पार्टी पर क़ब्ज़ा अब शरद के ख़िलाफ़ मोर्चा

nitish-sharadकहा जाता है कि राजनीति में वक्त से ज्यादा शक्तिशाली कोई नहीं होता है. भारतीय राजनीति में शरद यादव की शख्सियत ऐसी थी कि देश के बड़े से बड़े नेता भी एक बार शरद यादव के खिलाफ जाने या कुछ बोलने से हिचकते थे. लेकिन समय के साथ शरद यादव का भी जलवा घटता चला गया और अब स्थिति यह हो गई कि उन्हें जदयू से भी बेआबरू होकर बाहर आना पड़ा. तीर निशान पर शरद यादव के दावे को चुनाव आयोग ने खारिज कर नीतीश को जदयू का असली वारिस बताया. बात यही ठहर जाती तो खैरियत होती पर अब तैयारी उनको राज्यसभा से बेदखल करने की है. जदयू के थिंक टैंक काफी गंभीरता से इस काम में लगे हैं और सूत्र बताते हैं कि राज्यसभा के सभापति जल्द ही इस मामले में फैसला लेने वाले हैं.

शरद यादव को लेकर नीतीश कुमार के दिल में खटास कोई नई नहीं थी, लेकिन नीतीश कुमार ने संयम बनाए रखा और कोशिश की कि जब तक बर्दाश्त किया जा सकता है किया जाए. महागठबंधन के निर्माण से लेकर उसके विध्वंस तक ऐसी बहुत सारी बातें हुईं जिसे नीतीश कुमार ने बर्दाश्त किया और यह कोशिश की कि बाहर कोई गलत संदेश नहीं जाए. लेकिन महागठबंधन टूटनेे के बाद शरद यादव ने जब अपनी एकदम अलग लाइन लेनी शुरू कर दी तो नीतीश कुमार के सब्र का पैमाना टूट गया. लेकिन इसके बाद भी नीतीश कुमार ने कभी भी सार्वजनिक मंच से शरद यादव को भला बुरा नहीं कहा. राजद से भ्रष्टाचार समेत कई मद्दों को लेकर तल्खी बढ़ने पर नीतीश कुमार ने सितंबर में महागठबंधन छोड़ दिया था और एनडीए के साथ मिलकर सरकार बनाई थी.

शरद यादव को नीतीश का यह फैसला नागवार गुजरा था. शरद ने बागी तेवर अख्तियार करके अपना अलग गुट बना लिया. तब शरद ने कहा था कि जनता ने महागठबंधन को पांच साल के लिए वोट दिया था, बीच में इसे तोड़ना जनता के साथ धोखा है. इतना ही नहीं, गुजरात चुनाव से पहले शरद गुट ने चनाव आयोग में दावा किया था कि असली पार्टी उनके साथ है और पार्टी सिंबल पर भी उनका हक है. जब शरद खेमा लालू प्रसाद के संपर्क में आकर चुनाव आयोग की दहलीज तक चला गया तो  फिर नीतीश कुमार ने भी बोलना शुरू कर दिया. एक बार चुनाव आयोग से झटका खाने के बाद शरद यादव दोबारा चुनाव आयोग की शरण में गए, लेकिन एक बार फिर उन्हें मुंह की खानी पड़ी.

शरद खेमे की ओर से समर्थन को लेकर दिए गए साक्ष्य को चुनाव आयोग ने अपर्याप्त करार देते हुए कहा कि पार्टी और चुनाव चिन्ह नीतीश खेमे के पास रहेगा. आयोग ने अपने फैसले में कहा कि शरद यादव गुट को न पार्टी के राष्ट्रीय परिषद के सदस्यों और न ही सांसदों व विधायकों का समर्थन हासिल है. चुनाव आयोग के फैसले के बाद शरद यादव की राज्यसभा की सदस्यता बनाए रखने का दावा भी कमजोर हो गया है. गुजरात विधानसभा चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के ठीक पहले दिए गए फैसले में चुनाव आयोग ने शरद यादव गुट के दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया. नीतीश कुमार ने जदयू को लेकर किए गए फैसले पर कहा कि सच्चाई की जीत होती है. यह स्वाभाविक है. जिस वक्त मुख्यमंत्री ने एक आयोजन में यह प्रतिक्रिया दी उस वक्त वहां कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और महागठबंधन सरकार में मंत्री रहे अशोक चौधरी भी मौजूद थे. श्री चौधरी की ओर मुखातिब होते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि कांग्रेस के एक बड़े नेता जदयू के खिलाफ वकील थे. कितनी फीस लेते थे वह. उन्होंने कहा कि तीर को लेेकर हमारे मन में किसी तरह का संदेह नहीं था. जदयू महासचिव संजय झा ने शरद को मुखौटा बताते हुए इसे कांग्रेस की हार करार दिया है. चुनाव आयोग के फैसले का स्वागत करते हुए संजय झा ने कहा कि यह होना ही था.

दरअसल शरद यादव गुट अपने पक्ष में राजस्थान के 10 सदस्यों में से केवल दो सांसदों और दो विधायकों के समर्थन का ही हलफनामा पेश कर पाया. इनमें महाराष्ट्र में पार्टी के एक विधायक के समर्थन का हलफनामा नीतीश गुट ने भी पेश किया था. शरद यादव गुट पूरी तरह से राष्ट्रीय अधिवेशन में भाग लेने वाले सदस्यों में अपने बहुमत के सहारे पार्टी और चुनाव चिन्ह पर दावा कर रही थी.इस गुट का कहना था कि अप्रैल 2016 में पार्टी राष्ट्रीय अधिवेशन में जिन 1098 सदस्यों ने हिस्सा लिया था, उनमें 450 सदस्य शरद गुट के साथ हैं.

नीतीश के साथ जदयू का बहुमत

लेकिन चुनाव आयोग ने नीतीश गुट के इन तर्कों को तवज्जो दिया कि पार्टी के आंतरिक चुनाव अक्टूबर 2016 में राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव के साथ संपन्न हुए, जिसमें राष्ट्रीय परिषद के 195 सदस्य चुने गए थे. यही नहीं, पार्टी ने उसी महीने इस बारे में चुनाव आयोग को बता दिया था और आयोग ने अपनी वेबसाइट पर भी इसे अपडेट कर दिया था. चुनाव आयोग का कहना था कि उस समय किसी ने भी राष्ट्रीय परिषद के सदस्यों के चुनाव पर सवाल नहीं उठाया था. इससें यह साफ है कि इस पर सभी की सहमति थी. चुनाव आयोग ने माना कि राष्ट्रीय परिषद के 195 सदस्यों में से 138 ने हलफनामा दाखिल कर नीतीश कुमार का समर्थन किया है. पार्टी के लोकसभा के दो और राज्यसभा के सात सांसद भी नीतीश कमार के साथ हैं. बिहार में सभी जदयू विधायकों ने भी नीतीश पर भरोसा जताया है. चुनाव आयोग के फैसले के बाद शरद गुट ने वकीलों से सलाह-मशविरा करने का निर्णय लिया है. शरद गुट के नेता एवं पूर्व सांसद अली अनवर ने बताया कि चुनाव आयोग के फैसले के बारे में पहले से अंदेशा था. अब वकीलों से सलाह लेने के बाद आगे का कदम उठाया जाएगा. उन्होंने कहा कि जनता की अदालत सबसे बड़ी अदालत है. उसमें हमलोगों को जरूर इंसाफ मिलेगा. रास्ता हमलोगों ने नहीं बदला है. दूसरी तरफ जदयू के प्रदेश प्रवक्ता एवं विधान पार्षद नीरज कुमार ने चुनाव आयोग के फैसलेे की सराहना करते हुए कहा कि आयोग के निर्णय से शरद यादव को जवाब मिल गया है. असली पार्टी नीतीश कुमार के साथ है. जबसे शरद, लालू यादव की संगत में आए हैं उन पर इसका असर दिखने लगा है. अब शरद जी लालटेन सिर पर लेकर घूमिए और तेजस्वी यादव जिंदाबाद के नारे लगाइए. चुनाव आयोग द्वारा जदयू के चुनाव चिन्ह ‘तीर’ पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के दावे को सही ठहराने पर पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह ने खुशी जाहिर की. उन्होंने  कहा कि चुनाव आयोग ने हमारे इस दावे को सही माना. इसके लिए हम आयोग के प्रति आभार प्रकट करते हैं. आयोग के फैसले के बाद अब पार्टी गुजरात में चुनाव लड़ेगी.

पार्टी पर दावा बरकरार रहने और तीर निशान मिलने के बाद जदयू के हौसले बुलंंद हैं. सूत्रों पर भरोसा करें तो नीतीश कुमार ने अपनी दिल्ली ऑपरेशन की टीम को शरद के खिलाफ कदम उठाने के लिए ग्रीन सिग्नल दे दिया है. इस टीम में सांसद आरसीपी सिंह, केसी त्यागी, संजय झा और ललन सिंह प्रमुख हैं. इस टीम ने राज्यसभा के सभापति वैंकेया नायडू को पुख्ता कागजातों के साथ इस बात का आवेदन दे दिया है कि शरद यादव और अली अनवर की राज्यसभा की सदस्यता को समाप्त कर दिया जाए. जानकार बताते हैं कि चूंकि अब पार्टी के स्वामित्व के विवाद को चुनाव आयोग ने निपटा दिया है, इसलिए अब वैंकेया नायडू को अपना फैसला लेेने में सहूलियत होगी. शरद खेमा बार बार कह रहा है कि केंद्र की सरकार हमलोगों के खिलाफ नीतीश कुमार को मदद कर रही है. शरद यादव कहते हैं कि सचमुच अब डबल इंजन लग गया है, लेकिन हम हार मानने वाले लोग नहीं हैं. लेकिन जानकार बता रहे हैं कि जो तथ्य  हैं, उस आधार पर शरद यादव को अपनी सदस्यता बचाने में बहुत मिुश्कल होगी. ज्यादा संभावना इस बात की है कि उन्हें अपनी सदस्यता से हाथ धोना पड़ सकता है. सबसे बड़ा संकट यह है कि जदयू खेमा चाहता है कि जल्द से जल्द शरद यादव की सदस्यता खत्म हो और इसके लिए गंभीर प्रयास भी कर रहा है. अगर  जल्द ही शरद यादव को लेकर कोई उल्टी खबर आती है तो इस पर आश्चर्य नहीं होगा.