खून में डूबा हुआ जून

kashmirजून का महीना, जो इतेफाक से रमजान का पवित्र महीना भी था, अपने पीछे समूचे कश्मीर में खून खराबे के निशान छोड़ गया. इस महीने मिलिटेंट्स ने सुरक्षा बलों, विशेष रूप से जम्मू और कश्मीर पुलिस पर हमले तेज़ कर दिए थे. सुरक्षा बलों ने भी अपने अभियान तेज कर दिए, जिसके परिणामस्वरूप कोलैटरल डैमेज में कई नागरिक मारे गए. इस बढ़ते तनाव का प्रभाव सा़फ दिखाई दे रहा था, जिसका साया ईद-उल-फितर पर भी रहा. इसमें कोई शक नहीं है कि कत्ल चाहे जैसा भी हो, असहाय होने की भावना पैदा करता है. लेकिन जिस तरह से आम लोगों ने लगातार मिलिटेंट्‌स का समर्थन किया है और सेना की घेराबंदी तोड़कर उन्हें भागने में मदद की है, वो एक खतरनाक स्थिति को दर्शाता है. राजनीतिक संघर्ष ने अपना स्वरूप बदल लिया है. ये जिस तरीके से हिंसा की ताजा लहर में समाहित हुआ है, वो कुछ और ही कहानी बयान करता है. कश्मीर में 1987 में मिलिटेंसी की शुरुआत हुई थी, जो हताशा की स्थिति का प्रत्यक्ष परिणाम थी.

उसके बाद निरंतर कश्मीर को राजनीतिक अधिकारों से वंचित रखा गया. किसी भी समाज में राजनीतिक उद्देश्य के लिए हिंसा को उचित नहीं ठहराया जा सकता है. बहरहाल, जम्मू-कश्मीर के लोगों के साथ नई दिल्ली के विश्वासघात ने एक रिक्ति पैदा की और नई पीढ़ी को हथियार उठाने का मौक़ा दिया. ए. एम. वाटाली, जो अस्सी के दशक के उत्तरार्ध में सशस्त्र विद्रोह के समय कश्मीर के पुलिस प्रमुख थे, ने अपने अभी के संस्मरण कश्मीर इंतिफाडा में विस्तार से बताया है कि कैसे कश्मीरियों को पीछे घकेलने के लिए साजिशें की गईं. इसमें इस बात की चर्चा है कि दिल्ली की नीति ने कैसे लगातार कश्मीरी लोगों को कमजोर बनाया. ये ऐसा लक्ष्य था, जिसे 1947 और 1965 में पाकिस्तान भी हासिल करने में असफल रहा.

90 के मध्य में जब जम्मू एंड कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) ने एकतरफा युद्धविराम की घोषणा की, तब कश्मीर हिंसा से अहिंसा की ओर बढ़ा. लेकिन एक सार्थक वार्ता के लिए नींव रखने का मौका नहीं मिला, बल्कि इसका इस्तेमाल शांति के लिए लोगों के आग्रह को कमजोर करने के लिए किया गया. जेकेएलएफ के नेताओं के मुताबिक, युद्धविराम के बावजूद उनके संगठन के 600 से ज्यादा सदस्य मारे गए. जाहिर है, इस प्रकार से सामंजस्य की भावना को नकारने की कोशिश की गई. 2003 से 2007 के बीच की अवधि में भारत और पाकिस्तान को और अवसर मिला था. इस दौरान जम्मू और कश्मीर का मुद्दा फोकस में रहा. लेकिन दुख की बात ये है कि इस अवसर का लाभ नहीं उठाया गया. फिर से लड़कों को आतंकवाद की तरफ धकेल दिया गया. अफजल गुरु की फांसी इस स्थिति में एक महत्वपूर्ण मोड़ थी, जिसने स्थानीय लोगों के लिए वो रास्ते खोल दिए, जिसे वे छोड़ चुके थे. इससे न केवल राजनीतिक संदर्भ को नुकसान हुआ, बल्कि इसने आतंकवाद की सामाजिक मंजूरी के लिए जगह बनाई. नतीजतन, हिज्बुल मुजाहिद्दीन फिर से सेंटर स्टेज में आ गया. हिज्ब की वापसी का श्रेय उसके पोस्टर बॉय बुरहान वानी को भी जाता है, जो एक साल पहले मारा गया था.

हालांकि सुरक्षा अधिकारी इस बात से असहमत हैं कि ये स्थिति 1990 के दशक के समान है. फिर भी, दक्षिण कश्मीर में जो हो रहा है, वो निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है. सशस्त्र प्रतिरोध में आम जनता की भागीदारी कुछ ऐसी चीज है, जो 1990 से ज्यादा महत्वपूर्ण है. आंकड़े बताते हैं कि जून एक खूनी महीना था, जिसमें आतंकवाद सम्बंधी घटनाएं बहुत ज्यादा प्रभाव के साथ बढ़ गई थीं. 13 घटनाओं में 27 आतंकी, 8 पुलिसकर्मी, 6 नागरिकों और एक सेना के जवान के मारे जाने के कारण ये एक खूनी महीना रहा. जिस तरह से कुछ टॉप आतंकियों को मारा गया, अबाबाल के एक स्टेशन हाउस ऑफिसर की हत्या उसके पांच सहयोगियों के साथ कर दी गई और एक पुलिस उपाधीक्षक को भीड़ ने मारा, उससे इस मुसीबत की गहराई को समझा जा सकता है. जनवरी 2016 से जून 2016 तक हुई हिंसा के आंकड़ों की बात करें और इसकी तुलना जनवरी 2017 से जून 2017 की इसी अवधि के साथ करें, तो 2017 में जहां नागरिक मौतों की संख्या 21 रही, वहीं 2016 में ये 7 थी. इसी अवधि में पिछले वर्ष जहां 29 सुरक्षा बलों के जवानों की मौत हुई, वहीं 2017 में ये संख्या 38 है. इसी प्रकार, 2016 में जहां 79 आतंकी मारे गए, वहीं 2017 में ये संख्या कुछ बढ़कर 90 हो गई. सेना के ऑपरेशन के विरोध में नागरिकों की भागीदारी के कारण 2016 के मुकाबले नागरिकों की मौत में चार गुना बढ़ोतरी हुई है.

एक तरफ जहां आतंकवाद का ग्राफ बढ़ रहा है, वहीं कुछ नई घटनाएं भी ़फोकस में हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अमेरिकी यात्रा में एक उपहार मिला. उनके अमेरिका पहुंचने से एक दिन पहले अमेरिका के स्टेट डिपार्टमेंट ने हिज्बुल मुजाहिद्दीन के टॉप लीडर सलाहुद्दीन को वैश्विक आतंकवादी घोषित किया. 1987 का विधानसभा चुनाव लड़ने वाला सलाहुद्दीन तब मोहम्मद यूसुफ शाह हुआ करता था. सलाहुद्दीन पहला आतंकवादी है, जिसे अमेरिका से इस तरह का टैग मिला है. वैसे ये घोषणा प्रतीकात्मक है, क्योंकि इससे सलाहुद्दीन अमेरिका नहीं जा पाएगा और न ही उस देश में संपत्ति रख पाएगा. हालांकि, आतंकवाद के खिलाफ अपनी लड़ाई में नई दिल्ली के लिए ये एक नैतिक समर्थन या कहें प्रोत्साहन है. इससे भारत आंतकवाद के खिलाफ चल रही अंतरराष्ट्रीय मुहिम में शामिल हो जाता है. पाकिस्तान ने इस घोषणा को खारिज कर दिया है और चीन उसे एक स्वतंत्रता सेनानी कह कर एक कदम आगे चला गया है. अब ये स्पष्ट हो गया है कि कश्मीर, भारत और पाकिस्तान के बीच सिर्फ एक द्विपक्षीय विवाद नहीं है, बल्कि ये एक बड़े खेल का हिस्सा बन गया है, जिसमें चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) के बाद एक नया बदलाव आया है. इस लाइन में रूस भी है. इसके साथ ही चीन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की उम्मीदवारी को अवरुद्ध कर रहा है.

जैश-ए-मोहम्मद प्रमुख मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित किए जाने का भी चीन विरोध करता है. ये समझने के लिए बहुत प्रयास की आवश्यकता नहीं है कि क्या चीन वास्तव में ऐसा कर हिंसा का समर्थन करता है? ये निश्चित रूप से चीन द्वारा भारत को काउंटर करने की नीति है. कश्मीर पहले से ही अंतरराष्ट्रीय फोकस में है. पाकिस्तान के प्रसिद्ध पत्रकार हामिद मीर ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखे एक लेख में सही तरीके से निष्कर्ष निकाला है कि सलाहुद्दीन के खिलाफ अमेरिकी कार्रवाई कश्मीर पर उसकी मध्यस्थता का संकेत देती है. सलाहुद्दीन को वैश्विक आतंकवादी घोषित करके, वाशिंगटन, भारत और पाकिस्तान दोनों को वार्ता मेज पर लाने की अपनी लंबे समय से चली आ रही नीति के खिलाफ चला गया है. पहले से वो मानता आ रहा था कि कश्मीर एक वास्तविक राजनीतिक आंदोलन है.

आज की भाजपा सरकार कह सकती है कि वे उन लोगों के साथ जुड़ने में विश्वास नहीं करते हैं, जो कश्मीर में भारत के शासन को चुनौती देते हैं. लेकिन ये तथ्य है कि सरकारें, सरकारें होती हैं और सरकार में बदलाव के साथ वास्तविकता में बदलाव नहीं किया जा सकता है.

इस घोषणापत्र के परिणाम जो भी हों, उसका कश्मीर में जमीन पर शायद ही असर पड़ेगा. लेकिन आतंकवाद के लिए स्थानीय समर्थन में वृद्धि हुई है. जब तक कोई राजनीतिक दृष्टिकोण सरकार द्वारा अपनाया नहीं जाता है, तब तक हिंसा सुर्खियां बनती रहेंगी. दिल्ली में सरकार की तरफ से किए जाने वाले उकसावे और टीवी चैनलों द्वारा इसे समर्थन दिए जाने से शायद ही बदलाव की कोई उम्मीद दिखे. सशस्त्र बल भले आतंकवादियों को मार दें, लेकिन हाल के रुझानों से पता चला है कि अधिक से अधिक युवा मिलिटेंसी की तरफ झुकाव दिखा रहे हैं. राजनैतिक प्रयासों के अलावा, बेहतर प्रशासन, अत्याचार समाप्त करना और लगातार गिरफ्तारी ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दे हैं, जिन पर ध्यान देने की जरूरत है.

-लेखक राइजिंग कश्मीर के संपादक हैं.

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