यूपी की नकारा स्वास्थ्य व्यवस्था के परदे के पीछे की सच्चाई


गोरखपुर, फर्रुखाबाद और अब लखीमपुर खीरी में हुई तमाम बच्चों की दुखद मौत ने न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे देश में भाजपा सरकार की हृदयहीनता उजागर की है. प्रदेश का स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह कहता है कि बच्चों की मौत तो होती ही रहती है, यह सरकार के हत्यारे होने की सनद है. प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उस गोरखपुर जिले से आते हैं और वहीं से लगातार सांसद होते रहे हैं. गोरखपुर में बच्चों की लगातार होने वाली मौतों पर वे लगातार यही कहते रहे कि भाजपा जब सत्ता में आएगी तो सरकार का पहला काम होगा बच्चों की मौत रोकना. लेकिन नतीजा सामने है. ऑक्सीजन के लिए महज 67 लाख रुपए का भुगतान नहीं देने के कारण ऑक्सीजन की सप्लाई रोक दी गई और 60 से अधिक बच्चों को दम घोंट कर मार डाला गया. मानवतावादी होने का दावा करने वाली इसी सरकार ने चिकित्सा शिक्षा का बजट घटाकर आधा कर दिया. गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज समेत सभी सरकारी मेडिकल कॉलेजों को इसी बजट में पैसे मिलते रहे हैं. प्रदेश के 14 मेडिकल कॉलेजों और उनके साथ जुड़े अस्पतालों का बजट पिछले वर्ष के 2344 करोड़ से घटाकर इस वर्ष 1148 करोड़ कर दिया गया. बीआरडी मेडिकल कॉलेज के लिए बजट आवंटन पिछले वर्ष 15.9 करोड़ रुपए था, जिसे घटा कर इस वर्ष 7.8 करोड़ कर दिया गया. चिकित्सा से जुड़ी मशीनों और उपकरणों के लिए बीआरडी मेडिकल कॉलेज को मिलने वाली राशि तीन करोड़ रुपए से घटाकर मात्र 75 लाख रुपए कर दी गई. प्रदेश के अन्य सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में भी यही किया गया. कानपुर और इलाहाबाद के मेडिकल कॉलेजों का बजट आवंटन 15.9 करोड़ से घटा कर इस वर्ष क्रमश: 3.3 करोड़ और 4.2 करोड़ कर दिया गया. गोरखपुर मेडिकल कॉलेज के इंसेफलाइटिस वार्ड में कार्यरत 378 चिकित्साकर्मियों (चिकित्सक, शिक्षक, नर्स और कर्मचारी) को मार्च 2017 से तनख्वाह नहीं मिली. करीब दर्जनभर पीएमआर कर्मचारियों को 27 महीने से वेतन नहीं मिला. यह क्या है? यह क्या स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति योगी सरकार का मानवीय ‘अप्रोच’ है?

विडंबना यह है कि इसी साल मई महीने में उत्तर प्रदेश सरकार ने पोलियो और फाइलेरिया की तरह जापानी इन्सेफ्लाइटिस जैसी बीमारी को भी जड़ से उखाड़ फेंकने का अभियान शुरू किया था. लेकिन यह अभियान केवल प्रधानमंत्री मोदी की चाटुकारिता के दायरे में ही रह गया. इसके शिकार केवल गोरखपुर, फर्रुखाबाद और लखीमपुर खीरी जिले ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश के अस्पताल हुए हैं. जनसंख्या के मुताबिक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के निर्माण से लेकर विभिन्न स्तर के अस्पतालों की स्थापना के कानूनी प्रावधानों का पालन करने की बात तो छोड़िए, जो मेडिकल कॉलेज अस्पताल पहले से हैं उन्हें भी फेल करने की तरफ भाजपा की सरकार अग्रसर है. पूंजी घरानों को मजबूत करने और स्वास्थ्य-माफियाओं को सुखी-सम्पन्न करने के लिए सरकार काम कर रही है.

केंद्र सरकार भी इस साल जो नई राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति लेकर आई, उसने पूंजी घरानों को स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में आखेट करने का मौका दिया है. इस नीति के तहत स्वास्थ्य सेवाएं भी निजी घरानों-संस्थानों से खरीदी जाएंगी. इंगलैंड, न्यूजीलैंड, स्वीडन जैसे कई पूंजी-परस्त देशों में यह व्यवस्था वर्षों पहले (1985 से) लागू है, लेकिन उन देशों में भी ‘परचेज़र प्रोवाइडर स्प्लिट मॉडल’ की व्यवस्था फेल साबित हो चुकी है. ऐसी ही व्यवस्था को अपने यहां माथे पर उठा कर उसे नई राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के नाम से बेचा जा रहा है. यूपी सरकार ने भी ‘बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन’ के साथ मिलकर प्राथमिक चिकित्सा सेवाओं को ‘आउटसोर्स’ करने का करार किया था. इस करार की शर्त ही थी कि स्थानीय सेवादाताओं को इसमें शामिल नहीं किया जाएगा. नई स्वास्थ्य नीति लागू होने के बाद स्वास्थ्य सेवाओं के घरेलू बाज़ार का बड़े पैमाने पर विस्तार होगा और इस क्षेत्र में खर्च होने वाला सरकारी धन स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में काम करने वाली निजी कम्पनियों के आर्थिक स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद साबित होगा. इसीलिए चिकित्सा क्षेत्र में सेवाएं प्रदान करने और अस्पतालों की श्रृंखला चलाने वाली ज्यादातर बड़ी कम्पनियां राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति-2017 से बेहद प्रसन्न हैं. देश की नई स्वास्थ्य नीति का लाभ आम मरीजों को क्या मिल पाएगा, इस बारे में आप समझ सकते हैं और यह भी बखूबी समझ सकते हैं कि निजी कम्पनियां इससे कितना बेशुमार धन कमाएंगी.

नीतियां बनाने वाले हवाबाज-राजनीतिकों को देश की जमीनी स्थिति दिखाई नहीं देती. यूपी को ही एक उदाहरण के बतौर लें, तो पाएंगे कि यहां जनसंख्या बढ़ती रही, लेकिन प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं नीचे ही गिरती चली गईं. यूपी में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली के लिए केवल एक सरकार दोषी नहीं है, दोष सभी सरकारों का है. सबने प्रदेश के स्वास्थ्य क्षेत्र को केवल धन कमाने के स्रोत के बतौर इस्तेमाल किया. इस वजह से नौबत यहां तक आ गई कि विभिन्न बीमारियों से होने वाली मौतों में उत्तर प्रदेश देश के अन्य राज्यों की तुलना में अव्वल है. टाइफाइड से देशभर में होने वाली मौतों में 48 प्रतिशत मौतें यूपी में होती हैं. कैंसर से मरने वाले लोगों में यूपी की भागीदारी 20 प्रतिशत के करीब है, जबकि करीब इतने ही लोग टीबी से मरते हैं. प्रसव के समय मरने वाली महिलाओं (एमएमआर) में उत्तर प्रदेश का स्थान असम के बाद दूसरे नम्बर पर है. वर्ष 2015 का आंकड़ा बताता है कि यूपी में प्रत्येक एक लाख महिलाओं में से 285 महिलाओं की मौत प्रसव के दरम्यान हो गई. प्रदेश की 62 प्रतिशत से अधिक महिलाएं प्रसव से पूर्व मिलने वाली स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित हैं. जन्म से पहले के पांच साल में शिशु मृत्यु दर उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक है. यूपी में हजार नवजात बच्चों में से 64 बच्चे पांच साल की आयु पूरी होने से पहले ही मर जाते हैं. प्रति हजार बच्चों पर जन्म के एक महीने के भीतर 35 बच्चे मरते हैं. 50 बच्चे एक साल भी पूरा नहीं कर पाते. विभिन्न सरकारी और गैर सरकारी संगठनों द्वारा किए गए सर्वेक्षणों के मुताबिक स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में उत्तर प्रदेश की गिनती सबसे पिछड़े आठ राज्यों में होती है.

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