प्रधानमंत्री जी और राष्ट्रपति जी के भाषण ने मेरी आंखें खोल दी

इस बार 15 अगस्त ने हमें बहुत सारे नए ज्ञान दिए. एक ज्ञान तो ये दिया कि प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की भाषा, बिल्कुल कौमा और फुलस्टॉप के साथ एक है. शैली भी एक है. दोनों ने मिलकर जो बातें देश के सामने रखीं, उसने मेरे जैसे लोगों को बहुत चमत्कृत कर दिया. मेक इन इंडिया, जिससे नया हिन्दुस्तान बनता, सफल हो गई है. मेक इन इंडिया अब न्यू इंडिया बन गया है, मतलब नया हिन्दुस्तान बन रहा है. अब नया इंडिया नाम, एक अखबार नया इंडिया नाम से निकलता है, तो उसके संपादक बहुत खुश होंगे कि उनका नाम प्रधानमंत्री मोदी को बहुत पसंद आया.

पर मुझे जो ज्ञान मिला, वो ये है कि हम लोगों को नौकरियां दे चुके हैं, देश का नौजवान खुश है, किसान का 90 प्रतिशत से ज्यादा कर्ज माफ हो चुका है, बहुत सारी योजनाएं प्रधानमंत्री मोदी ने नए नाम से शुरू की हैं. उन योजनाओं का पहले से चल रही योजनाओं से कोई रिश्ता नहीं है, इसलिए जो लोग ये कहते हैं कि उन्होंने सारी पुरानी योजनाओं का नाम बदलकर नई योजनाओं का चेहरा बना दिया है, वो गलत कहते हैं. मोदी जी ने बिल्कुल नई योजनाएं शुरू की हैं और देश में खुशहाली हमारे दरवाजे पर खड़ी है.

इसका मतलब है कि सिर्फ दरवाजा खोलने की देर है, खुशहाली की आंधी हमारे जीवन में आने वाली है. ये सब जानकर हमें इतना अचम्भा हुआ और अच्छा लगा कि हमें अपने आस-पास उन्हें देखने की जरूरत नहीं है. हमारे कानों में बस आवाज आनी चाहिए कि हिन्दुस्तान बदल रहा है. हिन्दुस्तान लगभग बदल गया है. इतना ही नहीं, हिन्दुस्तान महाशक्ति बन गया है. सारी दुनिया में घूमकर बाहर का इन्वेस्टमेंट हिन्दुस्तान में लाने की बात करते थे, हमारे प्रधान सेवक जी. वो इन्वेस्टमेंट अवश्य आ गया होगा, लेकिन उसका कोई आंकड़ा हमारे पास उपलब्ध नहीं है.

लोग खामखाह मूर्खता की बात करते हैं कि नोटबंदी से देश की प्रगति नहीं हुई, बल्कि इस नोटबंदी के प्रचार में कितने हजारों-करोड़ रुपए खर्च हो गए. उसका भी कोई मतलब नहीं है. रिजर्व बैंक गणित नहीं लगा पा रहा है कि कितने रुपए उसके पास आए, इसके बावजूद कि लोग मांग कर रहे हैं, कम से कम ये तो बताओ कि नोटबंदी की वजह से जो नोट बदले गए, कितने आए. उन सवालों का भी कोई मतलब नहीं है, क्योंकि कालाधन समाप्त हो चुका है.

इसका मतलब आजादी से लेकर अब तक कालेधन को लेकर जितने भी सवाल खड़े हो रहे थे, वो बेवकूफी के सवाल थे. क्योंकि कितना कालाधन आया, कम से कम यही सरकार को पता नहीं है. कभी दो लाख करोड़ कहते हैं, कभी तीन लाख करोड़ कहते हैं. वो कालेधन का हिसाब क्या है? अगर प्रधान सेवक जी की अभी की बात मानें तो हम कोई भी रकम कह सकते हैं कि ये कालाधन है. कालाधन अब स्विस बैंकों या पनामा या डिफरेंट आइलैंड्‌स में, दुनिया के जो टैक्स हैवन देश माने जाते हैं, मॉरीशस में नहीं है. आतंकियों को तो कोई फंडिंग हो ही नहीं रही है और वो फंडिंग बंद हो गई.

आतंकवाद के ऊपर कंट्रोल हुआ है, क्योंकि कश्मीर में पत्थरबाजी कम हुई है. हमने कहा है कि ये हमारी नोटबंदी की वजह से हुआ है, क्योंकि अब उनको रुपया नहीं पहुंच पा रहा है, इसलिए अब कश्मीर में नौजवान पत्थर नहीं चला रहे हैं. इतनी ज्ञान की बातें उन अखबारों को भी नहीं पता, जो दिन-रात आरती उतारने में लगे हुए हैं, क्योंकि उनके पास भी इन तर्कों को पुष्ट करने के कारण जरूर होंगे. वो कोई भी कारण हमें नहीं बता पा रहे हैं. शायद बताना नहीं चाहते. लेकिन मैं और मेरे जैसे लाखों-करोड़ों लोग अपना माथा पीट रहे हैं, अपनी बुद्धि को कोस रहे हैं कि हमें ये सब क्यों नहीं दिखाई दिया और नहीं दिखाई देता है तो इसका मतलब हमारा आईक्यू गड़बड़ है. हमारी समझ गड़बड़ है. हमारी बुद्धिमत्ता को कहीं जंग लग गई है.

हमें देखना चाहिए कि 2022 में हम इस देश को नया बनता हुआ देखेंगे, नया बना हुआ देखेंगे. हर व्यक्ति को मकान मिल जाएगा, तीन साल में कितने लोगों को मकान मिले, इसका कोई आंकड़ा नहीं है. 2022 में अचानक हमारे देश के सभी बेघर लोगों को घर मिल जाएंगे. किसानों की फसल का भाव बढ़ जाएगा, उनकी आमदनी दोगुनी हो जाएगी. कैसे होगी, ये सवाल करना आज की तारीख में बहुत गलत है. जावेद अख्तर जैसे लोगों को तो सजा होनी चाहिए, जो नया हुक्मनामा नाम की नज्म सुना रहे हैं. आप जावेद अख्तर की वो नज्म सुनिए, नया हुक्मनामा और जावेद अख्तर को हजारों गालियां दीजिए कि तुमको इस देश में होने वाली प्रगति क्यों नहीं दिखाई दे रही है.

उस प्रगति के बारे में लिखो भाई. ये क्या लिख रहे हो कि हवाएं चले तो पूछ के चले, समुद्र में लहरें उठे तो कितनी उठेंगी, ये पहले अफसरों से पूछ लें. ये सब बेवकूफी और वाहियात बातें हैं. इस 15 अगस्त पर प्रधानमंत्री मोदी ने और देश के महामहिम राष्ट्रपति ने जो भाषण दिए हैं, वही जीवन का अंतिम सत्य है. जिसको उस सत्य के ऊपर भरोसा नहीं है, उसे इस देश में आजादी और चैन से जीने का हक नहीं है. उसे चाहिए कि वो कूपमंडूक हो जाए. लोग कहते हैं कि अपना ज्ञान बढ़ाओ. उसे चाहिए कि वो अपने उस बेवकूफी भरे ज्ञान को, जो इन बातों को सत्य नहीं मानता है, अपने दिमाग को किसी कैदखाने में, काल कोठरी में डाल दे.

मैं ये सब बातें इसलिए कह रहा हूं कि मुझे आपसे कहते हुए बहुत खुशी हो रही है कि इस बार हमें ये पता चला कि 2019 के इलेक्शन के लिए कोई मुद्दा ही नहीं है. 2019 के इलेक्शन में तो जनता मौजूदा नीतियों का समर्थन ही करने जा रही है, बल्कि 450 भाजपा सांसदों को जिताने जा रही है. 412 राजीव गांधी को मिले थे, उससे ज्यादा की जीत होने वाली है. इसलिए 2019 का तो कोई सवाल है ही नहीं. सवाल 2022 का है.

अगर हम 2022 में इस सरकार को नहीं देखना चाहते हैं या हम सवाल उठाते हैं तो हम उन सारे अच्छे विषयों को कूड़ा बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जो नहीं होना चाहिए. जैसे हरेक को मकान मिल जाएगा, हरेक को रोटी मिल जाएगी, किसान की आमदनी बढ़ जाएगी, ये सब चीजें 2022 में होंगी. 2022 में और क्या-क्या होगा? नई अर्थनीति आ जाएगी. हमारी विकास दर 10 को पार कर जाएगी. कोई गरीब नहीं रहेगा और रहेगा भी तो क्या हुआ? उन गरीबों की कोई हैसियत नहीं होगी.

उनको किसी तरीके से दो रोटी मिल जाए, उतना ही काफी है. हमारे देश में नक्सलवाद की समस्या है, हमारे देश में जातीय तनाव हैं, हमारे देश में सांप्रदायिक तनाव हैं, इन सारे सवालों का कोई मतलब नहीं है, न ही उनको छूने की जरूरत है. हम एक नए हिन्दुस्तान, नए युग में प्रवेश कर चुके हैं. हम नए भारत को 2022 में देखना चाहते हैं. मैं इन सारे सवालों के आगे अपने को बौना पाता हूं. मैं चाहता हूं कि ऐसा ही हो. मैं अपने साथियों से, खासकर जर्नलिज्म में कुछ लोग हैं, जो अब भी अपनी कलम उठाने की कोशिश करते हैं, रवीश कुमार जैसों से कहता हूं कि अगर आसानी से जीना है, सुख से जीना है तो इन सवालों को मत उठाओ. उसे देखो, जो प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति कह रहे हैं. वो दिखाई क्यों नहीं देता तुमको?

मैंने देखा कि एबीपी न्यूज के अभिसार शर्मा गोरखपुर हादसे को लेकर थोड़ा ज्यादा ही विचलित हो उठे हैं. उनसे भी मुझे कहना है कि तुम्हारी पत्नी सरकारी नौकरी करती है और तुम एबीपी न्यूज में हो. क्या चाहते हो कि उसका कालापानी, अंडमान में तबादला हो जाए या तुम्हें एबीपी से निकाल दिया जाए. अंतरात्मा क्यों अचानक बोलने लगती है? आपके अंतरात्मा में कुछ गड़बड़ी है. उसको ठीक कीजिए, उसको थोड़ा टाइट कीजिए. बहुत ज्यादा अंतरात्मा को बोलना नहीं चाहिए, समझना चाहिए. जो हमें समझाने की कोशिश हो रही है, उसे समझना चाहिए. मैं आपकी इस बात से सहमत हूं कि अमित शाह कहते हैं कि ऐसे हादसे होते ही रहते हैं. इसमें परेशानी की क्या बात है? मानिए इसको कि वो सही कहते हैं.

जब वो ये कहते हैं, तो उसमें ये अंतर्निहित है कि ऐसे हादसे भी होंगे और दूसरी तरह के हादसे भी होंगे. एक दिन आप गायब हो जाएंगे, आपको पता नहीं चलेगा. तो क्या हुआ? 2022 में एक नया देश बनने वाला है, जिसमेंें भले ही वो पांच प्रतिशत लोग हों, लेकिन उन्हें सबकुछ मिलेगा. जिनको नहीं मिलेगा, उनकी कोई हैसियत नहीं होगी. उन्हें खामोश रहने की ही सजा दी जाएगी. तो अगर हमने प्रधानमंत्री जी और राष्ट्रपति जी की बातों से कोई गलत मतलब निकालने की कोशिश की हो, तो उसके लिए हम दोनों से क्षमा चाहते हैं. मैं अपने को सुधार रहा हूं. मैं 2022 में एक नए हिन्दुस्तान को वैसा ही देख रहा हूं, जैसा प्रधानमंत्री जी और राष्ट्रपति जी हमें दिखाना चाहते हैं. आपको इस दिव्य ज्ञान को मूर्त रूप देने के लिए जितनी बधाई दी जाए, उतनी कम है. फिर से आप दोनों को 15 अगस्त के भाषण के लिए और देश को नई वास्तविकता से परिचित कराने के लिए बहुत धन्यवाद.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.
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संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

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