गंगा सफाई की असलियत

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gangaगंगा की सफाई के सवाल को लेकर दावे दर दावे किए गए और योजनाएं बना कर उन पर काम करने की बात कही गई. लेकिन सरकारी दावों की असलियत ये है कि अब गंगा का पानी पीने लायक तो दूर, नहाने के लायक भी नहीं बचा है. हाल ही में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने एक आरटीआई के जवाब में बताया है कि हरिद्वार में गंगा नदी का पानी नहाने के लिए भी सुरक्षित नहीं रह गया है. इस खुलासे के बाद तीन साल से केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कामकाज पर भी सवाल उठना लाजिमी है.

उत्तराखंड में गंगोत्री से लेकर हरिद्वार जिले तक 11 जगहों से पानी की गुणवत्ता की जांच के लिए नमूने लिए गए थे. इन 11 जगहों के बीच गंगा 294 किलोमीटर के इलाके में फैली है. बोर्ड के वरिष्ठ वैज्ञानिक आरएम भारद्वाज के मुताबिक इतने लंबे दायरे में गंगा के पानी की गुणवत्ता की जांच के 4 प्रमुख सूचक रहे, जिनमें तापमान, पानी में घुली ऑक्सीजन, बायलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड और कॉलिफॉर्म शामिल हैं. हरिद्वार के पास के इलाकों के गंगा के पानी में कॉलिफॉर्म और अन्य जहरीले तत्व पाए गए हैं.

नमामि गंगे जैसी योजनाओं में करोड़ो फूंकने के बाद भी उस हरिद्धार में गंगा को साफ नहीं किया जा सका है, जहां से गंगा मैदानी भूभाग में आती है. 1985 में गंगा की सफाई के लिए शुरू की गई गंगा कार्य योजना अब नमामि गंगे के रूप में सरकारी कार्यक्रम का हिस्सा है. बीते तीस सालों के दौरान गंगा सफाई को लेकर विभिन्न योजनाओं के नाम पर बाईस हजार करोड़ से ज्यादा रुपए बहाए जा चुके हैं.

आंकड़ों के मुताबिक भाजपा के पिछले दो वर्षों के शासनकाल में गंगा की सफाई के लिए आवंटित 3,703 करोड़ रुपए में से 2,958 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं, लेकिन इस पतित पावनी नदी की दशा जस की तस बनी हुई है. यही हाल पिछले 30 वर्षों के दौरान घोषित अन्य योजनाओं का भी रहा है. राष्ट्रीय गंगा सफाई मिशन के लिए 2014-15 में 2,137 करोड़ रुपए आवंटित किए गए थे. बाद में इसमें 84 करोड़ रुपए की कटौती कर इसे 2,053 करोड़ रुपए कर दिया गया.

लेकिन केंद्र सरकार ने भारी प्रचार-प्रसार के बावजूद सिर्फ 326 करोड़ रुपए खर्च किए और इस तरह 1,700 करोड़ रुपए बिना खर्चे रह गए. वर्ष 2015-16 में भी स्थिति कुछ खास नहीं बदली, अलबत्ता केंद्र सरकार ने प्रस्तावित 2,750 करोड़ रुपए के बजटीय आवंटन को घटाकर 1,650 करोड़ रुपए कर दिया. संशोधित बजट में से 18 करोड़ रुपए 2015-16 में भी बिना खर्च रह गए. ये भी हैरानी की बात है कि मौजूदा वित्त वर्ष (2016-17) में आवंटित 2,500 करोड़ रुपए में से अब तक कितने खर्च हुए हैं, केंद्र सरकार के पास इसका कोई विवरण मौजूद नहीं है.

गौर करने वाली बात ये भी है कि राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण (एनजीआरबीए) की तीन बैठकों में से प्रधानमंत्री ने सिर्फ एक बैठक की अध्यक्षता 26 मार्च, 2014 को की थी. अन्य दो बैठकों की अध्यक्षता केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने की थी, जो 27 अक्टूबर, 2014 और चार जुलाई, 2016 को हुई थीं.

जबकि मोदी के पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह ने इसके ठीक विपरीत अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान हुई एनजीआरबीए की सभी तीन बैठकों की अध्यक्षता की थी. ये बैठकें पांच अक्टूबर, 2009, पहली नवंबर, 2010, और 17 अप्रैल, 2012 को हुई थीं. ये तो समय ही बताएगा कि जिस मोदी सरकार ने अगले पांच वर्षों में गंगा पुनर्द्धार और सफाई पर 20,000 करोड़ रुपए खर्चने का वादा किया है, वो अपने वादे पूरे कर पाएगी या नहीं.

भाजपा सरकार बनने के बाद केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा पुनरुद्धार मंत्री उमा भारती ने कहा था कि अगले तीन साल के भीतर गंगा साफ हो जाएगी. गंगा को लेकर खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर भावुकता से भरे बयान देते रहे हैं. लेकिन नमामि गंगे जैसी योजना और लगातार सरकारी कार्यक्रमों में गंगा के माहात्म्य के उल्लेख के बावजूद खुद सरकार ये मान रही है कि गंगा का पानी नहाने के लायक भी नहीं बचा, तो अब तक की कवायदों को किस नजरिए से देखा जाएगा! कानपुर या दूसरे शहरों में औद्योगिक इकाइयों और सीवर आदि की वजह से पूरी तरह प्रदूषित हो चुकी ये नदी अगर हरिद्वार में भी इस हालत में चली गई है, तो इसके लिए कौन जिम्मेवार है?

सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्यों के बोर्डों को फटकार लगाते हुए पूछा है कि वे गंगा में विषाक्त कचरा डालने वाले उद्योगों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं कर पा रहे हैं? गौर करने वाली बात है कि गंगा के प्रति सरकारी उदासिनता को लेकर कोर्ट ने 1985 में भी ऐसी ही नाराजगी व्यक्त की थी और गंगा में गंदगी डालने वाले उद्योगों के खिलाफ कार्रवाई करने को कहा था. यदि तब के आदेश पर अमल हो गया होता, तो आज हालात बदल गए होते. चूंकि ऐसा नहीं हुआ इसलिए पिछले 29 सालों में गंगा में बहुत पानी बहने के साथ ही न जाने कितना औद्योगिक कचरा भी बह गया.

राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) भी हरिद्वार और कानपुर के बीच गंगा में औद्योगिक कचरा प्रवाहित किए जाने को लेकर केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार को फटकार लगा चुकी है. एनजीटी ने गंगा की सफाई के संदर्भ में स्पष्ट रुख नहीं अपनाने के लिए वन एवं पर्यावरण मंत्रालय, जल संसाधन मंत्रालय, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड एवं अन्य प्राधिकरणों की खिंचाई की थी. एनजीटी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार के नेतृत्व वाली पीठ ने कहा, हर कोई हमारे समक्ष आता है और कहता है कि हमने ये किया है, हमने वह किया है. लेकिन इसका परिणाम शून्य है.

जीवनदायी नदियां हमारी सांस्कृातिक धरोहर भी रही हैं. इतिहास गवाह है कि नदियों के किनारे ही ऐसी आधुनिकतम बड़ी सभ्यताएं विकसित हुईं, जो कृषि और पशुपालन पर अवलंबित रहीं. लेकिन जब सभ्यताएं औद्योगिक प्रौद्योगिक उत्पादनों से जुड़ गईं, तब ये अति विकसित व आधुनिक मानी जाने वाली सभ्यताएं मात्रा 70 साल के भीतर ही नदियों जैसी अमूल्य प्राकृतिक संपदा के लिए खतरा बन गईं.

गंगा मुक्ति आंदोलन से जुड़े अनिल प्रकाश बताते हैं कि पर्यावरणविदों ने इस समस्या की ओर ध्यान दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. लेकिन सरकार अब भी गंगा को लेकर उदासिन है. गंगा सफाई को लेकर चल रही तमाम योजनाओं के बीच हरिद्वार में औद्योगिक इकाइयों की श्रृंखला खड़ी हो गई. लेकिन उसके बरक्स जलशोधन संयंत्रों और गंदे पानी की निकासी की व्यवस्था करना जरूरी नहीं समझा गया. जहां पर गंगा के किनारे हर दिन पचास हजार से एक लाख लोग नहाने पहुंचते हों, वहां गंदगी और दूसरी समस्याओं का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है.

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