राजनीति

महिलाएं पंचायत संभाल सकती हैं तो देश क्यों नहीं

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राजस्थान के चुरू ज़िले के सुजानगढ़ का गोपालपुरा पंचायत. 2005 में हुए पंचायत चुनाव में गोपालपुरा पंचायत के लोगों ने सविता राठी को सरपंच चुना. वकालत की पढ़ाई कर चुकीं सविता राठी ने लोगों के साथ मिलकर गांव के विकास का नारा दिया था. सरपंच बनने के बाद सविता ने सबसे पहला काम ग्रामसभा की नियमित बैठक बुलाने का किया. ग्रामसभा की बैठकें होने से गांव के लोगों में विश्वास जागा कि उनके गांव की स्थिति भी बेहतर हो सकती है. गांव में हर तऱफ सफाई रहने लगी. सरपंच के साथ गांव वालों ने मिलकर पानी की कमी पूरी की. गांव में आपस में ख़ूब झगड़े होते थे. धीरे-धीरे जब ग्रामसभा की बैठकें होने लगीं तो यह मुद्दा भी उठा और आश्चर्यजनक रूप से लोगों के मतभेद कम होते चले गए. गांव में राशन की चोरी बंद हो गई. इसी तरह जब राजस्थान में टौंक ज़िले के सोड़ा गांव की सरपंच छवि राजावत बनीं, तब से यहां कई बदलाव हुए. छवि राजावत एमबीए की पढ़ाई करने के बाद अपने गांव आई थीं. सोड़ा गांव में ग्राम सभा की नियमित बैठकें उन्होंने करवाई. छवि ने शुरू में ही तीन महीने में ग्राम सभा की तीन बैठकें बुलाकर इसका तोड़ निकाल लिया. इसके बाद गांव से अतिक्रमण हटा. तीन महीने में ही गांव के लोगों ने बातचीत के ज़रिए तालाब की ज़मीन पर बने बाड़े हटवा दिए. आज, छवि राजावत की सफलता की गूंज संयुक्त राष्ट्र तक पहुंच चुकी है.

अभी देश के कई राज्यों में ग्रामीण पंचायतों में महिलाओं के लिए 50 फीसद आरक्षण की व्यवस्था है, तो कई जगह 33 फीसद आरक्षण है. इससे पंचायती राज व्यवस्था में बड़ी संख्या में महिलाओं को स्थानीय राजनीति से जुड़ने का मौका मिला और कई महिला जनप्रतिनिधियों ने इस तरह से काम किया कि उनके काम की चर्चा देश-विदेश तक पहुंच गई. मसलन, उत्तर प्रदेश में हाथरस के ग्राम सासनी की प्रधान अनिता उपाध्याय को केंद्र सरकार की सॉफ्टवेयर प्लान प्लस योजना के तहत गांव का डाटा लोड करने के लिए रानी लक्ष्मी बाई वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया गया. अनिता को गांव में लिंगानुपात, स्वच्छता और पेयजल के क्षेत्र में कार्य करने हेतु भी सम्मानित किया जा चुका है. सुल्तानपुर के गांव भपटा की ग्राम प्रधान बिंदू सिंह ने अपने गांव की वेबसाइट ही बना डाली और उसमें गांव के हर व्यक्ति से संबंधित जानकारी डाल दी. राजस्थान के सिरोही जिले की सेलवाडा ग्राम पंचायत की सरपंच मंजू मेघवाल गांव में बाल विवाह, लिंग आधारित गर्भपात, दहेज प्रथा जैसी कुरीतियों के खिलाफ काम करती रही हैं. मंजू ने विद्यालयों में बालिकाओं का ठहराव सुनिश्चित करने के लिए शौचालय की मरम्मत करवाई. राजस्थान के बहरोड़ तहसील की बूढ़वाल ग्राम पंचायत का चुनाव जीतने वाली सरपंच आशा देवी गांववासियों के लिए एक नई उम्मीद की किरण बनकर उभरीं. शत-प्रतिशत बालिका शिक्षा और कन्या भ्रूण हत्या को रोकना ही उनका लक्ष्य है. आशा देवी की पहल के बाद ग्रामीणों ने फैसला किया कि अब गांव में किसी भी समारोह में डीजे नहीं बजेगा. भोपाल के बरखेड़ी की महिला सरपंच भक्ति शर्मा के पंचायत में आज गांव में 100 ़फीसद लोगों के राशन कार्ड बने हुए हैं, सभी के बैंक अकाउंट्स हैं. सभी बच्चे स्कूल जाते हैं.

शफीक आलम Editor|User role
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