जो नगाओं को दिया वही कश्मीरियों को दीजिए

नगा समझौते का बहु-प्रचार कर केंद्र की भाजपा सरकार खुद ही कई सवालों में घिर गई है. आम नागरिकों को भी यह समझ में नहीं आ रहा है कि नगा समझौते के लिए अति-उत्साहित पहल करने वाली केंद्र सरकार कश्मीरियों की वाजिब मांगें भी सुनने को तैयार क्यों नहीं होती? अब तो ‘चौथी दुनिया’ ने 05 जून से 11 जून के अंक में यह उजागर कर दिया है कि नगा समझौते में केंद्र सरकार ने कहां-कहां और किन-किन शर्तों पर एनएससीएन प्रमुख थुइंगलेंग मुइवा के आगे घुटने टेके. केंद्र सरकार नगालैंड के एक आतंकी संगठन से समझौता कर लेती है, लेकिन कश्मीर में अलगाववादी संगठन से बात भी नहीं करना चाहती. यह दोतरफा व्यवहार क्यों? कश्मीर के अलगाववादी राष्ट्रवादी नहीं, तो क्या नगालैंड के उग्रवादी राष्ट्रवादी हैं? इन सवालों का जवाब केंद्र को देना ही होगा, आज नहीं तो कल…

अगर नगा विवाद खत्म करने के लिए एक संगठन की शर्तों पर समझौता हो सकता है, तो कश्मीर के साथ ऐसा क्यों नहीं हो सकता? अगस्त 2015 को केंद्र सरकार ने मुख्य वार्ताकार आरएन रवि की मध्यस्थता में आतंकी संगठन नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड के प्रमुख थुइंगलेंग मुइवा के साथ एकतरफा समझौता कर लिया. जबकि जुलाई 2016 में जब कश्मीर घाटी में हिंसा भड़की थी तभीे वार्ताकार दिलीप पडगांवकर ने कहा था कि यदि सरकार ने वार्ताकारों की  सिफारिशों पर अमल किया होता, तो कश्मीर को ये दिन नहीं देखने पड़ते.

साल 2010 में ही जब घाटी की स्थिति तनावपूर्ण हुई और सेना के हाथों कई बच्चों समेत 120 लोग मारे गए थे, तब केंद्र सरकार ने स्थिति की समीक्षा के लिए और कश्मीर का हल तलाशने के लिए एक टीम गठित की थी. इस टीम में वरिष्ठ पत्रकार (अब मरहूम) दिलीप पडगांवकर, शिक्षाविद् प्रोफेसर राधा कुमारी और पूर्व सूचना आयुक्त एमएम अंसारी आदि शामिल थे. इस टीम ने दो वर्षों में कई बार जम्मू-कश्मीर का दौरा किया और अलग-अलग विचारधारा से सम्बन्धित छोटे-बड़े पांच हजार लोगों से मुलाकात की थी. इसके बाद टीम ने अपनी रिपोर्ट केन्द्र सरकार को सौंप दी. इस रिपोर्ट में कश्मीर मसले को हल करने और यहां के हालात को ठीक करने की सिफारिशें थीं.

ये रिपोर्ट इस समय गृह मंत्रालय में किसी ताक पर धूल चाट रही है. विश्लेषक हैरान हैं कि कश्मीर में हालात इस कदर खराब होने के बावजूद, मोदी सरकार पूर्व सरकारी व गैर सरकारी वार्ताकारों की रिपोट्‌र्स के अनुसार कोई कदम क्यों नहीं उठाती. या फिर यहां वार्ता का सिलसिला क्यों नहीं शुरू करती. कुछ विश्लेषकों का कहना है कि अगर मोदी सरकार नगा विवाद खत्म करने के लिए एक गैर मामूली समझौता कर सकती है, जिसमें बृहत्तर नगालैंड के लिए अलग संविधान, अलग न्यायपालिका, अलग झंडा, अलग मुद्रा, अलग पासपोर्ट यहां तक कि अलग सेना जैसी अभूतपूर्व मांगों को स्वीकार किया गया है, तो फिर कश्मीर के बारे में दोहरा मापदंड क्यों?

कश्मीर देश का एकमात्र प्रदेश है, जहां देश की आजादी के 17 साल बाद यानि 1964 तक अपना प्रधानमंत्री था. यहां गवर्नर नहीं बल्कि सदर-ए-रियासत हुआ करता था. जम्मू-कश्मीर के पास आज भी अपना संविधान है. जम्मू-कश्मीर एकमात्र प्रदेश है, जिसका आज भी अपना झंडा है. कुछ दशक पहले तक जम्मू-कश्मीर में सुप्रीम कोर्ट और इलेक्शन कमीशन का कोई हस्तक्षेप नहीं था. यहां भाजपा और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियां अपनी यूनीट तक नहीं खोल सकती थीं. ये एकमात्र ऐसा प्रदेश है, जहां आज भी कोई भारतीय नागरिक जमीन या कोई संपत्ति नहीं खरीद सकता है. ये एकमात्र ऐसा प्रदेश है, जहां के लोगों को आज भी दोहरी नागरिकता, यानि जम्मू-कश्मीर की नागरिकता और भारतीय नागरिकता हासिल है. ऐसे दर्जनों उदाहरण हैं, जिनसे पता चलता है कि जम्मू कश्मीर भारत के अन्य राज्यों से अलग है. हकीकत ये है कि इस प्रदेश ने भारत के साथ विलय किया है.

ये महाराष्ट्र या उत्तर प्रदेश की तरह आम प्रदेश नहीं है. फिर क्या कारण है कि केंद्र सरकार इस रियासत के हालात को ठीक करने के लिए गैर मामूली कदम नहीं उठाती. जब से ये खुलासा हुआ है कि मोदी सरकार ने नॉर्थ ईस्ट का विवाद खत्म करने के लिए परंपरा से हट कर एक गैर मामूली समझौता किया है, देश भर में कुछ गंभीर सोच रखने वाले राजनीतिक विश्लेषकों ने ये सवाल पूछना शुरू कर दिया है कि कश्मीर में इस तरह का समझौता करने में क्या परेशानी है?

कश्मीर में सरकार के द्वारा नियुक्त किए गए या गैर सरकारी वार्ताकारों की सूची लम्बी है. इन्होंने 1990 से अब तक समय-समय पर यहां के हालात की समीक्षा करने के बाद किसी सकारात्मक पहल के लिए केंद्र सरकार से विभिन्न सिफारिशें पेश कीं. इन वार्ताकारों में केसी पंत से लेकर एन एन वोहरा (जम्मू-कश्मीर के मौजूदा गर्वनर) और राम जेठमलानी तक कई प्रसिद्ध नाम शामिल हैं. इसके अतिरिक्त कई अलग-अलग विचारधारा के लोगों ने अपने स्तर से भी कश्मीर की स्थिति को समझकर, इसके समाधान के लिए सरकार से सिफारिश की. ऐसे लोगों में वजाहत हबीबुल्ला, कुलदीप नैयर, बलराज पुरी, एमजे अकबर, शांति भूषण और वीके ग्रोवर जैसे लोग शामिल हैं.

इतना ही नहीं, 2007 में यूपीए सरकार ने कश्मीर में पांच वर्किंग ग्रुप बनाए थे, जिनमें एक ग्रुप जस्टिस सग़ीर की अध्यक्षता में बनाया गया था. इस ग्रुप को अपने रिपोटर्‌‌स और सिफारिशों के जरिए प्रदेश और केंद्र के बीच बेहतर संबंध स्थापित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. जस्टिस सगीर ने अपनी सिफारिशें पेश कीं, लेकिन उन्हें भी रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया. पिछले एक साल के दौरान यशवंत सिन्हा, मणिशंकर अय्यर और कमल मोरारका जैसी शख्सियतों के नेतृत्व में यहां कई गैर सरकारी प्रतिनिधिमंडल आए.

इन्होंने यहां के हालात की समीक्षा करने और लोगों से बातचीत करने के बाद केंद्र को कश्मीरियों से वार्तालाप स्थापित करने की सलाह दी. विनोद शर्मा, संतोष भारतीय और सीमा मुस्तफा जैसे पत्रकारों ने भी पिछले एक साल के दौरान कई बार कश्मीर के दौरे किए. यहां के हालात को इन्होंने अपने लेखों में ईमानदारी के साथ बयां किया और भारत सरकार को कश्मीर में ताकत का इस्तेमाल बंद करने की सलाह दी. लेकिन सरकार ने इनमें से किसी भी सलाह को गौर करने लायक नहीं समझा. नतीजतन हर गुजरने वाले दिन के साथ कश्मीर में हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं.

कश्मीर के हालात मे तब्दीली कैसे आएगी

गत एक वर्ष से हिंसक हालात के शिकार कश्मीर घाटी में इन दिनों हर शख्स की जुबान पर यही सवाल है कि यहां अब क्या होने वाला है? दरअसल, लोग अभी तक गृहमंत्री राजनाथ सिंह के उस बयान का अर्थ तलाशने की कोशिश कर रहे हैं, जो उन्होंने कश्मीर के हालात के बारे में इस साल 11 अप्रैल को दिया था. गृहमंत्री ने आश्वासन दिया था कि कश्मीर एक वर्ष के अंदर बदल जाएगा. उन्होंने अपने बयान को इन शब्दों में स्पष्ट किया, ‘इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कैसे, लेकिन तब्दीली (कश्मीर के हालात में) जरूर आएगी. इस बात में कोई शक नहीं कि एक साल के अंदर-अंदर कश्मीर में तब्दीली देखने को मिलेगी.’ अगर यह बयान भाजपा के किसी आम नेता ने दिया होता, तो शायद इसे अंधेरे में फेंका हुआ तीर समझकर नजरअंदाज किया जा सकता था.

लेकिन यह बयान देश के गृहमंत्री का है. गृहमंत्री ने यह बयान वास्तव में किसी सोची समझी रणनीति के तहत ही दिया होगा. कश्मीर के हालात पर गहरी नजर रखने वाले राजनीतिक विश्लेषक यह समझ नहीं पा रहे कि केवल एक वर्ष के अंदर (दो महीने निकल गए) हालात कैसे ठीक किए जा सकते हैं. केंद्र सरकार हुर्रियत के साथ बात करने के लिए तैयार नहीं है. आतंकी संगठनों के साथ बातचीत का सवाल ही पैदा नहीं होता. प्रदर्शनों पर काबू पाने और युवाओं का आक्रोश कम करने के लिए जमीनी स्तर पर कोई कदम नहीं उठाया गया है. फिर हालात एक वर्ष के अंदर कैसे ठीक हो सकते हैं. यह बड़ा अहम सवाल है.

कश्मीर घाटी के राजनीतिक विश्लेषक मोदी सरकार की मौजूदा कश्मीर नीति और सेना प्रमुख से लेकर अमित शाह तक के बयानों की रौशनी में एक अलग तरह की स्थिति बनती देख रहे हैं. उनके अनुसार, नई दिल्ली कश्मीर में सभी मिलिटेंट्स को खत्म करने, प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बेतहाशा ताकत का इस्तेमाल करके उन्हें खामोश करने और हुर्रियत नेताओं की जनता में साख खराब करने की कोशिश कर सकती है. उनकी कोशिश रहेगी कि यहां कब्रिस्तान जैसी खामोशी कायम करके इसे शांति का नाम दिया जा सके. प्रधानमंत्री ने हाल ही में अपने एक बयान के जरिए सेना को निर्देश दिया कि कश्मीर में मौजूद मिलिटेंट्स को दो महीने के अदंर-अंदर खत्म किया जाए. हालांकि नई दिल्ली की मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रधानमंत्री के बयान से पूर्व श्रीनगर में सेना की उच्चस्तरीय बैठक में दक्षिणी कश्मीर के बारह मिलिटेंट कमांडरों की लिस्ट को मंजूरी दे दी गई है.

इन बारह मिलिटेंट कमांडरों में से लश्कर के 6, हिज्ब के 5 और जैश मोहम्मद का 1 कमांडर शामिल है. स्थानीय मीडिया ने इन मिलिटेंट कमांडरो की सूची भी प्रकाशित की है. दूसरी तरफ, सेना प्रमुख पहले ही वार्निंग दे चुके हैं कि फौज और मिलिटेंट्स के बीच झड़पों के दौरान मिलिटेंट्स को भागने का अवसर देने के लिए पथराव करने वाले युवाओं से सख्ती से निपटा जाएगा. इस समय हुर्रियत नेताओं पर आरोप लगाया जा रहा है कि वे पाकिस्तान से सैकड़ों करोड़ रुपए हासिल करके घाटी में हालात खराब करवा रहे हैं. लेकिन अभी तक सरकार इस सिलसिले में कोई ठोस सबूत या दलील पेश करने में असफल साबित हुई है. सोलह मई को इंडिया टुडे ने एक सनसनीखेज वीडियो जारी करते हुए कश्मीर में हवाला स्कैंडल का पर्दाफाश करने का दावा किया. वीडियो में तीन हुर्रियत नेताओं नईम अहमद खान, फारूख अहमद डार और गाजी बाबा को ये स्वीकार करते हुए दिखाया गया कि कश्मीर में हालात खराब करने के लिए पाकिस्तान से सैकड़ों करोड़ रुपए की राशि हुर्रियत नेताओं को मिलती है.

मीडिया ताकतवर या सुरक्षा एजेंसियां

एक आम राय थी कि इस खुलासे के बाद सुरक्षा और जांच एजेंसियां हरकत में आ जाएंगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. दो सप्ताह बाद यानि एक जून को नेशनल इनवेस्टीगेशन एजेंसी (एनआईए) की 50 सदस्यीय कमिटी कश्मीर आई. टीम का नेतृत्व एक एडिशनल डायरेक्टर रैंक के ऑफिसर कर रहे थे. टीम में एक डिप्टी इंस्पेक्टर, दो एसपी और दस डीएसपी शामिल थे. यहां पहुंचने के दो दिन बाद यानी 3 जून को एनआईए की टीम ने विभिन्न व्यापारियों, हुर्रियत नेताओं और पूंजीपतियों के घरों पर छापे मारने का सिलसिला प्रारंभ किया. तीन जून को एनआईए की 10 टीमों ने कुल 18 स्थानों पर छापे मारे. दूसरे दिन, यानि चार जून को अन्य सात स्थानों पर छापे मारे गए. इसके अलावा एनआईए ने दिल्ली और हरियाणा के नौ स्थानों पर भी छापे मारे. दिल्ली में ये छापे ग्रेटर कैलाश, पीतमपुरा और बल्लीमरान में कथित तौर पर हवाला डीलरों के घरों या दफ्तरों पर मारे गए. जम्मू शहर के गैर मुस्लिम व्यापारी के घर पर भी छापा मारा गया. कुल 34 जगहों पर छापे मारे गए.

हैरानी की बात ये है कि इतने बड़े पैमाने पर की गई कार्रवाई के बाद खुद एनआईए की तरफ से जारी किए गए एक बयान में कहा गया कि इन छापों के दौरान केवल एक करा़ेड 15 लाख रुपए नकद, सोने के 85 सिक्के और 40 लाख रुपए के जेवर जब्त किए गए. उल्लेखनीय है कि इन सभी चीजों को केवल एक जगह से नहीं, बल्कि विभिन्न घरों से बरामद किया गया था. विश्लेषकों का कहना है कि एनआईए ने 33 विभिन्न जगहों पर की गई छापेमारी में इतनी मामूली राशि और कुछ लाख रुपए के जेवर बरामद होने की बात कहकर, खुद ही इन आरोपों को संदेहास्पद बना दिया है कि हवाला के द्वारा कश्मीर में हजारों या सैकड़ों करोड़ रुपए लाए जा रहे हैं. विभिन्न जगहों पर जब्त की गई इस मामूली राशि के बल पर कोर्ट में कुछ भी साबित नहीं किया जा सकता है. अगर किसी पूंजीपति या व्यापारी के घर से चंद लाख रुपए जब्त किए भी जाते हैं, तो उस पर अधिक से अधिक चंद लाख रुपए ब्लैकमनी रखने का आरोप लगाया जा सकता है. एनआईए ने छापों के दौरान कई लैपटॉप और मोबाइल फोन भी जब्त कर लिए हैं. उल्लेखनीय है कि जिन पूंजीपतियों या व्यापारियों के यहां छापे मारे गए हैं, उनके पास बाहर के व्यापार का सालाना हजारों करोड़ रुपए का व्हाईट ट्रांजेक्शन है.

ये भी गौर करने वाली बात है कि एनआईए ने इस जांच के लिए एक ओपन एफआईआर दर्ज कर लिया है. यानि किसी भी व्यक्ति को आरोपी नहीं बनाया गया है. इन तथ्यों से स्पष्ट हो जाता है कि दिल्ली के जिन न्यूज चैनलों पर कश्मीर में हवाला स्कैंडल बेनकाब हो जाने के ब़ड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, उनका कोई ठोस सबूत अभी तक सामने नहीं आया है. एनआईए ने विभिन्न घरों से जो कुछ भी जब्त किया है, संभव है कि वो सब अदालत में, जिनका है उनको वापस करना पड़े. यहां ये उल्लेखनीय है कि 2002 में इनकम टैक्स विभाग ने घाटी में बड़े पैमाने पर छापे मारे थे. तब भी कई हुर्रियत नेताओं के घरों से ‘अहम दस्तावेज’ बरामद करने के दावे किए गए थे.

दिल्ली के मीडिया वालों ने बवाल मचाते हुए ये दिखाने की कोशिश की थी कि बहुत बड़ा स्कैंडल बेनकाब हुआ है. लेकिन कुछ दिनों बाद ही खुद इनकम टैक्स विभाग ने वो केस बंद कर दिया. संभव है कि आने वाले चंद सप्ताहों में एनआईए खुद ही उस एफआईआर को खत्म करेगी, जिसके आधार पर इतने बड़े पैमाने पर छापे मारे गए हैं और मीडिया ने इतना बवाल मचा रखा है. देश के गंभीर विश्लेषक इस बात पर हैरान हैं कि अगर सरकार का ये दावा सही है कि कश्मीर में हालात खराब करने के लिए पाकिस्तान से सैकड़ों करोड़ रुपए यहां भेजे जा रहे हैं, तो क्या कारण है कि प्रदेश और केंद्र की सरकार इतने वर्षों में एक ठोस सबूत भी नहीं पेश कर सकी. क्या कारण है कि सरकार की जांच और सुरक्षा एजेंसियां आज तक ये पता लगाने में असफल रही हैं कि इतनी बड़ी राशि कहां से और किन लोगों के द्वारा यहां पहुंचाई जा रही है.

इंडिया टुडे की तरफ से स्टींग ऑपरेशन के बाद ही एनआईए हरकत में क्यों आई? क्या सरकार ऐसे मामले में मीडिया पर निर्भर है? गत एक वर्ष से सरकार की तरफ से कहा जा रहा है कि पथराव करने वालों को पैसा मिलता है. अगर ये सही है, तो जाहिर है इसके पीछे बाकायदा एक नेटवर्क होगा, जो घाटी के कोने-कोने तक पैसा पहुंचाने का काम करता होगा. उस नेटवर्क के साथ बड़ी संख्या में लोग जुड़े होंगे. तो फिर सरकार की एजेंसियां यहां क्या कर रही हैं. दो ही बातें हो सकती हैं कि या तो सरकार और उसकी एजेंसियां नकारा हैं, जो अब तक कुछ पता नहीं लगा सकीं और न कुछ साबित कर सकीं या ये हो सकता है कि इस तरह के सारे आरोप निराधार और झूठ पर आधारित हैं. जहां तक आम कश्मीरियों का ताल्लुक है, वे यही समझते हैं कि सरकार इस तरह के झूठे आरोप लगाकर कश्मीरियों के आंदोलन को बदनाम करने की कोशिश कर रही है.

पिछले 9 जून को घाटी में हुर्रियत के आह्‌वान पर व्यापक हड़ताल हुई. हुर्रियत के कुछ नेताओं ने श्रीनगर में प्रदर्शन का आह्‌वान किया था और उसे असफल बनाने के लिए सरकार को शहर में कर्फ्यू लगाना पड़ा. साफ जाहिर है कि एनआईए के छापों और दिल्ली के न्यूज चैनलों की तरफ से चरित्र हनन के अभियान के बावजूद हुर्रियत का आम लोगों में मान सम्मान है. ये वो सारे तथ्य हैं, जिन्हें दिल्ली का मीडिया छुपा रहा है. ‘चौथी दुनिया’ ने पिछले एक वर्ष से कश्मीर के वास्तविक हालात को ईमानदारी के साथ अपने पाठकों तक पहुंचाने की कोशिश की है.

मिलिटेंट्‌स के साथ जनता की हमदर्दी क्यों?

जहां तक कश्मीर में मिलिटेंसी का सवाल है, तो इसमें कोई शक नहीं है कि कश्मीर घाटी, खासतौर से दक्षिणी कश्मीर में मिलिटेंसी का घेराव बढ़ रहा है. हर गुजरने वाले दिन के साथ इसका दायरा बढ़ता जा रहा है. सरकार की तरफ से कहा जा रहा है कि दक्षिणी कश्मीर में इस वक्त 300 मिलिटेंट्स सक्रिय हैं, लेकिन हमारे सूत्र के अनुसार ये संख्या इससे कहीं ज्यादा है. पुलिस खुद इस बात को स्वीकार कर रही है कि गत तीन वर्ष के विरोध-प्रदर्शन के बाद दर्जनों युवा मिलिटेंट्स के साथ जुड़ गए हैं. स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि दक्षिणी कश्मीर में गत एक वर्ष के दौरान युवाओं ने सुरक्षा बलों और पुलिस से 60 से ज्यादा राइफलें छीन लीं.

सुरक्षा बलों से बंदूकें छीनने की घटनाएं इतने बड़े पैमाने पर पहले कभी देखने को नहीं मिली हैं. इतना ही नहीं, विश्वसनीय सूत्रों ने ‘चौथी दुनिया’ को बताया कि कश्मीर में मिलिटेंट्स के खिलाफ सेना और पुलिस की असफलता का एक बुनियादी कारण आमलोगों का मिलिटेंट्स से हमदर्दी रखना है. मिलिटेंट्स की बस्तियों में तलाश करना फौज के लिए कोई आसान काम नहीं है. उल्लेखनीय है कि 1990 में घाटी में सशस्त्र आंदोलन के बाद यहां जनता ने बड़े पैमाने पर मिलिटेंट्स का साथ दिया था.

हालांकि कुछ सालों बाद मिलिटेंट्स से लोगों की ये हमदर्दी कम होनी शुरू हो गई थी. लेकिन गत एक वर्ष के हालात और घटनाओं को देखें, तो पता चलता है कि मिलिटेंट्स को फिर से जनता का समर्थन मिल रहा है. इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अब अगर कोई मिलिटेंट मारा जाता है, तो उसके नमाज-ए-जनाजा में लोगों की शिरकत को रोकने के लिए सुरक्षा बलों को कड़ी मशक्कत करनी पड़ती है. गत एक-डेढ़ साल से यहां मारे जाने वाले मिलिटेंट्स के जनाजे में हजारों लोगों की शिरकत देखने को मिल रही है. ऐसे मौके पर युवाओं में काफी जोश-ओ-खरोश देखने को मिलता है.

गत एक वर्ष से दिल्ली के कुछ टीवी चैनल लगातार ये प्रोपेगेंडा कर रहे हैं कि कश्मीर में पत्थर फेंकने वालों को पैसे दिए जाते हैं. लेकिन अब घाटी में जगह-जगह स्कूली छात्र-छात्राओं को पथराव करते हुए देखा जा सकता है. इसकी शुरुआत लगभग दो महीने पहले हुई. 15 अप्रैल को सेना ने दक्षिणी कश्मीर के पुलवामा डिग्री कॉलेज में प्रवेश किया था और कथित तौर पर यहां छात्रों के साथ मारपीट की थी. कॉलेज के प्रिंसिपल ने स्थानीय मीडिया को बताया था कि उन्होंने फौज को कॉलेज परिसर में दाखिल होने से मना किया था, लेकिन उनकी एक न सुनी गई. सरकार ने इस घटना की जांच का आदेश दिया था.

लेकिन दूसरी सैकड़ों घटनाओं की जांच की तरह इस घटना की जांच का आदेश भी एक धोखा ही साबित हुआ. आज तक किसी को ये पता नहीं चला कि सेना, प्रिंसिपल और प्रशासन की अनुमति के बगैर कॉलेज परिसर में दाखिल क्यों हुई थी और उसे वहां क्या मिला. लेकिन इस एक घटना के कारण वादी में छात्र-छात्राओं के प्रदर्शन और पथराव का सिलसिला शुरू हो गया. पिछले 25 वर्ष में ऐसा पहली बार हो रहा है कि स्कूल ड्रेस पहने लड़के-लड़कियां सड़कों पर उतरकर सेना पर पथराव कर रहे हैं. छात्र-छात्राओं के हिंसात्मक प्रदर्शन को विदेशी मीडिया भी खुब दिखा रहा है.

कश्मीर में हालात खराब होने का ताल्लुक केवल मिलिटेंसी और पथराव की घटनाओं से ही नहीं जुड़ा है. लाईन ऑफ कंट्रोल पर आए दिन भारत-पाक फौज के बीच गोलीबारी के कारण सीमा पर रहने वाले लोगों की जिंदगी दुश्वार हो गई है. राजौरी जिले के सीमावर्ती क्षेत्र में पिछले कुछ सप्ताह के दौरान पाकिस्तानी गोलाबारी से एक लड़की समेत तीन लोग मारे जा चुके हैं. यहां गोलाबारी से बचने के लिए लगभग 550 परिवारों को प्रवास करने के लिए मजबूर होना पड़ा है. ऐसे परिवारों के 2000 से ज्यादा लोगों को प्रशासन ने पांच विभिन्न कैंपों में पनाह दे रखी है. लाइन ऑफ कंट्रोल पर केवल गोलाबारी ही एक मसला नहीं है, बल्कि यहां हर दूसरे दिन मिलिटेंट्स और फौज के बीच की झड़पें आम बात बन चुकी हैं. इन खबरों को मीडिया द्वारा नजरअंदाज किया जा रहा है. लेकिन कश्मीर के वास्तविक हालात का इस तरह की झड़पों से काफी गहरा सम्बंध है.

कश्मीर को जीतने के लिए चाहिए मोहब्बत या ताकत

सरकार ने एक महीने पहले से घाटी में पाकिस्तानी न्यूज चैनलों पर पाबंदी लगा रखी है. इंटरनेट पर आए दिन बैन लगाया जा रहा है. लेकिन इसके बावजूद शांति और कानून का राज दूर-दूर तक नजर नहीं आता. रोजाना घाटी के किसी न किसी क्षेत्र में सेना और मिलिटेंट्स में झड़पें हो जाती हैं. रोजाना किसी न किसी इलाके में नौजवान हिंसात्मक प्रदर्शन और पथराव करते नजर आते हैं और रोजाना सीमा पर गोलीबारी या घुसपैठ की कोई न कोई घटना होती है. कुल मिलाकर, कश्मीर घाटी की मौजूदा स्थिति का आकलन करना हो, तो कहा जा सकता है कि यहां हर गुजरने वाले दिन के साथ मिलिटेंसी बढ़ रही है. प्रदर्शन और पथराव एक नियमित दिनचर्या का हिस्सा बन चुके हैं और सीमा पर तनाव है. इस स्थिति के बावजूद, अगर गृहमंत्री भरोसे के साथ कह रहे हैं कि एक वर्ष के अंदर कश्मीर के हालात बदल जाएंगे, तो यकीनन हर किसी के मन में ये सवाल पैदा होगा कि कैसे?

एक राय ये भी है कि सरकार कश्मीर में मिलिटेंसी और प्रदर्शनकारियों को कुचलने के लिए बहुत ज्यादा ताकत का प्रयोग करने के बारे में सोच रही है. अगर ऐसा हुआ, तो कहा जा सकता है कि आने वाले चंद महीनों में कश्मीर में हिंसा और तेज हो जाएगी. सेना और पुलिस की तरफ से बहुत ज्यादा मौतें, बहुत ज्यादा जख्म, बहुत ज्यादा गिरफ्तारियां और बहुत हिंसा देखने को मिल सकती है. लेकिन एक सवाल सबके मन में आ रहा है कि क्या इससे सब कुछ ठीक हो जाएगा? हाल के दिनों में जो गंभीर सोच वाले लोग कश्मीर घाटी के दौरे पर आए हैं, उनमें यशवंत सिन्हा, मणिशंकर अय्यर और कमल मोरारका शामिल हैं.

इन लोगों के नेतृत्व में आए प्रतिनिधिमंडल ने यहां आम लोगों से लेकर बड़े-बड़े नेताओं से मुलाकात की और स्थिति की गहराई समझने की कोशिश की. दिलचस्प बात ये है कि वापस जाने के बाद इन सबने भारत सरकार को मशवरा दिया कि कश्मीर को ताकत की जुबान की जगह मोहब्बत की जुबान की जरूरत है. इन लोगों ने भारत सरकार को कश्मीर मुद्दे पर तुरंत बातचीत का सिलसिला शुरू करने की सलाह दी.

संतोष भारतीय, विनोद शर्मा, सीमा मुस्तफा जैसे पत्रकारों ने पिछले एक साल के दौरान कश्मीर घाटी के कई दौरे किए और यहां की स्थिति का जायजा लिया. इन्होंने अपने लेखों के जरिए भारत सरकार को सलाह दी कि कश्मीर समस्या को ताकत की बजाय वार्ता के जरिए हल किया जाय. लेकिन सच तो ये है कि मोदी सरकार कश्मीर को लेकर कोई नरम रवैया अख्तियार करने के मूड में नहीं है. कुछ विश्लेषकों के अनुसार, इसका कारण ये है कि कश्मीर के खिलाफ सख्त रवैया रखने से भाजपा को देश भर में राजनीतिक लाभ हो रहा है. अगर ये सच है, तो यकीन के साथ कहा जा सकता है कि मोदी सरकार की मौजूदा कश्मीर नीति में कोई तब्दीली नहीं आने वाली है. एक साल के अंदर-अंदर हालात बदलने की बात कहकर गृहमंत्री ने शायद यही संकेत दिया है कि यहां मुख्तलिफ आवाजों को दबाने के लिए ताकत का जबरदस्त इस्तेमाल किया जाएगा. यानि कहा जा सकता है कि आने वाले कुछ महीनों के दौरान कश्मीर के हालात और खराब होने की संभावना है.