टी सदस्य हैं.   मंत्री ने स्वीकार किया है कि छात्रों को विश्वस्तरीय सुविधाएं और अवसंरचना उपलब्ध कराने के लिए हमारे पास समुचित फैकल्टी सदस्य नहीं हैं. प
चुनौतियों की पटरी पर दौड़ती रेल
ट्रेन हादसे थमने की बजाय बढ़ते ही जा रहे हैं. इस साल अब तक छोटे-बड़े 80 हादसे हो चुके हैं, जबकि 2016 में इसी दौरान 69 हादसे हुए थे. रेलवे में सुरक्षा का कामकाज देखने वाले कर्मचारियों के 1.27 लाख पद खाली पड़े हैं. नतीजतन बाकी कर्मचारियों पर काम का भारी दबाव है. इससे भी रेल हादसे बढ़े हैं.  रेल हादसों के लिए रेल मंत्री ने आईसीएफ डिब्बों को जिम्मेदार ठहराया है. रेलवे सूत्रों का कहना है कि पुराने डिब्बों को जर्मन तकनीक से बने एलएचबी डिब्बों से बदलने की प्रक्रिया इतनी धीमी है कि इसमें 25 से 30 साल लग जाएंगे.
देश में हर साल मात्र 15 सौ एलएचबी डिब्बे बनते हैं. एलएचबी डिब्बों की खासियत यह है कि हादसे की स्थिति में यह एक-दूसरे पर नहीं चढ़ते. पहले सरकार ने वर्ष 2020 तक इन डिब्बों के सौ फीसदी इस्तेमाल का लक्ष्य तय किया था.  रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने इस साल रेल की पटरियों को अपग्रेड करने, नए ब्रिज बनाने और सिग्नल प्रणाली को आधुनिकतम बनाने के लिए वित्त मंत्रालय से 1.19 खरब रुपए मांगे थे. लेकिन कहा गया कि रेलवे को निवेश के लिए पहले ही काफी रकम दी जा चुकी है.

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