और कठिन हो सकता है कालाधन वापस लाना

Schweizerische-National-bankस्विस बैंकों में जमा कालाधन को लेकर देश में बहस बहुत पुरानी है. इसकी वापसी के लिए बाबा रामदेव एक अभियान चला चुके हैं, लेकिन फिलहाल पतंजलि की तैयार वस्तुएं बेचने में व्यस्त हैं. भाजपा के एलके आडवाणी ने भी एक समय में इस मुद्दे को चुनावी मुद्दा बनाया था. मौजूदा प्रधानमंत्री भी अपने चुनावी भाषणों में कालेधन की वापसी के बारे में कह चुके हैं, जिसको लेकर विपक्षी दल अब तक उनको घेरने की कोशिश करते रहे हैं. स्विस बैंकों में भारतीयों के कालाधन होने की खबरें अक्सर आती रहती हैं. सबसे विश्वसनीय खबर उस समय आई, जब जूलियस बायर बैंक के पूर्व कर्मचारी रुडॉल़्फ एल्मर ने यह दावा किया कि उसके पास भारतीय क्रिकेटरों, ़िफल्मी हस्तियों और राजनीति से जुड़े लोगों के स्विस बैंक खातों की जानकारियां हैं.

अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद स्विट्‌जरलैंड सरकार ने कई देशों के साथ सूचना के स्वत: विनिमय (ऑटोमैटिक एक्सचेंज ऑ़फ इन्फॉर्मेशन) का समझौता किया है. भारत भी उसमें शामिल है. स्विट्ज़रलैंड की राष्ट्रपति डोरिस ल्यूथार्ड हाल में भारत दौरे पर आई थीं, जिसमें यह मुद्दा भी सामने आया. प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी ने स्विस राष्ट्रपति के साथ सूचना के स्वत: विनिमय के समझौते को लागू करने के विभिन्न पहलुओं पर बातचीत की. हालांकि इस समझौते को स्विस संसदीय पैनल ने अपनी मंज़ूरी दे दी है, लेकिन वहां की संसद का इस पर मुहर लगना अभी बाक़ी है. लेकिन इस समझौते को पारित करवाने की सबसे बड़ी अड़चन यह है कि स्विट्‌जरलैंड की सबसे बड़ी पार्टी, दक्षिण पंथी स्विस पीपुल्स पार्टी का कहना है कि भ्रष्ट और तानाशाही देशों के साथ टैक्स डाटा साझा नहीं करना चाहिए. इस पार्टी की भ्रष्ट देशों की सूची में भारत का नाम भी शामिल है.

बहरहाल, स्विस संसद द्वारा सूचना के स्वत: विनिमय के समझौते की स्वीकृति के बाद क्या होगा, ये आने वाला वक़्त ही बताएगा, लेकिन ़िफलहाल स्विस बैंकों के हवाले से ऐसी ख़बरें आई हैं, जो कालाधन की वापसी की कोशिश में लगे देशों के लिए निराशा का कारण बन सकती हैं. रायटर्स द्वारा जारी एक खबर के मुताबिक स्विस बैंकों के वकीलों ने स्विट्ज़रलैंड के बैंकिंग गोपनीयता क़ानून की व्याख्या के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल की है. इस अपील का मकसद यह है कि व्हिसल-ब्लोअर्स के खिलाफ देश का कानून तोड़ने के लिए सजा दी जा सके. स्विस बैंकिंग एक्ट के मुताबिक स्विट्ज़रलैंड द्वारा संचालित बैंकों के कर्मचारियों को ग्राहकों की जानकारियां गोपनीय रखनी होती है, लेकिन पिछले एक दशक में कई कर्मचारियों ने विदेशी खातों का विवरण लीक किया है, जिसपर पश्चिमी देशों में सरकारों ने कार्रवाईयां की हैं.

दरअसल यह मामला 21 नवम्बर 2016 के दस्तावेज़ की वजह से उजागर हुआ है, जो जूलियस बायर बैंक के पूर्व कर्मचारी रुडोल्फ एल्मेर को गोपनीय जानकारी साझा करने के मामले में बरी किए जाने के खिलाफ स्विट्ज़रलैंड सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका का आधार बना है. गौरतलब है कि पिछले साल इस मामले में एक अदालत ने ़फैसला सुनाते हुए कहा था कि बैंक का गोपनीयता क़ानून एल्मर पर लागू नहीं होता, क्योंकि वे जूलियस बायर की कैरीबियन सहायक बैंक के कर्मचारी थे. बैंक के वकीलों की दलील है कि यदि देश से बाहर के स्विस बैंक के कर्मचारियों पर गोपनीयता क़ानून लागू नहीं हो सकता तो इससे गोपनीयता क़ानून के होने या न होने का कोई अर्थ नहीं है. स्विस बैंक के वकीलों का कहना है कि इसके दीर्घकालिक नकारात्मक परिणाम होंगे जिन्हें स्वीकार नहीं किया जा सकता. रिपोर्ट के मुताबिक स्विट्‌जरलैंड का सुप्रीम कोर्ट इस मामले की सुनवाई पर विचार कर रहा है. कोर्ट ने एल्मेर से 9 जून 2017 को लिखित जवाब मांगा था, जो उनके वकील द्वारा दाखिल किया जा चुका है. ऐसा माना जाता है कि अदालत इस पर अगले वर्ष अपना फैसला सुनाएगा.

अब सवाल यह उठता है कि यदि यह फैसला बैंकों के पक्ष में आता है तो क्या होगा? एल्बर के खिलाफ कार्रवाई का मतलब क्या है? जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि स्विट्‌ज़रलैंड के बैंक गोपनीयता क़ानून के बावजूद पूर्व में बैंक से जुड़े लोगों ने दूसरे देशों की सरकारों के साथ बैंक एकाउंट्स की जानकारियां साझा की हैं. जानकारों का मानना है कि बैंकों की तरफ से यह कवायद अपने कर्मचारियों को गोपनीय दस्तावेज़ साझा करने से रोकने के लिए की जा रही है. एल्मर को पिछले दो वर्षों में दो बार गिरफ्तार किया जा चुका है. यदि सूचना के स्वत: विनिमय के समझौते को स्विट्‌जरलैंड की संसद की मंज़ूरी मिल भी जाती है तब भी इस मुकदमे के दूरगामी परिणाम होंगे. आम तौर ऐसे मामलों का पर्दाफाश बैंक के कर्मचारी करते हैं. यदि गोपनीयता कानून की व्याख्या बैंकों के मन के मुताबिक हो गई तो ज़ाहिर है बैंक कर्मचारी डर जायेंगे और एल्मेर की तरह का जोखिम नहीं उठाएंगे.   इससे टैक्स चोरी के खिलाफ भारत समेत दुनिया के अन्य देशों की कोशिशों को गहरा आघात लगेगा.

भारत के लिए यह खबर इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि मौजूद सरकार कालेधन के खिलाफ कार्रवाई और स्विस बैंकों में भारतीय कालाधन की वापसी पर जोर देती रही है. विदेशी बैंकों में कालेधन की जानकारी का स्रोत अभी तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्हिसल-ब्लोअर द्वारा साझा की गई जानकारियां ही रही हैं. यदि व्हिसल-ब्लोअर्स को ही डरा-धमका कर खामोश कर दिया जाता है तो भारत के लिए कालाधन वापस लाने का रास्ता और कठिन हो जाएगा.