राजनीति

कैसे होगा भाजपा के मिशन 2019 का सपना पूरा?

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जातिवादी वर्चस्व की राजनीति ने सीतामढ़ी जिला में भाजपा संगठन को भीतर से खोखला कर दिया है. प्रदेश स्तर पर जिलाध्यक्ष के चुनाव के बाद से जिला संगठन दो खेमों में बंटा नजर आने लगा है. वर्तमान जिलाध्यक्ष सुबोध कुमार सिंह अपने ही दल के कुछ जिम्मेदार पदाधिकारियों की करतूतों को लेकर हाल में एनडीए गठबंधन के रालोसपा सांसद राम कुमार शर्मा से आमने-सामने हैं. वहीं जिला संगठन के विस्तार में पुराने सक्रिय कार्यकर्ताओं को किनारा कर नए चेहरों को तरजीह दिए जाने से विवाद और बढ़ गया है.

सीतामढ़ी जिला भाजपा अध्यक्ष के चुनाव के लिए आधा दर्जन से अधिक कार्यकर्ताओं ने नामांकन दाखिल किया था. परंतु पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच सामान्य स्थिति बनाए रखने को लेकर प्रदेश संगठन ने जिलाध्यक्ष का चुनाव किया. इसमें पार्टी के समर्पित कार्यकर्ताओं की अनदेखी कर खास गुट के नेताओं को तरजीह दी गई. कार्यकर्ताओं को उम्मीद थी कि नए जिलाध्यक्ष सुबोध कुमार सिंह के नेतृत्व में पार्टी संगठन को मजबूती मिलेगी. वे एक दशक पूर्व जिला महामंत्री का पद भी संभाल चुके हैं. मगर हाल के महीनों में पार्टी पदाधिकारी, कार्यसमिति सदस्य व विभिन्न प्रकोष्ठों के जिलाध्यक्षों का चुनाव किसी भी दृष्टिकोण से पार्टी के लिए हितकर नजर नहीं आ रहा है. जिला भाजपा संगठन के एक पूर्व पदाधिकारी का कुछ ऐसा ही मानना है.

अब एक नजर जिलाध्यक्ष द्वारा गठित जिला भाजपा कमिटी की सूची पर डाल लेते हैं. भाजपा जिलाध्यक्ष सुबोध कुमार सिंह द्वारा गठित जिला कमिटी में पौने दो सौ कार्यकर्ताओं को शामिल किया गया है. इसमें 8 उपाध्यक्ष, 3 महामंत्री, 8 मंत्री, 1 कोषाध्यक्ष, 1 मीडिया प्रभारी, 69 कार्य समिति सदस्य, 19 स्थायी आमंत्रित कार्यसमिति सदस्य, 56 विशेष आमंत्रित कार्य समिति सदस्य के अलावा मोर्चा एवं मंच के 12 जिलाध्यक्षों को शामिल किया गया है. इसमें कुल 30 महिलाएं हैं, जिसमें 1 उपाध्यक्ष, 4 मंत्री और 25 कार्य समिति सदस्य हैं.

वहीं 3 अल्पसंख्यकों को भी कार्य समिति में शामिल किया गया है. इसके अलावा विधानसभा स्तर पर कुल 125 कार्य समिति सदस्य बनाए गए हैं. इनमें सीतामढ़ी विधानसभा क्षेत्र में 29, रून्नीसैदपुर में 13, बाजपट्‌टी में 14, सुरसंड में 18, परिहार में 10, बथनाहा में 11, रीगा में 19 व बेलसंड में 11 को कार्य समिति सदस्य बनाया गया है. वहीं मोर्चा एवं मंचों की जिम्मेदारी एक दर्जन कार्यकर्ताओं को सौंपी गई है. इसमें युवा मोर्चा का नेतृत्व चुनचुन सिंह, किसान मोर्चा का चंदेश्वर पूर्वे, महिला मोर्चा का विभा ठाकुर, अल्पसंख्यक मोर्चा का शाहीन परवीन, अनुसूचित जाति मोर्चा का गौतम राम आजाद, अति पिछड़ा मोर्चा का बृजनंदन प्रसाद, पंचायती राज मंच का नवीन सिंह, सहकारिता मंच का सुरेश नंदन ठाकुर, शिक्षा मंच का पुणीन्द्र चौधरी, क्रीड़ा मंच का अखिलेश सिंह, व्यवसाय मंच का सुनील नायक व चुनाव आयोग मंच का महंत अशोक दास को दिया गया.

पार्टी सूत्रों का कहना है कि जिला कमिटी में अधिकतर वैसे लोगों को शामिल किया गया है, जो कुछ वर्षों में किसी अन्य पार्टी से पधारे हैं अथवा जिनका लंबे अर्से से पार्टी संगठन से कोई नाता नहीं था. वहीं कुछ ऐसे भी लोग शामिल हैं, जिन्होंने पिछले बिहार विधानसभा चुनाव में पार्टी गठबंधन के प्रत्याशी के विरुद्ध बतौर निर्दलीय चुनावी समर में उतरे थे. नतीजतन पार्टी व गठबंधन के प्रत्याशियों को पराजय का सामना करना पड़ा था. विधानसभा चुनाव में एनडीए गठबंधन प्रत्याशी के होते हुए चुनावी दंगल में ताल ठोकने वालों में सीतामढ़ी विधानसभा क्षेत्र से शाहीन परवीन, बेलसंड विधानसभा से पूर्व विधान पार्षद बैद्यनाथ प्रसाद, रून्नीसैदपुर विधानसभा से शशिनाथ सिंह व बाजपट्‌टी से श्याम चौधरी समेत कुछ अन्य लोग रहे हैं.

इसके बावजूद उन्हें जिला कमिटी में स्थान दिया गया है. जिला में मोर्चा एवं मंच की जिम्मेदारी कुछ ऐसे लोगों को सौंपी गई है, जो बिल्कुल नए चेहरे हैं अथवा पार्टी लीक से हटकर काम करते रहे हैं. वहीं लंबे अर्से से जिला कमिटी में सक्रिय रहे प्रो. विरेंद्र प्रसाद सिंह, निर्मल कुमार वियाहुत, संजय प्रियदर्शी, राम नरेश पांडेय, शिवराम साह व संजीव चौधरी सरीखे कार्यकर्ताओं की अनदेखी की गई है. चर्चा है कि दो खेमों में विभक्त जिला नेतृत्व की कमान दो अलग-अलग स्वजातीय पूर्व प्रतिनिधि के हाथों में है.

इनमें एक फिलहाल सक्रिय नहीं हैं, जबकि दूसरे पार्टी गतिविधियों में भागीदारी कर रहे हैं. चर्चा यह भी है कि इन दोनों के बीच चल रहे राजनीतिक वर्चस्व का फायदा कोई और उठा रहा है और पार्टी संगठन में अपनी स्थिति मजबूत करने में लगा है. इनका मकसद जिला पार्टी संगठन को मजबूत करने से ज्यादा 2019 की दावेदारी को लेकर अपने कुनबे को मजबूत करना है. जिले में भाजपा संगठन के जो हालात हैं, अगर समय रहते केंद्रीय और प्रदेश नेतृत्व ने इस पर गंभीरता से विचार नहीं किया, तो मिशन 2019 का सपना अधूरा रह जाएगा.

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