वर्तमान माहौल से गुस्से में हैं सेना के परिजन

santosh bhartiyaमेरी मुलाकात भारतीय सेना के एक जांबाज अधिकारी की पत्नी से हुई. उसने अपना एक अलग दर्द मेरे सामने रखा. मैं आपके साथ उसे इसलिए बांटना चाहता हूं, ताकि आज देश में जिस तरह का माहौल बनाया गया है, आप कम से कम इतना महसूस कर सकें कि वो माहौल सेना के अफसरों के परिवारों को कितना डरा रहा है. हमारे देश में सोशल मीडिया और टेलीविजन चैनल का अगर वश चले, तो कल ये पाकिस्तान से युद्ध कर लें और ज्यादा वश चले तो कल ये चीन के ऊपर हमला कर दें.

उनकी नजर में हम अमेरिका के बाद दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश हैं. हमारे आंख दिखाने भर से चीन खामोश हो जाएगा और पाकिस्तान डर कर चादर तान कर सो जाएगा. हो सकता है ऐसा हो या काश ऐसा होता, पर सेना के इस बहादुर अधिकारी की पत्नी ने जो कहा, वो इन सबसे अलग है.

उसने कहा कि जब मैं सोशल मीडिया देखती हूं और जब टेलीविजन चैनल की बहस सुनती हूं, तब बहुत डर जाती हूं. इसके बाद जब सोचती हूं कि अगर युद्ध हुआ तो मेरे पति को भी मोर्चे पर जाना पड़ सकता है, वो लौटेगा या नहीं, इसे लेकर मेरे मन में संशय है. मैं अभी तक ये समझ नहीं पा रही हूं कि पाकिस्तान और चीन की सीमा पर ऐसी कौन सी स्थिति पैदा हो गई, जिसे बातचीत से हल नहीं किया जा सकता. अगर राजनीतिज्ञ असफल हो रहे हैं, तो उसका कारण देश को पता चलना चाहिए. क्या उनमें बातचीत करने की क्षमता नहीं है, उनकी बातचीत में तर्क नहीं है या वो विश्व जनमत को अपने पक्ष में नहीं ला सकते हैं. इस बहादुर महिला का एक ही बेटा है और वो अपना बेटा भी सेना में भेजना चाहती है. उसके पति भी सेना में हैं.

उसके पिता भी सेना के अधिकारी रहे हैं. उसके रिश्तेदार भी सेना में हैं. इस महिला के मन में सवाल घुमड़ रहा है कि हम राजनीति के जरिए सीमा के जिन सवालों को हल कर सकते हैं, कूटनीति के जरिए विश्व जनमत अपने पक्ष में कर सकते हैं, तो हम ऐसा क्यों नहीं कर पा रहे हैं? हम देश में ये झूठा वातावरण क्यों बना रहे हैं कि सारी दुनिया हमारे साथ है और हमने पाकिस्तान और चीन को अलग-थलग कर दिया है. उसका कहना है कि अगर देश की आन पर कोई बात आ जाए, तो सेना का एक-एक सिपाही सीमा पर जाने के लिए तैयार है. लेकिन देश में जिस तरह का माहौल बनाया जा रहा है, उससे सेना के सिपाही और अधिकारी काफी गुस्से में हैं.

उसने मुझसे सवाल किया कि आप एक अखबार में काम करते हैं. क्या आप मेरी तरफ से देश के लोगों से ये पूछ सकते हैं कि कारगिल में हुए शहीदों के नाम किसी को   याद हैं? क्या आप लोगों से ईमानदारी से ये सवाल कर सकते हैं? वो ईमानदारी से यह बताएं कि वो कितने शहीदों के घर साल में एक बार भी जाते हैं? क्या आप ये मेरी तरफ से लोगों से पूछ सकते हैं कि जब होली, दिवाली होती है, जब हम खुशियों में नाचते-गाते हैं या 15 अगस्त, 26 जनवरी मनाते हैं, तो हम कितने शहीदों के परिवारों को सम्मानित करते हैं?

वो चाहे कारगिल के शहीद रहे हों या फिर आतंकवाद से लड़ते हुए शहीद हुए हों, क्या उन्हें इस बात का जरा भी ज्ञान है कि उनके परिवार किस हालात में  जी रहे हैं? उसने मुझसे पूछा, क्या आपको मालूम है कि शहीद के परिवारों की उनके गांव में क्या हालत है? उनकी जमीन पर किसने कब्जा कर लिया है? जब वो पुलिस थाने जाते हैं, तो उनका किस तरह से अपमान होता है? उनसे कहा जाता है कि साला, मरने वाला तो मर गया, बवाल छोड़ गया.

हमारे शहीदों के साथ जो हो रहा है, सोशल मीडिया पर जैसा माहौल बनाया जा रहा है, इससे हमारे सेना के परिवारों को क्या संदेश मिलता है? सैनिक अधिकारी की इस पत्नी ने मुझसे ये भी सवाल पूछा कि कारगिल के शहीदों का नाम मैं इसलिए ले रही हूं क्योंकि वो सबसे ताजा उदाहरण हैं. भारत-पाक के बीच 1965 और 1971 के युद्ध में शहीद हुए जवानों के परिवारों की बात तो मैं कर ही नहीं रही हूं, क्योंकि वो लोग हमारे तथाकथित देशप्रेमियों के अत्याचारों से इतने ज्यादा दुखी हो चुके हैं कि वो अब अपनी बात ही नहीं कहते. जगह-जगह ऐसे किस्सों की भरमार है कि कारगिल में शहीद हुए परिवार अपने ही समाज की प्रताड़ना झेल रहे हैं.

उनमें से बहुतों का ये भी कहना है कि काश हम देशप्रेम में इतने अंधे नहीं हुए होते. अब मैं आप पाठकों से यह पूछना चाहता हूं कि इस सैन्य अधिकारी की पत्नी का दर्द क्या आपके पास तक पहुंच पा रहा है? क्या आप भी अपने आस-पास किसी शहीद के परिवार के साथ समाज, पुलिस व जिला प्रशासन द्वारा किए जा रहे अमानवीय व्यवहार को देखकर अनदेखा तो नहीं कर रहे हैं. लेकिन ऐसा हो रहा है.

इस बहादुर सैनिक अधिकारी की पत्नी ने मुझसे एक सवाल और पूछा. उसने कहा कि इस समय देश में गायों की रक्षा के नाम पर जिस तरह से हत्याएं हो रही हैं, लोगों को मारा-पीटा जा रहा है, क्या इन लोगों की पहचान भारत के प्रधानमंत्री जिस भाषा का उपयोग कर रहे हैं, उससे हो सकती है? प्रधानमंत्री की भाषा पर राज्य सरकारें गोरक्षा के नाम पर अपराधवृत्ति करने वाले लोगों को रोकने का काम क्यों नहीं कर रही हैं?

क्या इसलिए कि राज्य सरकारें जानती हैं कि प्रधानमंत्री ये सिर्फ कह रहे हैं, करने के लिए नहीं कह रहे हैं. करने वाली भाषा वो होती है, जो नोटबंदी में इस्तेमाल की गई थी. करने वाली भाषा वो होती है, जो जीएसटी में की गई. करने वाली भाषा वो होती है, जो सुप्रीम कोर्ट के सारे आदेशों और चिंताओं को अनदेखा कर आधार कार्ड में इस्तेमाल की गई. पर ऐसा क्या कमाल है या इस भाषा में ऐसी कौन सी कमजोरी है कि प्रधानमंत्री के कहने के बावजूद गोरक्षा के नाम पर अपराधवृत्ति करने वाले लोग डर नहीं रहे हैं.

इस महिला ने ये भी पूछा कि ये लोग गोरक्षा के नाम पर सड़क पर किसी को भी पकड़कर मार-पीट रहे हैं. लोगों के घरों में घुसकर जवान लड़कियों के पहनावे को लेकर   बेइज्जत कर रहे हैं. ये गाय की रक्षा के नाम पर आंदोलन करने वाले या समाज को बांटने वाले लोग, क्या इस देश में मां-बहनों पर होने वाले अत्याचार को रोक पा रहे हैं? जो अपनी मां-बहनों पर होने वाले अत्याचार को न रोक पाए और गाय की रक्षा के नाम पर सड़क पर निकलकर फुफकार भरे, उससे ज्यादा नकली देशप्रेमी कोई हो नहीं सकता.

इसमें मैंने एक चीज और कही कि सारे तथाकथित देश-प्रेमी जो शहीद हुए हैं, उनके घर तो जाते ही नहीं हैं. जो सेना के सिपाही अभी जीवित हैं और सेना में हैं और देश में कहां उनकी ड्‌यूटी लगी होगी, उनके घर वाले भी नहीं जानते, जो बॉर्डर पर हैं चाहे पाकिस्तान का बॉर्डर हो या चीन का, क्या इनमें से कोई उनके घरों पर ये जाकर पूछता है कि तुम्हारे घर की समस्या क्या है? तुम्हारे बच्चे स्कूल में हैं, उनकी फीस समय पर जा रही है.

तुम्हें तुम्हारा पड़ोसी तो परेशान नहीं कर रहा है. तुम्हारी जमीन के ऊपर कब्जा करने की कोई कोशिश तो नहीं कर रहा है. तुम्हारी बहनों और पत्नियों को कोई छेड़ तो नहीं रहा है. सैन्य अधिकारी की इस महिला ने कहा कि मुझे एक भी ऐसा उदाहरण नहीं मिला, जहां लोगों ने कहा हो कि समाज की तरफ से हमें यह सहयोग मिल रहा है. बहुत सारी जगहों पर जिला प्रशासन, सेना में काम करने वाले मौजूदा सिपाहियों के घरवालों की समस्याओं को इसलिए हल नहीं करते क्योंकि वो घूस नहीं दे पाते. पुलिस अधिकारी उन्हें निकृष्ट दृष्टि से देखते हैं. अब तो अखबारों में भी खबरें आने लगी हैं कि पुलिस के लोग सैन्य अधिकारियों के साथ कैसा व्यवहार कर रहे हैं?

ये सवाल मुझे झिंझोड़ गया. जब मैंने अपने स्तर पर पता किया, तो इस बहादुर सैन्य अधिकारी, जिसे सेना के कई मेडल मिल चुके हैं, की पत्नी की बातों में मुझे 99 प्रतिशत सच्चाई मिली. मैं आपसे कुछ कहने की स्थिति में नहीं हूं क्योंकि मैं भी उसी समाज का हिस्सा हूं, जो समाज नकली देशप्रेम में पागल हो रहा है और जो सचमुच देशभक्त हैं, जो शहीद हुए हैं या जो शहीद होने के रास्ते पर हैं, उन्हें अनदेखा कर रहा है. यह हमारे ही देश में हो सकता है. उस देश में, जहां सेना की बहादुरी भी राजनीति का एक हिस्सा बन जाती है. इस बहादुर महिला ने कहा कि मैं जानती हूं कि मेरे सवाल आपको पसंद नहीं आएंगे. आप सोचेंगे कि मैं बुजदिली की बात कर रही हूं, लेकिन मैं ये सवाल करती हूं कि आपके परिवार के कितने लोग सेना में हैं.

जिनके परिवार सेना में हैं, उनके परिवारों से पूछिए कि उन्हें नकली देशप्रेम सिर्फ इसलिए परेशान कर रहा है क्योंकि अगर युद्ध चुनाव जीतने के लिए हो या अगर युद्ध अपने अहम को तुष्ट करने के लिए हो, तो ऐसे माहौल में जब लाशें घर में आती हैं तो घरवालों को सिर्फ राजनीतिज्ञों के चेहरे याद आते हैं. उन्हें लगता है कि हमारा बेटा, हमारा भाई और हमारा पति राजनीतिज्ञों की असफलता की वजह से शहीद हुआ है. युद्ध आखिरी रास्ता होना चाहिए, पर हमारे देश में युद्ध पहला रास्ता बना दिया गया है. इसके उदाहरण देखने के लिए कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं है. सिर्फ टीवी चैनलों की बहसों और सोशल मीडिया में चल रहे झूठ, फेक न्यूज और पागलपन के उफान को देखना भर पर्याप्त है.

मैं सांस रोककर इन सारी बातों को सुनता रहा. मुझे लगता है कि आप उनके साहस को सलाम करेंगे कि वो इतना सोचती हैं. वो सामाजिक रूप से सेना के सिपाहियों और अधिकारियों के बीच काम कर रहे सैनिक पत्नियों के एक बड़े दस्ते का हिस्सा है. उसने जो कहा, अगर उसका एक हिस्सा भी आप कर सकें, तो आप सचमुच देशप्रेमी कहलाने के लायक हैं. कारगिल में जो शहीद हुए, कारगिल में जो अपंग हुए या उसके बाद कश्मीर में शहीद होने वाले परिवारों के प्रति सिर्फ दिखावे की संवेदना मत जताइए, बल्कि उनके घर जाकर ये देखिए कि वो किस स्थिति में जी रहे हैं. अगर उन्हें मदद की जरूरत है तो फौरन मदद कीजिए.

उन नकली देशप्रेमियों की तरह अपने चेहरे को क्रूर मत बनाइए, जो इनकी शहादत की भावना का देशप्रेम के नाम पर अपमान करते है. उनके बच्चों की पढ़ाई, उनके परिवार की बीमारी में उनका साथ, सरकारी अधिकारियों के ऊपर दबाव कि उनकी समस्याओं का हल निकालें और साथ ही पुलिस अधिकारियों में ये डर पैदा कीजिए कि वो किसी भी सेना के सिपाही के परिवार को, चाहे वो शहीद का परिवार हो या इस समय सेना में काम करने वाले किसी सैनिक का परिवार हो, उसके प्रति अपमानजनक व लज्जाजनक व्यवहार करने की हिम्मत न करे.

क्या मेरी इतनी सी बात आप मानेंगे? सिर्फ वो नहीं मानेंगे, जो नकली देशप्रेमी हैं. जो अपने मां और पिता की रक्षा नहीं कर सकते, उन्हें बुढ़ापे में छोड़ देते हैं, लेकिन वो गाय के नाम पर सड़क पर शुद्ध आपराधिक कृत्यों का नेतृत्व करते हैं. लेकिन जो सचमुच भारत को प्यार करते हैं, उन लोगों के पास मैं ये बात पहुंचाना चाहता हूं कि कृपा कर शहीदों के परिवारों और सेना में काम करने वाले परिवारों को अपना परिवार मानिए. उस घर की बहन-बेटियों को अपनी बहन-बेटियां मानिए और उनकी रक्षा समाज के अपराधी तत्वों से कीजिए, जिनमें अधिकांश वो लोग हैं, जो आज सड़क पर अपराध का नंगा नाच कर रहे हैं.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

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संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

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