स्वायत्तता कश्मीरियों के लिए भावनात्मक मुद्दा है

देश में इस वक्त कश्मीर के हालात पर दो तरह के नजरिए पाए जाते हैं. पहला नजरिया कश्मीर समस्या के समाधान में सख्ती बरतने की बात करता है और दूसरा नरमी अख्तियार करने की. आरएसएस के 92वें स्थापना दिवस पर संघ प्रमुख मोहन भागवत ने ये मांग रखी कि कश्मीर को भारत में पूरी तरह शामिल करने के लिए संविधान में संशोधित किया जाए. मोहन भागवत के बयान के दूसरे दिन जम्मू-कश्मीर में भाजपा के सीनियर लीडर एवं मुख्यमंत्री निर्मल सिंह ने कहा कि भाजपा धारा 370 को समाप्त करने का पक्का इरादा रखती है. उन्होंने यहां तक कह दिया कि पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा अपने दम पर सरकार बनाने में सक्षम होती तो आज जम्मू-कश्मीर का नक्शा कुछ और होता. जाहिर है इस नजरिए से कश्मीर में और अधिक बेचैनी बढ़ेगी.

कश्मीर के बारे में दूसरा नजरिया उन लोगों का है, जो चाहते हैं कि राज्य को दिए हुए विशेष अधिकार पूरी तरह से बहाल किए जाएं. उनका ये भी कहना है कि समस्या का समाधान राजनैतिक तौर पर करने के लिए बातचीत का सिलसिला शुरू किया जाए. इस नजरिये के हामियों में भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री यशवंत सिन्हा भी शामिल हैं. वे पिछले एक वर्ष में कई बार कश्मीर का दौरा कर चुके हैं. उन्होंने यहां न सिर्फ सियासी और मजहबी रहनुमाओं से बातचीत की, बल्कि आम लोगों से भी मिलकर उनके विचार जानने की कोशिश की.

यशवंत सिन्हा ने अपने हाल के इंटरव्यू में कहा कि भारत ने भावनात्मक तौर पर कश्मीर को खो दिया है. उनका कहना है कि वादी में मायूसी बढ़ रही है. उन्होंने आगे कहा कि भारत को फौजी ताकत पर भरोसा करने के बजाय पाकिस्तान और कश्मीरियों के साथ बातचीत शुरू करनी चाहिए. भाजपा-पीडीपी के बीच हुए एजेंडा ऑफ एलाइंस का हवाला देते हुए यशवंत सिन्हा ने कहा कि सरकार बनाते समय दोनों पार्टियों में हुर्रियत से बातचीत करने पर सहमति बनी थी.

बहरहाल, फिलहाल सत्ता पक्ष यशवंत सिन्हा की बात सुनने के लिए तैयार नजर नहीं आता. मोदी सरकार कश्मीर पर नरमी बरतने का केवल दिखावा करती है. 15 अगस्त के अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने कहा था कि कश्मीर समस्या का समाधान कश्मीरियों को गले लगाने से होगा, लेकिन अभी तक सरकार की ओर से कश्मीर में कोई ऐसा सकारात्मक कदम नहीं उठाया गया है. गृह मंत्री राजनाथ सिंह हाल में कश्मीर दौरे पर थे. धारा 35 ए को समाप्त किए जाने के सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने यकीन दिलाया था कि कश्मीरियों की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाया जाएगा.

उनकी बात से ये मतलब निकाला जा सकता है कि कश्मीर को विशेषाधिकार देने वाली धाराओं को संविधान से नहीं हटाया जाएगा. गौरतलब है कि इस धारा को समाप्त करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की जा चुकी है और केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में इस पर अपना रुख साफ नहीं किया है. गृह मंत्री के बयान के बाद कश्मीर में ये उम्मीद बनी थी कि केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट को बताएगी कि वो धारा 35 ए को समाप्त नहीं करेगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. कश्मीरियों को डर है कि संविधान के इस प्रावधान को किसी भी वक्त खत्म करके राज्य की रही सही स्वायत्तता भी छीन ली जाएगी.

कश्मीर के प्रति मोदी सरकार की दोहरी नीति की वजह से दिल्ली और कश्मीर के दरमियान खाई दिन प्रति दिन बढ़ती जा रही है. शायद इसी वजह से यशवंत सिन्हा ने कहा है कि भारत ने भावनात्मक तौर पर कश्मीर को खो दिया है. संवैधानिक स्वायत्तता पर कश्मीरी जनता की संवेदनशीलता का अंदाजा पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेताओं के बयानों से भी लगाया जा सकता है. 35 ए पर राजनाथ सिंह के आश्वासन के फौरन बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुला ने ये मांग रख दी कि अगर राजनाथ सिंह सच कह रहे हैं तो केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट में ये राय रखनी चाहिए. मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्‌ती ने भी कह दिया कि अगर 35 ए को खत्म किया गया तो कश्मीर में तिरंगा झंडा उठाने वाला कोई नहीं होगा. इन दो नेताओं के बयानों से ये जाहिर हो जाता है कि कश्मीरी आवाम स्वायत्तता को लेकर कितनी संवेदनशील है.

13 अक्टूबर को श्रीनगर में बीएसएफ कैंप पर आत्मघाती हमला और एलओसी पर लगातार गोलाबारी इस बात के सबूत हैं कि तीन दशक बीत जाने के बाद भी नई दिल्ली जम्मू-कश्मीर की स्थिति पर काबू पाने में नाकाम रही है. अगर मिलिटेंसी की शुरुआत के 27 साल गुजरने के बाद भी श्रीनगर एयरपोर्ट से कुछ सौ मीटर की दूरी पर स्थित सुरक्षा बलों के कैंप पर आत्मघाती हमला हो सकता है तो इसका साफ मतलब है कि लाखों की तादाद में सैनिक और अर्धसैनिक बलों की मौजूदगी राज्य में मिलिटेंसी को खत्म नहीं कर सकती है. कश्मीर मसले के हल के लिए नई दिल्ली को बातचीत के दरवाजे खोलने ही पड़ेेंगे.

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