कायाकल्प की राह देख रहा गया का ऐतिहासिक कपिल धारा आश्रम


बिहार के प्रमुख आध्यात्मिक शहर गया में स्थित प्रसिद्ध ॠषि कपिल मुनि का आश्रम प्राचीन काल से ही एक तपस्थली के रूप में विख्यात रहा है. धार्मिक-आध्यात्मिक क्षेत्र से जुड़े कई संत-महात्मा इस आश्रम में आकर तप-सिद्धि प्राप्त कर चुके हैं. लेकिन ब्रह्मयोनी पहाड़ी की तलहटी में स्थित यह आश्रम आज अपने हाल पर आंसू बहा रहा है. कपिल धारा आश्रम की 12.50 एकड़ भूमि में से 10 एकड़ पर भूमि पर अभी भू-माफियाओं ने अवैध कब्जा कर रखा है. इस आश्रम के मुख्य ट्रस्टी योगी आदित्यनाथ जब देश के सबसे बड़े सूबे के मुख्यमंत्री बने, तो यह संभावना जगी थी कि अब इस आश्रम का भी उद्धार हो जाएगा. लेकिन ऐसा कुछ होता नहीं दिख रहा.

कहा जाता है कि सांख्य दर्शन के प्रणेता ॠषि कपिल मुनि जब श्राद्ध करने गया आए थे, तब इस आश्रम के निकट स्थित रूक्मिणी सरोवर से पश्‍चिम ब्रह्मयोनी पहाड़ की तलहटी में उन्होंने अंजजि से पितृ तर्पण किया था. उनकी अंजली से गिरे जल ने धारा का रूप ले लिया, जिसे आज कपिलधारा कहा जाता है. यह धारा आज भी पहाड़ से सालो भर अविरल प्रवाहित होती है. इसके स्त्रोत का आज तक पता नहीं चल सका है. करीब 250 साल पूर्व यहां तपस्या के लिए पहुंचे एक सिद्ध महात्मा ने यहां कपिल धारा आश्रम का निर्माण कराया था. 1905 में यहां के श्रद्धालुओं ने इस आश्रम का जिर्णोद्धार कराया था. बताया जाता है कि रामकृष्ण परमहंस के गुरु तोतापुरी को कपिल धारा आश्रम में ही कठिन तपस्या के बाद सिद्धी की प्राप्ति हुई थी. पटियालाराज के राजकुमार भी सांसारिक सुख छोड़कर तपस्या के लिए कपिलधारा आश्रम में ही आए थे. तपस्या के बाद वे गया में लंगटा बाबा के नाम से प्रसिद्ध हुए. आज भी कपिल धारा आश्रम में उनकी समाधी है. पहाड़ी बाबा, योगीराज गंभीरनाथ जी महाराज, स्वामी आत्मानंद और स्वामी स्वरूपानंद ने भी इसी आश्रम में तपस्या कर सिद्धी प्राप्त की थी. इस तपोभूमि का महात्म्य इतना है कि चैतन्य महाप्रभु भी यहां दर्शन को आए थे. स्वामी विवेकानंद, सिस्टर निवेदिता, योगी अवैधनाथ जी महाराज समेत कई सिद्धहस्त लोग यहां आ चुके हैं. कपिल धारा की गुफाओं में ॠषि-मुनि कठोर तपस्या और सिद्धी की प्राप्ति करते थें. इनमे से तीन गुुफाओं में आज भी नियमित रूप से पुजा-पाठ होता है, परन्तु संकीर्ण रास्ता और अंधेरा होने के कारण चार गुफाओं के अंदर कोई भी जाने का साहस नहीं कर पाता है. कपिलधारा आश्रम की सेवादार इमा गिरी और बंसत गिरी बताते हैं कि कपिलधारा आश्रम की चारो गुफाओं में आज भी दैविक और चम्तकारिक शक्तियां है. इनका कहना है कि आश्रम की इन गुफाओं में पंचमुखी नाग देवता का भी वास है. बताया जाता है कि कपिल धारा आश्रम की इन गुफाओं में तपस्या करने वाले ॠषि-मुनि गुफा के रास्ते से ही ब्रह्मयोनी पर्वत के शिखर पर स्थित शिव मंदिर तक पूजा करने जाते थे.

कपिल धारा आश्रम कभी शहर का सबसे प्रसिद्ध प्राकृतिक और धार्मिक स्थल हुआ करता था. लेकिन आज यह आश्रम अवैध कब्जे और अतिक्रमण की जद में है. सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत से भू-मफियाओं ने फर्जी कागजात बनाकर यहां की जमीनों पर कब्जा कर रखा है. यहां पक्के मकान भी बना दिए गए हैं. दो दशक पूर्व गया के तत्कालिन जिला पदाधिकारी अमृत लाल मीणा ने यहां की भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराया था, लेकिन बाद में प्रशासन की उदासिनता से अतिक्रमण और अवैध कब्जे का वही सिलसिला फिर शुरू हो गया. जिस कपिलेश्‍वर महाराज की पूजा-पाठ से कई संत-महात्माओं ने सिद्धी प्राप्त की, वे आज यहां अवैध निर्माण वाले भवन में कैद हो गए हैं. जिसके कारण यहां पूजा-पाठ भी बंद हो गया है. आश्रम के मंदिरों में स्थापित कई प्राचीन मुर्तियां भी चोरों की भेंट चढ़ गई हैं. इस मंदिर के सेवादार ने बताया कि  आश्रम को अवैध कब्जे से मुक्त कराने के लिए कई बार सरकारी दरवाजा खटखटाया गया, लेकिन सरकारी अधिकारियों ने आपेक्षिक सहयोग नहीं किया.

कपिल धारा आश्रम योगी आदित्यनाथ के परगुरु और गोरखपुर के गोरखनाथ मंदिर के पीठाधीस्वर रह चुके योगी गंभीरनाथ जी महाराज की तपस्थली रही है. योगी गंभीरनाथ जी महाराज के शिष्य योगी अवैधनाथ जी महाराज इस आश्रम के मुख्य ट्रस्टी थे. उनके निधन के बाद योगी आदित्यनाथ कपिल धारा आश्रम के मुख्य ट्रस्टी बने. आश्रम से जुड़े लोगों ने इसके जिर्णोेद्धार के लिए कई बार योगी आदित्यनाथ से गुहार लगाई. उनके उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद ये संभावना जगी थी कि वे अब इस आश्रम के कायाकल्प की दिशा में कुछ काम करेंगे, लेकिन इस दिशा में अब तक कोई काम होता नहीं दिख रहा है. हालांकि योगी आदित्यनाथ ने गया के कपिल धारा आश्रम आने की इच्छा प्रकट की है. आश्रम में एक ट्रस्टी ने ‘चौथी दुनिया’ को बताया कि ‘मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने खुद यहां आकर समस्याओं का संज्ञान लेना चाहते हैं. अगर ऐसा होता है, तो ऐतिहासिक कपिलधारा आश्रम पुन: अपने प्राचीन स्वरूप में लौट आएगा.’