मुख्यमंत्री (पू.) का सुसाइड नोट : उपराष्ट्रपति ने अपने कर्तव्य का पालन नहीं किया- क्यों?

cmमाननीय उपराष्ट्रपति जी ने अपने संवैधानिक और नैतिक कर्तव्य का पालन नहीं किया. क्यों नहीं किया, ये सवाल हम उपराष्ट्रपति जी से विनम्रता से पूछना चाहते हैं. क्या हम उपराष्ट्रपति जी से ये पूछ सकते हैं कि उनके कर्तव्य पालन न करने के पीछे कहीं ये कारण तो नहीं है कि वे मुसलमान हैं और उन्हें लगा हो कि छद्म हिन्दूवादी उनके पीछे पागलों की तरह पड़ जाएंगे. या फिर ये कि जो पत्र उन्हें दिया गया है, उस पत्र में देश के वित्त मंत्री रहे हुए व्यक्ति का नाम है, जो इस समय उनसे ऊंचे पद पर आसीन है. या फिर ये कि उसमें सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का नाम है और आने वाले संभावित मुख्य न्यायाधीश का नाम है. या फिर ये कि उनके सभापतित्व में चलने वाली राज्यसभा के कुछ भूतपूर्व सदस्यों के नाम हैं और कुछ वर्तमान सदस्यों के भी नाम हैं.

उपराष्ट्रपति जी के कर्तव्य पालन में खरा न उतरने का परिणाम भविष्य में शायद ये निकले कि कभी कोई राष्ट्रपति, कभी कोई प्रधानमंत्री, कभी कोई मुख्य न्यायाधीश या कभी कोई उपराष्ट्रपति अगर आत्महत्या करे और मृत्यु से पहले अपना आखिरी बयान छोड़ कर जाए, तो उसके ऊपर भी कोई कार्रवाई नहीं होगी. क्योंकि ईश्वर न करे, लेकिन व्यवस्था मिलकर उनके मृत्यु पूर्व बयान को दबा देगी. एक फिल्म अभिनेत्री जिया खान आत्महत्या करती है, पूरा सिस्टम नामजद लोगों के पीछे ईमानदारी से पड़ जाता है. लेकिन इस देश में पच्चीस साल तक विधानसभा का सदस्य रहने वाला व्यक्ति, जो वित्त मंत्री रहा और फिर बाद में मुख्यमंत्री बना, उसने मुख्यमंत्री निवास में आत्महत्या कर ली, आत्महत्या से पूर्व 60 पृष्ठ का खत लिखा, एक दस्तावेज लिखा, जिसे उसने ‘मेरे विचार’ का शीर्षक दिया, लेकिन उसकी जांच नहीं हुई. सारे कागज देखने पर पुलिस की रिपोर्ट में ये साफ संकेत है कि भूतपूर्व मुख्यमंत्री की आत्महत्या के पीछे के कारण उनके द्वारा छोड़े गए दस्तावेज में मौजूद हैं. लेकिन खुद पुलिस ने उसकी कोई जांच नहीं की. ये कैसा कमाल है कि राज्य सरकार ने केन्द्र को सिफारिश भेजी कि वो जैसी जांच चाहे वैसी जांच करवा ले, लेकिन केन्द्र ने सीबीआई की जांच का आदेश अबतक नहीं दिया है. देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मृत मुख्यमंत्री की विधवा मिलीं. उन्होंने कहा कि चार-पांच दिन के बाद मैं इसका अध्ययन करूंगा. लेकिन मार्च के बाद से अब तक उनके वो चार-पांच दिन पूरे नहीं हुए. मृत मुख्यमंत्री की विधवा प्रधानमंत्री से मिलने का आज तक समय मांग रही हैं, लेकिन प्रधानमंत्री के पास उनसे मिलने का समय नहीं है.

मैं अरुणाचल के भूतपूर्व मुख्यमंत्री कलिखो पुल की बात कर रहा हूं. पुल ने मुख्यमंत्री आवास में आत्महत्या की. उन्होंने 60 पृष्ठ का मौत पूर्व दस्तावेज लिखा. उस दस्तावेज में उन्होंने हर पृष्ठ पर अपने दस्तखत किए. फुट नोट पर कुछ लिखा और मरने से पहले उसके सारे पन्ने आसपास फैला दिए, ताकि वो अनदेखा न रह जाए. उन्होंने मृत्यु पूर्व बयान में ये आशा व्यक्त की कि इस पत्र में भ्रष्टाचार की जो कहानी लिखी है, उसके ऊपर जनता ध्यान देगी और भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी आवाज उठाएगी. भ्रष्टाचार की उस कहानी में उनकी पार्टी के राज्यसभा के सदस्य, बड़े वकील और सुप्रीम कोर्ट के जजों के प्रतिनिधि शामिल हैं. उसमें इसका संपूर्ण विवरण शामिल है कि राज्य में जो पैसा आता है, वो पैसा कैसे जनता के पास नहीं पहुंचता और उस पैसे की कैसे लूट हुई है. लेकिन कलिखो पुल को क्या मालूम था कि उन्हीं के साथी, उन्हीं की बिरादरी के राजनीतिज्ञ उनके इस मृत्यु पूर्व बयान को उस जगह पहुंचा देंगे, जहां से इसकी कहीं झलक भी नहीं आ पाएगी. उन्हें क्या पता था कि इस देश का मीडिया इस तरह के सवालों पर ध्यान नहीं देगा. श्री पुल को शायद ये भी नहीं पता था कि जिस राज्य में भारतीय जनता पार्टी का कोई नामलेवा नहीं था और जहां भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनाने में उन्होंने जितनी मेहनत की, उसी सरकार और केन्द्र में भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री उनकी मौत पर आंसू तो नहीं ही गिराएंगे, बल्कि उनकी पत्नी को मिलने का समय भी नहीं देंगे.

उनकी पत्नी ने उपराष्ट्रपति महोदय को अपना विस्तृत विवरण दिया, क्योंकि वे राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के पास नहीं जा सकतीं. कलिखो पुल के मृत्यु पूर्व बयान में तत्कालीन वित्त मंत्री श्री प्रणब मुखर्जी जी का नाम है. उनके कोलकाता के घर का पता है, जहां उन्होंने उन्हें पैसे दिए. श्री प्रणब मुखर्जी आज देश के राष्ट्रपति हैं, उनकी पत्नी उनके पास नहीं जा सकती थीं, इसलिए वे उपराष्ट्रपति महोदय के पास गईं.

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का नाम कलिखो पुलो ने मृत्यु पूर्व वक्तव्य में लिखा है. सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका को अप्राकृतिक मौत देने की तैयारी कर ली थी, जो उनकी पत्नी ने खत के रूप में सुप्रीम कोर्ट में जमा कराया था. उन्होंने ये अनुमति मांगी थी कि जिन लोगों के नाम पुल के मृत्यु पूर्व बयान में हैं, उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई जाए. लेकिन जब उन्हें पता चला कि उस पत्र की हत्या हो जाएगी, क्योंकि उस पत्र को ज्यूडिशियल याचिका में बदल दिया गया था. जिस तरह से याचिका की सुनवाई से एक दिन पहले शाम को रजिस्ट्रार के ऑफिस से उनके पास दिल्ली पहुंचने की सूचना फोन से दी गई, उससे उन्हें लगा कि उनको उस याचिका को वापस ले लेना चाहिए. इसके बाद वे सबसे वरिष्ठ उपलब्ध अधिकारी उपराष्ट्रपति के पास गईं और उन्हें सारी बातें बताते हुए, सारे कागज लगाकर ये कहा कि वे इसकी जांच कराएं. लेकिन उपराष्ट्रपति महोदय ने पता नहीं किन कारणों से, शायद ये वही कारण होंगे जिनका मैंने शुरू में जिक्र किया, उस फाइल को किसी के पास नहीं भेजा, लेकिन ये हमारा अंदाजा है. हम चाहते हैं कि उपराष्ट्रपति महोदय देश को ये बताएं कि उनके राज्यसभा के सदस्य जिनका नाम श्री पुल के मृत्युपूर्व नोट में है, क्या उन्होंने श्री पुल के उस नोट का खंडन किया है? क्या राज्यसभा भ्रष्टाचारी नेताओं को संरक्षण देने का अड्‌डा बन गई है? सुप्रीम कोर्ट की बेंच कहती है कि अगर सुप्रीम कोर्ट के जजों के खिलाफ कोई शिकायत है, तो राष्ट्रपति से अनुमति लेकर इसकी जांच कराई जा सकती है. लेकिन जब स्वयं राष्ट्रपति के पद पर आसीन व्यक्ति का नाम राष्ट्रपति के नाते नहीं, लेकिन किसी समय देश के वित्त मंत्री रहते हुए अगर आया हो, तो फिर उपराष्ट्रपति के अलावा इस पत्र को देने की कोई जगह बचती नहीं है. उपराष्ट्रपति जी ने संविधान और नैतिकता के सवाल को दरकिनार कर इस फाइल का क्या किया, उस पत्र का क्या किया, किसी को कुछ नहीं पता? क्या उपराष्ट्रपति जी संवैधानिक प्रमुख होने के नाते और राज्य सभा के सभापति होने के नाते देश को इसका कारण बताएंगे? सुप्रीम कोर्ट के फैसले, सुप्रीम कोर्ट की गतिविधियां, कुछ लोगों की वजह से सवालों के घेरे में आ गई हैं. खुद राज्यसभा सवालों के घेरे में आ गई है. क्या उपराष्ट्रपति जी इसकी जांच के लिए राज्यसभा की कोई समिति बनाएंगे या अपने संवैधानिक अधिकार के तहत एक एसआईटी गठित करने का आदेश गृहमंत्रालय को देंगे? ये सवाल है और बहुत बड़ा सवाल है.

आखिर सवालों के दायरे से बाहर कौन है? क्या स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. जब 2014 में उन्होंने सरकार बनाई, तो भारत को दिए गए उनके सबसे पहले वचनों में एक वचन था कि वे भ्रष्टाचार को लेकर जीरो टॉलरेंस की पॉलिसी पर चलेंगे. उन्होंने शायद इसीलिए अपने मंत्रिमंडल के राजनीतिक सदस्यों की हैसियत कम की और नौकरशाहों की हैसियत ज्यादा बढ़ाई. यद्यपि भ्रष्टाचार का कोई बड़ा मामला पहले का या उनके समय का, कानून के दायरे में अपने अंतिम परिणाम पर नहीं पहुंचा. लेकिन यहीं सवाल खड़ा होता है कि उनकी मदद करने वाले व्यक्ति, अरुणाचल के मुख्यमंत्री, जिन्होंने अरुणाचल में भारतीय जनता पार्टी की नींव रखी, उसकी सरकार बनवाई, कांग्रेस के भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाई. उन्होंने मरते समय 60 पृष्ठ का एक लंबा नोट लिखा, जिसमें ये सब विस्तार से लिखा कि कहां-कहां भ्रष्टाचार होता है, कौन-कौन भ्रष्टाचार करता है. ये भी लिखा कि उनसे किसने पैसे मांगे, क्यों पैसे मांगे और सरकार की किन योजनाओं के लिए पैसे मांगे. वो खत, वो उनका मृत्यु स्वीकारोक्ति बयान, प्रधानमंत्री के पास जरूर पहुंचा होगा. प्रधानमंत्री ने क्यों उसके ऊपर ध्यान नहीं दिया. भ्रष्टाचार की परत-दर-परत खोलने वाला एक दस्तावेज, उसी राजनीतिक बिरादरी के मुख्यमंत्री ने लिखा था, जिस राजनीतिक बिरादरी से प्रधानमंत्री हैं. उस दस्तावेज का नोटिस प्रधानमंत्री जी ने क्यों नहीं लिया. वो भारतीय जनता पार्टी के भ्रष्टाचार की कहानी नहीं कह रहा है, वो तो कांग्रेस के भ्रष्टाचार की कहानी कह रहा है. उसमें भारतीय जनता पार्टी से जुड़े किसी भी व्यक्ति का नाम नहीं है. उसमें कांग्रेस से जुड़े सभी लोगों के नाम हैं. वो चाहे आज कितने भी बड़े पदों पर हों. राज्यसभा के जितने भी सदस्यों के नाम उसमें आए हैं, वो सब कांग्रेस पार्टी से जुड़े हुए हैं. तब आखिर प्रधानमंत्री मोदी ने उस मृत्यु पूर्व बयान का संज्ञान क्यों नहीं लिया. क्यों प्रधानमंत्री ने उस बयान के आधार पर जांच नहीं बैठाई. क्यों प्रधानमंत्री ने सुप्रीम कोर्ट और राज्यसभा की ऐसी छवि बनने की इजाजत दे दी, मानो संपूर्ण सुप्रीम कोर्ट और संपूर्ण राज्यसभा भ्रष्टाचार के कीचड़ में नाक तक सनी है. अगर वे जांच करा देते, अगर वे एसआईटी बनवा देते, अगर वे सीबीआई को जांच सौंप देते, जिसमें निश्चित रूप से सुप्रीम कोर्ट और राज्यसभा के सदस्य बरी हो जाते, तो कम से कम एक लाछंन धुल जाता. लेकिन प्रधानमंत्री ने ऐसा नहीं किया. मैं आज भी मानता हूं कि प्रधानमंत्री साफ छवि के व्यक्तिगत रूप से ईमानदार व्यक्ति हैं. लेकिन उन्होंने क्या सोच कर स्वर्गीय पुल द्वारा लिखे गए उस 60 पृष्ठ के नोट को अनदेखा कर दिया और अनदेखा करने दिया.

मैं पूछता चाहता हूं, प्रधानमंत्री जी क्या हमारा सवाल उठाना गलत है? मैं सर्वोच्च न्यायालय से भी पूछना चाहता हूं कि क्या हमारा सवाल उठाना गलत है? मैं उपराष्ट्रपति जी से पूछना चाहता हूं कि क्या हमारा सवाल उठाना गलत है? मैं राज्यसभा से भी पूछना चाहता हूं कि क्या हमारा सवाल उठाना गलत है? अगर आपको लगता है कि हमारा सवाल उठाना गलत है, तो क्या हम आपसे इन सवालों को उठाने के बदले सार्वजनिक रूप से क्षमा मांगें. लेकिन मुझे लगता है कि इस भ्रष्ट व्यवस्था के जंगल में कुछ ऐसे लोग जरूर हैं, जो अन्याय, भ्रष्टाचार के खिलाफ अपना हाथ खड़ा करेंगे. मैं इसीलिए आखिर में संवैधानिक रूप से उपराष्ट्रपति जी से सवाल करता हूं और ये अपेक्षा भी जाहिर करता हूं कि आप जा रहे हैं, जाते-जाते अपने संवैधानिक और नैतिक कर्तव्य का पालन करेंगे. आपको श्रीमती पुल द्वारा भेजे गए 60 पेज के नोट के साथ उनकी ये अपेक्षा कि इसकी जांच एसआईटी के द्वारा या सीबीआई के द्वारा कराई जाए, आप इसपर ध्यान देंगे और अपने ऊपर लगने वाला लांछन स्वतः समाप्त करेंगे. मैं इतना और बता दूं कि पुलिस की रिपोर्ट में ये माना गया है कि श्री पुल की मृत्यु के कारण, उनके द्वारा लिखे 60 पृष्ठ के नोट में हैं. पुलिस ने जांच नहीं की, किसी संस्था ने जांच नहीं की, अरुणाचल सरकार की जांच की विनती को गृह मंत्रालय ने दबा दिया, तब प्रधानमंत्री जी, हम कैसे मानें कि आपमें भ्रष्टाचार को लेकर जीरो टॉलरेंस है. या फिर राजनैतिक सुविधा के लिहाज से, कुछ लोगों को धमकाने के लिए, चाहे वो सुप्रीम कोर्ट के जज हों, या कांग्रेस पार्टी हो, आपने इस जांच को फिलहाल निलंबित कर रखा है. जब इन दोनों, एक राजनीतिक पार्टी या सुप्रीम कोर्ट के जजों को दबाना होगा, तब आप इस जांच की कार्रवाई शुरू करेंगे. ईश्वर करे, ये सच न हो. क्योंकि प्रधानमंत्री को किसी भी प्रकार के अतिरिक्त दबाव पैदा करने की कम से कम भारत में आवश्यकता नहीं है. भ्रष्टाचार की परत-दर-परत खोलने वाला स्वर्गीय पुल का ये पत्र पूरा का पूरा हम इस अंक में छाप रहे हैं. सरकार से, राज्यसभा से और उपराष्ट्रपति जी से हम ये अपेक्षा करते हैं कि इस पत्र की सच्चाई और इसमें लिखी हुई बातों को जांच कर, दूध का दूध और पानी का पानी करने की जिम्मेवारी उनके ऊपर है. इस देश में लोकतंत्र के प्रति और लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति इज्जत बनी रहे. इसके लिए आवश्यक है कि उपराष्ट्रपति जी अपने कर्तव्य का पालन करें. वरना वे लोकतंत्र को खत्म करने के षड्‌यंत्र के हिस्सेदार माने जाएंगे.

देश की जनता से हम पूछना चाहते हैं कि जब कोई व्यक्ति आत्महत्या करता है, तो पुलिस उसकी जांच करती है और अगर उसे ऐसे व्यक्तियों के नाम मिलते हैं, जो आत्महत्या के लिए उकसाने का काम करते हैं, तो पुलिस उन्हें गिरफ्तार करती है और अदालत उन्हें सजा देती है. इस केस में ऐसा क्यों नहीं किया गया, कारण तलाशें. सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का नाम और उनके बाद मुख्य न्यायाधीश बनने वाले व्यक्ति का नाम श्री पुल ने अपने पत्र में लिखा है. उनके ऊपर लगा आरोप यदि सही नहीं है, गलत है, तो इसकी जांच कौन कराएगा? पुलिस ने जांच नहीं की, प्रधानमंत्री ने अनदेखा कर दिया, उपराष्ट्रपति ने अपने कर्तव्य का पालन नहीं किया, राष्ट्रपति स्वयं इसमें शामिल बताए गए हैं. आखिर किसी ने खंडन क्यों नहीं किया? मरा हुआ व्यक्ति साधारण व्यक्ति नहीं है, आम आदमी नहीं है. वो व्यक्ति जिसने आत्महत्या की, जिसने ये आरोप लगाए और मरने से पहले लगाए, उसके मृत्यु पूर्व दस्तावेज को क्यों अनदेखा कर दिया गया? ये माना जाता है कि 90 प्रतिशत वो बातें सही होती हैं, जो मरने वाला मरने से पहले लिखता है. ये सवाल, सवाल, सवाल, सवाल, सवाल… एक लंबी श्रृंखला का हिस्सा हैं. इसका जवाब आज नहीं तो कल, इस व्यवस्था को, सुप्रीम कोर्ट के जजों को, प्रधानमंत्री को और उपराष्ट्रपति को देना ही होगा.

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संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.