इराक़ के ग्राउंड ज़ीरो से संतोष भारतीय की रिपोर्ट, आईएसआईएस के खिलाफ जनयुद्ध

इस समय पूरी दुनिया में सिर्फ इराक में युद्ध चल रहा है. आईएसआईएस ने इराक के एक हिस्से पर क़ब्ज़ा जमा रखा है. पहले उन्होंने बड़े क्षेत्र पर क़ब्ज़ा जमाया था. वो पूरे इराक के ऊपर क़ब्ज़ा करना चाहते थे, पर धीरे-धीरे इराकी सेना ने उन्हें पीछे धकेल दिया. अब वे केवल तलअफर के इलाके में सिमट कर रह गए हैं. इस युद्ध में अमेरिका सहित पश्चिमी देश आईएसआईएस के खिलाफ इराक के लोगों की मदद कर रहे हैं, यह समाचार भी पूरी दुनिया में फैला हुआ है. मैं इस युद्ध को महसूस करने और जो लोग इराक में सीधे लड़ाई में शामिल हैं, उन लोगों से बात करने इराक गया. 54 डिग्री से ज्यादा भयानक गर्मी, रेगिस्तान, पानी की कमी और आमने-सामने की लड़ाई में जूझ रहे लोगों से जब मेरा सामना हुआ, तब मेरी आंखें खुली की खुली रह गईं. इराकी सेना की वास्तविकता, अमेरिका और पश्चिमी देशों की सच्चाई तथा आईएसआईएस से कौन लोग लड़ रहे हैं, यह जानकारी मेरे लिए चौंकाने वाली थी. मैं पब्लिक मोबलाइजेशन, जिसे इराक में पीएम कहा जाता है और जिसका अरबी नाम हश्द अलशाबी है, उनके दो कमांडरों से मिला. इनके नाम हैं सैयद मोहम्मद अल तला गनी और सैयद अहमद मुसाबी. मैं उन लोगों से भी मिला, जो हश्द अलशाबी के सदस्य हैं और जिन्होंने आईएसआईएस को यानि दाईश को मोसूल से निकालकर एक छोटे कस्बे में घेर रखा है. आईएसआईएस के अत्याधुनिक हथियारों, उनकी क्रूर रणनीति, उनके अमानवीय कार्यों के खिलाफ कैसे छोटे हथियारों से नौजवानों ने लड़ाई लड़ी और अपनी शहादत दी, ये जानकर युद्ध में शहीद हुए नौजवानों के प्रति मेरा सिर श्रद्धा से झुक गया. मैं आपको अपनी इस रिपोर्ट में समझाने की कोशिश करूंगा कि दरअसल आईएसआईएस के खिलाफ चल रहे युद्ध की सच्चाई क्या है? उसमें जो लोग शामिल हुए, उनकी मानसिकता क्या थी और इस समय युद्ध की हालत क्या है? ये रिपोर्ट सीधे इराक के युद्धग्रस्त क्षेत्र से मैंने भेजी है.

iraqदरअसल अरब दुनिया और खास तौर पर इस्लामी देश हमेशा उग्रवाद और बाहरी ताक़तों के प्रभाव में रहे हैं. इन ताक़तों ने अरब देशों की सुरक्षा और स्थिरता को हिला कर रख दिया. नतीजतन क्रूर शासकों को यहां की सत्ता पर क़ब्जा जमाने का मौक़ा मिला. इन बाहरी ताक़तों का मकसद यह था कि अरब दुनिया को बर्बाद कर दिया जाए. अरब देशों में सबसे अधिक बर्बादी इराक की हुई है. पूर्व में यह क्षेत्र ज़ालिम हुक्मरानों की वजह से उग्रवाद का सामना करता रहा है और इराक इसका एक उदाहरण है.

कौन इराक़ को बर्बाद करना चाहता है

पिछले 35 वर्षों से बाथ पार्टी इराक की सत्ता पर काबिज़ रही. बाथ पार्टी की स्थापना एक गैर-मुस्लिम, गैर-अरब ने की थी. कमांडर के मुताबिक, बाथ पार्टी ज़ाइनिस्ट एजेंडे के साथ सत्ता में आई थी. इसका संस्थापक एक गैर अरब, यहूदी ज़ाइनिस्ट मिशेल अफ्लाक था. उसका इराक की एकता और अखंडता व इराकी अवाम की गरिमा से कोई लेना-देना नहीं था. सद्दाम हुसैन की सरकार के पतन के बाद इराक तानाशाही से लोकतान्त्रिक व्यवस्था में दाखिल हुआ और इराक की जनता भय के माहौल से बाहर निकली. हालांकि सद्दाम हुसैन के दौर में भी यहां लोकतंत्र था, लेकिन यह ऐसा लोकतंत्र था जिसमें सत्ता हर हाल में उन्ही की पार्टी के हिस्से में आती थी. ज़ाहिर है यह लोकतंत्र का बेहतर उदाहरण नहीं है. लिहाज़ा यह कहा जा सकता है कि इराकी जनता ने सद्दाम हुसैन के बाद लोकतान्त्रिक तरीके से अपने मसलों को हल करने में अधिक उत्साह दिखाया.

बल्कि यूं कहा जाए कि इराकियों ने एक नई दुनिया का सफ़र तय किया, तानाशाही से लोकतंत्र की दुनिया का सफ़र. लेकिन इन सबके बावजूद इराक के अपने नस्लीय और क्षेत्रीय मसले थे. इन मसलों का हल देश के समक्ष एक बड़ी चुनौती थी. कुछ ताकतें शिया और सुन्नी में नस्लीय झगड़े करवाकर गृह युद्ध का माहौल बनाना चाहते थे, लेकिन जब उन्हें अपने मकसद में कामयाबी नहीं मिली तो उन्होंने इराक को तबाह करने के लिए दूसरा तरीका अपनाया. उन्होंने इराक के पश्चिमी हिस्से, जहां शिया और सुन्नी दोनों रहते हैं, में नस्लीय झगड़े कराने की साजिश रची. उन्होंने सुन्नियों में ये धारणा पैदा करने की कोशिश की कि इराक में शिया फौज है जो सुन्नियों पर अपनी सत्ता स्थापित करना चाहती है. उनकी ये कोशिशें बहुत हद तक सफल भी हुईं और इराक में कई तरह की समस्याएं खड़ी होने लगीं. इन ताकतों ने इराक में लोकतंत्र की बहाली को नुकसान पहुंचाया और इस विचार को जन्म दिया कि इराक पर शियाओं का कब्जा है. इस ख्याल से सुन्नियों के बीच बेचैनी और उलझन पैदा होने लगी. यहीं से उन ताकतों को बल मिलना शुरू हुआ, जो इराक को बर्बाद करना चाहते थे.

पश्चिमी इराक में हर फिरके के लोग (सुन्नी, शिया आदि) रहते हैं और उनमें वैचारिक मतभेद भी हैं. लिहाजा बाहरी ताकतों ने इस मतभेद का फायदा उठाने की योजना बनाई. अलकायदा जो इस इलाके में अपने कारनामों की वजह से बदनाम है, ने अपनी सरगर्मियां तेज कर दी. इराकी अवाम ने इस साजिश को जल्द ही भांप लिया और उनके ये प्रयास विफल हो गए. उसके बाद यही अलकायदा अमेरिका और इजराइल की मदद से आईएसआईएस के नए नाम से सरगरम हुआ.

जिन क्षेत्रों में विवाद था, उसने वहां जाकर नौजवानों को बरगलाया और उनके दिमाग में जहर घोला. इसका प्रशिक्षण उन्होंने अफगानिस्तान में लिया था. उन्होंने शिया समुदाय के लोगों का कत्ल करना शुरू किया. यहां से हालात खराब होने शुरू हुए. इराक के इस पश्चिमी क्षेत्र में शिया बाहुल्य सेना मौजूद थी. इस पृष्ठभूमि में यह मुमकिन नहीं था कि अमेरिका सुन्नियों की कोई फौज तैयार करता. लिहाजा उसने स्थानीय ताकतों की मदद से अलकायदा का जाल बिछाना शुरू किया. उसने शियाओं के खिलाफ दुष्प्रचार करना शुरू कर दिया. इन तमाम कारगुजारियों में अमेरिका का समर्थन हासिल रहा. नतीजा ये हुआ कि यह इलाका देखते-देखते फौजी छावनी में बदल गया.

इन तमाम कारगुजारियों का उद्देश्य मनोवैज्ञानिक युद्ध के लिए माहौल तैयार करना था. गड़बड़ी पैदा करने वाले तत्व सीरिया से तलअफर होते हुए इराक के कई हिस्सों में पहुंच गए. इन तत्वों को सऊदी के शेखों और कतर की सहायता प्राप्त थी, जिसने उन्हें फलने-फूलने का खूब मौका दिया. इन तत्वों को इराक के शियाओं और सुन्नियों के बीच फूट पैदा करने में कामयाबी हासिल हुई. वहाबी विचार के नौजवानों में यह सोच पैदा की गई कि यदि इराक में शिया हुकूमत को मजबूती मिली तो ईरान के साथ मिलकर वो सऊदी अरब और इस्लामी दुनिया को नुकसान पहुंचा सकते हैं. लिहाजा विश्व में शांति स्थापित करने और इस्लाम की बुनियाद को मजबूत करने के लिए इराकी सरकार के खात्मे के लिए संघर्ष करें. इस प्रचार से आईएसआईएस को मजबूती मिली और पूरा इलाका जिसमें इराक, सीरिया और तुर्की शामिल हैं, उनके प्रभाव में आ गया, जिससे यहां का माहौल खराब हो गया.

आईएसआईएस को मदद कहां से मिली

अब सवाल ये उठता है कि जॉर्डन, तुर्की, सीरिया और सऊदी अरब, जो इस क्षेत्र के महत्वपूर्ण देश हैं, में आईएसआईएस का प्रभाव कैसे पहुंचा. सीरिया तो इराक की तरह ही आतंकवाद का शिकार हुआ. उसके पीछेे भी वही कोशिशें हैं, जिसनेे नौजवानों को बरगलाकर आईएसआईएस को मजबूत करने का मौका दिया. आईएसआईएस के गिरोह में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से लोग इस्लाम के गलत विश्लेषण के नाम पर जमा हुए. उनका कोई अपना देश और खास ठिकाना नहीं था. उनमें चेचेन्या, अफगानिस्तान, अमेरिका और यूरोप के नौजवान शामिल थे. उनका संबंध इराक से नहीं है. उन्होंने इस्लाम की अलग विवेचना की और नौजवानों को गुमराह कर अपने साथ कर लिया.

बहरहाल, आईएसआईएस इराक में दाखिल हुआ. वो अपने नेतृत्व और दल-बल के साथ यहां आया. उन्होंने यहां अमेरिकी और जाइनिस्ट (इजरायली) विचारों को मजबूती देने की बात की और इस्लाम की शक्ल बिगाड़ कर पेश की. उनके मुखिया ने ऐसी इस्लामी हुकूमत स्थापित करने की बात की, जो इस्लामी सोच से मेल नहीं खाती. हिलेरी क्लिंटन ने अमेरिकी कांग्रेस में यह स्वीकार किया कि हमारी कोताहियों की वजह से ही आईएसआईएस को मजबूती मिली है, जिससे अरब की एकता धराशाई हो गई और उन्हीं की वजह से इराक में गृह युद्ध के हालात पैदा हुए हैं. अरब स्प्रिंग (गुलाबी क्रांति) के बाद अरब देशों में क्रांति आई. अमेरिका ने वहां अपनी मर्जी की संस्थाएं स्थापित की, अपनी मर्जी की सरकार बनवाई और उनके मंत्री तय किए, उसी तरह इराक में भी क्रांति लाकर एक लोकतांत्रिक देश को इस्लामिक देश में बदलने की कोशिश की गई. जब इराकी जनता ने इन कोशिशों को कामयाब नहीं होने दिया, तो यहां आईएसआईएस को लाया गया, जिसने इराकी अर्थव्यवस्था और सामाजिक ढांचे को जबरदस्त नुकसान पहुंचाया.

आईएसआईएस की मदद किसने की, के बारे में यह कहा जा सकता है कि उनके मददगारों में अमेरिका सर्वोपरि था. उन्हें सऊदी अरब और कतर से आर्थिक सहायता मिली. जाहिर है कि यह सब खुफिया तौर पर हो रहा था. इसका सबूत यह है कि आईएसआईएस के युद्ध क्षेत्र से ऐसी गाड़ियां बरामद हुई हैं, जिन पर सऊदी अरब और कतर के नंबर प्लेट लगे हुए हैं. इसके अलावा यहां मारे गए या पकड़े गए लड़ाकों के पास सऊदी अरब और कतर के पहचान पत्र मिले हैं और ऐसे हथियार भी मिले हैं, जिनपर सऊदी अरब के निशान मौजूद हैं. इससे यह जाहिर होता है कि इन तत्वों की मदद कौन कर रहा है? दरअसल मकसद यह था कि जब ये पश्चिमी इराक पर पूरी तरह से कब्जा जमा लें, तो इराक को दो हिस्सों में बांट दिया जाए. इस तरह से देखा जाए तो यह कहा जा सकता है कि उनका मकसद इराकी जनता को शिया और सुन्नी में बांटने का नहीं था, बल्कि इराक को दो हिस्सों में बांट कर एक हिस्से पर कब्जा जमाना था.

अब सवाल यह पैदा होता है कि इसमें सऊदी अरब का कौन सा हित था? दरअसल सऊदी अरब एक ऐसा देश है, जो वहाबी विचार रखता है, जबकि इराक में लोकतंत्र है और यह पूरी तरह से वहाबी सोच के खिलाफ है. इराक के बाद ईरान भी उन देशों में से है, जो वहाबियत को पसंद नहीं करता. इसका साफ मतलब है कि सऊदी अरब के इस वहाबी विचारधारा के खिलाफ इराक और ईरान एकजुट हैं.

वैसे इस क्षेत्र में इराक एकमात्र ऐसा देश है, जहां लोकतांत्रिक ढंग से वोटिंग कराकर सरकार चुनी जाती है. यही वजह है कि सऊदी अरब संपूर्ण इराक को अपनी विचारधारा के तहत करना चाहता है. इसी मकसद की प्राप्ति के लिए उसने अपने नौजवानों को तैयार किया और उन्हें सुन्नी बहुल मोसूल, बगदाद और समारा भेजा. ये सिर्फ इस वजह से हुआ, क्योंकि सऊदी अरब को अपने देश में जारी शाही हुकूमत पर खतरा नजर आ रहा था. वे इराक की तरक्की और लोकतांत्रिक शक्ति से भयभीत थे. ये बातें यूं ही नहीं कही जा रही है, बल्कि लड़ाई के दौरान गिरफ्तार कैदियों से ऐसे सबूत मिले हैं, जिनसे इस बात का पता चलता है.

पब्लिक मोबलाइजेशन के पीछे कौन

पश्चिमी इराक स्थित मोसूल शिया बहुल क्षेत्र है. यहां सुन्नियों की भी आबादी है. यहां आईएसआईएस ने धावा बोल दिया और बगदाद के आसपास उनकी आहट सुनाई देने लगी. यह खौफ जाहिर होने लगा कि वे बगदाद में भी दाखिल हो जाएंगे. उन्हें रोकने के लिए सरकार की तरफ से ठोस उपाय नहीं किए जा रहे थे. अगर वे बगदाद में दाखिल हो जाते, तो इराकियों खासतौर पर शियाओं का कत्लेआम कर देते. इराक की राजधानी बगदाद पर उनके कब्जे के बाद पूरी दुनिया में यह संदेश जाता कि इराक पर आईएसआईएस की हुकूमत है. लिहाजा आईएसआईएस को रोकना बहुत जरूरी था. लेकिन ये काम कैसे हो, यह सवाल बरकरार था. जब सरकार की तरफ से नाउम्मीदी नजर आने लगी, तब शिया धर्मगुरु मरजई को पब्लिक मोबलाइजेशन के लिए बयान देना पड़ा. मरजई की धार्मिक हैसियत को समझने के लिए यह साफ करना जरूरी है कि इमाम जाफर शियाओं के बारहवें और आखिरी इमाम हैं. उनके बारे में ये मान्यता है कि वे जिंदा हैं, लेकिन वो हमारी नजरों से ओझल हैं. वे चार अयातुल्लाह के जरिए अपना पैगाम देते हैं.

अयातुल्लाह अपनी मर्जी से कुछ भी नहीं कहते, बल्कि इमाम जाफर के निर्देश के मुताबिक ही अपना बयान या फतवा देते हैं. मरजई चारों अयातुल्लाह के नुमाइंदे होते हैं. इनके फतवे को मानना हरेक के लिए जरूरी है. शिया समुदाय के लोग उनकी बातों पर सौ फीसद अमल करते हैं. यदि वो कुछ करने का आदेश दें तो उसे करते हैं, न करने को कहें तो नहीं करते हैं. उनका बयान कुरान की बुनियाद पर होता है. मरजई का यह बयान तमाम इराकियों के लिए आह्‌वान के तौर पर होता है, जिसे स्वीकार करना या जिस पर अमल करना इराकियों के हर समुदाय के लिए अनिवार्य होता है, चाहे वो सुन्नी हों या शिया या फिर गैरमुस्लिम ही क्यों न हों. मरजई के इस बयान को नजफ और दक्षिणी इराक के लोगों ने फौरन मान लिया और इराक की रक्षा के लिए एकजुट हो गए. दरअसल हश्द अलशाबी (सेना की आम भर्ती या पब्लिक मोबलाइजेशन) के लिए आदेश मरजई की तरफ से ही आते थे. उनका आदेश था कि इधर-उधर की बातों पर ध्यान नहीं देना है.

उनसे भयभीत नहीं होना है. करबला में जुमे की नमाज के खुतबे में अयातुल्लाह की तरफ से आम भर्ती के लिए 14 निर्देश दिए गए कि कैसे आदेश लेना है, कैसे लोगों को बचाना है आदि-आदि. हर जुमे की नमाज के साथ लोगों के लिए निर्देश जारी किए जाते थे. दरअसल ये निर्देश इस्लाम की सही व्याख्या पेश कर रहे थे. सही इस्लाम यही है कि शिया, सुन्नी या गैरमुस्लिमों के बीच कोई भेदभाव नहीं हो. इस उद्देश्य को हासिल करने के लिए इराकियों ने अपना घर-बार छोड़ा और जंग लड़ी. उन्होंने आईएसआईएस के अत्याधुनिक हथियारों के मुकाबले यह लड़ाई पिस्तौल और छोटे हथियारों से लड़ी. उन्होंने यह कुर्बानी किसी व्यक्तिगत फायदे के लिए नहीं दी. वो सिर्फ ये चाहते थे कि देश के नागरिकों की रक्षा करें. यही चाह हर नौजवान में थी और वो इस यकीन के साथ आगे बढ़े कि जंग में उन्हें जीत हासिल होगी. उनका यह विश्वास बहुत ही अटल था, क्योंकि इमाम हुसैन ने चार हजार दुश्मनों का मुकाबला 72 लोगों के साथ मिलकर किया था.

आज नौजवान इसी विचार को अपनाने जा रहे थे. आम भर्ती के एक प्रतिनिधि ने बातचीत के दौरान कहा कि उन्होंने गांधी की इस बात से भी सबक लिया, जिसके बारे में उन्होंने कहा था कि हमने इमाम हुसैन से सीखा कि कैसे हताहत होकर भी जंग जीता जा सकता है. यहां के लोगों का मानना है कि महात्मा गांधी मुसलमान नहीं थे, मगर उनको यकीन था कि इमाम हुसैन की राह पर चलकर कामयाबी हासिल की जा सकती है. इन महान व्यक्तियों के विचारों से हौसला पाकर इराकी नौजवानों ने दुश्मनों का डटकर मुकाबला किया. इसका नतीजा यह हुआ कि आईएसआईएस के कदम आगे बढ़ने से रुक गए. इन नौजवानों को जनता, सरकार और इराकी फौज की मदद हासिल रही. तुर्की और ईरान जैसे देशों ने भी उनका विश्वास बढ़ाया और इस तरह एक आम भर्ती की सेना तैयार हुई.

हश्द अलशाबी ने कैसे दी टक्कर

इस सेना ने आईएसआईएस का पूरी ताकत से मुकाबला किया. लड़ाई से पहले रणनीति बनाई गई कि कैसे आईएसआईएस का मुकाबला किया जाए. आईएसआईएस से इराक की जनता, पुलिस और आम भर्ती की सेना के नौजवानों ने हर स्तर पर लड़ाई लड़ी. आम भर्ती की सेना ने जंग के मैदान में अपनी ताकत से पूरी दुनिया को हैरान कर दिया. इस सेना का मकसद यह था कि मरजई के आदेश को पूरा करते हुए इसकी ताकत का सही इस्तेमाल किया जाए, ताकि यहां विदेशी दखलंदाजी रोकी जा सके. इसलिए कर्बला में जुमे की नमाज के मौके पर मरजई के आदेश को पढ़कर सुनाया गया कि कैसे मुल्क की हिफाजत के लिए अयातुल्लाह यानि मरजई के आदेशों को लागू करना है. इस मौके पर उन शिया शहीदों को भी याद किया गया, जिन्होंने देश के नाम पर कुर्बानी दी थी.

इसके बाद पश्चिमी इराक के लोगों ने शिया फौज के उद्देश्यों और कुर्बानियों को महसूस किया और ये समझा कि शियाओं की इस क्षेत्र पर कब्जा करने की बातें केवल दुष्प्रचार थीं. इस दौरान अमेरिका ने वहां के कबीलों में हश्दुल शबई या आम भर्ती की सेना के बारे में दुष्प्रचार शुरू कर दिया, जिसका समर्थन कुछ सुन्नी नेताओं ने भी किया. लेकिन यह दुष्प्रचार बहुत दिनों तक नहीं चल सका, क्योंकि लोगों ने देखा कि सीरिया के कुछ इलाकों और मोसूल में सुन्नी भी बड़ी संख्या में आईएसआईएस के जुल्म का शिकार हो रहे हैं. लिहाजा सबने मिलकर सेना का साथ दिया और आईएसआईएस को बगदाद की तरफ बढ़ने से रोक दिया.

इस सिलसिले में हाजी सईद ने वहां का आंखों देखा हाल कुछ इस अंदाज में बताया कि आम भर्ती की सेना जब इस क्षेत्र में दाखिल हुई, तो सुन्नियों ने उनका स्वागत किया और उनके कंधे से कंधा मिलाकर आईएसआईएस को भगाने में मदद की. गौरतलब है कि आईएसआईएस से मुकाबला करने के लिए अमेरिका या अंतरराष्ट्रीय समुदाय से कोई मदद नहीं मिल रही थी. आम भर्ती की सेना को प्रशिक्षण देने के लिए ईरान के विशेषज्ञों ने कदम बढ़ाया और इराक के साथ एक समझौते पर दस्तखत किए. इन्हीं विशेषज्ञों ने उन्हें हरेक मोर्चे पर लड़ने के लिए प्रशिक्षित किया. यहां यह बताना जरूरी है कि अंतरराष्ट्रीय गठबंधन या अमेरिकी फाइटर्स विमानों से हश्द अलशाबी को कोई मदद नहीं मिल पा रही थी. जब हश्द अलशाबी ने मोर्चा संभाला, तब अमेरिका ने फिर एक खेल खेला और कहा कि अंतरराष्ट्रीय गठबंधन और अमेरिका हश्द अलशाबी की मदद करना चाहते हैं और हर मोर्चे पर उसके साथ रहना चाहते हैं. लेकिन हश्द अलशाबी अपने दम पर लड़ना चाहता था.

आम भर्ती की सेना को कई चरणों में प्रशिक्षित किया गया. पहला चरण था सेना को प्रशिक्षण देना. दूसरा चरण आईएसआईएस के हमलों के तरीकों पर विचार करना और रणनीति तैयार करना यानि जमीनी और हवाई हमलों में समन्वय स्थापित करना. इसके अलावा आईएसआईएस की आपूर्ति के रास्ते को काटना भी शामिल था. इस सिलसिले में इराकी सरकार ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि आईएसआईएस को अमेरिका की तरफ से आपूर्ति जारी थी. उन पर हवाई हमला करने से अमेरिका ने मना कर दिया था. आम भर्ती की सेना ने सुन्नी इलाकों के लिए अपनी रणनीति तैयार की, ताकि आईएसआईएस उनके क्षेत्र में कदम न जमा सके. इस सेना ने आईएसआईएस के ठिकानों पर हमला कर उनको तबाह करना शुरू कर दिया और उन्हें पीछे धकेल दिया. तलअफर में आईएसआईएस को सीरिया और तुर्की के रास्ते मदद पहुंचाई जा रही थी. आम भर्ती की सेना के लिए ये एक मुश्किलों  भरा दौर था.

प्रधानमंत्री से ये शिकायत की गई कि सीरिया के रास्ते पर तलअफर से पशमर्ग तक आईएसआईएस अपना मजबूत ठिकाना बनाए हुए है. जब सेना उसको तोड़ना चाहती है तो उसे जबरदस्त प्रतिरोध का सामना करना पड़ता है. तलअफर से सीरिया तक आम यातायात भी बिल्कुल ठप पड़ा था. इसके लिए रणनीति तैयार की गई और हैरानी की बात यह है कि आम भर्ती की सेना ने तीन-चार दिन में ही आईएसआईएस के दबदबे को समाप्त कर दिया. अंदाजा था कि इस इलाके को फौजी कार्रवाई से आजाद कराने में नौ से दस माह लग जाएंगे.

इराक़ी जनता अब कमज़ोर नहीं रही

सवाल यह है कि आखिर इस कार्रवाई में आईएसआईएस को सीरिया में दाखिल होने से कैसे रोका गया? इस सिलसिले में आम भर्ती की सेना ने तमाम रास्तों और मदद पहुंचाने वाले ठिकानों को घेर लिया था, जिससे आईएसआईएस की गतिविधियां थम गईं. यह बात भी गौर करने लायक है कि सीरिया के रास्ते पर इस्माइलिया के करीब अमेरिकी वायु सेना ने आम भर्ती की सेना पर हमला कर दिया, जिसमें 50 लोगों की जानें गईं. अमेरिका से जब इसकी शिकायत की गई तो उसका जवाब था कि निशाना लगाने में उनसे चूक हो गई. बहरहाल पिछले दिनों तलअफर को आईएसआईएस से आजाद कराने की मुहिम चली.

यह मुहिम प्रधानमंत्री एबादी और आम भर्ती की सेना के बीच एक समझौते के तहत शुरू हुई. इस समझौते के तहत देश की सभी फौजें शामिल हुईं. तलअफर आईएसआईएस के कब्जे से आजाद हो चुका है और ऐसी उम्मीद की जा रही है कि अब इराक से आईएसआईएस का पूरी तरह से सफाया हो जाएगा.

ये भी आशंका जताई जा रही है कि आईएसआईएस के लड़ाके रमादी, फलूजा, पश्चिमी इराक में कहीं-कहीं छुपे हो सकते हैं और भविष्य में कुछ मुश्किलें पैदा कर सकते हैं.  मौजूदा स्थिति यह है कि अमेरिका ने अब यह सोचना शुरू कर दिया है कि अल जवाहिरी, अल रजाकावी, अल कायदा और आईएसआईएस के बाद उसकी रणनीति क्या होगी? मौजूदा स्थिति में सऊदी अरब और यूएई में बदले की भावना पैदा हुई है. लिहाजा उनकी मदद से इराक में फिर अशांति फैल सकती है.

आम भर्ती सेना की कामयाबी के बाद भरोसा किया जा सकता है कि इराक के पास बड़ी फौजी ताकत है और वो किसी भी साजिश को कुचलने की क्षमता रखता है. बहरहाल आम भर्ती की सेना को मदद पहुंचा कर इराक के प्रधानमंत्री और हुकूमत ने बुलंद हौसले का सबूत दिया और सेना को बड़ी ताकत बना दी.

यह जानना भी बहुत जरूरी है कि आईएसआईएस से पहले अलकायदा की शक्ल में यहुदियों ने मोसूल के कबीलों में और व्यापारियों ने तल अफर के अलग-अलग इलाकों में अपनी जड़ें मजबूत की. वे फिलीस्तीन की तरह यहां भी गृह युद्ध की स्थिति पैदा करने की कोशिश में लगे रहे. ये लोग इराक के असली नागरिक नहीं हैं, बल्कि 1973 की जंग के दौरान यहां आकर बस गए थे और यहां अब व्यापार करते हैं. मोसुल में भी यहूदी रहते हैं, लेकिन वे इस देश के असली नागरिक नहीं हैं. बहरहाल, आम भर्ती की सेना अब इतनी ताकतवर जरूर हो गई है कि वो किसी भी साजिश का सर कुचल सकती है.

ये सच्चाई जो अभी आपने पढ़ी, दुनिया में लोगों को नहीं मालूम है. दुनिया को मालूम भी नहीं होगी, क्योंकि प्रचार तंत्र इतना बड़ा भ्रम पैदा करता है, जिसका कोई उदाहरण नहीं मिलता. मैं भी यहां ये सोच कर आया था कि इराकी सेना ने दाईश को पीछे धकेला है. लेकिन यह देखकर मेरा जनता के प्रति विश्वास और प्रगाढ़ हुआ कि अगर जनता चाहे तो किसी भी स्थिति का सामना कर सकती है. आमने-सामने के हथियारबंद युद्ध में, शायद चीन और वियतनाम के बाद, ये पहला उदाहरण है, जहां इराक की जनता ने सेना की काहिली के खिलाफ, सेना की हथियार डाल देने की कायराना मानसिकता के खिलाफ खड़े होकर, शिया और सुन्नी का भेद मिटाकर, मुस्लिमऔर गैर मुस्लिम का भेद मिटाकर, अपने हाथ में छोटे-छोटे हथियार लिए और अपनी शहादत दी.

दाईश को हर जगह घेर कर रखा और सफलतापूर्वक पीछे धकेल दिया. जनता द्वारा युद्ध लड़ने और जनता द्वारा युद्ध जीतने की यह अद्भुत मिसाल है. रिपोर्ट के अंत में मैं इराक की आम जनता, वहां के नौजवान और हश्द अलशाबी के तमाम सिपाहियों को सैल्यूट करता हूं, जिन्होंने बिना किसी देश की मदद के, बिना बड़े हथियारों के, सिर्फ अपना देश और संस्कृति बचाने के लिए शिया, सुन्नी, मुस्लिम और गैरमुस्लिम का भेद समाप्त कर, एक ऐसा युद्ध लड़ा, जिसका इतिहास जब लिखा जाएगा, तब उस इतिहास को पढ़ने वाले इराकी जनता के प्रति श्रद्धा से अपना सर अवश्य झुकाएंगे.

हमें नहीं पता कि इराक में 39 लापता भारतीय कहां हैं : हश्द अलशाबी

(चौथी दुनिया के प्रधान संपादक संतोष भारतीय ने अपने इराक दौरे पर हश्द अलशाबी के दो प्रतिनिधियों से विस्तार से बातचीत की, जिसका मुख्य अंश यहां पेश किया जा रहा है.)

सवाल: अल बगदादी के बारे में कुछ बताएं. उसे किसने बनाया और क्या वो इराकी हैं?

जवाब: बगदादी इराक का रहने वाला है, लेकिन वो एक विदेशी एजेंट है.

सवाल: आईएसआईएस के जो लड़ाके आप की हिरासत में हैं, आप उनका क्या करते हैं या क्या करेंगे? क्या वे अब भी जेल में हैं या आपने उन्हें सजा दे दी है?

जवाब: जब दो देशों के बीच लड़ाई होती है तो मानवाधिकार हनन के मामलों की जानकारी लेने, मरने वालों को एक दूसरे के हवाले करने के लिए रेड क्रॉस दोनों तरफ का जायजा लेता है. लेकिन आतंकवादियों के मामले में वो कुछ भी नहीं कर सकते हैं. जो लड़ाई के दौरान मारे गए, उन्हें हमने वहीं दफन कर दिया क्योंकि वे आतंकवादी थे, लेकिन जिन्हें हमने पकड़ा है, उन्हें हमने जेल में डाल दिया है. फ़िलहाल हम उनकी राष्ट्रीयता का पता लगा रहे हैं, ताकि उनके देश की सरकारों से उनके बारे में बातचीत की जा सके. उनके खिलाफ अदालत जो फैसला करेगी, उसी के मुताबिक उन्हें सजा दी जाएगी. चूंकि वे हत्यारे हैं, इसलिए उन्हें सजा हमारे अपने कानून के तहत दी जाएगी. इस्लामी क़ानून के मुताबिक दी जाएगी. इस्लामी कानून में इसका ज़िक्र है कि कैदियों के साथ कैसा सलूक किया जाना चाहिए.

सवाल: ये खबरें आईं कि कुर्द औरतों ने आईएसआईएस से जंग किया. इसमें कितनी सच्चाई है?

जवाब: कुर्द सेना ने आईएसआईएस से लड़ाई नहीं की. आईएसआईएस से उनका आमना-सामना हुआ, लेकिन उन्होंने जंग नहीं लड़ी. शायद वो तस्वीरें सीरिया से सम्बन्धित हों. वे सीरिया की सेना से युद्ध लड़ रहे थे. हां, एज़ीदियों ने एक बहुत ही छोटे स्तर पर उनका मुकाबला ज़रूर किया.

सवाल: आपने जिस समूह का अभी ज़िक्र किया, उसे भारत में एज़ीदी के नाम से जाना जाता है. जिस एज़ीद ने इमाम हुसैन का क़त्ल किया, उससे इस समूह का कोई सम्बन्ध है क्या?

जवाब: नहीं, उससे इनका कोई सम्बन्ध नहीं है. इन्हें ए़जीदी कहा जाता है. ये मआद बिन यारब के वंश से सम्बन्ध रखते हैं. हालांकि पहले वो मुस्लिम थे, लेकिन अब उनकी कोई किताब नहीं है, कोई पवित्र स्थल नहीं है, उनकी कुछ रस्में हैं, जो सिर्फ उनकी हैं. जैसा कि हमने कहा कि वे मुसलमान नहीं हैं, लेकिन वे इराकी हैं और हम उनका आदर करते हैं. उनमें से कुछ हमारे साथ आईएसआईएस के खिलाफ जंग भी लड़ रहे थे.

सवाल : इराक में 39 भारतीय लापता हैं. यह माना जाता है कि वे आईएसआईएस के कब्जे में हैं. तो आप लोगों को उनके बारे में कोई जानकारी है कि वे जिंदा हैं या नहीं?

जवाब: हमारे पास ऐसी कोई जानकारी नहीं है कि वे जिंदा हैं या नहीं, लेकिन हमें मालूम है कि 39 भारतीय इराक में लापता हैं.

सवाल: क्या वे तलाफा में नहीं हैं? क्योंकि ये ऐसा इलाका है जो आईएसआईएस के  कब्जे में है.

जवाब: हो सकता है कि वे वहां हो और यह भी हो सकता है वहां न हों.

इराक़ में आईएसआईएस का आ़िखरी क़िला भी ध्वस्त

27 अगस्त इराक के लिए एक ऐतिहासिक दिन बन गया. उस दिन इराकी सेना और हश्द अलशाबी के जवानों ने आईएसआईएस के कब्जे में इराक के आखिरी सबसे बड़े शहर तलअफर पर तीन साल बाद फिर से अपना कब्जा जमा लिया है. 8 दिनों तक चली इस जंग में तलअफर पर आईएसआईएस का कब्जा लगभग खत्म हो गया है. अब वे कुछ छोटे-छोटे इलाकों में सिमट कर रह गए हैं. इस लड़ाई में इराकी सेना और हश्द अलशाबी के जवानों ने तलअफर और उसके आसपास के 29 ठिकानों को आईएसआईएस के कब्जे से छुड़ा लिया. गौरतलब है कि आईएसआईएस ने दो दिन की लड़ाई के बाद 16 जून 2014 को तलअफर पर कब्जा कर लिया था.

आईएसआईएस इस शहर को सीरिया और मोसूल के लिए सप्लाई रूट के तौर पर इस्तेमाल कर रहा था. तलअफर की हार के बाद आईएसआईएस ने यहां से 11 किलोमीटर दूर उत्तर पश्चिमी क्षेत्र अल अयादा इन्क्लेव और उसके आसपास के अन्य गांवों में पनाह ली है. अब इराकी सेना के निशाने पर आईएसआईएस का यही आखिरी इलाका बच गया है. खबरों के मुताबिक, तलअफर की लड़ाई में आईएसआईएस के कुल 302 आतंकी मारे गए. इस लड़ाई में 2000 आईएसआईएस आतंकियों का मुकाबला 50 हजार इराकी सैनिकों के साथ हुआ. जाहिर है, मोसूल में इसी साल जून महीने में आईएसआईएस को शिकस्त मिली थी. अब तलअफर की हार आईएसआईएस की ताबूत में आखिरी कील साबित होगी.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.