जीतती सरकार, हारते किसान

पहले शाइनिंग इंडिया फिर हो रहा भारत निर्माण और अब न्यू इंडिया की बात हो रही है, लेकिन किसान आज भी मुफलिसी और मौत के बीच जूझ रहे हैं. आजादी के बाद से अब तक किसानों के लिए आंदोलन ही वो माध्यम रहा है, जिसके जरिए वे सरकारों तक अपने हक़ की आवाज पहुंचाते रहे हैं. लेकिन सरकारें उन आवाजों को सुनने और किसानों की समस्या सुलझाने की जगह आंदोलन को असफल करने की कोशिश में लग जाती हैं. कैसे, समझिए इस रिपोर्ट के जरिए…

sarkarप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों की आमदनी दोगुनी करने के लिए 2022 की समयसीमा तय की है. फिलहाल, देश का किसान मंडी में अपना प्याज 50 पैसे किलो बेचता रहे, दूध सड़क पर फेंकता रहे, आत्महत्या करता रहे और जब सब कर के थक-हार जाए तो सड़क पर उतर कर आंदोलन करे. लेकिन, किसान नहीं जानते कि जैसे इस सरकार में इस्तीफे नहीं होते, वैसे ही इस सरकार में आंदोलन की भी कोई गुंजाइश नहीं है. शायद तभी मन्दसौर से लेकर महाराष्ट्र, तमिलनाडु से लेकर राजस्थान तक किसानों ने आंदोलन तो किए, लेकिन उनका आंदोलन अंतिम परिणाम तक पहुंचते-पहुंचते दम तोड़ देता है. सरकारी गोली से लेकर सरकारी वादों के चक्रव्यूह में फंसकर किसान रह जाते हैं. चाहे कर्ज माफी की बात हो या स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश के मुताबिक 50 फीसदी अतिरिक्त एमएसपी दिए जाने की मांग, किसानों की हर मांग को सरकार एक ऐसे जाल में उलझा कर पेश करती है, जिसे किसानों के लिए समझना भी मुश्किल, मानना भी मुश्किल और टालना भी मुश्किल हो जाता है.

अंतत: किसान आंदोलन राष्ट्रव्यापी स्वरूप अख्तियार करने से पहले ही खत्म हो जाता है. पिछले कुछ महीनों में महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु के किसानों का जंतर-मंतर पर अनशन और सितंबर के महीने में राजस्थान के सीकर में लाखों किसानों का महाधरना, प्रदर्शन हुआ. सभी आंदोलनों की मांग करीब-करीब एक ही थी. कर्ज माफी, स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश को लागू करना, उपज का उचित मूल्य मिलना आदि, लेकिन इन तीनों आन्दोलनों का हश्र क्या हुआ, इसे देखते और समझते हैं. सबसे पहले बात करते हैं राजस्थान के किसानों के आंदोलन की. सीकर में 1 से 13 सितम्बर तक चले व्यापक किसान आंदोलन की जो परिणति हुई, उसने साबित कर दिया कि मौजूदा सरकार देश में किसी भी आंदोलन को उस मुकाम तक कभी नहीं पहुंचने देगी, जहां पहुंचकर किसान समस्या इस देश के लिए एक राष्ट्रीय मुद्दा बन सके.

सीकर आंदोलन को असफल करने की कोशिश

आंदोलन की व्यापकता और अपनी मांगों के प्रति किसानों की दृढ़ता को देखते हुए सरकार ने राजस्थान के किसानों की मांगों को पूरा कर उनकी समस्याओं का स्थायी समाधान करने की बजाय उन्हें आधी-अधूरी सहमति और आश्वासनों तक समेट दिया है. हालांकि इससे पहले राजस्थान सरकार ने पूरी कोशिश की कि किसानों का ये आंदोलन असफल हो जाय. पहले तो जयपुर पूरी तरह से सीकर को नजरअंदाज करता रहा, लेकिन जब 4 सितम्बर को सीकर में किसानों द्वारा मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का पुतला जलाया गया और पूरे सीकर में बंद हुआ, तब जाकर सरकार को इस आंदोलन की व्यापकता समझ आई.

लेकिन तब भी सरकार इसे स्थानीय स्तर पर सुलझाने के प्रयास में ही लगी रही. जिला प्रशासन की तरफ से किसानों को बातचीत के लिए बुलाया गया. कलेक्टर, कमिश्नर और आईजी के साथ अखिल भारतीय किसान सभा के नेताओं की वार्ता हुई. लेकिन जैसा कि होना था, यह वार्ता बेनतीजा रही, क्योंकि किसानों की 11 सूत्री मांगों को पूरा करना जिला प्रशासन के वश की बात नहीं थी. आंदोलन खत्म करने के लिए सरकार की तरफ से एक और षड्‌यंत्र रचा गया. मीडिया और जनता में ये संदेश देने के लिए कि सरकार किसान नेताओं से बातचीत कर रही है, सरकार ने भारतीय किसान संघ को वार्ता के लिए बुला लिया, जबकि उनकी इस आंदोलन में कोई भागीदारी नहीं थी.

यह आंदोलन पूरी तरह से अखिल भारतीय किसान सभा के नेतृत्व में संचालित हो रहा था. दरअसल, भारतीय किसान संघ, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का किसान संगठन है. स्पष्ट है कि भाजपा सरकार में आरएसएस से जुड़ा कोई संगठन सरकार के विरुद्ध सड़कों पर उतरेगा नहीं. लेकिन आमलोगों को ये संदेश देने के लिए कि सरकार ने आंदोलनरत किसानों से वार्ता की, इन्होंने आरएसएस के उस संगठन को बातचीत के लिए आमंत्रित किया, जिनतक इनकी सीधी पहुंच है और जो सरकार के विरोध में कुछ नहीं बोल सकते.

किसानों को उलझा दिया सरकारी योजनाओं के जाल में

पूरे राजस्थान की रफ्तार पर ब्रेक लगा देने वाले आंदोलन से जब सरकार की तंद्रा टूटी और सरकार ने किसानों को वार्ता के लिए बुलाया, तो लगा था कि कुछ ठोस परिणाम निकलकर सामने आएगा, लेकिन जो सामने आया वो पूरी तरह से नाकाफी है. जिन ग्यारह सूत्री मांगों को लेकर राज्यभर के किसान अपने घर से दूर लगातार तेरह दिनों तक सड़कों पर रहे, उन मांगों के एवज में सरकार ने उन्हें अपनी पुरानी योजनाओं का लेखा-जोखा सुना दिया है. जी हां, आधे से ज्यादा मांगों के जवाब में उन्हीं घिसी-पिटी योजनाओं का हवाला दिया गया है, जिनकी असफलता ने किसानों को सड़कों पर आने को मजबूर किया. सम्पूर्ण कर्जमाफी को आधे-अधूरे पर समेट दिया गया है, उसमें भी एक लम्बी प्रक्रिया का झोल है. किसानों की मांग थी कि उनके ऊपर जितना भी कर्ज है, उसे माफ किया जाय.

लेकिन सरकार ने इस मांग को आधा-अधूरा पूरा किया है. सरकार 50,000 रुपए तक की कर्जमाफी को लेकर सहमत हुई है. उसमें भी ये कहा गया है कि इस कर्जमाफी को लेकर एक कमिटी बनाई जाएगी. वो कमिटी अन्य राज्यों में हुई कर्जमाफी का अध्ययन करके एक महीने में रिपोर्ट देगी और इसके अनुसार सरकार कर्जमाफी को लेकर कदम उठाएगी. स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करने के मामले में भी टाल-मटोल ही दिखता है. सरकार की तरफ से कहा गया है कि स्वामीनाथन आयोग की 80 फीसदी से अधिक सिफारिशें लागू की जा चुकी हैं. राज्य में पहले से चल रही कृषि विकास की तमाम योजनाएं स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुसार ही हैं.

इसे पूर्णत: लागू करने को लेकर केंद्र सरकार को लिखा जाएगा. पशु बिक्री पर लगी रोक को हटाने वाली मांग में भी ऐसी ही लापापोती हुई है. नए कानून के अनुसार, 3 साल से कम उम्र के बछड़ों की खरीद-फरोख्त पर पाबंदी लगा दी गई थी. किसानों की मांग थी कि इस पाबंदी को हटाया जाय, क्योंकि इस नियम के बाद मजबूर किसान भी अपने पशु नहीं बेच पा रहे थे. सरकार ने इस मामले में पूरी राहत देने की जगह 3 साल को घटाकर 2 साल कर दिया, यानि अब 2 साल से बड़े बछड़े बेचे जा सकेंगे. सहकारी समितियों के कर्जों में कटौती बंद करने और किसानों को फसली ऋृण देने की मांग पर तो पूरी तरह से पुरानी योजनाओं का मुलम्मा चढ़ा दिया गया है.

किसानों के साथ बैठक में मौजूद सहकारी मंत्री ने बताया कि मौजूदा सरकार के कार्यकाल में 57 हजार करोड़ के ब्याज मुक्त ऋृण वितरित किए गए हैं. मंत्री जी ने पिछली कांग्रेस सरकार के द्वारा वितरित किए गए ऋृण से इसकी तुलना की और कहा कि पिछली सरकार ने केवल 27.87 हजार करोड़ के ऋृण ही वितरित किए थे. लेकिन इस ब्याज मुक्त ऋृण को सभी किसानों तक पहुंचाने की मांग को लेकर मंत्री जी ने कुछ नहीं कहा. 60 वर्ष से अधिक उम्र के किसानों के लिए पेंशन की मांग को सरकार ने आम लोगों के पेंशन से जोड़ दिया. सरकार की तरफ से कहा गया कि वर्तमान में सामाजिक सुरक्षा योजना के तहत सभी पात्र व्यक्तियों को वृद्धावस्था पेंशन दिया जाता है.

हालांकि जब किसानों ने कहा कि 5000 न हो सके तो, 2000 रुपए प्रति माह के पेंशन पर विचार किया जाना चाहिए, तो सरकार की तरफ से कहा गया कि इस पूर्ववर्ती योजना में ही संशोधन पर विचार किया जाएगा. बेरोजगारी के सवाल पर भी सकारात्मक रुख दिखाने की जगह सरकार ने इसे पूर्व की योजना से जोड़ दिया. सरकार की तरफ से कहा गया कि मनरेगा योजना के तहत पहले ही सौ दिनों का रोजगार दिया जा रहा है. सीकर के वाहनों को जिले में टोलमुक्त करने की मांग को सरकार टाल गई और कहा कि इसपर विचार किया जाएगा. सीकर को नहरों से जोड़े जाने की मांग का भी कोई स्पष्ट आश्वासन नहीं मिला. सरकार की तरफ से कहा गया कि इसे लेकर पंजाब सरकार के साथ एमओयू की जा रही है. किसानों के लिए मुफ्त बिजली की मांग के एवज में भी पुरानी योजना का हवाला दिया गया.

सरकार की तरफ से कहा गया कि मीटर वाले कृषि उपभोक्ताओं को पहले से ही 90 पैसे प्रति यूनिट की दर पर बिजली दी जा रही है. दलितों, अल्पंख्यकों और महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों के सवाल पर बस ये कहा गया कि कार्रवाई हो रही है. किसानों ने ये मांग भी की थी कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रों की रुकी हुई छात्रवृत्ति जल्द से जल्द दी जाय, इस पर सरकार की तरफ से बस इतना कहा गया कि छात्रवृत्ति के सम्बन्ध में प्रशासनिक स्वीकृति जारी की जा चुकी है.

ऐसा पहली बार नहीं हुआ कि सरकार की तरफ से किसी किसान आंदोलन की धार कुंद करने की कोशिश की गई हो. पिछले 2-3 सालों में जितने भी किसान आंदोलन हुए, सभी को येन-केन प्रकारेण असफल कर दिया गया. कुछ आंदोलनों का उद्देश्य तो हिंसा में दफन हो गया. हाल के दिनों में ऐसे दो आंदोलन प्रमुख रहे. एक महाराष्ट्र का आंदोलन और दूसरा मध्यप्रदेश के मंदसौर का किसान आंदोलन.

महाराष्ट्र आंदोलन: फाइलों में द़फन हो गए वादे

महाराष्ट्र के किसान आन्दोलन ने भी सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था. कर्जमाफी और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू कराने संबंधी अन्य मांगों को लेकर अहमदनगर के दिल पुणतांबा गांव से किसान हड़ताल की शुरुआत हुई थी, जिसने देखते-देखते आंदोलन का शक्ल अख्तियार कर लिया. इस आन्दोलन ने पूरे महाराष्ट्र को अपनी जद में ले लिया था. विरोध स्वरूप सड़कों पर अन्न-फल बिखेर कर और दूध बहाकर प्रदर्शन कर रहे किसानों ने देश ही नहीं, विदेशों में भी सुर्खियां बटोरी थी. इस आन्दोलन की शुरुआत में भी सरकार सोती रही, लेकिन जब आन्दोलन ने व्यापक रूप धारण कर लिया और इससे आम जनजीवन प्रभावित होने लगा, तब सरकार ने किसानों को वार्ता के लिए आमंत्रित किया. 11 जून को मुंबई में किसानों की सुकानु समिति और राज्य सरकार द्वारा बनाई गई मंत्रियों की कमिटी के बीच बैठक हुई. उसमें सरकार की तरफ से किसानों को कर्जमाफी का आश्वासन दिया गया.

इस आश्वासन के बाद किसानों ने आंदोलन खत्म करने का फैसला लिया. लेकिन जब कर्जमाफी की घोषणा की बात आई, तो पता चला कि इसे भी शर्त के साथ लागू किया जा रहा है. शर्त ये थी कि जिन किसानों के पास 5 एकड़ से कम जमीन है, उनका ही कर्ज मा़फ किया जाएगा. हालांकि सरकार ने ये भी कहा कि जिन किसानों के पास 5 एकड़ से ज्यादा जमीन है और वे जरूरतमंद हैं, उनकी कर्जमाफी पर विचार के लिए एक कमिटी बनाई जाएगी और उसकी रिपोर्ट के बाद इन किसानों की कर्जमाफी भी होगी. स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करने को लेकर ये फैसला हुआ कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस की अध्यक्षता में एक कमेटी बनेगी, जिसमें किसानों के प्रतिनिधि भी होंगे. ये कमिटी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलकर आगे की दिशा तय करेगी. दूध के दाम बढ़ाने और किसानों को मुना़फा देने की मांग पर ये फैसला हुआ था कि जिस तरह शक्कर के लिए किसानों और सरकार के बीच 70:30 का हिसाब होता है, वैसे ही दूध का भी होगा. ये भी कहा गया था कि सरकार 20 जुलाई तक दूध के लिए पॉलिसी लाने जा रही है.

सरकार के ये सभी वादे हवाई निकले और अपनी मांगों को लेकर किसानों को फिर से सड़कों पर आना पड़ा. कर्जमाफी के एलान के 2 महीने बाद भी जब सरकार की तरफ से इसे लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो किसानों ने फिर आंदोलन शुरू किया. लेकिन किसानों के इस आंदोलन को स्वतंत्रता दिवस की आड़ में बलपूर्वक कुचल दिया गया. कर्ज माफी के पैकेज को लागू नहीं किए जाने के विरोध में अहमदनगर, नासिक व परभणी के प्रदर्शन कर रहे सैकड़ों किसानों पर पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया, क्योंकि उस दिन 15 अगस्त था. अखिल भारतीय किसान सभा के बैनर तले हो रहे इस आंदोलन के दौरान अहमदनगर में इकट्ठा हुए सैकड़ों किसान मंत्री राम शिंदे से मुलाकात कर अपनी मांगों के समर्थन में एक ज्ञापन सौंपना चाहते थे. लेकिन पुलिस ने उनपर बेरहमी से डंडे बरसाए. ये कितना हास्यास्पद है कि एक तरफ लाल किले की प्राचीर से देश के प्रधानमंत्री किसानों के लिए किए गए अपने कार्यों पर कसीदे पढ़ रहे थे और दूसरी तरफ अपने हक की आवाज बुलंद कर रहे किसानों पर पुलिस लाठियां बरसा रही थी.

मंदसौर आंदोलन: हिंसा की आग में जली किसानों की मांग

मध्यप्रदेश के मंदसौर में किसानों के आंदोलन की परिणति तो और भी दुखद रही. जो किसान अपने हक के लिए सड़कों पर उतरे, उन्हें पुलिस की गोली खानी पड़ी. 6 जून को हजारों किसानों का हुजूम मंदसौर और पिपलियामंडी के बीच बही पार्श्वनाथ फोरलेन पर इकट्ठा हो गया. इन किसानों ने चक्का जाम करने की कोशिश की. पुलिस की तरफ से जब किसानों पर सख्ती दिखाई गई, तो किसानों ने विरोध दर्ज कराया. मुट्ठी भर पुलिस किसानों के बीच घिर गई. किसानों का आरोप था कि सीआरपीएफ और पुलिस ने बिना वॉर्निंग दिए फायरिंग शुरू कर दी. इस फायरिंग में 6 लोग मारे गए. इसके बाद तो पूरा मंदसौर, नीमच, रतलाम सहित कई जिले हिंसा की आग में जलने लगे. जिन मांगों को लेकर किसान सड़कों पर उतरे थे और आंदोलन कर रहे थे, वे सभी मांग हिंसा की भेंट चढ़ गए. इसके बाद शुरू हुआ सियासी ड्रामा. सरकार ने मंदसौर के डीएम-एसपी का तबादला किया. नीमच और रतलाम के भी कलेक्टर बदले गए.  गौर करने वाली बात ये रही कि सरकार पहले पुलिस फायरिंग में किसानों की मौत से इनकार करती रही. लेकिन गोलीकांड के तीसरे दिन सरकार ने यू-टर्न लिया और 8 जून को गृहमंत्री भूपेन्द्र सिंह ने पुलिस फायरिंग में 5 किसानों के मौत की बात मान ली. मुख्यमंत्री आंसू बहाते हुए मीडिया के सामने प्रकट हुए और मध्य प्रदेश में शांति बहाली के लिए अनिश्चितकालीन उपवास का एलान किया. हालांकि 9 जून को शुरू हुआ शिवराज सिंह चौहान का उपवास 10 जून को ही ख़त्म हो गया. कांग्रेस ने इसे दिखावा करार दिया और इसके बदले में 14 जून से 72 घंटे के सत्याग्रह का एलान किया. लेकिन इस पूरी सियासी नौटंकी के बीच किसानों की मांगों वाला मुख्य मुद्दा भी सरकारी गोली खाए किसानों के साथ ही द़फन हो गया.

क्या हैं किसानों की असल समस्याएं

बहरहाल, किसान आंदोलन के लगातार असफल होने के पीछे कई कारण हैं. जाहिर है, कोई सरकार अपने खिलाफ आन्दोलन नहीं चाहती, लेेकिन किसानों की कुछ ऐसी मूलभूत समस्याएं भी हैं, जिसे आमतौर पर किसान अपने आन्दोलन में नहीं उठाते. कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 1951 के बाद से प्रति व्यक्ति भूमि की उपलब्धता में 70 फीसदी की गिरावट हुई है. ये आंकड़े वर्ष 2011 में 0.5 हेक्टेयर से 0.15 हेक्टेयर तक आ गए. भविष्य में यह और घटेगा, यानि यह देश में छोटे और सीमांत भूमि-धारकों की संख्या का 85 फीसदी हैं. भारतीय कृषि राज्य पर 2015-16 की रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया है. एक बड़ी समस्या ये है कि भारत के 52 फीसदी खेत बारिश पर निर्भर हैं. उदारवादी अर्थव्यवस्था अपनाए हुए 25 साल से ज्यादा हो गए. 1991 में जब इसकी शुरुआत मनमोहन सिंह, वित्त मंत्री रहते हुए कर रहे थे, तब कहा गया था कि इससे देश में खुशहाली आएगी.

आज हाल ये है कि 1995 से 2014 के बीच देश में आधिकारिक तौर पर तीन लाख से अधिक किसान आत्महत्या कर चुके हैं. आखिर, किसान को लेकर सरकार की नीति और नीयत क्या है? इसे समझने के लिए एक और आंकड़े पर ध्यान दीजिए. 1947 के बाद, जीडीपी में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी 53.1 फ़ीसद थी. 60 वर्षों बाद यह घटकर 13 फ़ीसद रह गई. गौरतलब है कि सरकारी योजना के हिसाब से इसे और कम करने की कोशिश की जा रही है. सर्विस सेक्टर का हिस्सा बढ़ रहा है. ऐसे में, सरकार की कोशिश है कि 2020 तक जीडीपी में कृषि योगदान कम करके 6 प्रतिशत किया जाए. ऐसे में, किसान आंदोलन अगर कर्ज माफी तक ही अपनी मांग को सीमित रखता है, तो यकीन मानिए, आने वाले समय में भी किसानों को ऐसे ही आंदोलन करते रहना होगा, सरकारी वादों के समक्ष झुकते रहना होगा. कुल मिला कर, इस देश में सरकारें आती-जाती रहेंगी. राजनीतिक दल चुनाव हारते-जीतते रहेंगे, लेकिन किसान हमेशा हारने को अभिशप्त रहेंगे.

न्यू इंडिया में किसानों की क़ब्रगाह के लिए जगह रखिएगा!

भारत में बदलाव के नारे शाइनिंग इंडिया से होते हुए न्यू इंडिया तक पहुंच गए, लेकिन अन्नदाता किसान आज भी मौत को गले लगाने पर मजबूर है. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े बताते हैं कि किसान आत्महत्याओं में 42 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. 30 दिसंबर 2016 को जारी एनसीआरबी की रिपोर्ट ‘एक्सिडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड इन इंडिया 2015’ के मुताबिक साल 2014 में 12,360 किसानों और खेती से जुड़े मजदूरों ने खुदकुशी कर ली. ये संख्या 2015 में बढ़ कर 12,602 हो गई. इन मौतों में करीब 87.5 फीसदी केवल सात राज्यों में ही हुई हैं. साल 2015 में सबसे ज्यादा महाराष्ट्र के किसानों ने मौत को गले लगाया, ये संख्या 4,291 थी. किसानों की आत्महत्या के मामले में महाराष्ट्र के बाद कर्नाटक का नंबर आता है.

कर्नाटक में इस साल 1,569 किसानों ने आत्महत्या की. वहीं तेलंगाना में 1400, मध्य प्रदेश में 1290, छत्तीसगढ़ में 954, आंध्र प्रदेश में 916 और तमिलनाडु में 606 किसानों ने 2015 में आत्महत्या की. अन्य राज्यों की बात करें, तो इसी साल राजस्थान विधानसभा के बजट सत्र में एक प्रश्न के जवाब में वहां के गृहमंत्री ने एक चौंकाने वाला आंकड़ा पेश किया. उन्होंने बताया कि प्रदेश में 2008 से 2015 के दौरान आठ साल में 2870 किसान खुदकुशी कर चुके हैं. इससे भी बुरा हाल छत्तीसगढ़ का है.

छत्तीसगढ़ के राजस्व मंत्री ने इसी साल मार्च में विधानसभा में बताया था कि राज्य में जनवरी 2013 से 31 जनवरी 2016 तक 309 किसानों ने आत्महत्या की है. हालांकि छत्तीसगढ़ सरकार के इस आंकड़े पर भी सवाल खड़ा हो गए, क्योंकि एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार छत्तीसगढ़ में केवल 2015 में 854 किसानों ने आत्महत्या की है. पंजाब की बात करें, तो नई सरकार आने के बाद शुरू के तीन महीनों में ही 125 से किसान अपनी जान दे चुके हैं. ये रिपोर्ट भी गौर करने वाली है कि 1991 से 2011 के बीच लगभग 2000 किसानों ने रोज खेती छोड़ी.

क्या हैं स्वामीनाथन आयोग की स़िफारिशें

  • सीलिंग सरप्लस और बंजर भूमि का वितरण.
  • मुख्य कृषि भूमि और जंगल कॉरपोरेट क्षेत्र को ग़ैर कृषि प्रयोजनों के लिए देने पर रोक.
  • आदिवासियों और चरवाहों को जंगल में चराई का अधिकार.
  • एक राष्ट्रीय भूमि उपयोग सलाहकार सेवा की स्थापना.
  • कृषि भूमि की बिक्री विनियमित करने के लिए एक तंत्र की स्थापना
  • सस्ता स्वास्थ्य बीमा प्रदान करें, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को पुनर्जीवित करें.
  • माइक्रोफाइनांस नीतियों का पुनर्गठन, जो आजीविका वित्त के तौर पर काम करें.
  • सस्ती क़ीमत, सही समय-स्थान पर गुणवत्ता युक्त बीजों और अन्य सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित करें.
  • कम जोखिम और कम लागत वाली प्रौद्योगिकी, जो किसानों को अधिकतम आय प्रदान करने में मदद कर सके.
  • जीवन रक्षक फसलों के मामले में बाज़ार हस्तक्षेप योजना की आवश्यकता.
  • अंतरराष्ट्रीय मूल्य से किसानों की रक्षा के लिए आयात शुल्क पर तेजी से कार्रवाई की आवश्यकता.
  • न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के कार्यान्वयन में सुधार. धान और गेहूं के अलावा अन्य फसलों के लिए भी न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था की जानी चाहिए.
  • न्यूनतम समर्थन मूल्य उत्पादन की औसत लागत की तुलना में कम से कम 50 फ़ीसद अधिक होना चाहिए.
  • ऐसे बदलाव की ज़रूरत है, जो घरेलू एवं अंतरराष्ट्रीय बाज़ार के लिए स्थानीय उत्पाद की ग्रेडिंग, ब्रांडिंग, पैकेजिंग और विकास को बढ़ावा दे.

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