चुनाव से ज्यादा महत्वपूर्ण है लोकतंत्र

narendra modiसर्वशक्तिशाली लोग और सबसे मजबूत पार्टी डर जाए, तो उसका कारण जानने की इच्छा होती है. हमारे लिए सवाल है कि महाबली क्यों डर रहे हैं, पार्टी क्यों डर रही है और डर कर चुनाव में उन मुद्दों को उछाल रहे हैं, जो लोगों की रोजी-रोटी जैसे मुद्दों से ध्यान हटाती हो. वे सवाल गायब हैं, जिस पर लोगों को सोचते हुए वोट देना चाहिए. रोज गैर महत्वपूर्ण मुद्दों पर बहस हो रही है और असली मुद्दे बहस से गायब हैं. मैं गुजरात की बात कर रहा हूं. राहुल गांधी ऐसे विषय नहीं हैं, जिन्हें वक्त दिया जाए. उनका फैसला अब गुजरात की जनता करेगी. लेकिन जैसे उनके नाम से, उनके गुजरात जाने से भाजपा और भाजपा नेता डर गए हैं, उससे शंका पैदा होती है कि कहीं भाजपा गुजरात में किसी अंतर्विरोध का शिकार तो नहीं हो रही है. राहुल गांधी सोमनाथ मन्दिर गए. पूजा की. भगवान शंकर को प्रणाम किया. भगवान शंकर राहुल गांधी को आशीर्वाद न दें, इसलिए भगवान को याद दिलाने की कोशिश की गई कि राहुल गांधी हिन्दू नहीं हैं. सुब्रमण्यम स्वामी तो यहां तक बोल गए कि कॉलेज में राहुल गांधी क्या लिखते थे, क्या नहीं लिखते थे, वे कैथोलिक हैं या नहीं हैं, पारसी हैं, इसका सवाल खड़ा कर दिया. इसका मतलब है कि अब हम भगवान के स्तर पर जा कर फैसले लेने लगे हैं. इसी तरह का एक फैसला भाजपा के एक प्रवक्ता ने लिया.

उसने छाती ठोक कर टीवी पर कहा कि मैं देश या संविधान की तरफ से नहीं बोल रहा हूं, मैं भगवान राम की तरफ से बोल रहा हूं. भगवान राम क्या शक्तिहीन हैं, जो उन्हें भाजपा के एक प्रवक्ता की जरूरत पड़ गई? उसी तरीके से, भगवान की ओर से हमने ये फैसला कर लिया कि सोमनाथ मन्दिर में भगवान शंकर उन्हीं को आशीर्वाद देते हैं, जो हिन्दू हैं और भगवान शंकर को ये नहीं पता कि कौन हिन्दू है, इसलिए भाजपा के लोग भगवान को याद दिला रहे हैं कि राहुल गान्धी हिन्दू नहीं हैं, इसलिए उन्हें आशीर्वाद नहीं देना है. राहुल गान्धी की तरफ से किसी ने रजिस्टर के उस हिस्से पर दस्तखत कर दिए थे, जिस हिस्से पर अन्य धर्म के लोग दस्तखत करते हैं. इसका मतलब कि गुजरात के चुनाव में भगवान शंकर का आशीर्वाद राहुल गांधी के साथ नहीं है, ये बात स्थापित करने की कोशिश भाजपा की तरफ से की जा रही है. टीवी चैनल इस मुद्दे को उभारने में जी-जान से लग गए. क्या किसी भी भगवान ने ये कहा है कि हम सिर्फ हिन्दू को आशीर्वाद देंगे. भगवान तो ये कहते हैं कि कोई भी दुखी व्यक्ति या याचक आकर उनसे आशीर्वाद मांग सकता है. भगवान सिर्फ हिन्दू को ही आशीर्वाद देते हैं, ये पहली बार देश में भाजपा और संघ के लोग याद दिला रहे हैं.

सवाल ये है कि आप इतने महाबली हैं, गुजरात में आप प्रचार कर रहे हैं कि आप जीत रहे हैं. फिर प्रधानमंत्री को ये क्यों कहना पड़ रहा है कि मोरबी में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी आई थी, तो नाक पर पल्लू रख कर आई थी. अब उस समय दुर्गन्ध थी, इंदिरा गांधी की तबीयत खराब थी, लेकिन आप इतने अमानवीय हो जाते हैं कि आपने उस घटना का भी चुनावी इस्तेमाल कर लिया. आपको तो इस बात का इस्तेमाल करना चाहिए कि कांग्रेस ने 22 साल पहले गुजरात को कुछ नहीं दिया, हमने ये-ये काम किए, आगे ये-ये काम करेंगे. इस सब का कोई रिपोर्ट कार्ड गुजरात में नहीं है. इसकी जगह वहां पर भाजपा की चिंता है, सोमनाथ में राहुल गांधी का पूजा करना. भाजपा की चिंता है कि अगर गुजरात के हिन्दुओं ने कहीं राहुल गान्धी के प्रति झुकाव दिखा दिया तो हमारा क्या होगा? ये सवाल ताकतवर की कमजोरी दिखाते हैं. सुब्रमण्यम स्वामी का कहना ही क्या? उनकी कोशिश रहती है कि उन्हें ऐसा मौका मिले कि वे प्रधानमंत्री को मजबूर कर के अरुण जेटली की जगह खुद वित्त मंत्री बन जाएं, जैसे वे राज्य सभा आ गए. राज्यसभा में वे संघ की तरफ से आए हैं. इसलिए, ऐसे किसी भी द्वन्द्व में कूद पड़ना और ऐसा माहौल बनाने की कोशिश करना, जिससे आगे उन्हें राजनीतिक फायदा हो. खैर, ये उनकी राजनीति है, उन्हें ये काम करने दीजिए. लेकिन मेरा सवाल प्रधानमंत्री जी से, संघ प्रमुख से और भारतीय जनता पार्टी से है कि आप इस तरह के मुद्दे क्यों उठा रहे हैं? इनका चुनाव में क्या मतलब है?

एक बात और. अब तक जितने भी प्रधानमंत्री हुए, इनमें से किसी ने ऐसी भाषा नहीं इस्तेमाल की, जैसी भाषा आज के प्रधानमंत्री बोल रहे हैं. वाजपेयी जी ने भी ऐसी भाषा का इस्तेमाल नहीं किया. हर रैली में नरेंद्र मोदी जी जैसी भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो तेवर वो दिखा रहे हैं, जो मुद्दे उठा रहे हैं, वो देश के सामने एक प्रधानमंत्री द्वारा एक भाषाई शैली विकसित कर रहे हैं. इसके बाद लोग और भी इस भाषा स्तर से नीचे जाएंगे. कोई किसी के नाक काटने, कोई किसी का सिर काटने की बात करेगा. राजनीति में नए आए लोग भी यही सीखेंगे. मैं लालू प्रसाद यादव के बेटे की बात कर रहा हूं. वो भी ऐसी भाषा का इस्तेमाल कर के उनसे आगे जा रहे हैं. लोहिया जी कहते थे कि भ्रष्टाचार की गंगोत्री ऊपर से नीचे की तरफ आती है. उसी तरह भाषाई गरिमा और शालीनता भी ऊपर से नीचे आती है. अगर नंबर वन की कुर्सी पर बैठा आदमी इन चीजों का ख्याल नहीं रखेगा तो उसके अनुयायियों के पास भी वहीं पहुंचता है. इस तरह की भाषा नेहरू जी, अटल जी या चन्द्रशेखर जी ने कभी इस्तेमाल नहीं किया. ऐसी भाषा के इस्तेमाल से पहले वे इस्तीफा देना पसन्द करते. मुझे लगता है कि भाजपा अटल बिहारी वाजपेयी जी की परंपरा से बहुत दूर चली गई है. ये अच्छा है कि आज अटल जी बोलने-सुनने की स्थिति में नहीं हैं, वर्ना उन्हें बहुत दुख होता. अटल जी किसी का विरोध भी करते थे, तो बहुत शालीनता से करते थे और विरोधी का सम्मान करना किसी से सीखना हो तो अटल जी से सीखें. संसद में कहा था कि इंदिरा गांधी दुर्गा हैं. आज भाजपा में उस परंपरा के नेता नहीं हैं, जो है उन्हें भगाया जा रहा है.

वे चाहे यशवंत सिन्हा हों या अरुण शौरी या शत्रुघ्न सिन्हा, भोला सिंह या बलिया के भरत सिंह हों. भरत सिंह ने थोड़ी बहादुरी दिखाई, तो उनका गला ऐसे दबाया गया कि आज वो कहीं बोलते हुए सुनाई भी नहीं देते. पार्टी विद डिफरेंस वाली पार्टी में आज क्या हो रहा है? आज गुजरात जीतने के लिए ये क्या कर रहे हैं? ये अपने काम नहीं बता रहे हैं, विरोधी की कमजोरी नहीं बता रहे हैं. राहुल गांधी हिन्दू हैं या नहीं, इसका मुद्दा उठा रहे हैं. किसी भी तरह से उन्हें मुसलमान साबित करूं और अगर वो भी न हो पाए तो ईसाई तो साबित कर ही दो, ताकि हिन्दू उनसे दूर चला जाए. चुनाव की ये शैली बताती है कि शायद हम लोकतंत्र के अफ्रीकी दौर में पहुंचने जा रहे हैं. अच्छा है कि हम वहीं पहुंच जाएं. अच्छाई के रहे-सहे भ्रम भी दूर हो जाएं. पर देश के लोगों को तो सोचना चाहिए और इतना तो मुझे लगता है कि भाजपा के जो नए समर्थक हैं, वे भी शायद राजनीति की इस शैली को पसन्द नहीं कर रहे हैं. सवाल है कि क्यों सूरत में लोगों ने मीटिंग नहीं करने दी, क्यों जगह-जगह बड़ी लोगों की सभाओं में कुर्सियां खाली रह जा रही हैं? क्योंकि लोग जो सवाल सुनना चाह रहे हैं, वो उन्हें सुनने को नहीं मिल रहा है. मीडिया हाइजैक हो गया है.

गुजरात का चुनाव हो सकता है कि इस सन्देह को पुष्ट करे कि बैलेट पेपर से एक नतीजा आता है और ईवीएम से दूसरा नतीजा आता है. लेकिन अगर ऐसा हुआ तो इस देश के लोगों को बहुत दुख होगा. आगे उन्हें जब कभी फैसला करने का अवसर मिलेगा, तो बहुत दुखी होकर ही फैसला करेंगे. आमतौर पर इस देश के लोग सहिष्णु हैं, धर्मनिरपेक्ष हैं, सबकी इज्जत करते हैं. वो कभी किसी मजार, गुरुद्वारे या चर्च के पास से गुजरते हुए गाली नहीं देते हैं. ये आम हिन्दुस्तानी, आम हिन्दू का चरित्र है. बहरहाल, जितना भी अपभ्रंश करना हो कर लीजिए, लेकिन अंत में यह इस देश के लोकतंत्र को ही चोट पहुंचाता है.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.