सम्मान के साथ जीने का अधिकार बनाम आंदोलन का अधिकार

अब यह एक तरह से दो संवैधानिक अधिकारों के संघर्ष का मसला हो गया है. राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने 5 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर हो रहे धरना-प्रदर्शनों पर रोक लगाने और 4 सप्ताह के भीतर इस जगह को खाली कराने का आदेश जारी किया था. एनजीटी के चेयरपर्सन जस्टिस राठौर ने अपने फैसले में प्रदूषण एवं नियंत्रण अधिनियम, 1981 के प्रावधानों का हवाला दिया और इसे सम्मान के साथ जीने के अधिकार से भी जोड़ा था. गौरतलब है कि जंतर-मंतर के करीब रहने वाले लोगों ने यहां के आंदोलनों को अपने लिए परेशानी बताते हुए एनजीटी में केस दायर किया था. अपने घर 6-जंतर-मंतर रोड पर चौथी दुनिया से बात करते हुए याचिकाकर्ता वरुण सेठ ने कहा कि बीते चार साल से हम इस फैसले के लिए लड़ रहे थे. इन आंदोलनकारियों के कारण हमारा चैन-सुकून खत्म हो गया है. हम अपने घर में शांति से नहीं रह सकते हैं. उन्होंने आसपास के अन्य घरवालों का भी हवाला दिया, जो इन आंदोलनों के कारण परेशान हैं. ऐसे लोगों में जोरावर सिंह सिद्धू का भी परिवार है, जिनका पता है, 5-जंतर-मंतर रोड. इनकी भी वही दलील थी कि आंदोलनकारी हमारे सम्मान के साथ जीने के अधिकार का हनन कर रहे हैं. अब यहां सोचने वाली बात ये है कि क्या जंतर-मंतर पर धरना कर रहे लोगों को संविधान ने आंदोलन का अधिकार नहीं दिया? यदा-कदा बजने वाले लाउड स्पीकर से निजात पाने के लिए प्रयासरत जंतर-मंतर जैसे पॉस इलाके में करोड़ो अरबों के फ्लैट में रहने वाले इन लोगों की परेशानी क्या उनसे बड़ी है, जो अपनी समस्याओं की अनसुनी आवाज लेकर दिल्ली आते हैं? ऐसा भी नहीं है कि ये बीते 4-5 सालों से यहां आंदोलन कर रहे हैं. 1993 से ये लोग यहां आते हैं और अपनी मांगों के समर्थन में आवाज बुलंद करते हैं. रही बात इन्हें दूसरी जगह देने की, तो क्या इन्हें वहां ऐसी सुविधाएं मिल पाएंगी? इस मुद्दे की पड़ताल में हमने दिल्ली सरकार से पूछे गए एनजीटी के उस सवाल का जवाब तलाशने की भी कोशिश की कि क्या आपने कभी जाकर जंतर-मंतर के बाशिंदों की दयनीय हालत देखी है. हमें तो उन बाशिंदों के रहन-सहन में दयनीय जैसी कोई दशा नजर नहीं आई. हां ये जरूर दिखा कि ऋृण मुक्ति जैसे कई मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे तमिलनाडु के किसान अपनी हालत पर आंसू बहा रहे थे. यह भी नजर आया कि सरकारी फाइलों में मृत घोषित कर दिया गया एक युवा सरकार से गुहार लगा रहा है कि उसे जिंदा घोषित किया जाय.

खाने को है नहीं, आंदोलन के लिए 50,000 कैसे देंगे

एनजीटी के फैसले के बाद जंतर-मंतर पर आंदोलन करने आए ओड़ीशा के किसानों को यहां जगह नहीं दी गई. उन्हें कहा गया कि आप रामलीला मैदान जाइए. जब वे रामलीला मैदान पहुंचे, तो वहां पता चला कि उस दिन यानि 11 अक्टूबर को रामलीला मैदान पहले से ही किसी अन्य संगठन के आंदोलन के लिए बुक है. ऐसे में उन्हें वहां से लौटना पड़ा और उन्होंने संसद मार्ग पर प्रदर्शन किया. लेकिन इस दौरान इन्हें एक नई जानकारी मिली. आंदोलन करने वाले किसानों ने चौथी दुनिया को बताया कि रामलीला मैदान में उन्हें पता चला कि वहां आंदोलन करने के लिए एक दिन के 50,000 रुपए देने पड़ते हैं. कोई भी संगठन अगर वहां धरना-प्रदर्शन या आंदोलन करना चाहे, तो पहले उसे पूरे पैसे का भूगतान करना होगा. साथ ही वहां आंदोलनकारियों के लिए कोई सुविधा भी नहीं है. अब ये सोचने वाली बात है कि 12 एकड़ वाला रामलीला मैदान जंतर-मंतर का विकल्प कैसे हो सकता है. जंतर-मंतर जहां धरना-प्रदर्शन करने वाले ज्यादातर आंदोलनकारियों के खाने-पीने का सहारा बंगला साहिब गुरुद्वारे का लंगर है, वे रामलाला मैदान में आंदोलन करने के लिए 50,000 कहां से देंगे?

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