किसान जींस भी पहन सकते हैं आंदोलन भी कर सकते हैं

आखिर वे कौन लोग हैं, जिन्हें किसान के बाइक पर चलने या जींस पहनने से आपत्ति है. जाहिर है, ऐसी मानसिकता के लोग ये कभी नहीं चाहेंगे कि किसान अपने हक के लिए लड़ें, आंदोलन करें. लेकिन पहली बार किसानों ने ये साबित कर दिया है कि किसान जींस भी पहन सकता है, खेती भी कर सकता है और जरूरत पड़ने पर आंदोलन भी कर सकता है. अब ये आंदोलन सफल हो या असफल, लेकिन ये साबित हो गया है कि किसान इस देश में एक संगठित ताकत है, किसान इस लोकतंत्र की जिन्दा कौम है.

ramdevमध्य प्रदेश: सरकार का किसान संघ बनाम किसान का किसान संघ
मध्य प्रदेश के किसान आंदोलन से जुड़ा सबसे बड़ा सवाल है कि ये आंदोलन किस मजदूर संगठन का है और ऐसी क्या आफत आ गई थी कि पुलिस को गोली चलानी पड़ी, जिसकी वजह से आधा दर्जन से ज्यादा किसानों की मौत हो गई. पहले सवाल का जवाब ये है कि दरअसल, ये भारतीय किसान संघ (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की एक शाखा और भाजपा से नजदीकी रखने वाला एक किसान संगठन) ही था, जिसे गुपचुप तरीके से सरकार ने बुलाकर वार्ता कर ली.

लेकिन जमीनी स्तर पर जिस संगठन ने इस आंदोलन को शुरू किया था, उसे खबर लिखे जाने तक सरकार की तरफ से एक फोन कॉल तक नहीं गया. दरअसल, किसानों के साथ भारतीय किसान संघ ने जो धोखेबाजी की, उसी से आहत हो कर राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन से जुड़े किसान उग्र होते चले गए.

शिव कुमार शर्मा उर्फ कक्का जी, राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. शिव कुमार शर्मा मध्य प्रदेश के पुराने जमीनी किसान नेता हैं. पुलिस द्वारा किसानों पर गोली चलाने वाली घटना के बारे में ‘चौथी दुनिया’ से बात करते हुए वे यहां तक कह गए कि शिवराज से झूठा सीएम कोई नहीं होगा. 8 किसानों की मौत हो चुकी है. आंदोलन बेकाबू है. इसकी वजह शिवराज सिंह चौहान ही हैं. उनके इस आरोप का आधार क्या है, ये पूछे जाने पर वे बताते हैं कि ये आंदोलन राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ ने 1 जून को शुरू किया था.

भारतीय किसान संघ की यहां कोई हैसियत नहीं है. वे हमारे आंदोलन के खिलाफ थे. 4 दिन बाद अचानक संघ के कहने पर वे हमारे समर्थन में आए और उज्जैन में जाकर सीएम के साथ समझौता कर लिया. उसके बाद ट्वीट कर उन्होंने आंदोलन समाप्ति की घोषणा कर दी. शिवकुमार शर्मा के मुताबिक, भारतीय किसान संघ की इस हरकत से स्थानीय किसान उग्र हो गए और शिवराज सिंह चौहान के पुतले जलने लगे.

किसान आंदोलन के दौरान पुलिस को गोलीबारी क्यों करनी पड़ी, इस पर वे कहते हैं कि सरकार की तरफ से मंदसौर में कुछ आसामाजिक तत्वों को भेज कर गाड़ियों में आग लगवाई गई और फायरिंग की स्थिति बनाई गई. वे कहते हैं कि इस सरकार का ये पुराना ट्रेंड है. उनके मुताबिक इस फायरिंग में 8 किसान शहीद हो गए और इसी की प्रतिक्रिया में भीड़ बेकाबू हो गई. वे ये भी सवाल उठाते हैं कि आज तक हमलोगों को वार्ता के लिए क्यों नहीं बुलाया गया है.

बहरहाल, सरकार की तरफ से मृत किसानों के लिए एक करोड़ रुपए के मुआवजे की घोषणा की गई है. जाहिर है, 2018 में चुनाव है. इस आंदोलन से भाजपा की काफी किरकिरी हुई है और इसके प्रतिकूल प्रभाव से ही निपटने के लिए सरकार ने मुआवजे की रकम इतनी ज्यादा बढाई है. शिव कुमार शर्मा ने ‘चौथी दुनिया’ को बताया कि ये आंदोलन कम से कम 10 जून तक चलेगा. 53 हजार गांवों में शिवराज सिंह के पुतले जलाए जाएंगे.

आंदोलन की मुख्य वजह और मुख्य मांगों के बारे में वे बताते हैं कि मुख्य रूप से हमारी दो मांगें हैं. पहली ये कि किसानों को स्वामीनाथ आयोग की सिफारिश के अनुसार एमएसपी पर 50 फीसदी अधिक मूल्य मिले और दूसरी कि हमें ऋणमुक्त किया जाए. वे कहते हैं कि हरियाणा, तेलंगाना और आन्ध्र प्रदेश में भी हमारा आंदोलन शुरू होने वाला है और अब जल्द ही किसान आंदोलन एक राष्ट्रव्यापी शक्ल अख्तियार करने जा रहा है.

इधर, मंदसौर में किसानों पर पुलिस गोलीबारी के खिलाफ मध्य प्रदेश के अन्य शहरों समेत राजस्थान में भी विरोध की आग फैल गई. एमपी के सिधी जिले में टोको-रोको-ठोको क्रांतिकारी मोर्चा ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का पुतला दहन किया है. टोको-रोको-ठोको क्रांतिकारी मोर्चा के संयोजक उमेश तिवारी ‘चौथी दुनिया’ से बात करते हुए कहते हैं कि खुद को किसानों का बेटा कहने वाले शिवराज सिंह ने किसानों से संवाद तक करना जरूरी नहीं समझा और उल्टे किसानों की हत्या करवा दी. उनका यह कृत्य संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है. पुतला दहन के बाद सीधी कलेक्टर के माध्यम से मध्य प्रदेश के राज्यपाल के नाम ज्ञापन पत्र भी सौंपा गया.

महाराष्ट्र: एक धड़े की हड़ताल खत्म, एक की जारी
महाराष्ट्र में भी किसान आंदोलन जारी है. ये अलग बात है कि अब इसमें विभिन्न राजनीतिक दल भी शामिल हो गए हैं और इस आंदोलन के जरिए राजनीतिक लड़ाई भी लड़ने की कोशिश की जा रही है. लेकिन महाराष्ट्र के किसानों ने जिस तरीके से अपना विरोध प्रदर्शन किया और कर रहे हैं, उससे पता चलता है कि वाकई किसानों की हालत बहुत खराब है.

महाराष्ट्र किसान मंच के संयोजक और किसान क्रांति के नेता धनंजय धोर्दे पाटिल ‘चौथी दुनिया’ से बात करते हुए कहते हैं कि महाराष्ट्र में 2013 से लगातार सूखा पड रहा था. पिछले साल बेहतर बारिश हुई, तो पैदावार बढ़ी. अंगूर, प्याज, तुअर दाल, चना की फसल अच्छी हुई, लेकिन उसका दाम किसानों को नहीं मिला. पिछले साल प्याज 50 पैसे प्रति किलो बिका.

इस साल भी यही हुआ. प्याज उगाने का खर्च प्रति किलो 8 रुपए आता है लेकिन किसानों को मंडी में एक रुपए का दाम मिलता है. इससे किसान परेशान थे. पाटिल बताते हैं कि 17 मार्च 2017 को महाराष्ट्र में डॉक्टर हड़ताल पर गए थे. मैं और मेरे कुछ साथियों ने सोचा कि किसान भी हड़ताल क्यों नहीं कर सकते. फिर हमारे लोग पास के गांव पुणतांबा और शिरडी से 15 किलोमीटर दूर तक गए और वहां के लोकल लीडर्स से मिले.

3 अप्रैल को पुणतांबा ग्राम सभा ने प्रस्ताव पारित किया कि अगर किसान का कर्ज माफ नहीं किया जाता है, स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू नहीं होती हैं और दूध का दाम 50 रुपए प्रति लीटर नहीं दिया जाता है, तो पूरे महाराष्ट्र के किसान 1 जून से हड़ताल पर जाएंगे.

इसके बाद, इन लोगों ने महाराष्ट्र के सैकड़ों गांवों के किसानों से अपील की कि वे भी अपने यहां की ग्राम सभा से ऐसा ही प्रस्ताव पारित करवाएं और 1 जून के हड़ताल की सूचना सरकार को दे दें. 1 मई को लगभग 3000 ग्राम पंचायतों ने सरकार को ग्राम सभा का प्रस्ताव भेज दिया.

इस तरह, एक गैर राजनीतिक संगठन किसान क्रांति के नाम से लोग एक जगह जमा हुए. किसान क्रांति के नाम से कार्यकर्ता काम करने लगे. 30 मई को सीएम के साथ किसान क्रांति के कुछ नेताओं की बातचीत हुई, जिसका कोई नतीजा नहीं निकला.

1 जून से पूरे महाराष्ट्र में किसान हड़ताल पर चले गए. 2 जून की रात को सीएम ऑफिस की तरफ से किसान क्रांति के कुछ नेताओं के लिए बुलावा आया. 12 बजे रात को मीटिंग हुई. सीएम ने कहा कि 5 एकड़ तक जमीन वाले किसानों का कर्जा माफ किया जाएगा और दूध के दाम 20 जून तक बढ़ाए जाएंगे.

इसके बाद किसान क्रांति के एक धड़े ने अपनी तरफ से हड़ताल वापस लेने का ऐलान किया. उनका ये तर्क था कि हड़ताला ज्यादा लंबा खींचने से कानून-व्यवस्था बिगड़ने का डर है. साथ ही किसान आर्थिक तौर पर ज्यादा लंबा हड़ताल बर्दाश्त नहीं कर सकते. लेकिन महाराष्ट्र के विपक्षी दलों समेत सत्ता में शामिल शिव सेना ने अपनी तरफ से हड़ताल जारी रखने का फैसला किया और इसमें किसान क्रांति का एक धड़ा भी शामिल हो गया. इनका कहना था कि सिर्फ 5 एकड़ ही क्यों, सभी किसानों का कर्ज माफ हो. 5 जून को महाराष्ट्र पूरी तरह से बंद रहा और आगे भी किसान क्रांति समेत विपक्ष की तरफ से रेल रोकने की तैयारी की जा रही है.

बात चाहे केंद्र की हो, महाराष्ट्र की, मध्य प्रदेश की या उत्तर प्रदेश की, इन सभी जगहों पर दो बातें समान हैं. पहली ये कि इन सभी जगहों पर भाजपा की सरकार है और दूसरी ये कि सभी जगह किसान कर्ज को लेकर परेशान हैं. किसान चुनावी वादों के पूरा होने के इंतजार में हैं. उत्तर प्रदेश में योगी सरकार ने कर्ज मा़फी की घोषणा तो कर दी, लेकिन अभी तक उसको अमल में नहीं लाया जा सका है.-विनोद सिंह, राष्ट्रीय अध्यक्ष, किसान मंच

इस आंदोलन पर भी रायता बिखेर देंगे नेता
जब भी कोई आंदोलन गरमाता है और निर्णायक दौर में पहुंचता है, तभी नेता उसमें कूद पड़ते हैं और उस पर सियासत का रायता फैला देते हैं. आंदोलन का राजनीतिकरण हो जाने के कारण सरकारें फिर राजनीतिक रुख अख्तियार कर लेती हैं और आंदोलन बिखर कर रह जाता है. इसे नेताओं की साजिश भी मान सकते हैं कि वे किसी भी जन-आंदोलन को इतना ताकतवर नहीं बनने देते कि वो भविष्य में राजनीतिक विकल्प के बतौर खड़ा हो सके. जेपी आंदोलन को छोड़ कर देश के किसी भी आंदोलन को देखें, तो नेता का पदार्पण तभी होता है जब आंदोलन परवान चढ़ने लगता है.

जेपी आंदोलन भी जेपी और छात्रों-युवकों के बल पर शुरू हुआ और बाद में उसमें तमाम नेता टपक पड़े. आम लोगों के मन में ये सवाल बार-बार उठता रहा है कि आंदोलन की शुरुआत में नेता कहां रहते हैं? या नेता खुद कोई व्यापक जन-आंदोलन खड़ा क्यों नहीं कर पाते? या नेता आंदोलन को डुबाने क्यों चले आते हैं? नेता आंदोलन खड़ा होने के बाद ही उसमें अपनी नाक क्यों घुसेड़ देते हैं? लोगों ने अपने कटु अनुभवों से इन सवालों का जवाब जाना है. महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में किसान आंदोलन गरमाया, तो नेता भी गरमाने लगे. उसके पहले नेताओं को उन्हीं किसानों की कोई परवाह नहीं थी.

कांग्रेस के नेता राहुल गांधी हों या शिव सेना के नेता संजय राउत या जदयू नेता शरद यादव या आप नेता अरविंद केजरीवाल या कोई अन्य, ये सारे नेता तब कहां थे, जब किसान यंत्रणा में अपनी जान दे रहे थे! जब किसान अपनी फसलें कौड़ियों के मोल बेच रहे थे या आजिज आकर अपनी उपज सड़कों पर फेंक रहे थे, तब ये नेता कहां थे! नेता अगर किसानों के हितों को लेकर इतने ही संजीदा होते, तो क्या किसान लाखों की संख्या में फांसी पर लटकते! क्या किसान अपनी ही फसल की लागत भी नहीं निकाल पाते और उद्योगपति मालामाल होते रहते! विडंबना ये है कि महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में किसान आंदोलन के निर्णायक दौर में पहुंचने के ठीक पहले सारे नेता कूद पड़े हैं.

अब कांग्रेस अपने तरीके से राजनीति करेगी और आम आदमी पार्टी अपने तरीके से, उसी में जदयू भी अपनी सियासत खोंसेगी और शिव सेना अपनी. नतीजतन पूरा आंदोलन राजनीति के बहुकोण में फंस जाएगा और केंद्र और दोनों प्रदेशों की भाजपा सरकार को भी राजनीति करने का मौका मिल जाएगा. इस तरह एक और जन-आंदोलन बेनतीजा बिखर कर रह जाएगा. इसके संकेत अभी से मिलने लगे हैं.

किसान आंदोलन और समाचार चैनल
10 जून की सुबह मध्य प्रदेश के सिहोर और भोपाल में किसान प्रदर्शन कर रहे थे. ये किसान मंदसौर गोलीबारी की घटना में मारे गए किसानों के विरोध में प्रदर्शन कर रहे थे. इसके अलावा राजस्थान और महाराष्ट्र में किसानों का आंदोलन चल रहा था. इस गर्मी में किसान सड़क पर थे, पुलिस की लाठियां खा रहे थे. इधर दिल्ली के वातानुकुलित दफ्तर में बैठे टीवी चैनलों के पत्रकार नरेंद्र मोदी की विदेश यात्रा का प्रसारण कर रहे थे. जी न्यूज, आज तक, न्यूज-18 इंडिया समेत ज्यादातर चैनलों को सिहोर और भोपाल में जारी किसान आंदोलन को दिखाने की शायद फुर्सत नहीं थी, या उन्होंने इसकी जरूरत नहीं समझी. एबीपी और एनडीटीवी ही मात्र दो ऐसे चैनल थे, जो 10 जून की सुबह वाले प्रदर्शन का प्रसारण कर रहे थे. इसके अलावा दिल्ली का राष्ट्रीय मीडिया इस किसान आंदोलन को बदनाम करने के लिए बार-बार ये कह रहा है कि ये किसान नहीं, उपद्रवी हैं. जाहिर है, ऐसा करके मीडिया सत्ताधारी दल के एजेंडे को आगे बढ़ा रहा है.

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