केजरीवाल की अनसुनी कहानी

पंजाब – से किसने केजरीवाल को मिसलीड और मिसगाइड किया किसने चलाई अपनी मर्ज़ी

गोवा – में जब पंकज गुप्ता प्रभारी थे तब आशीष तलवार को किसके कहने पर गोवा भेजा गया

गुजरात – राष्ट्रपति चुनाव को लेकर क्या  रहेगा रुख, क्या  विपक्षी एकता के हिमायती नहीं हैं केजरीवाल

राजनीति में किसी दल या व्यक्ति के लिए मर्सिया पढ़ने का रिवाज नहीं है. वजह, कब कौन कहां से धूल-मिट्टी झाड़ते हुए फिर से मैदान में आ डटे, किसी को पता नहीं होता. इस लिहाज से आम आदमी पार्टी के अंत की भविष्यवाणी करना या अरविंद केजरीवाल की शौर्य गाथा का बखान करना, दोनों खतरे से खाली नहीं हैं. लेकिन 5 साल पुरानी पार्टी से जुड़े कुछ ऐसे सवाल, कुछ ऐसी कहानियां जरूर हैं, जिसे जानना न सिर्फ दिलचस्प है, बल्कि जरूरी भी है. पढ़िए, चौथी दुनिया की खास रिपोर्ट :

kejriwalये घटना एमसीडी चुनाव परिणाम आने से पहले की है. दिल्ली की सुन्दर नगरी से ही अरविंद केजरीवाल ने सबसे पहले सोशल एक्टिविज्म शुरू किया था. जाहिर है, यहां के सैक़डों ऐसे लोग हैं, जो अरविंद केजरीवाल को और अरविंद केजरीवाल इन लोगों को व्यक्तिगत तौर पर जानते हैं. आज भी पार्टी में इस क्षेत्र के काफी लोग सक्रिय रूप से जु़डे हुए हैं. उसी सुंदर नगरी के कुछ लोग अरविंद केजरीवाल से मुलाकात का समय चाह रहे थे. ये लोग बार-बार एप्वायंटमेंट लेने के लिए मुख्यमंत्री आवास जा रहे थे.

लेकिन इन्हें न तो एप्वायंटमेंट मिल रहा था और न ही अरविंद केजरीवाल से मुलाकात हो पा रही थी. काफी दिनों बाद ये लोग अरविंद केजरीवाल की पत्नी सुनीता केजरीवाल तक अपनी बात पहुंचाने में सफल होते हैं. जैसे ही अरविंद केजरीवाल को अपनी पत्नी के माध्यम से यह पता चलता है कि सुन्दर नगरी के लोग उनसे मिलने की कोशिश कर रहे हैं और उन्हें एप्वायंटमेंट नहीं मिल पा रहा है, वे गुस्से में आ जाते हैं. आनन फानन में उन लोगों को मुख्यमंत्री आवास बुलाया जाता है और अरविंद केजरीवाल इन लोगों से मिलते हैं.

इस छोटी सी कहानी का सार ये है कि सत्ता वो शय है, जो कई बार आपको खुद की खबर भी नहीं लगने देती. ऐसा ही कुछ अरविंद केजरीवाल के साथ भी हुआ. लेकिन सवाल ये है कि जिस सत्ताई एलिटिजम के खिलाफ आप खड़े हुए, खुद उसी में कैसे फंस गए? फंस गए इसलिए, क्योंकि जाहिर तौर पर सुंदर नगरी के उन लोगों को एप्वायंटमेंट न देने के पीछे कुछ ऐसे लोगों की संलिप्तता रही होगी, जो ये तय करने में खुद इतने सक्षम हैं कि अरविंद केजरीवाल को किससे मिलना है और किससे नहीं मिलना है.

इस कहानी से ‘आप’ की कहानी शुरू करने की जरूरत क्यों पड़ी? इसलिए कि अगर आम आदमी पार्टी की समीक्षा सिर्फ उन तर्कों और तथ्यों के सहारे की जाए, जो सालों से मीडिया और सोशल मीडिया में तैर रहे हैं, तो ये समीक्षा, समीक्षा न रह कर कुछ और बन जाएगी. चौथी दुनिया ने अपनी पड़ताल में कुछ ऐसे नए तथ्य और कहानियों को सामने लाने की कोशिश की है, जिनके जरिए आम आदमी पार्टी की मौजूदा स्थिति को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है.

मसलन, गोवा और पंजाब में किन नेताओं का अहम पार्टी की हार का कारण बना. महज 313 जिलों में जिस पार्टी की डिस्ट्रिक्ट कमेटी थी, उसने 400 से अधिक लोकसभा क्षेत्रों में चुनाव लड़ने का साहस क्यों और कैसे किया? संगठनात्मक स्तर पर पहले क्या गलतियां हुईं और अब उसे सुधारने की क्या कोशिशें हो रही हैं आदि.

313 जिलों में जिला कमेटी, फिर 400 लोकसभा क्षेत्रों से उम्मीदवार किसने उतारे

सबसे पहले इस तथ्य पर नजर डालते हैं कि आम आदमी पार्टी ने ऐसी क्या उम्मीदें जगाई थी, जिस पर जनता ने भरोसा कर के उसे दो-दो बार दिल्ली की गद्दी सौंपी. जनता को उम्मीद थी कि आम आदमी पार्टी राजनीति का बेहतर और स्वच्छ विकल्प बनेगी. पार्टी पारदर्शी तरीके से काम करेगी. चन्दे से लेकर टिकट वितरण तक में पारदर्शिता आएगी, जिससे आम आदमी की राजनीति में सहभागिता बढ़ेगी. ये पार्टी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ेगी. आम आदमी पार्टी की सरकार जन समस्याओं पर ध्यान देगी.

सत्ता का विकेन्द्रीकरण होगा. लेकिन 49 दिनों की सरकार के बाद जब अचानक आम आदमी पार्टी ने लोकसभा चुनाव लड़ने की घोषणा की, तब ‘आप’ के मतदाताओं को एक झटका लगा. जनता ने तो दिल्ली की सरकार चलाने के लिए इन्हें जनादेश दिया था. फिर सरकार से निकलने और लोकसभा चुनाव लड़ने की घोषणा का क्या अर्थ था? यहां सवाल ये भी है कि एक अपेक्षाकृत नई पार्टी के पास क्या राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा कोई मजबूत संगठन था, जिसके सहारे इसने देश भर के 400 से अधिक लोकसभा क्षेत्रों से चुनाव लड़ने की हिम्मत दिखाई?

दरअसल, लोकसभा चुनाव से पहले आम आदमी पार्टी के तब के संरक्षक शांति भूषण ने दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में एक जोशीला भाषण देते हुए कहा था कि जनता बार-बार मौका नहीं देती. इसलिए हमें इस मौके को नहीं गंवाना चाहिए. तब पार्टी के वरिष्ठ नेता योगेन्द्र यादव भी चाहते थे कि पार्टी देश भर में लोकसभा का चुनाव लड़े. पार्टी ने तैयारी शुरू की. संगठन से जुड़े लोगों की सूची निकाली गई. पता चला कि सिर्फ 313 जिलों में ही पार्टी की डिस्ट्रिक्ट कमेटी बन पाई है.

ध्यान देने की बात यह है कि इन जिला कमेटियों में ज्यादातर ऐसे लोग थे, जो अन्ना आंदोलन के वक्त जुड़े थे और बाद में पार्टी बनने पर पार्टी की जिला इकाई से जुड़ गए. दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु जैसे कुछ जगहों के अलावा कहीं भी पार्टी का मजबूत संगठन नहीं था. छिटपुट तरीके से कुछ नाम जरूर पार्टी के साथ जुड़े हुए थे, वो भी सिर्फ लोकसभा का चुनाव लड़ने के लिए. इसके बावजूद, योगेन्द्र यादव की सलाह पर आम आदमी पार्टी ने 400 से अधिक लोकसभा क्षेत्रों से अपने उम्मीदवार उतार दिए. खुद केजरीवाल बनारस से चुनाव लड़ने चले गए.

चुनाव नतीजा आया, तो पता चला कि बनारस और पंजाब को छोड़ कर तकरीबन हर सीट पर पार्टी की जमानत जब्त हो गई. जाहिर है, अन्ना आंदोलन से केजरीवाल को जो ग्लैमर हासिल हुआ था, वो लोकसभा चुनाव के परिणाम में नहीं बदल पाया. इसके अलावा, तत्कालीन राजनीतिक माहौल भी ऐसा था, जहां चुनाव लड़ने का दांव भी राजनीतिक रूप से आम आदमी पार्टी के लिए उल्टा पड़ गया. मीडिया और जनता के बीच केजरीवाल को भगोड़ा तक कहा जाने लगा.

पर्सेप्शन की लड़ाई में पिछड़े

लेकिन तब भी दिल्ली की जनता का विश्वास शायद आम आदमी पार्टी से पूरी तरह से डिगा नहीं था. नतीजतन, लोकसभा चुनाव के एक साल बाद ही दिल्ली में फिर से विधानसभा के चुनाव हुए और जनता ने आम आदमी पार्टी को दूसरा मौका दिया. पार्टी ने 70 में से 67 सीटें हासिल की. लेकिन दो साल बीतते-बीतते ऐसा क्या हुआ कि आम आदमी पार्टी को पंजाब से लेकर गोवा और फिर दिल्ली नगर निगम चुनाव में एक के बाद एक जबरदस्त हार का सामना करना पड़ा?

दरअसल, इन दो सालों में इस सरकार ने जितने अच्छे काम किए (बिजली-पानी-हेल्थ-एजुकेशन क्षेत्र में) उससे कहीं ज्यादा विवादों में फंसती चली गई. पहले मंत्रियों से जुड़े विवाद, उपराज्यपाल और केन्द्र के साथ तनातनी, मीडिया के साथ खट्टे-मीठे रिश्ते, केंद्र सरकार के खिलाफ हमलावर रवैये आदि की वजह से खुद अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी के बारे में मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक में एक निगेटिव पर्सेप्शन क्रिएट हुआ.

दिल्ली के पूर्ण राज्य न होने के कारण वे उपराज्यपाल के साथ पटरी बिठा कर काम नहीं कर सके, जिससे कई सारे अनावश्यक विवाद भी खड़े हुए. मोदी सरकार पर हमलावर रहने के कारण केजरीवाल और आम आदमी पार्टी की इमेज जनता और मीडिया के बीच सबसे ज्यादा खराब हुई. जनता को लगने लगा कि वे काम कम करते हैं, विवाद की राजनीति अधिक करते हैं. इसका नतीजा एमसीडी चुनाव परिणाम में देखने को मिला.

गुप्ता प्रभारी, तलवार प्रभारी पार्टी हारी

लेकिन दिल्ली से इतर एक बड़ा सवाल पंजाब और गोवा से जुड़ा है. सबसे पहले बात करते हैं, गोवा की. गोवा की कहानी ये है कि पार्टी के राष्ट्रीय सचिव पंकज गुप्ता गोवा के प्रभारी बनाए गए थे. गुप्ता शरीफ और मृदुभाषी नेता हैं. वे चुपचाप अपना काम करते हैं और तिकड़म से दूर रहते हैं. गोवा में पार्टी का अस्तित्व तो था, लेकिन वॉलंटियर्स नहीं थे. दूसरी तरफ, कर्नाटक के आम आदमी पार्टी प्रभारी पृथ्वी रेड्डी के पास वॉलंटियर्स की अच्छी-खासी संख्या है. उस समय उन्होंने अपने करीब 200 फुलटाइम वॉलंटियर्स को गोवा भेजा. महाराष्ट्र से भी वॉलंटियर्स आए. इसके बावजूद, स्थानीय स्तर पर पार्टी गतिविधि में वो तेजी नहीं आ रही थी, जिसकी जरूरत थी. इसके बाद ही, ग्राउंड से मिली एक सिक्रेट रिपोर्ट के आधार पर अरविंद केजरीवाल ने आशीष तलवार को प्रभारी बनाकर गोवा भेजा.

गोवा में पार्टी की हालत यहीं से बिगड़ने लगी. कुमार विश्वास की रैली गोवा में कब हो, कहां हो, कितनी हो, इतनी साधारण सी बात को लेकर भी पंकज गुप्ता और आशीष तलवार के बीच कोऑर्डिनेशन नहीं बन पाता था. पंकज कुछ कहते, तो आशीष कुछ और. इस चक्कर में वॉलंटियर्स भी कन्फ्यूज्ड हो गए. पार्टी ने बहुत देर करते हुए सीएम पद के लिए एल्विस गोम्स का नाम तय किया. अरविंद केजरीवाल और कुमार विश्वास की एक-दो रैली में भीड़ तो जुटी, लेकिन ये भीड़ संगठन क्षमता की वजह से नहीं, बल्कि केजरीवाल और कुमार विश्वास के खुद के ग्लैमर की वजह से आई थी.

आम आदमी पार्टी के रोड शो में गिनती के लोग होते थे. अन्य नेताओं की रैली में भी भीड़ नहीं होती थी. केजरीवाल की रैली में आई भीड़ वोट में बदले, इसके लिए पार्टी के पास संगठनात्मक क्षमता मौजूद नहीं थी. संगठन को मजबूत बनाने वाले लोगों के बीच जो आपसी समन्वय चाहिए था, वो भी नदारद था. नतीजा ये हुआ कि गोवा में पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली और करारी हार का सामना करना पड़ा.

ओवरकॉन्फिडेंट कैप्टेन के ओवरकॉन्फिडेंट व्यवहार का परिणाम था पंजाब

अब बात पंजाब की. पंजाब में चुनाव से पहले ही मीडिया सर्वे से लेकर तमाम राजनैतिक बहसों में ये बताया जाता था कि आम आदमी पार्टी वहां सबसे आगे है. फिर ऐसा क्या हो गया कि आम आदमी पार्टी पंजाब में तीसरे नंबर की पार्टी बन कर रह गई. दरअसल, एक लाइन में कहें तो पंजाब को जीतने की जिम्मेदारी उन लोगों को सौंप दी गई थी जिन्हें पंजाब का ‘प’ तक नहीं मालूम था.

चौथी दुनिया को मिली जानकारी के मुताबिक, जिस दुर्गेश पाठक को पंजाब की जिम्मेदारी दी गई, उसने न केवल पार्टी आलाकमान को मिसलीड किया, बल्कि पंजाब में संगठन बनाने, उम्मीदवारों के चयन और प्रचार अभियान तक में अपनी मनमर्जी चलाई. दुर्गेश पाठक पंजाब में पार्टी के उप प्रभारी थे और संजय सिंह प्रभारी. लेकिन पाठक वहां चुनाव से करीब एक साल पहले से कैंप किए हुए थे. संजय सिंह वहां तभी जाते थे, जब कोई बैठक आदि करनी होती थी. अरविंद केजरीवाल चुनाव के एक महीने के दौरान वहां नियमित कैंपेन करते रहे.

इससे पहले उन्होंने पंजाब में कुछ रैलियां ही की थी. यानि, कुल मिलाकर पार्टी और आलाकमान पंजाब की ग्राउंड रियलिटी के लिए सिर्फ और सिर्फ दुर्गेश पाठक के फीडबैक पर ही निर्भर थे. चुनाव से काफी पहले पंजाब के गांवों की दीवारों को आम आदमी पार्टी के नारों और चुनाव चिन्ह से पाट दिया गया था. जहां देखिए, वहां सिर्फ ‘आप’. इससे लोगों को लगा कि पार्टी यहां काफी मजबूत स्थिति में है, लेकिन हकीकत कुछ और ही थी. स्थानीय स्तर पर संगठन बनाने का काम उतने आक्रामक तरीके से नहीं हुआ, जितने आक्रामक तरीके से पंजाब की दीवारों को पार्टी के रंग में रंगने का काम किया गया था.

टिकट वितरण का काम भी दुर्गेश पाठक से मिले फीडबैक और संस्तुति के आधार पर ही किया गया. इस मामले में भी दुर्गेश पाठक ने सिर्फ और सिर्फ अपनी मर्जी चलाई. ऐसे बहुत लोगों को भी टिकट मिल गया जिनके पास सिर्फ बहुत पैसा था. गौरतलब है कि पंजाब विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के उम्मीदवारों ने अच्छा-खासा पैसा खर्च किया. लेकिन इनमें से ज्यादातर ऐसे पैसे वाले उम्मीदवार थे, जो सिर्फ चुनाव लड़ने के लिए मैदान में ताल ठोक रहे थे.

इनके पास सामाजिक और राजनीतिक अनुभव नहीं था. वे सिर्फ पैसा खर्च कर सकते थे और किया भी. पार्टी ने दिल्ली से वॉलंटियर्स भेजे, विधायक भेजे, लेकिन दिक्कत ये थी कि इन लोगों को भी वहां जाकर सिर्फ और सिर्फ दुर्गेश पाठक के इशारों पर ही काम करना पड़ता था. वहां कायदे से बूथ मैनेजमेंट के लिए सर्वे करने, लोगों को चिन्हित करने आदि का काम करना था, जो चुनाव होने-होने तक नहीं हो सका था.

दिल्ली से गए वॉलंटियर्स, विधायक और वहां के उप प्रभारी दुर्गेश पाठक के बीच कहीं कोई कोऑर्डिनेशन नाम की चीज नहीं थी. सब अपने-अपने हिसाब से काम कर रहे थे. एक और दिक्कत थी. पंजाबी अपनी भाषा, अपनी संस्कृति, अपनी पंजाबियत से प्यार करते हैं. दिल्ली से गए वॉलंटियर्स, विधायक और खुद दुर्गेश पाठक इस बात को नहीं समझ पाए. वे स्थानीय स्तर पर युवाओं को अपने साथ जोड़ने में असफल रहे. गांवों के पंजाबी भाषी लोग इनकी हिन्दी सुन कर प्रभावित भी नहीं होते थे. लेकिन शायद दुर्गेश पाठक को ये लगा कि लोकसभा चुनाव के समय जैसे इन्हें झटके में 4 सीटें मिल गई थीं, वैसे ही विधानसभा चुनाव में भी ये बाजी मार लेंगे.

लेकिन ऐसी स्थिति आ गई कि चुनाव से दो दिन पहले इनके कई स्थानीय कार्यकर्ता अकाली दल और कांग्रेस के साथ चले गए. नतीजा यह हुआ कि सैकड़ों बूथों पर इनके लोग तक नहीं दिखे. चुनाव नतीजों के बाद, संजय सिंह पर कई तरह के आरोप लगे, वहीं दुर्गेश पाठक साफ बच कर निकल गए. जबकि मुख्य जिम्मेवारी इन्हीं की थी, जिसे निभाने में ये बुरी तरह असफल रहे. आम आदमी पार्टी की पंजाब की हार दरअसल भ्रामक, गलत सूचना और ओवरकॉन्फिडेंट कैप्टेन (दुर्गेश पाठक) के ओवरकॉन्फिडेंट व्यवहार का भी नतीजा है.

क्या विपक्षी एकता के हिमायती नहीं हैं केजरीवाल

हालांकि, ओवरकॉन्फिडेंट होने की ये कहानी सिर्फ यही नहीं थमती और न सिर्फ पंजाब और गोवा से शुरू होती है. इस ओवरकॉन्फिडेंस का शिकार पार्टी का शीर्ष नेतृत्व भी हुआ है. उदाहरण के लिए, मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में जहां विपक्ष एकदम कमजोर पड़ा है और विपक्षी एकता की बात हर जगह से सुनाई दे रही है, वैसी स्थिति में भी अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी अकेले केंद्र सरकार के खिलाफ लगातार हमलावर बनी है. पिछले दो साल में अरविंद केजरीवाल सिर्फ नीतीश कुमार और ममता बनर्जी से मिले, लेकिन तमाम विपक्ष के नेताओं से दूरी बनाए रहे. पार्टी सिर्फ प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मोदी सरकार पर हमले करती रही.

नतीजा यह हुआ कि संसद से सड़क तक की लड़ाई में पार्टी अकेली रह गई. हाल  में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने विपक्षी नेताओं की एक बैठक बुलाई थी. लेकिन उस बैठक में आम आदमी पार्टी को नहीं बुलाया गया. इसके पीछे राजनैतिक कारण हो सकते हैं. ये हो सकता है कि चूंकि अभी तक की चुनावी लड़ाई में आम आदमी पार्टी ने सीधे-सीधे कांग्रेस और भाजपा को ही टक्कर दिया है. कांग्रेस आम आदमी पार्टी को अपने लिए एक मुखर प्रतिद्वन्द्वी (दिल्ली के नजरिए से) मानती है. शायद केजरीवाल खुद भी ये चाहते हैं कि विपक्ष के साथ मिलने से अच्छा है कि अकेले ही चला जाए, यानि खुद को मोदी के बरक्स पेश किया जाए.

हालांकि ये इतना आसान भी नहीं होगा. लेकिन उनकी इस सोच का असर ये हो रहा है कि एक मुखर विरोधी आवाज नक्कारखाने में तूती बन कर रह गई है. अब देखना यह होगा कि राष्ट्रपति चुनाव में पार्टी की क्या भूमिका होती है? आम आदमी पार्टी किसे अपना समर्थन देती है. इससे भी आने वाले वक्त की राजनीतिक तस्वीर बहुत हद तक साफ होगी. लेकिन अब तक की अपनी राजनीति की वजह से आम आदमी पार्टी एक ऐसे पर्सेप्शन की लड़ाई में पिछड़ती जा रही है, जो मीडिया और सोशल मीडिया से बहुत हद तक प्रभावित हो रही है.

भूल सुधारने या छवि सुधारने की कवायद

बहरहाल, पंजाब, गोवा और एमसीडी चुनाव परिणाम के बाद आम आदमी पार्टी को कम से कम यह समझ में आया है कि राजनीति दरअसल पर्सेप्शन की भी एक लड़ाई होती है और इस लड़ाई में वे काफी पिछड़ गए हैं. पार्टी ने एक बार फिर खुद को अपनी पुरानी छवि में ढालने का काम शुरू कर दिया है. इसके संकेत केजरीवाल की हाल की कुछ गतिविधियों से मिलते हैं. हाल में पंजाब में उनका 4 दिन का दौरा प्रस्तावित था. लेकिन इस 4 दिन के दौरे को उन्होंने 1 दिन में समेट दिया. सिर्फ एक दिन के लिए वे अमृतसर गए और वहां पार्टी कार्यकर्ताओं से मुलाकात कर वापस दिल्ली लौट गए. इन दिनों केजरीवाल दिल्ली के ग्रामीण इलाकों में घूम-घूमकर लोगों से मिल रहे हैं.

अपने मंत्रियों और विधायकों से भी उन्होंने जनता के बीच रहने और जनता से मिलने के लिए कहा है. ये सभी काम इसलिए भी किए जा रहे हैं क्योंकि उन पर ये आरोप लग रहा था कि वे दिल्ली से ज्यादा देश के दूसरे राज्यों पर फोकस करते हैं. केजरीवाल जनता के इस पर्सेप्शन को झूठ साबित करना चाहते हैं. वे अब  प्रधानमंत्री पर भी सीधे हमला करने से बच रहे हैं. एक तरह से कहें, तो इस मामले में वे साइलेंट मोड में हैं. हालांकि ईवीएम के मुद्दे को लेकर उनकी पार्टी चुनाव आयोग पर लगातार हमलावर है.

संगठनात्मक स्तर पर भी पार्टी बड़े बदलाव करने जा रही है. दिल्ली के नए प्रभारी गोपाल राय करीब डेढ़ लाख पार्टी पदाधिकारियों की नियुक्ति करने जा रहे हैं. ये नियुक्तियां बूथ लेवल तक की होंगी. बाकायदा इन लोगों को नियुक्ति पत्र देकर मंडल अध्यक्ष, बूथ प्रभारी, क्षेत्र प्रभारी आदि बनाया जाएगा. पहले इस तरह की नियुक्ति पार्टी ने नहीं की थी. सूत्रों के मुताबिक, ऐसे जमीनी कार्यकर्ता, जो पार्टी से रूठे हुए हैं या पार्टी छोड़ चुके हैं, उन्हें भी मनाने की कोशिश की जाएगी.

यानि, कुल मिला कर देखें तो आम आदमी पार्टी अब दिल्ली पर ज्यादा फोकस करने के मूड में है. पार्टी पर्सेप्शन की उस ल़डाई में खुद को फिर से वापस लाना चाहती है, जिसमें वो काफी पिछड़ चुकी है. अब आम आदमी पार्टी इसमें सफल होती है या नहीं, ये तो आने वाले समय में पता चलेगा, लेकिन इसका संकेत अगले कुछ महीनों में मिल जाएगा. इंतजार कीजिए, ये देखने के लिए कि राष्ट्रपति चुनाव और गुजरात चुनाव को लेकर पार्टी का क्या रुख  रहता है?