कश्मीर में नई शुरुआत, वार्ताकार दिनेश्वर शर्मा का पहला क़दम

kashmirकेन्द्र सरकार ने शायद जम्मू कश्मीर के लिए तैनात वार्ताकार दिनेश्वर शर्मा की विश्वसनीयता बढ़ाने और घाटी में उनके प्रभाव को कायम रखने के लिए उनकी सिफारिश पर हजारों कश्मीरी नौजवानों के खिलाफ दर्ज पुलिस केसों को खत्म करने का फैसला किया है. इसका कारण यह हो सकता है कि केंद्र सरकार द्वारा दिनेश्वर शर्मा को वार्ताकार नियुक्त करने के फैसले को कश्मीर के सियासी और अवामी हलकों में कोई ज्यादा सराहना नहीं मिली थी. केंद्र के इस फैसले पर अधिकतर टिप्पणीकारों का यही कहना था कि इंटेलिजेंस ब्यूरो के एक पूर्व निदेशक को बातचीत का काम सौंप कर सरकार केवल वक्त गुजारना चाहती है. आलोचकों का कहना है कि अगर केन्द्र सरकार कश्मीर मसले को एक सियासी मसला समझती, तो दिनेश्वर शर्मा के बजाय किसी राजनीतिक शख्सियत को वार्ताकार नियुक्त करती. अलगाववादी नेताओं ने शर्मा के साथ किसी तरह की बातचीत करने से साफ इंकार कर दिया है. नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारुख अब्दुल्ला के अलावा राज्य के कई प्रमुख नेताओं ने भी शर्मा की नियुक्ति को समय की बर्बादी करार दिया है.

केस वापस लेने का क्रेडिट दिनेश्वर शर्मा को

चूंकि सरकार ने अब हजारों कश्मीरी नौजवानों के खिलाफ केसों को खत्म करने की घोषणा की है, इसके फलस्वरूप आने वाले दिनों में दिनेश्वर शर्मा जम्मू कश्मीर में अधिक सक्रिय हो सकते हैं. आम लोग उनसे इस तरह के कई अन्य सकारात्मक कदमों की उम्मीद रख सकते हैं. गौरतलब है कि केन्द्र और राज्य सरकार दोनों ने पथराव के आरोप में नौजवानों के खिलाफ दर्ज केसों को वापस लेने के निर्णय का क्रेडिट दिनेश्वर शर्मा को दिया है. मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती, जिन्होंने टि्‌वटर पर केस वापस लेने की प्रक्रिया शुरू करने की घोषणा की, उन्होंने भी इसका क्रेडिट दिनेश्वर शर्मा को दिया है. उन्होंने लिखा, ‘ये बात हौसला बढ़ाने वाली है कि वार्ताकार ने एक सकारात्मक कदम के साथ शुरुआत की है. केन्द्र और राज्य सरकार भी उनकी सिफारिशों को गंभीरता से ले रही है.’ दिनेश्वर शर्मा द्वारा केसों को वापस लेने की सिफारिश के बाद उस पर अंतिम निर्णय लेने के लिए हाल में गृहमंत्री राजनाथ सिंह के नेतृत्व में कश्मीर से संबंधित एक उच्चस्तरीय बैठक में फैसला लिया गया. इस बैठक में रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के अलावा सुरक्षा एजेंसी और गृहमंत्रालय के अधिकारी भी मौजूद थे. उल्लेखनीय है कि पिछले साल जुलाई में मिलिटेंट कमांडर बुरहान वानी की हत्या के बाद घाटी में हिंसा फैलाने के आरोप में नौजवानों पर 11,500 केस दर्ज किए थे. फिलहाल इनमें से बहुत सारे नौजवान या तो जेलों में बंद हैं या फिर अदालतों में अपने केसों की पैरवी कर रहे हैं.

नए वार्ताकार ने भेजा था सार्वजनिक निमंत्रण

दिनेश्वर शर्मा ने वार्ताकार की हैसियत से अपना पहला दौरा नवंबर की शुरुआत में किया. उन्होंने तीन दिन तक घाटी और दो दिन तक जम्मू में अपने प्रवास के दौरान 80 से अधिक प्रतिनिधिमंडलों से मुलाकात की. उनसे मिलने के लिए लोग अप्रत्याशित रूप से बड़ी संख्या में पहुंचे. नए वार्ताकार ने ज्यादा से ज्यादा लोगों से मिलना सुनिश्चित करने के लिए सार्वजनिक निमंत्रण भी भेजा था. यही कारण है कि श्रीनगर में केवल तीन दिन के प्रवास के दौरान उनसे मिलने के लिए बड़ी संख्या में लोग नेहरू गेस्ट हाउस पहुंचे. लोगों ने भी इस बात पर संतोष व्यक्त किया कि उन्हें आसानी से नए वार्ताकार से मिलने का मौका मिला. वहां सिक्युरिटी चेकिंग आदि का भी कोई झंझट नहीं था. दिनेश्वर शर्मा इन तीन दिनों में उमर अब्दुल्ला, मोहम्मद युसूफ तारेगामी, हकीम यासीन, गुलाम हसन मीर और दूसरे कई महत्वपूर्ण राजनीतिक शख्सियतों से मिलने के लिए खुद उनके घरों पर पहुंचे. चौथी दुनिया को सूत्रों से पता चला है कि दिनेश्वर शर्मा को घाटी में बहुत से लोगों ने जनता को राहत पहुंचाने से संबंधित विभिन्न प्रस्ताव दिए हैं, जिनमें जेलों में बंद नौजवानों की रिहाई और उनके खिलाफ दर्ज पुलिस केसों को वापस लेने के प्रस्ताव भी शामिल हैं. माना जाता है कि इसी फीडबैक के आधार पर केन्द्र सरकार ने कश्मीरी नौजवानों के खिलाफ दर्ज 4500 केसों को खत्म करने का निर्णय लिया है. नई दिल्ली की मीडिया रिपोट्‌र्स में यहां तक कहा गया है कि अगर सरकार के इस कदम की घाटी में सकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिली, तो केन्द्र सरकार अन्य दूसरे केसों को खत्म करने पर भी विचार कर सकती है.

केन्द्र सरकार के इस प्रस्तावित कदम को कई टिप्पणीकार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के उस बयान के साथ जोड़कर देखते हैं, जो उन्होंने इस साल 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस समारोह को संबोधित करते हुए दिया था. मोदी ने अपने भाषण में कहा था कि ‘न गोली से न गाली से, कश्मीर की समस्या सुलझेगी कश्मीरियों को गले लगाने से.’ जाहिर है कि 15 अगस्त से अब तक केन्द्र सरकार ने कश्मीर घाटी में ऐसा कोई कदम नहीं उठाया, जिससे यहां की जनता को लगे कि प्रधानमंत्री वाकई कश्मीरियों को गले लगाने की अपनी बात पर यकीन भी रखते हैं. लेकिन अब केन्द्र सरकार हजारों नौजवानों को फौजदारी पुलिस केसों से निजात दिलाएगी, तो यह वाकई एक बहुत बड़ा कदम माना जाएगा. हकीकत यह है कि पिछले जुलाई के बाद हिंसा के दौरान जो सैकड़ों नौजवान बुरी तरह से घायल हुए थे या जिन्हें पुलिस के गुस्से का शिकार होना पड़ा था, वे और उनके परिवार केंद्र सरकार के प्रस्तावित कदम से अब राहत की सांस लेंगे. यकीनन केन्द्र सरकार के इस कदम को घाटी में सार्वजनिक तौर पर सराहा जाएगा.

हज़ारों लोगों के खिलाफ केस अलोकतांत्रिक

विश्लेषक परव़ेज मजीद ने इस विषय पर चौथी दुनिया के साथ बात करते हुए कहा ‘नौजवानों के खिलाफ पथराव के आरोप में दर्ज हजारों फौजदारी मुकदमों को वापस लेने का सरकार का ये कदम वाकई सराहनीय है. इसके फलस्वरूप न सिर्फ नौजवानों को परेशानियों से छुटकारा मिलेगा, बल्कि उनके परिवारों को भी राहत मिलेगी.’ परवेज का मानना है कि ये कदम खुद राज्य और केन्द्र सरकार के लिए लाभकारी साबित होंगे. उनका कहना है कि किसी भी सभ्य समाज में, जहां एक निर्वाचित सरकार की मौजूदगी का दावा किया जा रहा हो, उसमें हजारों गैर सियासी लोगों के खिलाफ फौजदारी के मुकदमे दर्ज होना खुद लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है. वैसे भी उन केसों को तार्किक अंजाम तक पहुंचाना प्रशासनिक और न्यायिक स्तर पर भी एक बहुत मुश्किल काम है. मान लीजिए कि पुलिस इन केसों में आरोपियों के खिलाफ दर्ज चार्जशीट को साबित भी कर देती है, तो क्या अदालत हजारों नौजवानों को सजा देगी और अगर ऐसा हुआ तो इसका यहां के हालात पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा. जाहिर है कि सरकार हालात को बद से बदतर नहीं बनाना चाहेगी. इसलिए ये सारे केस वापस लेना सरकार के हित में है.

ऐसा लग रहा है कि राज्य और केन्द्र सरकार एक वर्ष से ज्यादा समय तक आम कश्मीरियों के खिलाफ सख्त रवैया अख्तियार करने के बाद अब लोगों की परेशानी खत्म करने की कोशिश कर रही है. हिंसक माहौल के कारण महीनों तक जनता से दूर रहने के बाद अब मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने भी विभिन्न जिलों में जनता दरबार का आयोजन शुरू कर दिया है. विभिन्न महकमों के शीर्ष अधिकारियों की मौजूदगी में मुख्यमंत्री जनता दरबार में विभिन्न विचार वाले लोगों को बुलाकर उनकी शिकायतें सुनती हैं और मौके पर ही संबंधित अधिकारियों को उन्हें हल करने के निर्देश भी देती हैं. टिप्पणीकारों का कहना है कि मुख्यमंत्री ऐसा कर एक साल से आलोचना की शिकार गवर्नेंस को बेहतर बनाने के साथ-साथ अपनी पार्टी की छवि सुधारने की कोशिश भी कर रही हैं. पीडीपी के बारे में घाटी में आम धारणा यह है कि इस दल ने 2014 के चुनाव के बाद भाजपा के साथ साझा सरकार बनाकर जनादेश का अपमान किया है. दरअसल चुनाव के दौरान पीडीपी नेतृत्व ने लोगों को ये कहकर लुभाया था कि अगर राज्य में भाजपा को सत्ता से बाहर रखना है, तो इसके लिए पीडीपी को वोट देना जरूरी है. इसके बाद पीडीपी ने अपने वादों और विचारधारा को सत्ता पर कुर्बान कर दिया. बहरहाल महबूबा मुफ्ती इस वक्त जनता से संपर्क बनाने में लगी हुई हैं. अगर नौजवानों के खिलाफ दर्ज केस वापस लिए गए, तो पीडीपी यकीनन इसका भी क्रेडिट लेने की कोशिश करेगी.

ऑपरेशन ऑल आउट की हक़ीक़त

जहां एक तरफ मोदी सरकार कश्मीर में बातचीत की शुरुआत कर रही है, वहीं सेना ने कश्मीर में अपनी कारवाईयां जारी रखी हुई हैं. दिनेश्वर शर्मा के वार्ताकार नियुक्त होने के एक दिन बाद ही सेना प्रमुख बिपिन रावत ने स्पष्ट कर दिया था कि वार्ताकार के प्रयासों के बावजूद मिलिटेंसी के खिलाफ फौजी ऑपरेशन जारी रहेंगे. उल्लेखनीय है कि घाटी में सेना ने आतंकवादियों के खिलाफ ऑपरेशन ऑल आउट शुरू कर रखा है, जिसके तहत यहां सक्रिय आतंकवादियों को मारा जा रहा है. जाहिर तौर पर ये फौजी ऑपरेशन सफल साबित हो रहे हैं, क्योंकि आए दिन किसी न किसी क्षेत्र में झड़पों के दौरान स्थानीय और गैर स्थानीय आतंकवादियों को मारा जाता है. 18 नवंबर को उत्तरी कश्मीर के बांदीपुरा जिले में एक ऐसे ही फौजी ऑपरेशन में लश्करे तैयबा से जुड़े छह गैर कश्मीरी आतंकवादियों को मार गिराए जाने के बाद पुलिस और सैन्य अधिकारियों ने एक साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया था कि आतंकवादियों के खिलाफ जारी ऑपरेशन सफलता के साथ जारी हैं. इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में घाटी में तैनात सेना की पंद्रहवीं कोर के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल जेएस संधू और राज्य पुलिस के प्रमुख शिशपाल वेद ने आंकड़े बताते हुए कहा था कि इस वर्ष अब तक सेनाओं के हाथों 190 आतंकवादी मारे गए, जिनमें 110 विदेशी और 80 कश्मीरी आतंकवादी शामिल थे. मारे गए 190 आतंकवादियों में वो 66 आतंकवादी भी शामिल हैं, जो इस साल लाइन ऑफ कंट्रोल पर घुसपैठ करते हुए मारे जा चुके हैं. जनरल संधू और डॉ. वेद का कहना था कि फोर्स ने इस साल 60 से ज्यादा कश्मीरी नौजवानों को हिंसा की राह पर जाने से रोका है, यानि ये वो कश्मीरी नौजवान थे जो मिलिटेंट बनने की ताक में थे और उन्हें ऐसा करने से रोका गया. हाल में दक्षिणी कश्मीर में एक फुटबॉलर माजिद खान, जो आतंकवादी बन चुका था, समेत दो आतंकवादियों के घर वापस लौटने से भी फोर्सेज और पुलिस का हौसला बढ़ा है. इसके बाद ही फोर्सेज और पुलिस ने घोषणा की कि हिंसा का रास्ता त्यागने वाले कश्मीरी आतंकवादियों को नई जिंदगी बसर करने के लिए सहायता दी जाए.

मिलिटेंसी को अब भी मिल रहा अवामी सपोर्ट!

इसके बावजूद सुरक्षा एजेंसियों के लिए ये बात चिंताजनक है कि मिलिटेंट्‌स को सार्वजनिक स्तर पर मदद जारी है. इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 18 नवंबर को बांदीपुरा में छह आतंकवादियों के मारे जाने के एक दिन बाद यानी 19 नवंबर को घाटी में हड़ताल की गई. यह हड़ताल सैयद अली गिलानी, मीरवाइज उमर फारुक और मोहम्मद यासीन मलिक की संयुक्त प्रतिरोधी नेतृत्व ने बुलाई थी, जबकि बांदीपुरा जिले में लोगों ने खुद हड़ताल की. इसी तरह दक्षिणी कश्मीर के त्राल कस्बे में 20 नवंबर को एक 17 वर्षीय कश्मीरी आतंकवादी आदिल रशीद के मारे जाने पर लोगों ने दो दिन तक शोक हड़ताल की. आदिल की नमाज-ए-जनाजा में हजारों लोग शामिल हुए थे. टिप्पणीकारों का मानना है कि आतंकवादियों को अवामी सपोर्ट सुरक्षा एजेंसियों और सरकार के लिए एक ऐसा मसला है, जिसका हल ताकत के जरिए नहीं निकाला जा सकता है. वरिष्ठ पत्रकार और दैनिक ‘चट्‌टान’ के संपादक ताहिर मोहियुद्दीन ने इस विषय पर चौथी दुनिया से बात करते हुए कहा कि इसमें कोई दो राय नहीं है कि कश्मीर में मिलिटेंसी को अवामी सपोर्ट हासिल है.

यही कारण है कि पिछले 27 सालों में सुरक्षा बल इस मिलिटेंसी को पूरी तरह से खत्म करने में असफल रहे हैं. ताहिर मोहियुद्दीन का मानना है कि कश्मीर के हालात को सामान्य करने और मिलिटेंसी से छुटकारा पाने के लिए नई दिल्ली के पास इसके अलावा कोई चारा नहीं है कि वो कश्मीर मसले का सियासी हल निकालने के लिए ठोस कदम उठाए और एक सियासी अमल शुरू करे. उन्होंने कहा कि कैदियों की रिहाई और नौजवानों के खिलाफ केसों को वापस लेने जैसे कदम सराहनीय करार दिए जा सकते हैं. लेकिन ये समझना कि केवल सद्भावना के इन कदमों और फौजी ऑपरेशन के बल पर ही सब कुछ ठीक होगा, यह एक बहुत बड़ा छलावा है, क्योंकि न तो विश्वास बहाली के कदम कश्मीर के लिए नए हैं और न ही फौजी ऑपरेशन. ये सब चीजें अतीत में भी होती रही हैं. पिछले 27 वर्षों के दौरान सुरक्षा बल मिलिटेंटों के खिलाफ अपनी कार्रवाई जारी रखे हुए हैं. अब तक हजारों मिलिटेंट मारे जा चुके हैं, लेकिन सच्चाई ये है कि न यहां मिलिटेंसी खत्म हुई और न ही मिलिटेंटों का हौसला कम हुआ. ताहिर मोहियुद्दीन का मानना है कि कश्मीर में शांति के लिए राजनीतिक प्रक्रिया जारी रहना अनिवार्य है.

कश्मीर में 27 वर्षों की हिंसा के दौरान यह बात साबित हो चुकी है कि नई दिल्ली की तरफ से कश्मीर के सियासी मसले को नजरंदाज कर सिर्फ शांति कायम करने की इच्छा सदैव असफल साबित हुई है. कश्मीरी जनता का प्रतिरोध और अलगाववादी नेतृत्व हमेशा नई दिल्ली के मंसूबों के आड़े आई है. हालांकि नए वार्ताकार ने हुर्रियत लीडरों के साथ भी बातचीत करने की राय जाहिर की है. लेकिन फिलहाल इसकी कोई संभावना नजर नहीं आ रही है. इसके कई कारण हैं, पहला तो एनआईए ने अलगाववादी लीडरशिप का दायरा तंग किया हुआ है. लगभग पांच महीने से एनआईए कश्मीर में आतंकवाद की फंडिंग के केस की जांच कर रही है. इस वक्त हुर्रियत के नेताओं समेत दर्जन भर लोग तिहाड़ जेल में बंद हैं.

एनआईए के चक्रव्यूह में फंसे हुर्रियत नेता

हकीकत ये है कि जब से घाटी में एनआईए सक्रिय हुई है, हुर्रियत लीडरशिप लगातार दबाव में नजर आ रही है. घाटी में इस वक्त एक आम धारणा यह है कि नई दिल्ली ने हुर्रियत लीडरों को एनआईए के चक्र में फंसाकर शांति कायम करने के लिए दो स्तरों पर काम शुरू कर दिया है. एक तरफ मिलिटेंसी के खिलाफ ताकतवर फौजी मुहिम शुरू कर दी गई और दूसरी तरफ सामाजिक और राजनीतिक सतह पर लोगों को करीब लाने के लिए एक वार्ताकार तैनात कर दिया गया है. इतना ही नहीं, मोदी सरकार बार-बार इस बात का इशारा दे चुकी है कि वो जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले सांविधानिक प्रावधान को खत्म करना चाहती है, ताकि इस राज्य का भारत में पूरी तरह से विलय हो. मोदी सरकार की इस रणनीति को लेकर सियासी हलकों में इस वक्त कई सवाल चर्चा का विषय बने हुए हैं. मसलन क्या कश्मीर में फौज द्वारा मिलिटेंटों के खिलाफ शुरू की गई मुहिम ऑपरेशन ऑलआउट के फलस्वरूप क्या वास्तव में   मिलिटेंसी हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी, यानि क्या सुरक्षा बलों की अन्य एजेंसियां इस बार वो सब कर दिखाएंगी, जो पिछले 27 साल में नहीं हुआ. क्या पाकिस्तान में मिलिटेंसी का समर्थन करने वाले हलके इसे खामोशी से देखते रहेंगे और इसे स्वीकार भी करेंगे? क्या हुर्रियत लीडरों को कश्मीर में पूरी तरह अप्रासंगिक बनाया जा सकता है? क्या आम कश्मीरियों को विश्वास बहाली जैसे कदमों के जरिए खामोश किया जा सकता है? क्या ये सब कर कश्मीर में पूर्ण शांति बहाल कर दुनिया को संतुष्ट किया जा सकता है कि यहां सब कुछ ठीक हो गया? ये वो सवाल हैं जिनका जवाब भविष्य के गर्भ में है. फिलहाल ये कहा जा सकता है कि अगर ये सारी चीजें इतनी आसानी से हो गईं और कश्मीर में हर तरफ शांति बहाल हो जाएगी तो इस एतिहासिक सफलता का सेहरा यकीनन मोदी सरकार के सर जाएगा. लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ और अतीत की तरह एक बार फिर हालात नहीं सुधरे, तो नई दिल्ली के पास कश्मीर का सियासी मसला हल करने के लिए एक प्रभावी राजनीतिक प्रक्रिया शुरू करने के अलावा और कोई दूसरा रास्ता नहीं बचेगा.