सकारात्मकता से परास्त विवाद

litteratureअपने एक लेख में मशहूर सांस्कृतिक इतिहासकार लोटमान ने लिखा है कि चिन्हों और प्रतीकों के जरिए संप्रेषण मानवता की सबसे बड़ी उपलब्धि है, लेकिन इसकी भी नियति तकनीकी सुधार की तरह ही है. जैसे प्राय: सभी तकनीकी सुधार एक प्रकार से दोधारी तलवार होते हैं. जहां उन्हें सामाजिक प्रगति और जनकल्याण के क्षेत्र में अपनी भूमिका का निर्वाह करना पड़ता है, वहां नकारात्मक उद्देश्यों के लिए भी उनका उपयोग चालाकी से किया जाता है. चिन्हों और प्रतीकों के उपयोग का उद्देश्य सही रचना देना होता है, लेकिन इसका उपयोग बहुधा गलत रचना देने के लिए किया गया गया है. उनका मानना है कि इस प्रकार के चलन से एक बहुत ही विचित्र किस्म की हठवादी विपरीत अवधारणा का विकास हुआ.

इस अवधारणा के तहत यह माना जाने लगा कि एक विषय जो असत्य हो सकता है, बनाम एक विषय जो कि असत्य नहीं हो सकता है. हाल ही में गोवा में संपन्न हुए अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल के दौरान जिस तरह से ‘एस दुर्गा’ फिल्म को लेकर विवाद उठाने की कोशिश की गई, उसको अगर लोटमान की इन अवधारणाओं के आलोक में देखें, तो उसमें भी एक हठवादी अवधारणा की अंतर्धारा दिखाई देती है. फिल्मकार ने पहले ‘सेक्सी दुर्गा’ के नाम से फिल्म बनाई, बाद में उसको ‘एस दुर्गा’ कर दिया. फिल्म फेस्टिवल में उसकी स्क्रीनिंग नहीं हो पाई, वो अदालत चले गए और वहां से स्क्रीनिंग का आदेश लेकर आए. फिर सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने अदालत में अपील की, जहां से जूरी को फैसला लेने को कह दिया गया.

.फिल्म फेस्टिवल के आखिरी दो दिनों तक इस फिल्म को दिखाए जाने पर सस्पेंस बना रहा. इन दो दिनों के दौरान फिल्म निर्देशक सनल कुमार शशिधरन ने गोवा में धरना प्रदर्शन आदि की भी कोशिश की, लेकिन उन्हें ज्यादा तवज्जो नहीं मिली. इस पूरे विवाद का पटाक्षेप सेंसर बोर्ड के एक फैसले से हो गया, जिसमें उसने इस फिल्म के सर्टिफिकेशन को रद्द कर दिया. हलांकि अगर इस फिल्म को प्रदर्शित किया जाता, तो एक गलत परंपरा की शुरुआत होती कि कोई भी अदालत जाकर जूरी के फैसले को चुनौती देता और फिर अदालत के आदेश के बाद फिल्म की स्क्रीनिंग हो जाती. ऐसा होने से जूरी की आजादी पर भी फर्क पड़ता, जो कि स्वस्थ सिनेमा के लिए उचित नहीं होता. हलांकि इस तरह के आयोजनों में फिल्मों के प्रदर्शन की अनुमति का अंतिम अधिकार स्थानीय राज्य सरकार के पास होता है.

इस पूरे विवाद को हवा देने की कोशिश की गई, लेकिन इन तथ्यों को छुपा लिया गया कि फिल्मकार ने ‘एस’ के बाद तीन आयताकार सफेद बॉक्स लगा कर फिल्म को गोवा अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में दिखाने की अर्जी दी थी. सेंसर बोर्ड से जुड़े जानकारों का कहना है कि ‘एस’ के बाद तीन आयताकार बॉक्स लगाकर उसके बाद दुर्गा लिखने के कई अर्थ हैं. आयताकार बॉक्स लगाकर फिल्मकार शायद ये संदेश देने की कोशिश कर रहे हों कि उन्होंने विरोध स्वरूप ‘सेक्सी’ के तीन अक्षरों दो ढंक दिया. शबाना आजमी जैसी अदाकारा ने गोवा फिल्म फेस्टिवल के बहिष्कार का आह्वान किया था, लेकिन उसको फिल्मी दुनिया में ही किसी ने तवज्जो नहीं दी. गोवा फिल्म फेस्टिवल के समापन समारोह में अमिताभ बच्चन, सलमान खान, अक्षय कुमार, कटरीना कैफ से लेकर करण जौहर, पूजा हेगड़े, भूमि पेडनेकर और सुशांत सिंह राजपूत के अलावा कई अन्य सितारे मौजूद थे.

दरअसल एक खास विचारधारा के पोषकों को बहिष्कार आदि का रास्ता सबसे आसान लगता है. उससे भी आसान है कि कहीं कुछ हो, तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को खतरे में होने की बात उछाल दो. यह एक ऐसा जुमला बन गया है, जो हर जगह फिट हो जाता है, चाहे वो फिल्म हो, साहित्य हो, पत्रकारिता हो, पेंटिंग हो, कहीं भी. अगर कहीं कुछ गलत होता लग रहा हो, तो उसके लिए संवाद करने की जरूरत है, सरकार या आयोजक से बात की जा सकती है. शबाना आजमी जैसी शख्सियतों को मसलों को सुलझाने की कोशिश करनी चाहिए न कि किसी भी विवाद में अपनी राजनीति को चमकाने का अवसर तलाशना चाहिए.

एक अभिनेत्री के तौर पर उनका जितना सम्मान है, उसका उपयोग उनको बॉलीवुड में सकारात्मक पैरोकारी में करना चाहिए, क्योंकि नकारात्मकता का अंत तो नकार से ही होता है. यह ठीक है कि लोकतंत्र में सबको अपनी बात रखने का हक है और विरोध जताने का हक भी है, लेकिन जब आप एक मुकाम हासिल कर लेते हैं, तो लोगों की आकांक्षा अलग हो जाती है. इस फिल्म फेस्टिवल के समापन समारोह में अमिताभ बच्चन ने एक बेहतरीन बात की. उन्होंने कहा कि फिल्म ही एक ऐसा माध्यम है, जहां तीन घंटे तक हमें अपने बगल में बैठे इंसान के जाति, धर्म, विचारधारा आदि के बारे में पता नहीं होता और ना ही उससे कुछ लेना लेना देना होता है. लेकिन अफसोस कि अमिताभ बच्चन की सोच वाले लोग कम हैं यहां तो लोग फिल्म को लेकर भी राजनीति करने से नहीं चूकते.

विवादों से बेअसर गोवा फिल्म फेस्टिवल में इस वर्ष कुछ बेहद सार्थक काम भी हुए. फिल्म फेस्टिवलों में भी अबतक ज्यादातर एकालाप होता था. या तो फिल्मकार की बातें सुनकर फिल्म देखो, या सितारों की स्पीच सुनो, लेकिन 48 साल बाद अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल ने अपना दायरा बढ़ाया और एकालाप को संलाप में बदलने की कोशिश की गई.

साहित्य और सिनेमा को लेकर पूर्व में बहुत बातें होती रही हैं. खासतौर पर हिंदी में तो साहित्यकारों के सिनेमा को लेकर अनुभव बहुत अच्छे नहीं रहे हैं. प्रेमचंद के सिनेमा से मोहभंग के बारे में रामवृक्ष बेनीपुरी ने अपने संस्मरण में लिखा है- ‘1934 की बात है. बंबई में कांग्रेस का अधिवेशन हो रहा था. इन पंक्तियों का लेखक कांग्रेस के अधिवेशन में शामिल होने आया. बंबई में हर जगह पोस्टर चिपके हुए थे कि प्रेमचंद जी का ‘मजदूर’ अमुक तारीख से रजतपट पर आ रहा है. ललक हुई, अवश्य देखूं कि अचानक प्रेमचंद जी से भेंट हुई. मैंने ‘मजदूर’ की चर्चा कर दी. बोले ‘यदि तुम मेरी इज्जत करते हो तो ये फिल्म कभी नहीं देखना.’ यह कहते हुए उनकी आंखें नम हो गईं और, तब से इस कूचे में आने वाले जिन हिंदी लेखकों से भेंट हुई, सबने प्रेमचंद जी के अनुभवों को ही दोहराया है.’ प्रेमचंद के अलावा अमृत लाल नागर, उपेन्द्र नाथ अश्क, पांडेय बेचन शर्मा उग्र, गोपाल सिंह नेपाली, सुमित्रानंदन पंत जैसे साहित्यकारों का भी सिनेमा से साथ ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाया.

अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में इस वर्ष साहित्य और सिनेमा से लेकर कहानी की ताकत, उसके कहने का अंदाज और बच्चों के सिनेमा जैसे विषयों पर गंभीर मंथन हुआ. वाणी त्रिपाठी टिक्कू द्वारा क्यूरेट किए गए इन विषयों को लेकर श्रोताओं में खासा उत्साह रहा. साहित्यिक प्रेरणा, सिनेमा और लिखित शब्द पर पौराणिक कथाओं को आधुनिक तरीके से लिखनेवाले लेखक अमीश त्रिपाठी, कवि और संगीत मर्मज्ञ यतीन्द्र मिश्र के अलावा गीतकार और सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी ने भी अपने विचार रखे. इसका संचालन वाणी ने किया था. कहानी की ताकत और किस्सागोई पर एक पैनल में बेहद रोचक चर्चा हुई. अगर हम बॉलीवुड को देखें या फिर पूरे भारतीय भाषा की फिल्मों को देखें, तो बच्चों की फिल्मों का अनुपात बहुत कम होता है. एक सत्र बच्चों के सिनेमा पर भी केंद्रित था, जिसमें प्रसून जोशी और नितेश तिवारी जैसे वक्ता मौजूद थे. चर्चाओं का फलक इतना बड़ा था कि एक पूरा सत्र टैगोर के संसार पर केंद्रित था. आज के जमाने में डिजीटल प्लेटफॉर्म को लेकर बात ना हो, तो आयोजन अधूरा सा लगता है. मशहूर फिल्मकार भारतबाला ने इस विषय पर एक सत्र संचालित किया.

दो सत्र बेहद रोचक रहे, जिसमें एक तो था ‘अपनी अगली फिल्म कैसे बनाएं’, जिसमें करण जौहर के अलावा एकता कपूर, सिद्धार्थ रॉय कपूर और स्टार फॉक्स के सीईओ विजय सिंह ने अपनी बातें रखीं. दूसरा सत्र ‘नए यथार्थ से मुठभेड़’ पर केंद्रित था. इन दोनों सत्रों में करण जौहर ने बेहद सधे अंदाज में अपनी बात रखी. एकता कपूर हमेशा की तरह संक्षिप्त पर दू द प्वाइंट रहीं. करण जैहर ने एक सत्र में सोशल मीडिया पर फिल्म समीक्षा को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की.

उन्होंने कहा कि जिस तरह से इन दिनों ट्वीटर आदि पर फिल्मों की लाइव समीक्षा होती है, वो अच्छा संकेत नहीं है. इन सत्रों की परिकल्पना करनेवाली समिति की अध्यक्ष वाणी त्रिपाठी टिक्कू के मुताबिक, इस आयोजन का मकसद देश में सिनेमा लिटरेसी को बढ़ावा देना है. इन सत्रों में लोगों की उपस्थिति ने इस बात के संकेत दे दिए हैं कि इस तरह का प्रयोग लोगों को पसंद आया. कुल मिलाकर अगर हम देखें, तो बेवजह के विवादों को उठाने की कोशिशों को सकारात्मक पहल ने हाशिए पर पहुंचा दिया.

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