कुदरत की मार, सरकार बेकार

yogiयूपी के कई जिलों में बारिश और बाढ़ तबाही मचा रही है. शासन-प्रशासन का राहत कार्य और मुख्यमंत्री का हवाई सर्वेक्षण सब एक घिसी-पिटी फिल्म की तरह दोहरा रहा है. लोग बारिश और बाढ़ से मर रहे हैं और इसी प्रदेश में लोग सूखे से भी मर रहे हैं. अभी पिछले ही दिनों बुंदेलखंड में एक आदमी भूख से मर गया. आदतन प्रशासन ने कह दिया कि वह बीमारी से मरा. गनीमत है कि प्रशासन ने बसपाई शासन की नकल करते हुए यह नहीं कहा कि मरने वाला पागल था.

बुंदेलखंड में महोबा जिले के घंडुआ गांव में भुखमरी के कारण छुट्टन नामक जिस व्यक्ति की मौत हुई वह मजदूर था. उसकी पत्नी ने कहा कि हफ्तेभर से घर में चूल्हा जला ही नहीं. मनरेगा में कई दिन से छुट्टन को काम नहीं मिल रहा था. परिवार भीषण आर्थिक तंगी से गुजर रहा था. उसके बच्चे कई दिनों से भीख मांगकर पेट भर रहे थे. हालात ऐसे थे कि छुट्टन का अंतिम संस्कार करने के लिए परिवार के पास पैसे नहीं थे. छुट्टन के पास कुछ जमीन तो थी, लेकिन आर्थिक तंगी के कारण वह खेती नहीं कर पा रहा था. छुट्टन और उसकी पत्नी उषा अपने तीन बच्चों और बूढ़ी मां के पालन-पोषण के लिए मनरेगा में मजदूरी करते थे.

दोनों ने मनरेगा में मजदूरी की थी, लेकिन उन्हें उसका भी भुगतान नहीं मिला. प्रशासन कहता है कि छुट्टन बीमार था, इसी वजह से मरा. छुट्टन का परिवार कहता है कि भूख की वजह से छुट्टन की तबीयत खराब होती गई और मौत हो गई. छुट्टन की विधवा उषा कहती हैं कि उनके पति पर दो लाख रुपए का कर्ज था. छुट्टन के जीते जी उसकी मदद के लिए कोई नहीं पहुंचा, लेकिन उसके मरने के बाद प्रशासन के अफसर छुट्टन के घर आए. उसके अंतिम संस्कार के लिए पांच हजार रुपए दिए. कुछ अनाज भी दिया और चले गए. स्थानीय लोग कहते हैं कि गांव के लोगों ने चंदा देकर छुट्टन का अंतिम संस्कार किया. इसके पहले भी भुखमरी के कारण महोबा के ही ऐला गांव में नत्थू रैदास की मौत हो चुकी है.

उत्तर प्रदेश में एक तरफ बारिश और बाढ़, तो दूसरी तरफ सूखा विचित्र त्रासदी की तरह आया है. पूरब में बारिश से तबाही है, तो पश्चिम में बारिश के अभाव में खेत सूखे पड़े हैं. आगरा क्षेत्र के किसान बारिश के लिए तरस रहे हैं. इटावा मैनपुरी क्षेत्र में ऐसे ही हालात हैं. बुंदेलखंड के चित्रकूट और बांदा में बारिश के लिए पूजा-पाठ हो रहा है और किसानों की आत्महत्या की खबरें भी आ रही हैं. जालौन और हमीरपुर में भी बारिश नहीं हुई. जबकि पूर्वांचल के जिलों में बाढ़ की विनाशलीला चल रही है. नेशनल हाइवे समेत कई सम्पर्क मार्ग डूब गए या बह गए. गांव, कस्बे, बाजार जलमग्न हैं. हजारों परिवार बांधों, सड़कों और रेलवे ट्रैक के किनारे शरण लिए हैं. बिजली और टेलीफोन सेवा ठप्प पड़ी है. सेना, एनडीआरएफ, पीएसी, एसएसबी बाढ़ प्रभावित परिवारों की मदद में लगी है.

दूसरी तरफ पश्चिमी उत्तर प्रदेश सूखे के कारण बेहाल हो रहा है. बुंदेलखंड तो लगातार प्राकृतिक आपदा का शिकार हो रहा है. कभी सूखा तो कभी ओलावृष्टि बुंदेलखंड को बर्बाद कर रहा है. यहां के किसान लगातार आत्महत्या कर रहे हैं. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि बुंदलेखंड में पिछले पांच वर्ष में 3223 किसानों ने आत्महत्या की. ओलावृष्टि और सूखे जैसी प्राकृतिक आपदा के कारण वर्ष 2015 और 2016 में 1500 से अधिक किसानों की मौत हुई. यह तो आधिकारिक आंकड़ा है, जबकि गैर सरकारी सर्वेक्षणों के आधार पर निकाले गए आंकड़े सरकारी आंकड़े से कहीं अधिक हैं.

भारतीय स्टेट बैंक के वर्ष 2016 के आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश के किसानों पर कुल कृषि ऋण 86241.20 करोड़ है. भारतीय रिजर्व बैंक कहता है कि ढाई एकड़ से कम जोत वाले 31 प्रतिशत सीमांत और लघु किसानों को ऋण दिया गया है. यानि, प्रदेश सरकार ने लघु और सीमांत किसानों के कुल 27,419.70 करोड़ का कर्ज माफ किया. कर्जे का औसत प्रति किसान लगभग 1.34 लाख रुपए का है. सरकारी दस्तावेज कहता है कि कर्जा लेने वाले लघु और सीमांत कृषकों की संख्या लगभग डेढ़ करोड़ है.

जबकि 10 करोड़ किसानों में से 2.33 करोड़ लघु और दो करोड़ सीमांत कृषक हैं. स्पष्ट है कि इन सभी पर किसी न किसी प्रकार का कर्ज जरूर है. फिर सवाल उठता है कि सरकार ने किस आधार पर महज डेढ़ करोड़ कर्जदार किसानों की सूची बनाई? खैर, उत्तर प्रदेश का इस वर्ष (2016-17) का सालाना बजट 3.46 लाख करोड़ रुपए का है. सरकार को इस वर्ष के कुल बजट का 33 प्रतिशत हिस्सा कर्ज माफी के लिए बैंकों को देना होगा. इससे वित्तीय वर्ष 2016-17 में उत्तर प्रदेश को 49,960.88 करोड़ रुपए का राजकोषीय घाटा होगा. यह घाटा सकल राज्य घरेलू उत्पाद का 4.04 प्रतिशत है. कर्ज माफी के बाद यह घाटा 55 प्रतिशत बढ़ जाएगा. उत्तर प्रदेश की वित्तीय हालत पहले से ही खराब चल रही है.

इस प्रदेश में किसानों की हालत यह रही है कि वर्ष 2013 में यहां 750 किसानों ने आत्महत्याएं की थीं. वर्ष 2016 में 1800 किसानों ने आत्महत्या की. आधे से अधिक आत्महत्याएं सूखाग्रस्त बुंदेलखंड और गरीब पूर्वांचल में हुईं. इन आत्महत्याओं का मुख्य कारण किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) का ऋण और उससे भी अधिक साहूकारों का ऋण है. साहूकारों से किसानों ने 20 से 24 प्रतिशत ब्याज पर कर्जा ले रखा है. इसमें किसान की खेती-बाड़ी सब गिरवी पड़ी हुई है और किसान साहूकारों का बंधुआ मजदूर बन गया है. साहूकारों से किसानों को मुक्ति दिलाने की सरकार की तरफ से कोई कानूनी कोशिश नहीं हो रही है.

सूखाग्रस्त बुंदेलखंड के गांवों में हैंडपंपों से पानी निकलना बंद हो गया है. कुएं सूखे हैं. भूगर्भजल का स्तर पाताल में चला गया है. चुनिंदा लोगों के पास गहरे खर्चीले हैंडपंप हैं. लेकिन यह पानी कुछ खास लोगों की ही प्यास बुझाती है. बुंदेलखंड के 80 प्रतिशत किसान कर्ज में डूबे हैं. रोजी-रोटी की तलाश में शहरों में मजदूरी के लिए भाग चुके हैं. गांव के गांव खाली पड़े हैं. केंद्र सरकार की संसदीय समिति की रिपोर्ट तक यह बता चुकी है कि बुंदेलखंड से लोगों का अंधाधुंध पलायन हो रहा है. केंद्र की रिपोर्ट कहती है कि बांदा से 7 लाख 37 हजार 920, चित्रकूट से 3 लाख, 44 हजार 920, महोबा से 2 लाख, 97 हजार 547, हमीरपुर से 4 लाख, 17 हजार 489, उरई से 5 लाख, 38 हजार 147, झांसी से 5 लाख, 58 हजार 377 और ललितपुर से 3 लाख 81 हजार 316 लोग पलायन कर चुके हैं.

केंद्र सरकार की यह रिपोर्ट दो साल पहले की है. अब तो यह आंकड़ा और बढ़ चुका होगा. यह कितनी बड़ी विडंबना है कि जिस धरती से यमुना, चंबल, धसान, बेतवा और केन जैसी नदियां बहती हों, वहां से भूख-प्यास के कारण लाखों लोग पलायन कर जाते हैं. जहां दस वर्षों में चार हजार से अधिक किसान खुदकुशी कर लेते हैं. वहीं पत्थर खोद कर नेता और माफिया करोड़पति और अरबपति होते रहते हैं. बुंदेलखंड में उत्तर प्रदेश के सात जिले झांसी, हमीरपुर, बांदा, महोबा, जालौन और चित्रकूट आते हैं. इन सात जिलों में 19 विधानसभा सीटें हैं. इन सभी सीटों पर भाजपा जीती है. लेकिन इस क्षेत्र की असलियत है, टूटी-फूटी सड़कें, मील दर मील सूखे खेतों का रेगिस्तान, छोटे-छोटे बियाबान पड़े गांव, फूस और खपरैल की छतों के नीचे बैठे सूखे मरियल लोग और मातमी सन्नाटा.

भुखमरी के खिलाफ जंग लड़ रहा है ‘रोटी बैंक’

बुंदेलखंड में पिछले करीब तीन वर्षों से भुखमरी के खिलाफ ‘रोटी बैंक’ जंग लड़ रहा है. ‘रोटी बैंक’ के प्रणेता और संयोजक स्वामी तारा पाटकर कहते हैं कि इसकी शुरुआत तब हुई थी, जब पूरा बुंदेलखंड अकाल की चपेट में था. ‘रोटी बैंक’ ने भूखों की मदद करने के लिए सक्षम लोगों से दो रोटी और थोड़ी सब्जी देने की अपील की, तो हजारों हाथ मदद के लिए उठ खड़े हुए. ‘रोटी बैंक’ भोजन इकट्ठा करके भूखे, लाचार और जरूरतमंदों को वितरित करता है. यह सिलसिला आज भी अनवरत जारी है. महोबा में ‘रोटी बैंक’ की पांच शाखाएं चल रही हैं, जिनमें लोग भोजन जमा करते हैं और इन शाखाओं से गरीबों को दिनभर भोजन बांटा जाता है. शाम को कुछ स्वयंसेवक घरों से भी भोजन इकट्ठा करते हैं और उसे गरीबों को खिलाते हैं. पाटकर कहते हैं, ‘हम नहीं चाहते कि बुंदेलखंड दुनिया में भुखमरी व पिछड़ेपन के लिए जाना जाए. इसीलिए हमने लोगों के सहयोग से ‘रोटी बैंक’ की शुरुआत की. आखिर हम संवेदनहीन सरकार के भरोसे कब तक बैठे रहेंगे. हम नहीं चाहते कि हमारे आसपास कोई भूखा रहे, अपने शहर में कोई व्यक्ति भूखा सोए.’ महोबा के ‘रोटी बैंक’ मॉडल से प्रेरित होकर बुंदेलखंड के हमीरपुर, उरई, बांदा आदि जनपदों मे भी ‘रोटी बैंक’ शुरू हुए, जो सफलतापूर्वक चल रहे हैं. इसके अलावा लखनऊ, दिल्ली, मुंबई, हजारीबाग, इंदौर समेत देशभर में सौ से अधिक रोटी बैंक चल रहे हैं.

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