फेक न्यूज़ से सावधान जानिए क्या है फेक न्यूज़

फेक न्यूज़ एक व्यापक श्रेणी है. इसकी कई उपशाखाएं हैं. एक शाखा है, फेक तस्वीरों की. कई नेताओं के ट्वीट से लेकर सरकार की रिपोर्ट तक में फेक तस्वीरें पहुंच जाती हैं और वहां से आप लोगों के बीच. हाल ही में भारत के गृहमंत्रालय की 2016-17 की सालाना रिपोर्ट के पेज नंबर 40 पर यह जानकारी दी गई कि जो अंतरराष्ट्रीय सीमा है, वहां पर 2043 किमी तक तेज़ रौशनी की व्यवस्था करने की मंज़ूरी प्रदान की गई है, सिर्फ 100 किमी ही काम बाकी रह गया है, बाकी हो गया है. इसे दिखाने के लिए गृहमंत्रालय की रिपोर्ट में एक तस्वीर लगाई गई जिसके नीचे लिखा हुआ है, सीमा पर तेज़ रौशनी की व्यवस्था. जिसे आप देखकर समझेंगे कि वाह ये तो कमाल ही हो गया.

fake newssकिसी के लिए भी ये पता लगाना बड़ी चुनौती है कि फेक न्यूज़ है या नहीं. राजनीतिक विचारधारा से प्रेरित हो कर कई वेबसाइट मौजूद हैं, जो न्यूज़ संगठन के भेष में आपके साथ छल कर रही हैं. भारत में इस तरह की कई वेबसाइट हैं जिनके नाम इस तरह से रखे गए हैं, जिन्हें देखकर लगता है कि कोई न्यूज़ संगठन होगा. दिक्कत ये है कि इनकी चोरी पकड़ लेने के बाद भी जो सफाई होती है, वो उस झूठ का पीछा नहीं कर पाती है जो बहुत दूर निकल चुकी होती है.

फेक न्यूज़ खासकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करने लगा है. इसके ज़रिए कहीं सांप्रदायिक तनाव पैदा किया जा रहा है, तो कहीं किसी दल के नेता को लगातार बदनाम किया जाता रहता है. सूचनाओं को पहले न्यूज़ की शक्ल में भेजा जाता है. कई महीनों तक फैलाने के बाद उसी सूचना का चुटकुला बनाकर फिर से भेजा जाता है, ताकि आप बार-बार देखते रहे हैं कि जवाहर लाल नेहरू का असली नाम क्या था और वे कहां से आते थे.

15 मई 2016 को टाइम्स ऑफ इंडिया की अमूल्या गोपालकृष्णनन ने नेहरू के नाम पर फैलाए जा रहे झूठ को लेकर एक रिपोर्ट छापी. नेहरू भी फेक न्यूज़ वालों के तंत्र से नहीं बच सके. ‘जवाहर एक अरबी शब्द का नाम है, कोई कश्मीरी ब्राह्मण अपने बच्चे का अरबी नाम रख ही नहीं सकता है. नेहरू के दादा गियासुद्दीन ग़ाज़ी थे, मुग़लों के कोतवाल थे जिन्होंने अपना नाम गंगाधर नेहरू रख लिया. नेहरू का जन्म इलाहाबाद की वेश्याटोली में हुआ था. नेहरू ने एक कैथलिक नन को गर्भवती कर दिया था, चर्च ने उस नन को भारत से बाहर भेज दिया जिसके लिए नेहरू आजीवन चर्च के आभारी रहे.’

पहले तो यह सवाल आप ख़ुद से पूछिए कि क्या आपने कभी व्हाट्सऐप या इंटरनेट पर नेहरू से संबंधित इस तरह की फेक जानकारी देखी है. इस वक्त जब भारत में 16वें प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी का शासन चल रहा है, तब किसी को पहले प्रधानमंत्री की वंशावली या उन्हें मुग़ल बताने में क्या दिलचस्पी हो सकती थी. एक पूरा राजनीतिक तंत्र लगा रहा नेहरू के बारे में इस तरह की बातों को फैलाने में. यह साल भर से ज़्यादा समय से चल रहा था.

लेकिन जब अमूल्या ने इन तथ्यों की जांच की तब कुछ लोगों तक यह बात पहुंची, क्योंकि तब तक फेक न्यूज़ के गिरोह से लड़ने वाला अल्ट न्यूज डॉट इन नहीं आया था. यू ट्यूब पर भी नेहरू को लेकर कई तरह के वीडियो बनाए गए हैं, जिनमें फेक तथ्यों का इस्तेमाल किया गया है. एक वीडियो का ज़िक्र है, जिसका टाइटल है हिन्दुस्तान का सबसे अय्याश आदमी. जिसे 40 लाख लोगों ने देखा था. मकसद है कि नेहरू की साख को ख़त्म करते रहा जाए.

नेहरू को लगातार बदनाम किया जा रहा है. नेहरू दुनिया में नहीं हैं. इसलिए 2019 में उनके प्रधानमंत्री का चुनाव उम्मीदवार बनने की कोई संभावना भी नहीं है, फिर एक राजनीतिक तंत्र क्यों नेहरू को बदनाम करता जा रहा है. नेहरू के बारे में ऐसी ग़लत सूचनाओं को न्यूज़ की शक्ल में पेश किया गया ताकि लाखों लोग देख सकें और नेहरू के प्रति घृणा फैलती रहे. इनमें से अधिकांश फेक न्यूज़ था. मकसद था कि नेहरू को कश्मीरी ब्राह्मण से मुसलमान बना दो. अय्याश बता दो. एक वीडियो में बताया गया है कि नेहरू की मौत एड्स से हुई थी. जैकलीन केनेडी और मृणालिनी साराभाई की तस्वीरें लगाकर नेहरू को अय्याश दिखाया गया. फोटोशॉप का इस्तेमाल हुआ. विकिपीडिया में नेहरू और उनके पिता मोतीलाल नेहरू को लेकर जानकारियां बदल दी गईं.

टाइम्स ऑफ इंडिया ने सेंटर फॉर इंटरनेट एंड सोसाइटी के प्राणेश प्रकाश के हवाले से लिखा है कि सरकार के आईपी एड्रेस से यह बदलाव किया गया. 24 जनवरी 2016 की स्क्रोल डॉट इन की एक खबर है. जब नेताजी के पेपर सार्वजनिक किए गए, तो उनमें से कुछ भी ख़ास नहीं निकला मगर उसके हवाले से नेहरू के नकली पत्र बनाकर व्हाट्सऐप के ज़रिए बांटा जाने लगा, जिसके झांसे में पत्रकार तक आ गए. जब पता चला तो सबने डिलिट करना शुरू कर दिया और माफी मांगनी शुरू कर दी. जबकि इस तरह का कोई पत्र ही नहीं था.

फेक न्यूज़ का एक रूप यह भी है कि आज के समय में आपको फेक न्यूज़ देना और इतिहास के तथ्यों को भी फेक कर देना. सोचिए इस तरह से आप न तो आज के बारे में सही जान पाएंगे और न बीते हुए कल के बारे में. इंटरनेट पर नेहरू के बारे में फेक जानकारियां भरी जा रही हैं. आपका बच्चा स्कूल-कॉलेज के प्रोजेक्ट के लिए जब डाउनलोड करेगा तो ग़लत जानकारियां लिख आएगा. हो सकता है कि राजनीतिक विचारधारा से प्रेरित शिक्षक उन्हीं जानकारियों पर उसे नंबर भी दे दें और वो पूरी ज़िंदगी इस यकीन में जीता रहेगा कि जो जानता है वह सही था जबकि वो फेक था. फेक न्यूज़ और फेक वीडियो के कारण कई जगह सांप्रदायिक हिंसा हुई है, हत्या हुई है और संपत्तियों को नुकसान भी पहुंचा है. लेकिन इसी फेक न्यूज़ के ज़रिए इतिहास की सबसे बड़ी हिंसा से जुड़ी जानकारी को ही मिटाने की कोशिश की गई.

आपने हाल ही में देखा था कि प्रधानमंत्री मोदी इज़रायल दौरे पर होलोकॉस्ट मेमोरियल गए थे. जहां उन्होंने इतिहास का एक क्रूरतम अध्याय बताया था. लेकिन गार्डियन अखबार की कैरोल कैडवॉलडर ने नोटिस किया कि गूगल के सर्च में यह डालने पर कि क्या सच में हालोकॉस्ट हुआ था? तो जवाब आता है कि होलोकॉस्ट हुआ ही नहीं था और सर्च रिज़ल्ट एक नव नात्ज़ी वेबसाइट स्टॉर्मफ्रंट डॉट ओआरजी पर ले जाता है, जहां इस तरह की बातें लिखी हैं कि चोटी के दस कारण कि होलोकॉस्ट हुआ ही नहीं था. 11 दिसंबर 2016 के अपने लेख में कैरोल ने इस पर विस्तार से बात की है, जो गार्डियन अखबार में छपा है. उन्होंने बताया है कि यू ट्यूब पर भी इस तरह के कई वीडियो हैं.

जबकि किताबों और ऐतिहासिक दस्तावेज़ों में यह बात दर्ज़ है कि हिटलर ने साठ लाख लोगों को मरवा दिया था. कैरोल ने जब यह सवाल उठाया तो उसके बाद गूगल ने सुधार कर दिया, लेकिन सोचिए इंटरनेट पर ऐसे कितने ऐतिहासिक साक्ष्यों को बदल दिया गया होगा. उसी तरह जैसे सरकारें इतिहास की किताबों को बदल देती हैं. आप सोचते हैं कि यह आपके और आपके बच्चे के लिए महत्वपूर्ण सवाल नहीं है. क्या आप इतने समझदार माता पिता हैं, जो अपने बच्चों को फेक न्यूज़ और फेक हिस्ट्री की विरासत खुशी-खुशी देना चाहता है.

पिछले साल बज़फीड नाम की वेबसाइट ने 5 बड़ी फेक न्यूज़ की एक लिस्ट बनाई थी, मसलन-

  1. ओबामा ने देश के सभी स्कूलों में निष्ठा की शपथ लेने पर रोक लगाने के आदेश दे दिए हैं. इसे फेसबुक पर 21 लाख बार शेयर किया गया.
  2. पोप फ्रांसिस ने डोनाल्ड ट्रंप की उम्मीदवारी का समर्थन किया, इसे 9 लाख बार शेयर किया गया.

एक और दिलचस्प तथ्य है. अमेरिकी अखबार द सन क्रॉनिकल के टॉम रिली ने 29 जून, 2017 को अपने एक संपादकीय में लिखा कि एसोसिएडेट प्रेस जैसी बड़ी संस्था भी फेक न्यूज़ का शिकार हुई है. जबकि यह संस्था 171 साल पुरानी है. दुनिया भर के 1700 अख़बारों, 5000 टीवी और रेडियो ब्रॉडकास्ट एपी की स्टोरी छापते हैं. तो सोचिये कहां-कहां फेक न्यूज़ पहुंच जाता होगा. ये उस संस्था का हाल है, जिसके 120 देशों में 243 न्यूज़ ब्यूरो हैं. भारत के आठ दस टीवी चैनल मिला देंगे, तो भी इतने रिपोर्टर नहीं होंगे.

एसोसिएटेड प्रेस ने यह बात स्वीकार की है कि उसकी कुछ ऐसी ख़बरें भी थीं, जो न्यूज़ नहीं थीं. इसलिए एपी ने एक नया न्यूज़ फीचर शुरू किया है, नॉट रियल न्यूज. इसके तहत ऐसी फेक न्यूज़ का पर्दा़फाश किया जाएगा जो ट्वीटर या दूसरे प्लेटफॉर्म पर वायरल हुईं. फिर भी यह काम किसी बड़ी झील को छलनी से सा़फ करने जैसा है.

फेक न्यूज़ एक व्यापक श्रेणी है. इसकी कई उपशाखाएं हैं. एक शाखा है, फेक तस्वीरों की. कई नेताओं के ट्वीट से लेकर सरकार की रिपोर्ट तक में फेक तस्वीरें पहुंच जाती हैं और वहां से आप लोगों के बीच. हाल ही में भारत के गृहमंत्रालय की 2016-17 की सालाना रिपोर्ट के पेज नंबर 40 पर यह जानकारी दी गई कि जो अंतरराष्ट्रीय सीमा है, वहां पर 2043 किमी तक तेज़ रौशनी की व्यवस्था करने की मंज़ूरी प्रदान की गई है, सिर्फ 100 किमी ही काम बाकी रह गया है, बाकी हो गया है.

इसे दिखाने के लिए गृहमंत्रालय की रिपोर्ट में एक तस्वीर लगाई गई जिसके नीचे लिखा हुआ है, सीमा पर तेज़ रौशनी की व्यवस्था. जिसे आप देखकर समझेंगे कि वाह ये तो कमाल ही हो गया. लेकिन जब 14 जून को अल्ट न्यूज डॉट इन ने इस तस्वीर को झूठ बताते हुए रिपोर्ट छापी, तो सब हैरान रह गए.

आखिर गृहमंत्रालय की रिपोर्ट में फेक तस्वीर कैसे जा सकती है, आई कहां से. क्या ये रिपोर्ट गूगल सर्च करके बनाई जा रही थी. अल्ट न्यूज डॉट इन ने बताया कि यह तस्वीर स्पेन मोरक्को सीमा की है. गनीमत है कि गृहमंत्रालय के गृहसचिव ने ज़रा भी देरी नहीं की. बाद में खबर आई कि गृहसचिव ने रिपोर्ट की तैयारी से जुड़े अधिकारियों से सफाई मांगी तो पता चला कि बीएसएफ से ये तस्वीर आई थी. गृहसचिव ने इसके लिए अफसोस जताया और सालाना रिपोर्ट के ऑनलाइन संस्करण से तस्वीर हटा ली गई है. मगर तीन महीने से यह तस्वीर मौजूद थी. जाने कहां-कहां पहुंच गई होगी.

आल्ट न्यूज़ ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि हिंदुत्व डॉट इन्फो पर इसे लेकर सरकार की उपलब्धि के रूप में प्रचार शुरू हो गया. लिखा गया कि भारत-पाक और भारत-बांग्लादेश सीमा को पूरी तरह से सील करने का काम भी ज़ोर से चला हुआ है और जल्द ही सीमाएं पहले की अपेक्षा काफी ज़्यादा सुरक्षित हो जाएंगी. एक काम करने वाली सरकार को ऐसा करते देखते हुए काफी अच्छा अहसास होता है…

यही नहीं, बीजेपी के सांसद परेश रावल के दो ट्वीट की चर्चा करने जा रहा हूं. पहला ट्वीट 3 जुलाई का है. सांसद परेश रावल ने पूर्व राष्ट्रपति ए पी जे अब्दुल कलाम का एक बयान ट्वीटर हैंडल पर शेयर कर दिया. लिखा कि ये छद्म लिबरल लोगों के लिए है. बाद में पता चला कि वो बयान कलाम का था ही नहीं.

इस बयान में लिखा था कि मुझे पाकिस्तान ने इस्लाम का हवाला देकर मिलाने का प्रयास किया लेकिन मैंने मातृभूमि के साथ गद्दारी नहीं की. जब हंगामा हुआ तो परेश रावल ने कहा कि मुझे पता नहीं था कि यह फेक है. अगर इनकी जगह कोई और होता, तो मैं इसे दो बार चेक करता मगर कलाम की वजह से मुझे यह सही लगा.

यह बिल्कुल मुमकिन है कि ऐसा हुआ है और ऐसा हो जाता है. कोई भी ऐसी तस्वीरों और बयानों के झांसे में आ जाता है. लेकिन जब उन्होंने मशहूर लेखिका अरुंधति रॉय को लेकर एक ट्वीट किया तो उसके कई ख़तरनाक पहलू सामने आ गए.

17 मई 2017 को परेश रावल ने ट्वीट किया कि अरुंधति रॉय ने इंटरव्यू दिया है कि 70 लाख भारतीय सेना कश्मीर के आज़ादी गैंग को हरा नहीं सकती. इसी के साथ उन्होंने अरुंधति रॉय की तस्वीर लगा दी, जिसमें वो सेना की जीप के आगे बिठाई गईं हैं.

इसे लेकर कई बड़े न्यूज़ चैनलों पर बकायदा बहस हो गई. बहस का तेवर ऐसा था कि अरुंधति रॉय के खिलाफ भीड़ आक्रामक हो सकती थी. जबकि अरुंधति राय न तो हाल में श्रीनगर गईं थीं और न ही ऐसा कोई इंटरव्यू किसी को दिया था. अरुंधति राय ने एक साल पहले आउटलुक पत्रिका को ज़रूर इंटरव्यू दिया था, मगर परेश रावल का ट्वीट उस इंटरव्यू को लेकर नहीं था. 24 मई को द वायर डॉट इन ने जब यह पता लगाया कि परेश रावल तक जानकारी कैसे पहुंची, तो फेक न्यूज़ का एक और ख़तरनाक पहलू सामने आ गया.

परेश रावल ने अरुंधति रॉय का यह फेक इंटरव्यू द नेशनलिस्ट नाम के फेसबुक पेज से उठाकर ट्वीट कर दिया. इस पेज पर ख़बर पहुंची पोस्टकार्ड डॉट न्यूज से, इस वेबसाइट की कई ख़बरें फेक न्यूज़ के सिलसिले में विवादित हो चुकी हैं. इस पर लिखा था कि अरुंधति रॉय ने यह इंटरव्यू द टाइम्स ऑफ इस्लामाबाद को दिया है कि 70 लाख भारतीय सेना कश्मीर के आज़ादी गैंग को हरा नहीं सकती हैं. पोस्टकार्ड डॉट न्यूज ने अपना सोर्स नहीं बताया, लेकिन वायर ने पाया कि रेडियो पाकिस्तान ने सबसे पहले यह प्रसारित किया था. जिस द टाइम्स ऑफ इस्लामाबाद को पाकिस्तानी अख़बार बताया जा रहा है, वो वेबसाइट है, अखबार नहीं है. पोस्टकार्ड डॉट न्यूज ने जिस दिन ये फेक इंटरव्यू छापा था, उसी दिन इसे सत्यविजयी डॉट कॉम ने भी छापा और चार पांच वेबसाइट ने भी इसे अपने यहां जगह दी. इन सभी का नाम भी फेक न्यूज़ के सिलसिले में आ चुका है.

द वायर डॉट इन ने पकड़ा कि इंटरनेट हिंदू डॉट इन ने अपनी स्टोरी में टाइम्स ऑफ इस्लामाबाद का लिंक दिया था. आप देखिए कि किस तरह पाकिस्तानी साइट से चलते हुए फेक न्यूज़, फेक इंटरव्यू भारत के सांसद के ट्वीटर हैंडल पर पहुंचता है और वहां से भारत के चैनलों पर अरुंधति रॉय के ख़िला़फ ज़ोरदार बहस छिड़ जाती है. परेश रावल ने ट्वीट डिलिट कर दिया, लेकिन आज भी यह फेक इंटरव्यू रेडियो पाकिस्तान की वेबसाइट और भारत के पास्टकार्ड डॉट न्यूज पर तस्वीर के साथ है. यह भी एक रणनीति है. जब विवाद थम जाएगा तो फिर से इस फेक इंटरव्यू को घुमाया जाने लगेगा या क्या पता व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी में घुमाया ही जा रहा हो.

आप सोचिए यह कितना ख़तरनाक पहलू है. फेक न्यूज़ के मामले में भारत और पाकिस्तान की वेबसाइट भी एक दूसरे की मदद कर सकती हैं. कोई आपके नाम से पाकिस्तान में फेक इंटरव्यू छपवा दे, जब तक आप सफाई देंगे, टीवी चैनल, नेता और ये वेबसाइट मिलकर आपका भयंकर नुकसान कर चुके होंगे. अभी तो इसके ज़रिए आवाज़ उठाने वालों को डराया जा रहा है, कमज़ोर और डरपोक विपक्ष को डराया जा रहा है. लेकिन जल्दी ही इस खेल के ज़रिए आप लोगों को भी फिक्स किया जाने लगेगा. बल्कि किया भी जा रहा है.